सीफॉलजी: चुनावी आंकड़ों का ताना-बाना

सीफॉलजी एक आकर्षक करियर है। कड़ी मेहनत के दम पर इस क्षेत्र में सफलता हासिल की जा सकती है। इसके बारे में बता रही हैं नमिता सिंह-
किसी भी लोकतांत्रिक देश में लोगों को वोट देने से लेकर सरकार के गठन की प्रक्रिया तक के बारे में जानने की उत्सुकता रहती है। इसके लिए वे कई माध्यमों से अपनी जिज्ञासा शांत करने की कोशिश करते हैं। अभी हाल ही में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी कमोबेश यही स्थिति रही। इस चुनाव में जो चीज तेजी से उभर कर सामने आई, वह एग्जिट पोल के नतीजों की विश्वसनीयता थी, क्योंकि चुनाव के बाद जो नतीजे आए, वे काफी हद तक एग्जिट पोल के निष्कर्ष का समर्थन करने वाले थे। न सिर्फ दिल्ली विस चुनाव, बल्कि बीते लोकसभा चुनाव व उप्र विस चुनाव 2012 में भी एग्जिट पोल के संकेत सही साबित हुए थे। ये एग्जिट पोल अथवा इलेक्शन सर्वे आसानी से किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचते। इसके लिए कुछ खास लोगों की महीनों की मेहनत व लम्बी कवायद छिपी होती है। ये खास लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें राजनीतिक, सामाजिक, जातिगत, जनसांख्यिकी व पिछले कुछ चुनावों के आंकड़ों की बारीकी से जानकारी होती है। इन प्रोफेशनल्स को सीफॉलजिस्ट (चुनाव विश्लेषक) तथा इस पूरी विधा को सीफॉलजी (चुनाव विश्लेषण) कहते हैं।
कैसा है यह क्षेत्र
सीफॉलजी तेजी से उभरता हुआ एक आकर्षक करियर है। इसमें विभिन्न स्रेतों से जुटाई गई जानकारियों एवं आंकड़ों का जम कर विश्लेषण करने के बाद कोई निष्कर्ष निकाला जाता है। यह काम बेहद चुनौतीपूर्ण एवं मेहनत वाला है। खासकर चुनाव के दिनों में सीफॉलजिस्टों की सिरदर्दी और बढ़ जाती है। उन्हें चुनाव की पड़ताल करने, आंकड़े एकत्र करने और राजनीतिक सलाह देने जैसे कार्य करने पड़ते हैं। इसके लिए उन्हें कई तरह के रिसर्च कार्य, यात्राएं, लोगों से मेल-मिलाप आदि में जुटना पड़ता है। अपने इन्हीं निष्कर्षों एवं जुटाई गई जानकारियों के आधार पर वे चुनाव परिणाम की धुंधली सी तस्वीर सामने ला पाते हैं। देखा जाए तो पिछले कुछ वर्षों से मीडिया व राजनीतिक दल इन सीफॉलजिस्टों पर पूरी तरह से निर्भर हो गए हैं।
कब कर सकेंगे कोर्स
वैसे तो इसके लिए अलग से किसी खास कोर्स का संचालन नहीं किया जाता, लेकिन पोस्ट ग्रेजुएशन में राजनीति शास्त्र, समाजशास्त्र अथवा सांख्यिकी की डिग्री हासिल कर चुके छात्र इसके लिए उपयुक्त समझे जाते हैं। इस क्षेत्र की कार्यशैली व गंभीरता को देखते हुए इसमें पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स को ही मुफीद माना जाता है। यदि छात्र के पास राजनीति शास्त्र, समाजशास्त्र अथवा सांख्यिकी में से किसी एक में डॉक्टरेट की डिग्री है तो उसे वरीयता दी जाती है।
राजनीतिक समझ आवश्यक
यह ऐसा प्रोफेशन है, जिसमें राजनीतिक आंकड़ों का ताना-बाना बुनने के साथ ही जनसांख्यिकी पैटर्न को गहराई से समझना जरूरी होता है। साथ ही जातिगत समीकरणों व राजनीतिक हलचलों से खुद को अपडेट रखना पड़ता है। एक अच्छा सीफॉलजिस्ट बनने के लिए यह आवश्यक है कि प्रोफेशनल्स जातिगत एवं मतों के ध्रुवीकरण को बखूबी समझें, अन्यथा वे एक स्वस्थ व निर्विवाद निष्कर्ष पर कभी नहीं पहुंच पाएंगे। इन प्रमुख गुणों के साथ-साथ उन्हें परिश्रमी व धर्यवान भी बनना होगा। उनके पास पिछले कुछ चुनावों का आंकड़ा भी होना चाहिए। कम्प्यूटर व इंटरनेट की जानकारी उन्हें कई तरह से लाभ पहुंचा सकती है।
रोजगार के भरपूर अवसर
सफलतापूर्वक कोर्स करने के बाद सीफॉलजिस्ट के पास कई अवसर हैं। चुनाव के कुछ दिन पूर्व से लेकर सरकार के गठन होने तक इनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। रिसर्च कराने वाली एजेंसियों, टेलीविजन चैनल, समाचार पत्र-पत्रिकाओं आदि को इन लोगों की जरूरत होती है। इसके अलावा पॉलिटिकल एडवाइज, टीचिंग, संसदीय कार्य तथा पॉलिटिकल रिपोर्टिंग में इन लोगों की बेहद मांग है। यदि प्रोफेशनल्स किसी संस्था अथवा बैनर से जुड़ कर काम नहीं करना चाहते तो वे स्वतंत्र रूप से भी अपनी सेवाएं दे सकते हैं।
सेलरी
इसमें सेलरी की कोई निश्चित रूपरेखा नहीं होती। चुनावी दिनों में सीफॉलजिस्ट मोटे पैकेज पर एक प्रोजेक्ट विशेष के लिए अपनी सेवाएं देते हैं, जबकि टीचर व एनालिस्ट के रूप में वे आसानी से 30-35 हजार रुपए प्रतिमाह कमा सकते हैं। यदि वे फ्रीलांसर के तौर पर काम कर रहे हैं तो उनके लिए आमदनी के कई रास्ते होते हैं। आज कई ऐसे चुनाव विश्लेषक हैं जो लाखों रुपए महीना कमा रहे हैं तथा उनसे जुड़ कर अन्य कई लोगों को भी काम और पैसा मिल रहा है।
कुछ प्रमुख कोर्स
बीए इन पॉलिटिकल साइंस
बीए इन सोशियोलॉजी
बीए इन स्टैटिस्टिक्स
एमए इन पॉलिटिकल साइंस
एमए इन सोशियोलॉजी
एमए इन स्टैटिस्टिक्स
फायदे व नुकसान
चुनावी विश्लेषणों से बनती है पहचान
कुछ खास दिनों में मिलता है मोटा पैसा
आंकड़ों के उलझने से तनाव की स्थिति
कई बार घंटों सिर खपाने के बाद भी नतीजा शून्य
एक्सपर्ट व्यू
लगातार अध्ययन से कर सकते हैं बेहतर
एग्जिट पोल का सर्वप्रथम चलन 16वें दशक में अमेरिका में उस समय देखने को मिला था, जब वहां व्यवहारवादी आंदोलन चलाया गया था। तर्क यह दिया गया कि जिस तरह से मौसम विज्ञानी अपनी साइंटिफिक एप्रोच के जरिए पूर्वानुमान लगाते हैं, क्यों न राजनीति में भी इस टर्म को प्रयोग में लाया जाए। इसके लिए वहां के दार्शनिकों ने लाइब्रेरी में बैठ कर डाटा कलेक्शन या भविष्यवाणी न कर लोगों के बीच में जाकर डेमोक्रेसी की सफलता व असफलता को परखने का सुझाव दिया। क्योंकि यदि व्यक्ति तत्काल में कोई प्रतिक्रिया देता है तो उसमें 60-70 फीसदी सच्चाई होती है। यहीं से एग्जिट पोल अपने प्रचलन में आया। आज दिन-ब-दिन सच होते एग्जिट पोल के नतीजों ने इस पूरी विधा को सराहनीय मंच दिया है। सही मायने में सेफॉलजी एक ऐसा कार्य है, जिसमें मानवीय व्यवहार को गहराई से परखते हुए किसी निष्कर्ष तक पहुंचा जाता है। युवाओं के लिए सीफॉलजी एक रोचक करियर के रूप में सामने आया है। लड़कियां भी इसमें तेजी से आ रही हैं। उम्मीद है कि आने वाले समय में यह बहुत बड़ा सेक्टर बन जाएगा। इस क्षेत्र में अध्ययन बहुत जरूरी है, तभी इसमें टिके रह सकते हैं। यूजीसी को चाहिए कि इस ट्रेंड को पकड़ते हुए ग्रेजुएशन व पोस्ट ग्रेजुएशन स्तर पर नया कोर्स शुरू करे।
- डॉ. रजनीकांत पाण्डेय,
एसोसिएट प्रोफेसर, दीनदयाल उपाध्याय
विश्वविद्यालय, गोरखपुर

प्रमुख संस्थान
सीफॉलजी एक ऐसी कला है, जिसकी पूरी बुनियाद राजनीति शास्त्र, समाजशास्त्र व सांख्यिकी विषयों की मदद से रखी जाती है। इसलिए जिन विश्वविद्यालयों में उपरोक्त विषयों से संबंधित ग्रेजुएशन व पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स कराए जाते हैं, वे सभी सीफॉलजिस्ट का कौशल सीखने का साधन बनते हैं। कुछ प्रमुख विश्वविद्यालय अथवा संस्थान निम्न हैं-
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
वेबसाइट
- www.bhu.ac.in
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
वेबसाइट
- www.du.ac.in
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली
वेबसाइट
- www.jnu.ac.in
इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीटय़ूट, कोलकाता
वेबसाइट-
www.isical.ac.in
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर  वेबसाइट- www.ddugu.edu.in
यूनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान, जयपुर

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