Wednesday, September 19, 2018

सॉइल साइंस में कॅरिअर

शिक्षण से लेकर रिसर्च और मिट्टी के संरक्षण से लेकर कंसल्टिंग जैसे कई अवसर कॅरिअर विकल्प के रूप में सॉइल साइंटिस्ट के लिए उपलब्ध हैं। एग्रीकल्चरल रिसर्च काउंसिल अपने सभी रिसर्च संस्थानों के साथ मृदा वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी नियोक्ता है। इसके अलावा सॉइल साइंटिस्ट डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर, विश्वविद्यालयों, कृषि सहकारी समितियों, खाद निर्माताओं और रिसर्च संस्थानों के द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। 

एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन के रूप में मृदा एक अहम तत्व है। मृदा विज्ञान में मिट्टी का अध्ययन एक प्राकृतिक संसाधन के रूप में किया जाता है। इसके अंतर्गत मृदा निर्माण, मृदा का वर्गीकरण, मृदा के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक गुणों और उर्वरकता का अध्ययन किया जाता है। बीते सालों में फसल उत्पादन, वन उत्पाद और कटाव नियंत्रण में मिट्टी के महत्व को देखते हुए मृदा विज्ञान के क्षेत्र में रोजगार के ढेरों अवसरों का सृजन हुआ है। अब देश भर में बड़ी संख्या में सॉइल टेस्टिंग व रिसर्च लैबोरेट्रीज स्थापित हो रही हैं। इनमें से हरेक को प्रशिक्षित पेशेवरों की जरूरत होती है, जो मिट्टी के मापदंडों का मूल्यांकन कर सकें ताकि उसकी गुणवत्ता को सुधारा जा सके। ऐसे में यह क्षेत्र रोजगार के अवसरों से भरपूर है।

क्या करते हैं सॉइल साइंटिस्ट


सॉइल साइंटिस्ट या मृदा वैज्ञानिक का प्राथमिक काम फसल की बेहतरीन उपज के लिए मृदा का विश्लेषण करना है। मृदा वैज्ञानिक मृदा प्रदूषण का विश्लेषण भी करते हैं, जो उर्वरकों और औद्योगिक अपशिष्ट से उत्पन्न होता है। इन अपशिष्टों को उत्पादक मृदा में परिवर्तित करने के लिए उपयुक्त तरीके और तकनीकियां भी वे विकसित करते हैं। इन पेशेवरों के वर्क प्रोफाइल में बायोमास प्रॉडक्शन के लिए तकनीकियों का इस्तेमाल शामिल है। वनस्पति पोषण, वृद्धि व पर्यावरण गुणवत्ता के लिए भी वे काम करते हैं। उर्वरकों का उपयोग सुझाने में भी मृदा वैज्ञानिक की भूमिका अहम होती है। सॉइल साइंस प्रोफेशनल मृदा प्रबंधन पर मार्गदर्शन करते हैं। चूंकि मृदा वैज्ञानिक रिसर्चर, डवलपर और एडवाइजर होते हैं, इसलिए वे अपने ज्ञान का इस्तेमाल बेहतरीन मृदा प्रबंधन के लिए करते हैं। मिट्टी की उर्वरकता और पानी के सही इस्तेमाल के लिए वे सलाह देते हैं। मिट्टी के अधिकतम सही उपयोग के लिए भी मृदा वैज्ञानिक जिम्मेदार होते हैं। मृदा क्षरण को वे रोकते हैं और यह भी सुनिश्चित करते हैं कि मिट्टी की उर्वरकता बरकरार और बेहतर रहे। मृदा वैज्ञानिक फील्ड के साथ-साथ लैबोरेट्री में काम करते हैं। वे डेटा बैंक, सिम्युलेशन मॉडल्स और कम्प्यूटर का उपयोग करते हैं।

क्या पढ़ना होगा


अध्ययन के मुख्य क्षेत्रों में सॉइल केमिस्ट्री, माइक्रोबायोलॉजी, फिजिक्स, पेडोलॉजी, मिनरोलॉजी, बायोलॉजी, फर्टिलिटी, प्रदूषण, पोषण, बायोफर्टिलाइजर, अपशिष्ट उपयोगिता, सॉइल हेल्थ एनालिसिस शामिल हैं। छात्र सॉइल साइंस में बैचलर या मास्टर डिग्री ले सकते हैं। साथ ही वे सॉइल फॉर्मेशन (वह प्रक्रिया जिससे मिट्टी बनती है।), सॉइल क्लासिफिकेशन (गुणों के अनुसार मिट्टी का वर्गीकरण), सॉइल सर्वे (मिट्टी के प्रकारों का प्रतिचित्रण), सॉइल मिनरोलॉजी (मिट्टी की बनावट), सॉइल बायोलॉजी, केमिस्ट्री व फिजिक्स (मिट्टी के जैविक, रसायनिक व भौतिक गुण), मृदा उर्वरकता (मृदा में कितने पोषक तत्व है), मृदा क्षय जैसे क्षेत्रों में स्पेशलाइजेशन कर सकते हैं।

कॅरिअर के विकल्प


शिक्षण से लेकर रिसर्च और संरक्षण से लेकर कंसल्टिंग जैसे कई अवसर कॅरिअर विकल्प के रूप में मृदा वैज्ञानिकों के लिए उपलब्ध हैं। कृषि, वॉटर रिहैबिलिटेशन प्रोजेक्ट्स, सॉइल एंड फर्टिलाइजर टेस्टिंग लैबोरेट्रीज, ट्रांसपोर्टेशन प्लानिंग, आर्कियोलॉजी, मृदा उत्पादकता, लैंडस्केप डवलपमेंट जैसे क्षेत्रों में मृदा वैज्ञानिकों की खासी मांग है। क्रॉप एडवाइजर से लेकर संरक्षणकर्ता बनने तक सॉइल साइंस यानी मृदा विज्ञान में अनगिनत अवसर हैं। पर्यावरण और एग्रो-कंसल्टिंग फर्म्स में इस क्षेत्र के पेशेवरों की प्रबंधकीय और एग्जीक्यूटिव पदों पर खासी जरूरत है। ऐसा चलन न केवल भारत, बल्कि विदेशों में है। इस फील्ड में रिसर्च आपको आईसीएआर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुंचता सकती है। इतना ही नहीं फसल उत्पादकता और मृदा स्वास्थ्य को बरकरार रखने के लिए आने वाले सालों में अधिक रोजगार उत्पन्न होगा।

अवसर


एग्रीकल्चरल रिसर्च काउंसिल अपने सभी रिसर्च संस्थानों के साथ मृदा वैज्ञानिक की सबसे बड़ी नियोक्ता है। इसके अलावा मृदा वैज्ञानिक डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर, विश्वविद्यालयों, कृषि सहकारी समितियों, खाद निर्माताओं और रिसर्च संस्थानों के द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। मृदा वैज्ञानिक अपना व्यवसाय भी शुरू कर सकते हैं। वे एनालिस्ट या मृदा सर्वेक्षक और डवलपमेंट कंसल्टेंट के रूप में काम कर सकते हैं। वे अपने सेवाएं एग्रीकल्चरल इंडस्ट्री, डवलपमेंट, कॉपरेटिव, कॉमर्शिलय बैंक के कृषि विभागों को दे सकते हैं।

यहां से करें कोर्स


इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट, पूसा
http://www.iari.res.in/

तमिलनाडु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, कोयंबटूर
http://www.tnau.ac.in/

पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, लुधियाना
http://www.pau.edu/

यूनिवर्सिटी ऑफ कलकत्ता, कोलकाता
http://www.caluniv.ac.in/

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, वाराणसी
http://www.bhu.ac.in/

Sunday, September 16, 2018

एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस में करियर

एविएशन का नाम आते ही आसमान में उड़ने का मन करता है लेकिन यदि आप बनाना चाहते हो हो एविएशन में अपना करियर तो आप कहाँ पर अपनी लाइफ बना सकते हो। एविएशन सेक्टर (Aviation Sector) में हो रहे लगातार विस्तार से रोजगार के अवसरों में काफी इजाफा हुआ है। ऐसे में बहुत से अवसर हैं कई लोग सोचते हैं केवल पायलट या एयर होस्टेस तक ही एविएशन में जॉब सीमित हैं,  लेकिन ऐसा कतई नही है क्योंकि इनके इलावा भी आप एविएशन में अपना करियर बना सकते हो। इसी लाइन में में एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर (AME) भी बहुत अच्छा विकल्प है।
एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर की कार्य प्रकृति कैसी है उसका क्या काम होता है: किसी भी जहाज की तकनीकी जिम्मेदारी एएमई के ऊपर होती है। हर उड़ान के पहले एएमई जहाज का पूरी तरह से निरीक्षण करता है और सर्टिफिकेट जारी करता है कि जहाज उड़ान भरने को तैयार है। इस काम के लिए उसके पास पूरी तकनीकी टीम होती है। कोई भी विमान एएमई के फिटनेस सर्टिफिकेट के बिना उड़ान नहीं भर सकता। गौरतलब है कि एक हवाईजहाज के पीछे करीब 15-20 इंजीनियर काम करते हैं। इसी से इनकी जरूरत का अनुमान लगाया जा सकता है।
कैसे बन सकते हो आप एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर बन सकते हो: जैसे की पायलट बनने के लिए लाइसेंस लेने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है वैसे ही एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर बनने के लिए भी लाइसेंस लेना पड़ता है। यह लाइसेंस डायरेक्टर जनरल ऑफ सिविल एविएशन द्वारा प्रदान किया जाता है। कोई भी संस्थान, जो इससे संबंधित कोर्स कराता है, उसे भारत सरकार के विमानन मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाले डीजीसीए से इसके लिए अनुमति लेनी होती है। जो इंस्टिट्यूट इससे मान्यता प्राप्त हैं उनसे भी आप ये लाइसेंस हासिल कर सकते हैं।
एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर बनने के लिए क्या शैक्षणिक योग्यता की आवश्कयता होनी चाहिए: जो विद्यार्थी इस कोर्स के लिए आवेदन करना चाहते हैं, उनके लिए फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथेमेटिक्स विषयों की पढ़ाई जरूरी है। पीसीएम से 12वीं उत्तीर्ण विद्यार्थी एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियरिंग से संबंधित पाठ्यक्रमों में दाखिला ले सकते हैं। कोर्स के दौरान मैकेनिकल इंजीनियरिंग और वैमानिकी की विभिन्न शाखाओं के बारे में जानकारी दी जाती है।
एविएशन सेक्टर में कहाँ मिलेंगे अवसर: ऐसे तकनीकी प्रोफेशनल्स के लिए देश-विदेश में सभी जगह मौके हैं। एयर इंडिया, इंडिगो, इंडियन एयरलाइन्स, जेट एयरवेज, स्पाइस जेट, गो एयर जैसे एयरलाइंस में तो मौके मिलते ही हैं, इसके अलावा देश के तमाम हवाईअड्डों और सरकारी उड्डयन विभागों में भी रोजगार के बेहतरीन अवसर उपलब्ध होते हैं। भारत में ही करीब 450 कंपनियां हैं, जो इस क्षेत्र में रोजगार प्रदान करती हैं। एएमई का शुरुआती वेतन 20-30 हजार हो सकता है, जिसमें अनुभव और विशेष शिक्षा के साथ बढ़ोतरी होती जाती है। इसके साथ-2 आप विदेशी या प्राइवेट कंपनियो जो प्राइवेट एयरक्राफ्ट की सुविधा उपलब्ध कराती उनमे भी आप अपना करियर चुन सकते हो
देश में कौन कौनसे मुख्य संस्थान हैं जहाँ पर एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर के लिए कोर्स किया जा सकता है: जो संस्थान संबंधित कोर्स कराने का इच्छुक होता है, उसको डीजीसीए से मान्यता लेनी होती है। ऐसे कुछ प्रमुख संस्थान हैं-
  • जेआरएन इंस्टीट्यूट ऑफ एविएशन टेक्नोलॉजी, नई दिल्ली
  • भारत इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोनॉटिक्स, पटना एयरपोर्ट, पटना
  • इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोनॉटिक्स साइंस, कोलकाता
  • एकेडमी ऑफ एविएशन इंजीनियरिंग, बेंगलुरु
  • आंध्र प्रदेश एविएशन एकेडमी, हैदराबाद

Saturday, September 15, 2018

इम्यूनोलॉजी में पीएचडी

 हमारे शरीर को बीमारियों से बचाने के लिए इसके अंदर सक्रिय प्रतिरक्षा तंत्र या इम्यून सिस्टम से जुड़ी बारीकियों का अध्ययन करने में रूचि रखने वाले कर सकते हैं, इम्यूनोलॉजी में पीएचडी के लिए आवेदन। बॉयोलॉजी के इस परिष्कृत क्षेत्र में शोध के लिए नई दिल्ली स्थित नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ इम्यूनोलॉजी ने आवेदन मंगवाए हैं। नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ इम्यूनोलॉजी नई दिल्ली में जेएनयू कैंपस के पास ही स्थित है। इसके रिसर्च प्रोग्राम में आवेदन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। आवेदन ऑनलाइन है। अंतिम तिथि 31 दिसंबर है।
रिसर्च के विकल्प
नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ इम्यूनोलॉजी ने जिन एरियाज में रिसर्च के लिए पीएचडी के प्रस्ताव मंगवाए हैं, वे इस प्रकार हैं- इंफेक्शन एंड इम्यूनिटी, जेनेटिक्स मॉलिक्यूलर एंड सेलुलर बायोलॉजी, केमिकल, स्ट्रेक्चरल एंड कंप्यूटेशनल बायोलॉजी, रीप्रोडक्शन एंड डेवलपमेंट। रिसर्च के ये सभी एरियाज इंटरडिसीप्लीनरी एरियाज हैं। रूचि होने पर आप अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं।
क्या है योग्यता
आवेदक ने साइंस की ब्रांच में एमएससी या एमटेक या एमबीबीएस या एमवीएससी या एमफार्म या समकक्ष कोर्स किया हो। बारहवीं और ग्रेजुएशन में उसके कम से कम 60 फीसदी अंक हों। मास्टर डिग्री में उसे कम से कम 55 फीसदी अंक मिले हों। फाइनल ईयर के छात्र भी इस कोर्स के लिए आवेदन कर सकते हैं।
कैसे होगा चयन
चयन के लिए कुल दो माध्यम निर्धारित हैं-
1. प्रवेश परीक्षा- यह नई दिल्ली, हैदराबाद, पुणे और कोलकाता में होगी। 2. दिसंबर में होने वाली जेजीईईबीआईएलएस के स्कोर के जरिए। इन आवेदकों को अलग से आवेदन करना होगा।
कैसे करें आवेदन
आवेदन के लिए www.nii.res.in पर जाएं, ऑनलाइन आवेदन करें। आवेदन शुल्क जनरल/ ओबीसी/ शावि के लिए 500 रूपए है। एससी/एसटी के लिए 250 रूपए है। आवेदन 1 नवंबर से 31 दिसंबर तक कर सकते हैं।

Tuesday, September 11, 2018

न्यूट्रिशनिस्ट में करियर

संतुलित डाइट के महत्व से तो हर कोई वाकिफ है लेकिन अपनी उम्र, शारीरिक क्षमता, कार्य की प्रकृति और दैनिक रुटीन के हिसाब से डाइट कैसी होनी चाहिए, इसको लेकर अध‍िकांश लोग भ्रमित रहते हैं। सही डाइट से जुड़ी हमारी शंकाएं दूर करते हैं डायटीशियन और न्यूट्रिशनिस्ट। अगर आप हेल्दी लाइफस्टाइल के साथ रोमांचक करियर चाहते हैं, तो यह फील्ड आपके लिए बढ़िया है। 
लोगों की बदली जीवनशैली और खानपान की खराब आदतों का सबसे ज्यादा असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसीलिए हाल के दिनों में लोगों के बीच बैलेंस्ड डाइट को लेकर जागरूकता बढ़ी है। हालांकि बैलेंस्ड डाइट व्यक्ति विशेष की अपनी जरूरतों पर आधारित होती है, इसीलिए इसे लेकर लोगों में अक्सर भ्रम भी रहता है। इसी भ्रम को दूर करके फूड न्यूट्रिएंट्स के हिसाब से हमें सुझाव देते हैं डायटीशियन और न्यूट्रिशनिस्ट। अगर आपको भी फूड साइंस और न्यूट्रिशन में रुचि है, तो आप इसमें करियर प्लान कर सकते हैं।
क्या है न्यूट्रिशन एंड डायटेटिक्स?
यह फूड साइंस से जुड़ा एक ऐसा कोर्स है, जिसमें फूड न्यूट्रिएंट्स के बारे में अध्ययन किया जाता है। इसी के आधार पर बड़े स्तर पर लोगों में न्यूट्रिशन से जुड़ी समस्याओं को पहचानकर उन्हें दूर करने के लिए सामाजिक और तकनीक के स्तर पर समाधान तलाशे जाते हैं। यही नहीं, सरकारी इकाइयों और स्वास्थ्य से जुड़े संस्थानों को भी इन्हीं के अनुसार स्वास्थ्य नीति में बदलाव के सुझाव दिए जाते हैं।
कौन-से कोर्स?
इस फील्ड में करियर प्लान करने के लिए 12वीं में फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी जैसे विषय लेकर पढ़ने वाले विद्यार्थी होम साइंस व फूड साइंस एंड प्रॉसेसिंग में बीएससी, फूड साइंस एंड माइक्रोबायोलॉजी, न्यूट्रिशन, न्यूट्रिशन एंड फूड साइंस और न्यूट्रिशन एंड डायटेटिक्स में बीएससी ऑनर्स कर सकते हैं। इसके अलावा डायटेटिक्स एंड न्यूट्रिशन में डिप्लोमा और फूड साइंस एंड पब्लिक हेल्थ न्यूट्रिशन में डिप्लोमा भी किया जा सकता है। ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद आप इन्हीं विषयों में एमएससी कर सकते हैं। इस फील्ड में रिसर्च का भी काफी स्कोप है। हायर स्टडीज करने वाले विद्यार्थियों को इस फील्ड में मौके भी बहुत मिलते हैं। 
जरूरी स्किल्स 
अगर आपको फूड इंग्रीडिएंट्स में रुचि है और अलग-अलग पकवानों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री में मौजूद न्यूट्रिएंट्स के बारे में पढ़ना व उनके हिसाब से डाइट में परिवर्तन करना पसंद है, तो आप इस फील्ड में जरूर आएं क्योंकि इसमें आपको नियंत्रित डाइट का सही प्लान बनाने का तरीका सिखाया जाता है। बॉडी मास इंडेक्स के हिसाब से आप अपना खुद का फूड चार्ट भी डिजाइन कर सकते हैं।
भविष्य की संभावनाएं 
आप सरकारी क्षेत्र और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे संस्थानों में अपना करियर बना सकते हैं। अमूमन इस फील्ड में चार तरह के न्यूट्रिशनिस्ट काम करते हैं:
क्लिनिकल न्यूट्रिशनिस्ट 
ये हॉस्पिटल्स, आउटपेशेंट क्लिनिक्स और नर्सिंग होम्स में काम करते हैं। इसमें आपको रोगियों की बीमारियों
के हिसाब से उनका डाइट चार्ट प्लान करना होगा।
मैनेजमेंट न्यूट्रिशनिस्ट 
ये न्यूट्रिशनिस्ट क्लिनिकल और फूड साइंस एक्सपर्ट्स होते हैं। ये बड़े संस्थानों में काम करने वाले एक्सपर्ट्स का
मैनेजमेंट करते हैं। इसके अलावा इन्हें न्यूट्रिशनिस्ट्स की प्रोफेशनल ट्रेनिंग की जिम्मेदारी भी दी जाती है।
कम्युनिटी न्यूट्रिशनिस्ट 
ये सरकारी स्वास्थ्य एजेंसियों, हेल्थ एंड फिटनेस क्लब्स और डे-केयर सेंटर्स में काम करते हैं। इस क्षेत्र में किसी व्यक्ति विशेष के लिए काम न करके पूरे समुदाय पर फोकस किया जाता है।
मैनेजमेंट न्यूट्रिशनिस्ट 
ये न्यूट्रिशनिस्ट क्लिनिकल और फूड साइंस एक्सपर्ट्स होते हैं। ये बड़े संस्थानों में काम करने वाले एक्सपर्ट्स का
मैनेजमेंट करते हैं। इसके अलावा इन्हें न्यूट्रिशनिस्ट्स की प्रोफेशनल ट्रेनिंग की जिम्मेदारी भी दी जाती है।
न्यूट्रिशन एडवाइजर 
ये एक्सपर्ट्स बिना किसी संस्थान से जुडे, किसी डॉक्टर की तरह अपनी स्वतंत्र प्रैक्टिस करते हैं और लोगों को न्यूट्रिशन से जुड़ी सलाह व मार्गदर्शन देते हैं। इस तरह की फ्रीलांसिंग में भी अच्छी संभावनाएं हैं। 
प्रमुख संस्थान 
- नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन, हैदराबाद
- जेडी बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ होम साइंस, कोलकाता
- लेडी अर्विन कॉलेज, दिल्ली 
- एसएनडीटी विमेंस यूनिवर्सिटी, मुंबई
- ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हाइजीन एंड पब्लिक हेल्थ, कोलकाता
- मुंबई यूनिवर्सिटी

Monday, September 10, 2018

कोरियोग्राफर में बनाए करियर

डांस सिखाना यानि कोरियोग्राफर बनना आज कल युवाओं की पसंद बन रहा है.यह एक पैसा और नाम देने वाला करियर है और फिल्म इंडस्ट्री में अच्छे कोरियोग्राफर की डिमांड रात दिन बढ़ती जा रही है.लेकिन इसमें करियर बनाने की सोचने से पहले यह जान लें की कोरियोग्राफी केवल डांस करना ही नहीं है बल्कि दूसरों को नए तरह का डांस सिखाना है. इसलिए सब तरह के डांस, डांसिंग स्टेप्स और डांस को हर तरह के म्यूजिक पर डांस कर सकना ही कोरियोग्राफी है. चलिए जाने डांस मैं करियर कैसे करे कोरियोग्राफर कैसे बने.

कोरियोग्राफर कैसे बने:

कुछ लोगो को बचपन से ही डांस करने का बहुत शौक होता हैं. ऐसे लोग बचपन से डांस सीखते हैं या ऐसे भी उन् लोगो को बहुत अच्छा डांस आता. जो लोग डांस में माहिर होते हैं उन् लोगो के घर में भी बहुत सारे डांस कम्पटीशन’से  जीती हुई ट्रॉफीज होती हैं. ऐसे लोग बढ़े होकर भी अपनी डांस को कंटिन्यू रखना चाहते हैं और डांस मैं अपना करियर बनाना चाहते हैं. लेकिन जिन लोगो को यह अच्छी तरह से पता ही नहीं होता कि उन्हें डांस में करियर बनाने के लिए क्या क्या करने की ज़रूरत हैं उन् लोगो का सपना तो अधूरा ही रह जाता हैं.
लेकिन हमारा सवाल यह हैं की अगर हुनर और जज्बा हैं तो क्यों हमारा कोई भी सपना अधूरा रहे.आज हम अपने इस लेख में आप लोगो को यह बताएँगे की हम डांस मैं अपना करियर बनाने के लिए क्या क्या तरीका अपना सकते हैं.आप लोगो को बस हमारे इस लेख में दिए गए कुछ ट्रिक्स को ध्यान से पढ़ने की और फॉलो करने की ज़रूरत हैं.यकीं मानिये इन् ट्रिक्स को फॉलो करके आप लोग डांस मैं अपना करियर बनाने में कामयाब जरूर हो जायेंगे.
डांस में करियर कैसे बनाये अपने डांस को हमेशा कंटिन्यू रखे:
आपको अगर डांस करने में रूचि हैं और आप डांस मैं अपना करियर बनाना चाहते हैं तोह आप अपने डांस को कभी भी ऑफ मत रखिए.हमारा कहने का मतलब हैं की आप हो सके तो रोज या दो तीन दिन के बाद बाद अपने घर में ही डांस की प्रैक्टिस करिए.आप अगर चाहे तोह एक कमरे को लॉक करके उस कमरे में अपने डांस की प्रैक्टिस कर सकते हैं. आप अगर अपने डांस को एक दम से बंद न करके उसको कंटिन्यू रखेंगे तो आपको डांस में एक्सपीरियंस बना रहेगा और आपको डांस करने में किसी भी तरह की gilt का एहसास नहीं होगा.
स्कूल, कॉलेज etc. में हो रही डांस कॉम्पेटीशन्स में भाग ले:
अगर आप डांस मैं अपना करियर बनाने मैं इंटरेस्टेड हैं तो आप स्कूल, कॉलेज और बाकि छोटे मोटे functions में होने वाले डांस competitions में भाग लेते रहे. ऐसे छोटे मोटे competitions में भाग लेते रहने से आपकी ऐम्बर्रसमेंट वाली फीलिंग ख़तम हो जायेगी और जब आपको किसी के सामने डांस करने से ऐम्बर्रसमेंट का एहसास नहीं होगा तब आप अपने डांस को खुल के कर पाएंगे और डांस मैं अपना करियर बनाने में और डांस की दुनिया में अपनी एक जगह बनाने में कामयाब हो जायेंगे.
डांस क्लास ज्वाइन कर सकते हैं:
अगर आप डांस मैं अपना करियर बनाना चाहते हैं तोह इस के लिए आपका डांस में माहिर होना बहुत ज़रूरी हैं. और मैं अपने आप को पक्का और निपुण बनाने के लिए आप लोग एक डांस क्लास ज्वाइन कर सकते हैं. ऐसा करने से डांस के प्रति आपका जूनून और डांस मैं आपका नॉलेज दोनों की वृद्धि होगी. और तभी आप डांस के लिए परफेक्ट माने जायेंगे.
कोरियोग्राफर कैसे बने:
कोरियोग्राफर बनने के लिए ज़रूरी है की आप को डांस करने का बहुत शौक हो. इसके लिए सबसे पहले आप किसी अच्छे डांस स्कूल में प्रवेश लें और डांस के बेसिक स्टेप्स को जान लें जिससे किसी के भी सामने आप कुछ डांस कर के बता सकें. अब डांस की पढाई करनी होगी. कोरियोग्राफी को सिखाने के लिए हर जगह स्कूल या यूनिवर्सिटी नहीं है इसलिए आपको कुछ जगहों पर उपलब्ध डांस की ही संस्थाओं में प्रवेश लेना होगा. कुछ प्रमुख संस्थाएं जो कोरियोग्राफी सिखाती हैं
  • संगीत नाटक अकादमी न्यू डेल्ही,
  • नाटय इंस्टिट्यूट ऑफ़ कथाक एंड कोरियोग्राफी बंगलोरे
  • फैकल्टी ऑफ आर्ट्स इन यूनिवर्सिटी मैसोरे
  • स्कूल ऑफ फाइन आर्ट्स एंड म्यूजिक, इंदौर
  • कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी
  • महात्मा गांधी मिशन संगीत अकादमी औरंगाबाद,
  • शिवाजी यूनिवर्सिटी कोल्हापुर
  • गर्ल्स कॉलेज इंदौर
  • फ्लेम स्कूल ऑफ़ आर्ट्स पुणे
  • बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी वाराणसी,
प्राइवेट इंस्टिट्यूट में भी डांस सिखएं:
जब आप गवर्नमेंट के इन इंस्टिट्यूट से डांस में डिग्री या डिप्लोमा ले लें तो यह मत समझिए कि आपकी डांस की पढाई पूरी हो गयी है.इसके बाद अप्प प्राइवेट संस्थानों से डांस की पढाई करें. कुछ प्रमुख संस्थान जो कोरियोग्राफी सिखाते हैं उनके नाम हैं थे|:
  • डांसवर्क्स परफार्मिंग आर्ट्स अकादमी, मुम्बई
  • र न्यू डेल्ही, शामक डावर इस्टिट्यूट फॉर परफार्मिंग आर्ट्स, मुम्बई
  • श्रुति संगीत विद्यालय जळगाव आदि हैं.
अब किसी मुम्बई के ग्रुप को ज्वाइन करें:
जब आप प्राइवेट इंस्टिट्यूट से भी डांस सीख लें उसके बाद आप मुम्बई के किसी डांस ग्रुप को ज्वाइन कर लें. वैसे तो डांस ग्रुप हर जगह होते हैं पर मुंबई में रहकर आप प्रोड्यूसर और डायरेक्टर्स से संपर्क भी कर सकते हैं इसलिए डांस में करियर बनाने के लिए मुम्बई ही सबसे सही जगह है.
जॉब में ज़्यादा से ज़्यादा सीखें:
अपने इतना सीखा है इसका मतलब यह नहीं कि आप अपने आपको सबसे अच्छा कोरियोग्राफर समझने लगें. याद रखें पढाई के दौरान सीखने में और जॉब करते समय सीखने में बहुत अंतर होता है. इसलिए जब आप डांस ग्रुप ज्वाइन करें तो आप ज़्यादा से ज़्यादा अनुभव लेने की कोशिश करें.
विडियो CDs से सीखें:
आप कुछ फॉरेन कोरियोग्राफर के डांसेज की CDs खरीद लें. जब आप खाली हों तो आप डांस की CDs चलाकर उनके स्टेप्स को नोट करें और सोचें कि इस स्टेप में और क्या नया हो सकता है. यह सभी नए स्टेप जो आप बना रहे हैं उसे आप अकेले में परफॉर्म करके अपने वीडियो कैमरे में रिकॉर्ड कर लें जिससे की आप यह डांस स्टेप्स भूलेंगे नहीं और समय पर आप किसी प्रोड्यूसर और डायरेक्टर को वह स्टेप्स करके दिखा सकते हैं.
प्रोड्यूसर और डायरेक्टर से संपर्क करें:
जब आपको यकीन हो जाए कि किसी गाने की कोरियोग्राफी आप कर सकते हैं और आपके पास अनेकों नए डांस स्टेप्स हैं तब आप फिल्म प्रोड्यूसर और डायरेक्टर से संपर्क करें और उन्हे पहली मुलाकात में ही हु डांस स्टेप दिखाएँ की फिल्म प्रोड्यूस और डायरेक्टर्स आप से प्रभवित हुए बिना नहीं रह सके और आपको की कोरियोग्राफी करने का अवसर दें. वैसे तो अनेक फिल्म प्रोड्यूसर अच्छे’ कोरियोग्राफर की तलाश करते हैं पर कुछ बड़े बैनर जिनके साथ काम करके आप अपना भविष्य संवार सकते हैं बालाजी टेलीफिल्म्स, मुक्ता आर्ट्स, एरोस इंटरनेशनल, उत्व मोशन पीक्चर्स, भंसाली प्रोड्यूक्शन्स,यश राज प्रोड्यूक्शन्स, धर्मं प्रॉड्यूक्शन्स, विशेष फिल्म्स, राजश्री प्रोड्यूक्शन्स हैं.
क्या सैलरी होती है:
इस करियर में अनुभव के आधार पर सैलरी मिलते है. एक फ्रेशर कोरियोग्राफर के तौर पर 400 से 500 रूपए प्रति घंटा प्राप्त करता है जबकि कुछ अनुभव हो जाने पर कोरियोग्राफर को 2000 रूपए प्रति घंटे तक मिल जाते हैं.फ़िल्म इंडस्ट्रीज से जुड़े अनुभवी और सफल कोरियोग्राफर एक साल में 20 लाख रूपए तक कमा लेते हैं.
आप को यह अच्छी तरह से समझ में आ गया होगा की डांस में करियर कैसे बना सकते हैं या डांस में करियर बनाने के के लिए हम किन किन तरीको को अपना सकते हैं. हम तो आप लोगो से बस यही कहेंगे कि अपने इस पैशन को ऐसे ही ठंडा मत हो जाने दीजिये 

Friday, September 7, 2018

उगाएं धन की वनस्पति

पौधे और फूल न केवल हमारे उद्यानों में सुंदरता फैलाते हैं और हमारे जीवन को ताजगी देते हैं बल्कि हमारी बुनियादी आवश्यकताओं तथा औषधियों के लिए महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक सामग्रियों के रूप में कार्य करते हैं। पौधे ऐसे रासायनिक कारखाने होते हैं जो मनुष्य के लिए उपयोगी सभी प्रकार के उत्पाद देते हैं। भोजन के अतिरिक्त पौधे कागज, भवन सामग्री, द्रव्यों, गोंद, कपड़ों, औषधियों और कई अन्य उत्पादों के लिए कच्चा माल देते हैं। उदाहरण के लिए एलोवेरा पौधा क्रीम तथा चिकित्सा द्रव्यों में प्रयोग में लाया जाता है। इन सब बातों का अध्ययन वनस्पति विज्ञान में किया जाता है। वनस्पति विज्ञान में वनस्पति जगत में पाए जाने वाले सब पेड़-पौधों का अध्ययन होता है। जीव विज्ञान का यह एक प्रमुख अंग है। दूसरा प्रमुख अंग प्राणी विज्ञान है। सभी जीवों को जीवन निर्वाह करने, वृद्धि करने, जीवित रहने और जनन के लिए भोजन या ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। यह ऊर्जा सूर्य से प्राप्त होती है। सूर्य में परमाणु के विखंडन या तरंगों के रूप में चलकर यह ऊर्जा पृथ्वी पर आती है। केवल पौधों में ही इस ऊर्जा के ग्रहण करने की क्षमता विद्यमान है। पृथ्वी के अन्य सब प्राणी पौधों से ही ऊर्जा प्राप्त  करते हैं। अतः विज्ञान में वनस्पति के अध्ययन का विशिष्ट और बड़े महत्त्व का स्थान है।
प्रमुख शिक्षण संस्थान
* कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर
* हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी, शिमला
* नौणी विश्वविद्यालय, सोलन (हिप्र)
* अमरावती विश्वविद्यालय, अमरावती
* इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
* आंध्र विश्वविद्यालय वाल्टेयर, विशाखापट्टनम
* गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर (पंजाब)
* अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़
* लखनऊ यूनिवर्सिटी, उत्तरप्रदेश
* कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी, कुरुक्षेत्र
* जम्मू यूनिवर्सिटी, जम्मू
शैक्षणिक योग्यता
साइंस संकाय में बायोलॉजी, फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स विषयों के साथ दस जमा दो उत्तीर्ण होना अनिवार्य है। स्नातक कोर्स के लिए इस विषय की स्ट्रीम के छात्र दाखिला ले सकते हैं। बीएससी, एमएससी, एमफिल के बाद पीएचडी की उपाधि भी हासिल की जा सकती है।
वेतनमान
वनस्पति विज्ञान में सरकारी और निजी क्षेत्र में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं। सरकारी क्षेत्र में अध्यापन या शोध के क्षेत्र में सरकारी  मानकों के अनुसार वेतन मिलता है। अध्यापन और शोध के क्षेत्र में आरंभ में लगभग 30 हजार से वेतन शुरू होता है। इसके अलावा प्राइवेट सेक्टर  में  भी कंपनियां अच्छे वेतनमान पर इस फील्ड के एक्सपर्ट्स को रखती हैं।
उत्पत्ति और विकास
वनस्पति जगत के सदस्य अत्यंत सूक्ष्म से लेकर अत्यंत विशालकाय तक होते हैं। इसकी शुरुआत शैवाल पौधे के अध्ययन से शुरू होती है। यह सबसे साधारण और प्राचीनतम वनस्पति है। यह अपना भोजन स्वयं बनाता है। आज कई प्रकार के गूढ़ आकार के भी शैवाल पाए जाते हैं। शैवालों से ही पृथ्वी पर के अन्य सब पौधों के उत्पन्न होने का अनुमान वैज्ञानिकों ने लगाया है। वनस्पतियों के अध्ययन में सबसे पहला कदम पेड़ पौधों का नामकरण और वर्गीकरण है। जब तक उनके नाम का पता न लगे और वे पहचान में न आएं, तब तक उनके अध्ययन का कोई महत्त्व नहीं है। अतः वनस्पति विज्ञान का सबसे पुराना और सबसे अधिक महत्त्व का विभाग वर्गिकी या वर्गीकरण विज्ञान है। इसमें केवल नाम का ही पता नहीं लगता, अपितु पेड़ पौधों के पारस्परिक संबंध का अध्ययन कर उन्हें विभिन्न समूहों में रखा भी जाता है।
अवसर कहां-कहां
विश्वविद्यालयों, कालेजों से वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में स्नातक योग्यता प्राप्त करने वाले छात्रों के लिए कई प्रकार के रोजगार उपलब्ध हैं। जैसे कि ब्रीडर के रूप में, पार्क रेंजर, पादप रोग विज्ञानी, पारिस्थितिकीविद, प्रोफेसर, अध्यापक, कृषि परामर्शदाता, अनुसंधानकर्ता, उद्यान विज्ञानी, नर्सरी प्रबंधक।
दीर्घकालीन करियर की संभावना
व्यापक शिक्षा तथा अनुभव के आधार पर वनस्पति विज्ञानी बना जा सकता है। उसके बाद किसी वनस्पति विज्ञानी के रूप में उन्नति की संभावना सामान्यतः उसकी विश्वविद्यालय डिग्री पर निर्भर होती है। व्याख्यात्मक प्रकृति विज्ञानी, पर्यावरण सुधार तकनीशियन अथवा अनुसंधान सुविधाओं में प्रयोगशाला तकनीशियन के रूप में कार्य किया जा सकता है। कई व्यक्ति पर्यावरण, बागबानी या कृषि से जुड़े क्षेत्रों में परामर्शदाता के रूप में कार्य करते हैं जबकि अन्य व्यक्ति अनुसंधान तथा अध्यापन के क्षेत्र में कार्य करने का निर्णय भी ले सकते हैं।
पर्यावरण संरक्षक के साथ रोजगारपरक भी
शहरी इलाकों में तबदील हो रहे गांव हमारे भविष्य के लिए सवाल बन गए हैं। जहां पर्यावरण को लेकर कई बड़ी मुश्किलें खड़ी हो रही हैं, वहीं शहरी इलाकों में तबदील हुए गांवों में युवा कृषि को छोड़कर रोजगार तलाश कर रहे हैं। लेकिन रोजगार के अवसर इतने अधिक नहीं हैं कि युवाओं का भविष्य संवर सके। इसी बीच वनस्पति विज्ञान जहां पर्यावरण को बेहतर करने के लिए एक अहम कदम है, वहीं युवाओं को रोजगार के नए अवसर भी प्रदान कर रहा है।
स्नातक योग्यता डिग्री वालों के लिए अवसर
निजी क्षेत्र- औषधि कंपनियां, नर्सरी, जैव प्रौद्योगिकी फर्में, खाद्य कंपनियां,  तेल उद्योग, फल उत्पादक, बीज कंपनियां, रसायन कंपनियां, कागज कंपनियां, सरकारी क्षेत्र- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, भारतीय वन सेवा, कृषि।

Wednesday, September 5, 2018

डिजास्टर मैनेजमेंट में करियर

इन दिनों पूरी दुनिया में प्राकृतिक आपदाओं का दौर जारी है। बाढ़ के कारण चीन और पाकिस्तान जैसे देशों में हजारों लोगों की जान चली गई। वहीं लेह में बादल फटने के सैंकड़ों लोग मारे गए। हालांकि सूखा, बाढ़, चक्रवाती तूफानों, भूकम्प, भूस्खलन, वनों में लगनेवाली आग, ओलावृष्टि और ज्वालामुखी फटने जैसी विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है, न ही इन्हें रोका जा सकता है लेकिन इनके प्रभाव को एक सीमा तक जरूर कम किया जा सकता है, जिससे जान-माल का कम से कम नुकसान हो। प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में डिजॉस्टर मैनेजनेंट यानी आपदा प्रबंधन से जुड़े लोग माहिर होते हैं। प्राकृतिक आपदाओं को देखते हुए आने वाले समय में यह हॉट करियर ऑप्शन हो सकता है। 

डिजास्टर मैनेजमेंट की जरूरत क्यों?

हर साल प्राकृतिक आपदाओं के कारण दुनिया भर में हजारों-लाखों लोगों की जान चली जाती है। इस मामले में भारत भी काफी संवेदनशील देश है। देश के कई हिस्से में हर साल बाढ़ की समस्या आम है। भारत में बहुत से क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं के लिए अति संवेदनशील हैं। एक अनुमानित आंकडा बताता है कि पिछले बीस सालों में पूरे विश्व में जमीन खिसकने, भूकंप, बाढ, सुनामी, बर्फ की चट्टान सरकने और चक्रवात जैसी आपदाओं में लगभग तीस लाख से अधिक लोगों की जान चली गई। विश्व भर में आईं प्राकृतिक आपदाओं में लगभग 90 प्रतिशत विकासशील देशों के हिस्से पडीं। देश की 70 प्रतिशत खेतिहर जमीन सूखे की आशंका की जद में है। वहीं कुल जमीन का 60 फीसदी हिस्सा भूकंप के प्रति संवेदनशील है, 12 प्रतिशत बाढ और 8 प्रतिशत चक्रवात के लिए। जब प्राकृतिक आपदाओं का पैमाना इतना बड़ा हो तो आपदा प्रबंधन से जुड़े लोगों की जरूरत होती ही है, ताकि जान-मान का नुकसान कम से कम हो।

क्या करते हैं पेशेवर ?
आपदा प्रबंधन से जुड़े पेशेवर प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य जीवन बहाल करने का कार्य करते हैं। यह प्रबंधक ऐसे विशेषज्ञ लोगों के समूह का मुखिया होता है, जिनकी सेवाएं आपदा के समय अनिवार्य होती है। जैसे-डॉक्टर, नर्स, सिविल इंजीनियर, दूरसंचार विशेषज्ञ, वास्तुशिल्प, इलेक्ट्रीशियन इत्यादि। आपदा प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौती आपदाग्रस्त सीमा-क्षेत्र और होनेवाली क्षति का आकलन करना है। इससे इस क्षेत्र का कार्य अत्यधिक वैज्ञानिक प्रक्रिया का रूप ले लेता है। आपदाग्रस्त क्षेत्रों की भौगोलिक एवं आर्थिक स्थितियों के कारण चुनौती और भी बढ़ जाती है।

प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के केंद्र सरकार और राज्य सरकारें आवश्यक धन उपलब्ध कराती हैं। इन सबमें मुख्य सरकारी एजेंसी के रूप में गृह मंत्रालय बडी भूमिका निभाता है। वह आपदा के समय डिजास्टर मैनेजमेंट का कार्य संभालता है। कृषि एवं सहकारिता मंत्रालय सूखे और अकाल के वक्त अपनी जिम्मेदारियां निभाता है। वहीं, अन्य विपदाओं के लिए दूसरे मंत्रालय भी जिम्मेदार होते हैं, जैसे- हवाई दुर्घटनाओं के लिए सिविल एविएशन मिनिस्ट्री, रेल दुर्घटनाओं के लिए रेल मंत्रालय, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय और परमाणु ऊर्जा मंत्रालय आदि भी विभिन्न प्रकार की विपदाओं के समय जिम्मेदारियां निभाते हैं। डिजास्टर मैनेजमेंट में प्रशिक्षित लोग आपदा के वक्त बहुमूल्य होते हैं।

कौन बन सकता है आपदा प्रबंधक?

कोई भी व्यक्ति यह कार्य कर सकता है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति दिन-प्रतिदिन अपने-अपने स्तर पर आपदा प्रबंधन का कार्य करते हैं। यदि किसी व्यक्ति के मन में जनसेवा का भाव है और वह अत्यधिक दबाव तथा तनावपूर्ण स्थितियों में कार्य कर सकता है। उसका जोश बना रहता है तथा आपदा एवं भारी खतरे होने के बावजूद वह पूरे उत्साह से दिन भर कार्य कर सकता है, तो वह व्यक्ति प्रभावी आपदा प्रबंधक बन सकता है।

पहल सरकार की
भारत सरकार ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण पहल की। मानव संसाधन मंत्रालय ने दसवीं पंचवर्षीय परियोजना में डिजास्टर मैनेजमेंट को स्कूल और प्रोफेशनल एजुकेशन में शामिल किया था। वर्ष 2003 में पहली बार केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने आठवीं कक्षा के सामाजिक विज्ञान विषय के पाठ्यक्रम में इसे जोडा। फिर आगे की कक्षाओं में और सरकारी व गैर सरकारी उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में भी डिजास्टर मैनेजमेंट की पढ़ाई होनी लगी।

किस तरह के कोर्स

देश के कई प्रबंधन संस्थान डिजास्टर मैनेजमेंट में सर्टिफिकेट से लेकर पीजी डिप्लोमा लेवल के कोर्स संचालित करते हैं। वहीं कई विश्वविद्यालय डिग्री लेवल कोर्स भी ऑफर कर रहे हैं। डिजास्टर मैनेजमेंट के कोर्स रेगुलर और डिस्टेंस लर्निग के माध्यम से भी कर सकते हैं।
भारतीय पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण संस्थान, नई दिल्ली एक ऐसा ही संस्थान है। यहां आपदा प्रबंधन में दो वर्ष का स्नातकोत्तर दूरवर्ती अध्ययन शिक्षा कार्यक्रम चलाया चलाया जा रहा है। इस कार्यक्रम के लिए न्यूनतम योग्यता किसी भी विषय में स्नातक है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय ने आपदा प्रबंधन का प्रमाण-पत्र कार्यक्रम शुरू किया है। देश में आपदा की गहनता में वृद्धि तथा अंतराल में होनेवाली कमी को ध्यान में रखते हुए छह माह का पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। भोपाल गैस त्रासदी के बाद आपदा प्रबंधन संस्थान (डीएमआई) की स्थापना की गई। यहां खतरनाक तत्वों के प्रबंधन, जोखिम विश्लेषण, स्थल पर तथा स्थल से बाहर आपात स्थितियों की योजना बनाने एवं प्राकृतिक आपदाओं के प्रबंधन से संबंधित प्रशिक्षण पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं।

योग्यता

सर्टिफिकेट कोर्स के लिए न्यूनतम योग्यता बारहवीं पास है, जबकि मास्टर डिग्री या पीजी डिप्लोमा के लिए न्यूनतम योग्यता स्नातक है। इस कोर्स में एडमिशन लेने वालों में हर परिस्थिति में काम करने का जज्बा जरूर होना चाहिए। कुछ संस्थान प्रोफेशनल के लिए भी सर्टिफिकेट कोर्स चलाते हैं।

पाठ्यक्रम
डिजास्टर मैनेजमेंट के तहत रिस्क असेसमेंट ऐंड प्रिवेंटिव स्ट्रैटेजीज, लेजिस्लेटिव स्ट्रक्चर्स फॉर कंट्रोल ऑफ डिजास्टर मिटिगेशन, ऐप्लिकेशन ऑफ जीआईएस इन डिजास्टर मैनेजमेंट, रेस्क्यू आदि विषय आते हैं। इसमें विभिन्न क्षेत्रों में स्पेशलाइजेशन भी किया जा सकता है, जैसे- माइनिंग, केमिकल डिजास्टर और टेक्निकल डिजास्टर वगैरह।

करियर की संभावनाएं

डिजास्टर मैनेजमेंट के क्षेत्र में आम तौर पर सरकारी नौकरियों में, आपातकालीन सेवाओं में, लॉ इन्फोर्समेंट, लोकल अथॉरिटीज, रिलीफ एजेंसीज, गैर सरकारी प्रतिष्ठानों और यूनाइटेड नेशन जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों में नौकरियों की अच्छी संभावनाएं हैं। प्राइवेट सेक्टर में भी आपको जॉब मिल सकती है, जैसे केमिकल, माइनिंग, पेट्रोलियम जैसी रिस्क इंडस्ट्रीज में। आमतौर पर इन इंडस्ट्रीज में डिजास्टर मैनेजमेंट सेल होता है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं रेडक्रॉस और यूएन प्रतिष्ठान भी प्रशिक्षित पेशेवर को काम पर रखते हैं। अनुभव हासिल करने के बाद खुद की कंपनी या फिर एजेंसी भी खोली जा सकती है।

इंस्टीट्यूट वॉच

u इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी (इग्नू), नई दिल्ली

u नॉर्थ बंगाल यूनिवर्सिटी, दार्जिलिंग

u इंटरनेशनल सेंटर ऑफ मद्रास यूनिवर्सिटी, चेन्नई

u सिक्किम मनिपाल यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ, मेडिकल ऐंड टेक्नोलॉजिकल साइंसेज, गंगटोक

u इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इकोलॉजी ऐंड एनवायरनमेंट, नई दिल्ली

u नेशनल सेंटर फॉर डिजास्टर मैनेजमेंट, इंद्रप्रस्थ एस्टेट, रिंग रोड, नई दिल्ली

u सेंटर फॉर सिविल डिफेंस कॉलेज, नागपुर

u एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन ट्रेनिंग ऐंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, हैदराबाद

u डिजास्टर मिटिगेशन इंस्टीट्यूट, अहमदाबाद

u एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन ट्रेनिंग ऐंड रिसर्च इंस्टीट्यूट हैदराबाद

u सेंटर फॉर डिजास्टर मैनेजमेंट, पुणे

u एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्टर मैनेजमेंट, नोएडा

u नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी, पटना

u राजर्षि टंडन ओपन यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद।

Sunday, August 26, 2018

डर्मेटोलॉजी

डिसिन में स्पेशलाइजेशन के लिए उपलब्ध विकल्पों में ‘डर्मेटोलॉजी’ काफी लोकप्रिय हो गया है। मौजूदा वक्त में ‘फर्स्ट इम्प्रेशन इज द लास्ट इम्प्रेशन’ कहावत को इतनी गंभीरता से लिया जा रहा है कि व्यक्ति के रूप को व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण अंग माना जाने लगा है। इस कारण लोगों में अपने रूप और व्यक्तित्व को लेकर चिंता का स्तर भी तेजी से बढ़ रहा है। यहां तक कि कॉलेज जाने वाले छात्र भी खुद को आकर्षक दिखाने की गरज से काफी रुपये खर्च कर रहे हैं।
अपने रूप को लेकर लोगों में गंभीरता का स्तर इस कदर बढ़ गया है कि वह चेहरे पर छोटा-सा मुंहासा हो जाने भर से परेशान हो उठते हैं। कई बार वह ऐसी परेशानियों को इस कदर अपने ऊपर हावी कर लेते हैं कि घर से बाहर निकलना भी छोड़ देते हैं। ऐसे माहौल में रूप निखारने का दावा करने वाली फेयरनेस क्रीमों की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। खुजली और घमौरियों (रैशेज) जैसे त्वचा संबंधी रोग आम हो चुके हैं। गर्मी और बरसात के मौसम में इनकी अधिकता काफी बढ़ जाती है। इनके सही उपचार के लिए डॉंक्टर का परामर्श जरूरी होता है। कई बार उपचार के लिए डॉंक्टर के पास कुछ दिनों या हफ्तों के अंतराल पर बार-बार जाने की जरूरत होती है। ऐसे में लोग अपनी त्वचा के लिए ज्यादा खर्च करने में जरा भी नहीं हिचकते।
त्वचा और रूप के प्रति लोगों के बढ़ती सजगता के कारण डर्मेटोलॉजिस्ट की मांग में इजाफा हो रहा है। डर्मेटोलॉजी मेडिसिन की एक शाखा है, जिसमें त्वचा और उससे संबंधित रोगों के निदान का अध्ययन किया जाता है। यह एक स्पेशलाइज्ड विषय है, जिसकी पढ़ाई एमबीबीएस के बाद होती है। डर्मेटोलॉजिस्ट रोगों के उपचार के अलावा त्वचा, बाल और नाखूनों से संबंधित कॉस्मेटिक समस्याओं का भी निदान करते हैं।
डर्मेटोलॉजिस्ट का काम
इनका मुख्य कार्य लोगों की उन बीमारियों का उपचार करना होता है, जो त्वचा, बाल, नाखूनों और मुंह पर दुष्प्रभाव डालती हैं। एलर्जी से प्रभावित त्वचा, त्वचा संबंधी दागों, सूर्य की रोशनी में झुलसे या अन्य तरह के विकारों से ग्रसित त्वचा को पूर्व अवस्था में लाने में ये रोगियों की मदद करते हैं। इसके लिए वह दवाओं या सर्जरी का इस्तेमाल करते हैं। त्वचा कैंसर और उसी तरह की बीमारियों से जूझ रहे रोगियों के उपचार में भी वह सहयोग करते हैं। क्लिनिक या अस्पताल में वह सबसे पहले मरीजों के रोग प्रभावित अंग का निरीक्षण करते हैं। जरूरी होने पर वह रोग की गंभीरता जांचने के लिए संबंधित अंग से रक्त, त्वचा या टिश्यू का नमूना भी लेते हैं। इन नमूनों के रासायनिक और जैविक परीक्षणों से वह पता लगाते हैं कि रोग की वजह क्या है। रोग का पता लगने के बाद उपचार शुरू कर देते हैं। इस कार्य में वह दवाओं, सर्जरी, सुपरफिशियल रेडियोथेरेपी या अन्य उपलब्ध उपचार विधियों का उपयोग करते हैं।
अन्य कार्य
कई बार शरीर में पोषक तत्वों की कमी के कारण भी त्वचा संबंधी रोग हो जाते हैं। ऐसे में डर्मेटोलॉजिस्ट रोगियों की स्थिति को देखते हुए उनके लिए ‘डाइट प्लान’ भी तैयार करते हैं। इसी तरह वह रोगियों को व्यायाम के साथ त्वचा और बालों की देखरेख से संबंधित सलाह भी देते हैं। इसके अलावा मरीजों के उपचार से संबंधित चिकित्सकीय दस्तावेजों (दी गई दवाओं और पैथोलॉजिकल जांच से संबंधित) का प्रबंधन भी उनके कार्यक्षेत्र का एक हिस्सा है।
करते हैं कॉस्मेटिक सर्जरी: चेहरे और अन्य अंगों को आकर्षक बनाने के लिए डर्मेटोलॉजिस्ट कॉस्टमेटिक सर्जरी भी करते हैं। त्वचा की झुर्रियों और दाग-धब्बों को खत्म करने के लिए वह डर्माब्रेशन जैसी तकनीक और बोटोक्स इंजेक्शन का इस्तेमाल करते हैं। इन तकनीकों के अलावा वह लेजर थेरेपी का भी उपचार में उपयोग करते हैं। इस तकनीक की मदद से वह झुर्रियों और त्वचा पर होने वाले सफेद दाग का ईलाज करते हैं।
योग्यता: फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी के साथ बारहवीं पास करके एमबीबीएस डिग्री प्राप्त करना डर्मेटोलॉजिस्ट बनने की पहली शर्त है। इसके बाद डर्मेटोलॉजी, वेनेरियोलॉजी और लेप्रोलॉजी में तीन वर्षीय एमडी या दो वर्षीय डिप्लोमा पाठय़क्रम की पढ़ाई की जा सकती है।
स्पेशलाइजेशन के लिए उपलब्ध विषय
मेडिकल डर्मेटोलॉजी         सर्जिकल डर्मेटोलॉजी
डर्मेटोपैथोलॉजी                हेअर एंड नेल डिस्ऑर्डर्स
जेनिटल स्किन डिजीज       पीडियाट्रिक डर्मेटोलॉजी
इम्यूनोडर्मेटोलॉजी             पब्लिस्टरिंग डिस्ऑर्डर्स
कनेक्टिव टिश्यू डिजीज     फोटोडर्मेटोलॉजी
कॉस्मेटिक डर्मेटोलॉजी      जेनेटिक स्किन डिजीज
संभावनाएं
डर्मेटोलॉजी विषय के पोस्ट ग्रेजुएट पाठय़क्रम की पढ़ाई के बाद आप किसी निजी अस्पताल, नर्सिंग होम या सरकारी डिस्पेंसरी में डर्मेटोलॉजिस्ट के तौर पर काम कर सकते हैं। शिक्षण कार्य में रुचि होने पर आप किसी मेडिकल कॉलेज, यूनिवर्सिटी या इंस्टीटय़ूट में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में अध्यापन या शोध-कार्यों का निर्देशन भी कर सकते हैं।
संबंधित शिक्षण संस्थान
एम्स, नई दिल्ली
मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, नई दिल्ली
पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीटय़ूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़
डिपार्टमेंट ऑफ डर्मेटोलॉजी एंड वेनेरियोलॉजी, दिल्ली यूनिवर्सिटी
एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर
एएफएमसी, पुणे
डिपार्टमेंट ऑफ डर्मेटोलॉजी, पांडिचेरी इंस्टीटय़ूट ऑफ मेडिकल साइंसेज
डॉं एमजीआर मेडिकल यूनिवर्सिटी, तमिलनाडु
जरूरी गुण:
अच्छा सौंदर्यबोध और स्वास्थ्य हो
मरीजों के साथ सहानुभूतिपूर्वक संवाद करने में कुशलता हो
हर तरह की स्थितियों से निपटने का पर्याप्त धैर्य हो
भावनात्मक और मानसिक रूप से मजबूत हो
दूसरों की मदद करने की इच्छा हो

Thursday, August 23, 2018

सिविल इंजीनियरिंग: करियर

आज देश प्रगति के पथ पर सरपट दौड़ रहा है। बड़े शहरों के अलावा छोटे शहरों में भी विकास की प्रक्रिया तेजी से चल रही है। रियल एस्टेट के कारोबार में आई चमक ने कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों को रोशन किया है। इन्हीं में से एक प्रमुख क्षेत्र ‘सिविल इंजीनियिरग’ भी है। इंजीनियरिंग के क्षेत्र में कदम रखने वाले अधिकांश छात्र सिविल इंजीनियरिंग की तरफ तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। वह रियल एस्टेट के अलावा भी कई सारे कंट्रक्शन कार्य जैसे पुल निर्माण, सड़कों की रूपरेखा, एयरपोर्ट, ड्रम, सीवेज सिस्टम आदि को अपने कौशल द्वारा आगे ले जाने का कार्य कर रहे हैं।
क्या है सिविल इंजीनियरिंग?जब भी कोई योजना बनती है तो उसके लिए पहले प्लानिंग, डिजाइनिंग व संरचनात्मक कार्यों से लेकर रिसर्च एवं सॉल्यूशन तैयार करने का कार्य किया जाता है। यह कार्य किसी सामान्य व्यक्ति से न कराकर प्रोफेशनल लोगों से ही कराया जाता है, जो सिविल इंजीनियरों की श्रेणी में आते हैं। यह पूरी पद्धति ‘सिविल इंजीनियरिंग’ कहलाती है। इसके अंतर्गत प्रशिक्षित लोगों को किसी प्रोजेक्ट, कंस्ट्रक्शन या मेंटेनेंस के ऊपर कार्य करना होता है। साथ ही इस कार्य के लिए उनकी जिम्मेदारी भी तय होती है। ये स्थानीय अथॉरिटी द्वारा निर्देशित किए जाते हैं। किसी भी प्रोजेक्ट एवं परियोजना की लागत, कार्य-सूची, क्लाइंट्स एवं कांट्रेक्टरों से संपर्क आदि कार्य भी सिविल इंजीनियरों के जिम्मे होता है।
काफी व्यापक है कार्यक्षेत्रसिविल इंजीनियरिंगका कार्यक्षेत्र काफी फैला हुआ है। इसमें जरूरत इस बात की होती है कि छात्र अपनी सुविधानुसार किस क्षेत्र का चयन करते हैं। इसके अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में हाइड्रॉलिक इंजी..., मेटेरियल इंजी..., स्ट्रक्चरल इंजी.....,  अर्थक्वेक इंजी., अर्बन इंजी..., एनवायर्नमेंटल इंजी..., ट्रांसपोर्टेशन इंजी... और जियो टेक्निकल इंजीनियरिंग आदि आते हैं। देश के साथ-साथ विदेशों में भी कार्य की संरचना बढ़ती जा रही है। प्रमुख कंपनियों के भारत आने से यहां भी संभावनाएं प्रबल हो गई हैं।
सिविल इंजीनियर बनने की योग्यतासिविल इंजीनियर बनने के लिए पहले छात्र को बीटेक या बीई करना होता है, जो 10+2 (भौतिकी, रसायन शास्त्र व गणित) या समकक्ष परीक्षा में उच्च रैंक प्राप्त करने के बाद ही संभव हो पाता है, जबकि एमएससी या एमटेक जैसे पीजी कोर्स के लिए बैचलर डिग्री होनी आवश्यक है। इन पीजी कोर्स में दाखिला प्रवेश परीक्षा के जरिए हो पाता है। इंट्रिग्रेटेड कोर्स करने के लिए 10+2 होना जरूरी है। बारहवीं के बाद पॉलिटेक्निक के जरिए सिविल इंजीनियरिंग का कोर्स भी कराया जाता है, जो कि डिप्लोमा श्रेणी में आते हैं।
प्रवेश प्रक्रिया का स्वरूपइसमें दो तरह से प्रवेश परीक्षा आयोजित की जाती है। एक पॉलीटेक्निनक तथा दूसरा जेईई व सीईई। इसमें सफल होने के बाद ही कोर्स में दाखिला मिलता है। कुछ ऐसे भी संस्थान हैं, जो अपने यहां अलग से प्रवेश परीक्षा आयोजित करते हैं। बैचलर डिग्री के लिए आयोजित होने वाली प्रवेश परीक्षा जेईई (ज्वाइंट एंट्रेंस एग्जाम) के जरिए तथा पीजी कोर्स के लिए आयोजित होने वाली परीक्षा सीईई (कम्बाइंड एंट्रेंस एग्जाम) के आधार पर होती है।
ली जाने वाली फीससिविल इंजीनियरिंग के कोर्स के लिए वसूली जाने वाली फीस अधिक होती है। बात यदि प्राइवेट संस्थानों की हो तो वे छात्रों से लगभग डेढ़ से दो लाख रुपए प्रतिवर्ष फीस लेते हैं, जबकि आईआईटी स्तर के संस्थानों में एक से डेढ़ लाख प्रतिवर्ष की सीमा होती है। इसमें काफी कुछ संस्थान के इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर करता है, जबकि प्राइवेट संस्थानों का प्रशिक्षण शुल्क विभिन्न स्तरों में होता है।
आवश्यक अभिरुचिसिविल इंजीनियर की नौकरी काफी जिम्मेदारी भरी एवं सम्मानजनक होती है। बिना रचनात्मक कौशल के इसमें सफलता मिलनी या आगे कदम बढ़ाना मुश्किल है। नित्य नए प्रोजेक्ट एवं चुनौतियों के रूप में काम करना पड़ता है। एक सिविल इंजीनियर को शार्प, एनालिटिकल एवं प्रैक्टिकल माइंड होना चाहिए। इसके साथ-साथ संवाद कौशल का गुण आपको लंबे समय तक इसमें स्थापित किए रखता है, क्योंकि यह एक प्रकार का टीमवर्क है, जिसमें लोगों से मेलजोल भी रखना पड़ता है।
इसके अलावा आप में दबाव में बेहतर करने, समस्या का तत्काल हल निकालने व संगठनात्मक गुण होने चाहिए, जबकि तकनीकी ज्ञान, कम्प्यूटर के प्रमुख सॉफ्टवेयरों की जानकारी, बिल्डिंग एवं उसके सुरक्षा संबंधी अहम उपाय, ड्रॉइंग, लोकल अथॉरिटी व सरकारी संगठनों से बेहतर तालमेल, प्लानिंग का कौशल आदि पाठय़क्रम का एक अहम हिस्सा हैं।
रोजगार से संबंधित क्षेत्रएक सिविल इंजीनियर को सरकारी विभाग, प्राइवेट और निजी क्षेत्र की इंडस्ट्री, शोध एवं शैक्षिक संस्थान आदि में काम करने का अवसर प्राप्त होता है। अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा इसमें संभावनाएं काफी तेजी से बढ़ी हैं। इसका प्रमुख कारण रियल एस्टेट में आई क्रांति ही है। इसके चलते हर जगह बिल्डिंग, शॉपिंग, मॉल, रेस्तरां आदि का निर्माण किया जा रहा है। यह किसी भी यूनिट को रिपेयर, मेंटेनेंस से लेकर कंस्ट्रक्शन तक का कार्य करते हैं। बीटेक के बाद रोड प्रोजेक्ट, बिल्डिंग वक्र्स, कन्सल्टेंसी फर्म, क्वालिटी टेस्टिंग लेबोरेटरी या हाउसिंग सोसाइटी में अवसर मिलते हैं। केन्द्र अथवा प्रदेश सरकार द्वारा भी काम के अवसर प्रदान किए जाते हैं। इसमें मुख्य रूप से रेलवे, प्राइवेट कंस्ट्रक्शन कंपनी, मिल्रिटी, इंजीनियरिंग सर्विसेज, कंसल्टेंसी सर्विस भी रोजगार से भरे हुए हैं। अनुभव बढ़ने के बाद छात्र चाहें तो अपनी स्वयं की कंसल्टेंसी सर्विस खोल सकते हैं।
इस रूप में कर सकते हैं कामसिविल इंजीनियरिंग
कंस्ट्रक्शन प्लांट इंजीनियर
टेक्निशियन
प्लानिंग इंजीनियर
कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट इंजीनियर
असिस्टेंट इंजीनियर
एग्जीक्यूटिव इंजीनियर
सुपरवाइजर
प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर
साइट/प्रोजेक्ट इंजीनियर
सेलरीइसमें मिलने वाली सेलरी ज्यादातर केन्द्र अथवा राज्य सरकार के विभाग पर निर्भर करती है, जबकि प्राइवेट कंपनियों का हिसाब उससे अलग होता है। बैचलर डिग्री के बाद छात्र को 20-22 हजार रुपए प्रतिमाह तथा दो-तीन साल का अनुभव होने पर 35-40 हजार के करीब मिलने लगते हैं। मास्टर डिग्री करने वाले सिविल इंजीनियरों को 25-30 हजार प्रतिमाह तथा कुछ वर्षों के बाद 45-50 हजार तक हासिल होते हैं। इस फील्ड में जम जाने के बाद आसानी से 50 हजार रुपये तक कमाए जा सकते हैं। विदेशों में तो लाखों रुपए प्रतिमाह तक की कमाई हो जाती है।
एजुकेशन लोनइस कोर्स को करने के लिए कई राष्ट्रीयकृत बैंक देश में अधिकतम 10 लाख व विदेशों में अध्ययन के लिए 20 लाख तक लोन प्रदान करते हैं। इसमें तीन लाख रुपए तक कोई सिक्योरिटी नहीं ली जाती। इसके ऊपर लोन के हिसाब से सिक्योरिटी देनी
आवश्यक है।
प्रमुख संस्थान
इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ टेक्नोलॉजी, नई दिल्ली
वेबसाइट-
 www.iitd.ernet.in
(मुंबई, गुवाहाटी, कानपुर, खडगपुर, चेन्नई, रुड़की में भी इसकी शाखाएं मौजूद हैं)
बिड़ला इंस्टीटय़ूट ऑफ टेक्नोलॉजी (बीआईटीएस), रांची
वेबसाइट
www.bitmesra.ac.in
दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली
वेबसाइट
www.dce.edu
इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ साइंस, बेंग्लुरू
वेबसाइट
www.iisc.ernet.in
नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ कंस्ट्रक्शन मैनेजमेंट एंड रिसर्च, नई दिल्ली
वेबसाइट-
  www.nicmar.ac.in( गुड़गांव, बेंग्लुरू, पुणे, मुंबई, गोवा में भी शाखाएं मौजूद)

फायदे एवं नुकसान
बड़े शहरों में अन्य प्रोफेशनल्स की अपेक्षा न्यू कमर को अधिक सेलरी
कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में बूम आने से प्रोफेशनल्स की भारी मांग
समाज व देश की प्रगति में भागीदार बनने पर अतिरिक्त खुशी
कई बार निर्धारित समय से अधिक काम करने से थकान की स्थिति
चिह्न्ति क्षेत्रों में शिफ्ट के रूप में काम करने की आवश्यकता

  1. जॉब के सिलसिले में अधिक यात्राएं परेशानी का कारण

Monday, August 13, 2018

एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस में करियर

एविएशन का नाम आते ही आसमान में उड़ने का मन करता है लेकिन यदि आप बनाना चाहते हो हो एविएशन में अपना करियर तो आप कहाँ पर अपनी लाइफ बना सकते हो। एविएशन सेक्टर (Aviation Sector) में हो रहे लगातार विस्तार से रोजगार के अवसरों में काफी इजाफा हुआ है। ऐसे में बहुत से अवसर हैं कई लोग सोचते हैं केवल पायलट या एयर होस्टेस तक ही एविएशन में जॉब सीमित हैं,  लेकिन ऐसा कतई नही है क्योंकि इनके इलावा भी आप एविएशन में अपना करियर बना सकते हो। इसी लाइन में में एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर (AME) भी बहुत अच्छा विकल्प है।
एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर की कार्य प्रकृति कैसी है उसका क्या काम होता है: किसी भी जहाज की तकनीकी जिम्मेदारी एएमई के ऊपर होती है। हर उड़ान के पहले एएमई जहाज का पूरी तरह से निरीक्षण करता है और सर्टिफिकेट जारी करता है कि जहाज उड़ान भरने को तैयार है। इस काम के लिए उसके पास पूरी तकनीकी टीम होती है। कोई भी विमान एएमई के फिटनेस सर्टिफिकेट के बिना उड़ान नहीं भर सकता। गौरतलब है कि एक हवाईजहाज के पीछे करीब 15-20 इंजीनियर काम करते हैं। इसी से इनकी जरूरत का अनुमान लगाया जा सकता है।

कैसे बन सकते हो आप एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर बन सकते हो: जैसे की पायलट बनने के लिए लाइसेंस लेने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है वैसे ही एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर बनने के लिए भी लाइसेंस लेना पड़ता है। यह लाइसेंस डायरेक्टर जनरल ऑफ सिविल एविएशन द्वारा प्रदान किया जाता है। कोई भी संस्थान, जो इससे संबंधित कोर्स कराता है, उसे भारत सरकार के विमानन मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाले डीजीसीए से इसके लिए अनुमति लेनी होती है। जो इंस्टिट्यूट इससे मान्यता प्राप्त हैं उनसे भी आप ये लाइसेंस हासिल कर सकते हैं।
एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर बनने के लिए क्या शैक्षणिक योग्यता की आवश्कयता होनी चाहिए: जो विद्यार्थी इस कोर्स के लिए आवेदन करना चाहते हैं, उनके लिए फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथेमेटिक्स विषयों की पढ़ाई जरूरी है। पीसीएम से 12वीं उत्तीर्ण विद्यार्थी एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियरिंग से संबंधित पाठ्यक्रमों में दाखिला ले सकते हैं। कोर्स के दौरान मैकेनिकल इंजीनियरिंग और वैमानिकी की विभिन्न शाखाओं के बारे में जानकारी दी जाती है।
एविएशन सेक्टर में कहाँ मिलेंगे अवसर: ऐसे तकनीकी प्रोफेशनल्स के लिए देश-विदेश में सभी जगह मौके हैं। एयर इंडिया, इंडिगो, इंडियन एयरलाइन्स, जेट एयरवेज, स्पाइस जेट, गो एयर जैसे एयरलाइंस में तो मौके मिलते ही हैं, इसके अलावा देश के तमाम हवाईअड्डों और सरकारी उड्डयन विभागों में भी रोजगार के बेहतरीन अवसर उपलब्ध होते हैं। भारत में ही करीब 450 कंपनियां हैं, जो इस क्षेत्र में रोजगार प्रदान करती हैं। एएमई का शुरुआती वेतन 20-30 हजार हो सकता है, जिसमें अनुभव और विशेष शिक्षा के साथ बढ़ोतरी होती जाती है। इसके साथ-2 आप विदेशी या प्राइवेट कंपनियो जो प्राइवेट एयरक्राफ्ट की सुविधा उपलब्ध कराती उनमे भी आप अपना करियर चुन सकते हो
देश में कौन कौनसे मुख्य संस्थान हैं जहाँ पर एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर के लिए कोर्स किया जा सकता है: जो संस्थान संबंधित कोर्स कराने का इच्छुक होता है, उसको डीजीसीए से मान्यता लेनी होती है। ऐसे कुछ प्रमुख संस्थान हैं-
  • जेआरएन इंस्टीट्यूट ऑफ एविएशन टेक्नोलॉजी, नई दिल्ली
  • भारत इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोनॉटिक्स, पटना एयरपोर्ट, पटना
  • इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोनॉटिक्स साइंस, कोलकाता
  • एकेडमी ऑफ एविएशन इंजीनियरिंग, बेंगलुरु
  • आंध्र प्रदेश एविएशन एकेडमी, हैदराबाद

Tuesday, August 7, 2018

अर्थसाइंस से बनाएं सुनहरा भविष्य

अर्थसाइंस एक तरह से जियोलॉजी की ही अगली कड़ी है। इस कोर्स को बाजार की आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर ही तैयार किया गया है,
पृथ्वी के उदगम, विकास और इसके अंदर और बाहर चलने वाली हलचलों को जानना खासा रोचक है। क्या अन्य ग्रहों पर कोई जीवन है? चन्द्रमा, मंगल, बृहस्पति और अन्य ग्रहों पर क्या संसाधन उपलब्ध हैं? इनमें क्या बदलाव आ रहे हैं? सिकुड़ते ग्लेशियरों का महासागरों और जलवायु पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? इस तरह की तमाम बातें और अनसुलझी पहेलियों के बारे में डाटा एकत्र करने का काम भूवैज्ञानिक करते हैं, उसका विश्लेषण करते हैं और एक निष्कर्ष पर पहुंचने का प्रयास करते हैं।
आज जब पूरे विश्व की धरती को लेकर तरह-तरह की खबरें आ रही हैं, इसे समझने और उसकी तह तक जाने के लिए ऐसे विशेषज्ञों की अच्छी-खासी जरूरत पड़ रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय ने इस क्षेत्र में कुशल वैज्ञानिक और विशेषज्ञों की मांग को ध्यान में रखते हुए अर्थसाइंस का पांच वर्षीय इंटीग्रेटेड कोर्स शुरू किया है। खास बात यह कि एमएससी इन अर्थसाइंस नाम से प्रचारित इस कोर्स में प्रवेश का दरवाजा बारहवीं कक्षा के बाद ही खोला गया है। पांच साल के इस कोर्स को पूरा करने के बाद सीधे करियर अपनाने या चुनने का मौका मिलता है।
क्या है कोर्स में?
इस कोर्स में पहले तीन साल स्नातक स्तर की पढ़ाई होती है। इसके बाद सीधे एमएससी में दाखिला मिलता है। कुल 10 सेमेस्टर हैं। इसमें अर्थसाइंस के विविध पहलुओं जैसे भूभौतिकी, जल विज्ञान, समुद्र विज्ञान, वातावरणीय विज्ञान, ग्रहीय विज्ञान, मौसम विज्ञान, पर्यावरणीय विज्ञान और मृदा विज्ञान को व्यापक तौर पर पढ़ने व समझने का मौका मिलता है। महाद्वीपों के खिसकने, पर्वतों के बनने, ज्वालामुखी फटने के क्या कारण हैं, वैश्विक पर्यावरण किस तरह परिवर्तित हो रहा है, पृथ्वी प्रणाली कैसे काम करती है, हमें औद्योगिक कूड़े का निपटान कैसे और कहां करना चाहिए, भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए समाज की ऊर्जा और पानी की बढ़ती मांग को कैसे पूरा किया जा सकता है, जिस तरह विश्व की जनसंख्या बढ़ रही है, क्या हम उसके लिए पर्याप्त खाद्य तैयार कर सकते हैं तथा किस प्रकार खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा प्राप्त कर सकते हैं, ये सब चीजें अर्थसाइंस के अध्ययन क्षेत्र में हैं।
भूवैज्ञानिक समस्याओं को सुलझाने और संसाधन प्रबंधन, पर्यावरणीय सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा मानव कल्याण के लिए सरकारी नीतियों को तैयार करने में प्रयुक्त अनिवार्य सूचना या डाटाबेस उपलब्ध कराते हैं। कोर्स के दौरान खनन, तेल व प्राकृतिक गैस, भूजल, कोयला, जियो तकनीक, जीआईएस व रिमोट सेंसिंग, पर्यावरण अध्ययन, ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन जैसे कई क्षेत्रों को जानने और समझने का अवसर दिया जाता है। इनसे जुडे क्षेत्रों में से एक क्षेत्र में छात्रों को आगे चल कर स्पेशलाइजेशन चुनना होता है। यह काम एमएससी स्तर पर होता है। एमएससी में चार पेपर थ्योरी के हैं। इसके अलावा कई पेपर वैकल्पिक हैं, जिसमें से छात्र किसी एक को चुन कर अपना करियर बना सकता है।
कोर्स के दौरान छात्रों को दो तरह की ट्रेनिंग भी दी जाती है। पहले स्तर पर हर साल छात्रों को फील्ड ट्रिप पर भेजा जाता है। एमएससी स्तर पर समर ट्रेनिंग और समर इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग के अलावा डिजर्टेशन का काम पूरा करना होता है। यहां फील्ड वर्क के बहुत विकल्प हैं।
शाखाएं
अर्थसाइंस की कई शाखाएं हैं। इनमें पर्यावरण अध्ययन, माइनिंग, जियोटेक्नोलॉजी, डिजास्टर मैनेजमेंट, एटमॉसफेरिक साइंस, जियोहैजर्डस, क्लाइमेट चेंज, ओशनोग्राफी, रिमोट सेंसिंग, एप्लायड हाइड्रोजियोलॉजी, काटरेग्राफी और जियोग्राफिक इंफॉर्मेशन सिस्टम आदि प्रमुख हैं।
अवसर हैं कहां
कोर्स के छात्र के लिए राज्य और केन्द्र सरकार में जियोलॉजिस्ट बनने के कई अवसर हैं। एमएससी पास छात्रों के लिए जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा समय-समय पर जियोलॉजिस्ट की भर्ती के लिए परीक्षा आयोजित की जाती है। सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड भी इस कोर्स के छात्रों को काम करने का अवसर मुहैया कराता है। इसमें हाइड्रोजियोलॉजिस्ट के रूप में उसी स्केल पर नियुक्ति होती है, जिस स्केल पर जियोलॉजिस्ट की। इनके अलावा पीएचडी करने के बाद साइंटिस्ट पद पर भर्ती होती है। ये सभी पद ग्रेड ए स्तर के अधिकारी के हैं। रिसर्च संस्थाओं के अलावा आजकल निजी कंपनियों में एग्जिक्यूटिव के रूप में भी क्लास वन पद पर इसके विशेषज्ञ रखे जा रहे हैं।
ओएनजीसी, वेदांता, हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड, ईएसएसआर, केर्न इंडिया जैसी कई कंपनियां हैं, जहां इनकी मांग है। पीएचडी करने वालों के लिए रिसर्च एसोसिएट और अध्यापन के भी मौके हैं। इसके अलावा इनकी मांग देश में जहां पेयजल के लिए काम हो रहा है या फिर सीमेंट, माइनिंग आदि के कामों में इस कोर्स के छात्रों की मांग है।
दाखिला कैसे
इसमें बारहवीं की मेरिट के आधार पर दाखिला दिया जाता है। साइंस के छात्र के लिए बारहवीं में भौतिकी, गणित और रसायनशास्त्र पढ़ा होना जरूरी है, तभी उसे दाखिला दिया जाता है। हंसराज कॉलेज इस कोर्स की कट ऑफ लिस्ट निकाल कर मेरिट के हिसाब से दाखिला देता है। आईआईटी प्रवेश परीक्षा पास करने वाले को कट ऑफ में 5 फीसदी की छूट दी जाती है। ओबीसी वर्ग के लिए कट ऑफ में दस फीसदी तक रियायत है।
फैक्ट फाइल
कोर्स कराने वाले संस्थान
इस कोर्स की पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग में होती है। हालांकि दाखिला हंसराज कॉलेज में हो रहा है। वहां छात्रों को मुख्य पेपर के लिए नहीं, बल्कि उसके साथ पढ़ाए जाने वाले स्पेशलाइजेशन पेपरों के लिए जाना होता है। मुख्य कोर्स की पढ़ाई और क्लास जियोलॉजी विभाग में होती है। कुल 25 सीटें हैं।
विश्वविद्यालय में इसके अलावा जियोलॉजी ऑनर्स का कोर्स रामलाल आनंद कॉलेज में चलाया जा रहा है, लेकिन अर्थसाइंस का सिलेबस इससे थोड़ा भिन्न है। यह कोर्स इसके अलावा देश में आईआईटी खड़गपुर और रुड़की में चलाया जा रहा है।
दिल्ली विश्वविद्यालय, हंसराज कॉलेज
आईआईटी, खड़गपुर और रुड़की
पांडिचेरी यूनिवसिटी, पुड्डुचेरी
इंडियन स्कूल ऑफ माइंस, धनबाद
फैक्ट फाइल
स्कॉलरशिप
इस कोर्स में आईआईटी संस्थानों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए आयोजित गेट पास करने के बाद छात्रों को 8 हजार रुपये प्रतिमाह मिलते हैं। एमएससी के बाद एमफिल या पीएचडी की पढ़ाई पूरी करने के लिए जेआरएफ यानी जूनियर रिसर्च फेलोशिप के रूप में करीब 20 हजार रुपये मिलते हैं।
एमफिल स्तर पर केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में सरकार की ओर से करीब तीन हजार रुपए प्रतिमाह स्कॉलरशिप दी जाती है।
पीएचडी में यह राशि पांच हजार प्रतिमाह है। अर्थ विज्ञान के क्षेत्र में शोध कार्य के लिए अन्य सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं भी स्कॉलरशिप देती हैं। यह रिसर्च कार्यों, पीएचडी या पोस्ट डॉक्टरेट फेलोशिप के लिए दी जाती है।
वेतन
इस कोर्स के छात्रों को रिसर्च संस्थान 30 हजार से लेकर 40 हजार तक के पैकेज पर ले जा रही हैं। निजी क्षेत्रों में युवाओं की सैलरी स्किल को देखते हुए तय की जाती है। जियोलॉजिस्ट का वेतनमान भी 40 हजार रुपये से 50 हजार रुपये है।
कॉलेज शिक्षण और रिसर्च एसोसिएट के रूप में वेतनमान शुरुआती तौर पर 40 से 45 हजार रुपये है।
कोचिंग संस्थान
कोर्स में दाखिला आमतौर पर 12वीं के अंकों के आधार पर होता है। भौतिकी, रसायनशास्त्र और गणित की पृष्ठभूमि से लैस छात्रों को ही इंटीग्रेटेड एमएससी अर्थसाइंस में दाखिला मिलता है। अगर चाहें तो बारहवीं के बोर्ड में इन विषयों में अच्छे अंक लाने के लिए कोचिंग संस्थान की मदद ले सकते हैं। अपने पास किसी स्तरीय कोचिंग का चुनाव कर सकते हैं। जो छात्र आईआईटी प्रवेश परीक्षा में सफल होकर इधर आना चाहते हैं, वे भी कोचिंग की मदद ले सकते हैं।
एजुकेशन लोन
कॉलेज में इससे जुड़े कोर्स में दाखिले की फीस बहुत कम है, इसलिए लोन की जरूरत नहीं पड़ती। विदेश में पीचएडी की पढ़ाई के लिए बैंक में लोन आदि की व्यवस्था है।
अवसर 
स्नातक की डिग्री हासिल कर चुके छात्रों के लिए बीएड करने के बाद शिक्षण, टूरिज्म में सर्टिफिकेट कोर्स करके टूर एंड ट्रेवल्स एजेंसी आदि में काम के अवसर मिलते हैं। विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होकर बैंक व अन्य निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्रों में नौकरी कर सकते हैं। सरकारी क्षेत्र की ओर देखें तो यूपीएससी की परीक्षा में शामिल होकर आईएएस, आईपीएस बन सकते हैं।
अगर इतिहास की अच्छी समझ है तो ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनने वाले धारावाहिक या फिल्म में पटकथा लेखन का काम कर सकते हैं। एमए, एमफिल करने के बाद कॉलेजों में अध्यापन का काम करने के काफी अवसर हैं। पुरातत्व विभाग से डिप्लोमा कोर्स करने के बाद केन्द्र व राज्य सरकार के संग्रहालयों में काम किया जा सकता है।

Friday, August 3, 2018

गाड़ि‍यों की लुक डिजाइन में कर‍ियर

जब भी बात गाड़ियों के लुक की होती है, तो कुछ गाड़ियां खुद ही हमारे जहन में आ जाती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उनकी डिजाइनिंग उस समय के हिसाब से बिल्कुल 'हटकर' और कंफर्ट लेवल को ध्यान में रखकर की गई होती है। गाड़ियों के इसी ओवरऑल लुक की डिजाइनिंग करते हैं ऑटोमोटिव इंजीनियर्स। अगर आपको भी वाहनों से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात आकर्षित करती है, तो आप भी ऑटोमोटिव डिजाइनर बन सकते हैं।
क्या है ऑटोमोटिव डिजाइन?
ऑटोमोबाइल्स के अपीयरेंस और फंक्शनैलिटी को डिजाइन करने की प्रक्रिया ऑटोमोटिव डिजाइनिंग कहलाती है। इसमें कार, बाइक, ट्रक, बस आदि हर सेग्मेंट के वाहन शामिल हैं। इसके तहत गाड़ियों की इंटीरियर व एक्सटीरियर डिजाइन, कलर स्कीम और शेप पर भी काम किया जाता है।
जॉब प्रोफाइल
किसी भी ऑटोमोबाइल को बनाने के लिए बेसिक आइडिया की जरूरत होती है। आइडिया जनरेशन ही ऑटोमोटिव डिजाइनर की प्रमुख जिम्मदारी है। इंजीनियर्स और डिजाइनर्स की टीम इस आइडिया पर चर्चा करती है और फिर कॉन्सेप्ट तैयार हो जाने पर डिजाइनर्स सॉफ्टवेयर की मदद से गाड़ी का बेसिक स्केच बनाते हैं, जो 3डी होता है। इसमें वाहन की हर बेसिक डीटेल शामिल होती है। साथ ही इंटीरियर और एक्सटीरियर की कलर स्कीम की जानकारी भी देनी होती है। डिजाइन फाइनल होने के बाद गाड़ी का स्केल मॉडल बनाया जाता है।
जरूरी स्किल
ऑटोमोटिव डिजाइनर बनने की सबसे पहली शर्त तो यह है कि आपमें सड़क पर चलने वाली हर गाड़ी के लिए पैशन होना चाहिए। साथ ही आपके पास वाहनों के निर्माण और उनकी फंक्शनैलिटी के बारे में बेसिक जानकारी भी होनी चाहिए। सृजनात्मकता के साथ ही आपमें ड्रॉइंग और स्कल्पचर बनाने में रुचि भी होनी चाहिए।
कौन-से कोर्स?
इस उद्योग में करियर बनाने के लिए डिजाइनिंग में बैचलर्स की डिग्री होनी जरूरी है। आप चाहें, तो डिजाइनिंग में मास्टर्स करके अपना ज्ञान और बढ़ा सकते हैं। इससे जॉब पाने की संभावना भी बढ़ जाती है। वैसे इस उद्योग में सर्वाइवल और करियर ग्रोथ के लिए डिजाइन स्किल्स ही मायने रखती हैं। आप चाहें, तो कोर्स पूरा करने के बाद किसी कंपनी में इंटर्नशिप करके डिजाइनिंग की बारीकियां सीख सकते हैं।
भविष्य की संभावनाएं
ऑटोमोटिव डिजाइनर बड़े ऑटोमोबाइल निर्माताओं के कॉन्सेप्ट एंड डिजाइनिंग डिपार्टमेंट में काम करते हैं। अगर बात पे-पैकेज की करें, तो यह फील्ड काफी आकर्षक है। ज्यादातर कंपनियां ऑटोमोटिव डिजाइनर्स को अच्छा पैकेज देती हैं। भारत में आम तौर पर इस फील्ड में 5 लाख रुपए के वार्षिक पैकेज से शुरूआत होती है। अनुभव के साथ यह बढ़ता जाता है।