Sunday, September 25, 2016

रेडियोलॉजी में करियर

एक्सरे, अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन, एमआरआई, एंजियोग्राफी आदि जैसी मेडिकल डायग्नॉस्टिक तकनीकों से आज पूरे चिकित्सा जगत का स्वरूप बदल गया है। अब शरीर के किसी भी अंदरूनी हिस्से में छिपा रोग पता लगाना आसान हो गया है। रेडियोलॉजी का क्षेत्र अब करियर के लिहाज से आकर्षक बन गया है। जॉब मार्केट में ऐसे लोगों की भारी मांग है, जिन्हें रेडिएशन से बचाव की समझ हो और जो मशीन्स की देखरेख करना जानते हों। रेडियोलॉजिस्ट के तौर पर हैल्थकेयर के क्षेत्र में बेशुमार अवसर हैं।
क्या है रेडियोलॉजी?

रेडियोलॉजी एक मेडिकल टेक्नोलॉजी है। इसकी मदद से शरीर के अंदरूनी हिस्सों की जांच की जाती है। इससे डॉक्टरों को मरीजों की स्थिति और उनकी बीमारियों के बारे में सटीक जानकारी मिल जाती है, जिससे उन्हें कारगर इलाज करने में काफी आसानी होती है। रेडियोलॉजी दो तरह की होती है: डायग्नॉस्टिक रेडियोलॉजी और थैरापेटिक रेडियोलॉजी। डायग्नॉस्टिक रेडियोलॉजी के अंतर्गत मुख्य रूप से रेडियोग्राफी और अल्ट्रासाउंड से जुड़े टेस्ट शामिल होते हैं, जैसे एक्सरे, सोनोग्राफी, सीटी स्कैन, एमआरआई, एंजियोग्राफी, फ्लोरोस्कोपी, पोसीट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी आदि। थैरापेटिक रेडियोलॉजी में रेडियो तरंगों द्वारा उपचार किया जाता है।
वर्क प्रोफाइल

रेडियोलॉजिस्ट भी चिकित्सक ही होते हैं। स्पेशलाइजेशन की वजह से ये रेडियोलॉजी तकनीक के कुशल जानकार बन जाते हैं यानी इन्हें रेडियोलॉजी के सुरक्षित इस्तेमाल की बारीक जानकारी होती है। एक रेडियोलॉजिस्ट के तौर पर ये शरीर के विभिन्न अंगों का एक्सरे करते हैं। रेडियो इमेज का विश्लेषण और इंटरप्रिटेशन करते हैं। इसके अलावा, इन पर यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी होती है कि एक्सरे करते समय मरीज या आसपास के लोगों पर रेडियोएक्टिव किरणों का कोई बुरा असर न हो। यही नहीं, ऐसे प्रोफेशनल्स को रेडियोग्राफिक उपकरणों और मरीजों के रेकॉर्ड्स को मेन्टेन रखने का काम भी करना होता है।
पर्सनल स्किल

कुशल रेडियोलॉजिस्ट बनने के लिए मेहनती, धैर्यवान, मिलनसार और सेवाभावी होना चाहिए। इसके अलावा कम्प्यूटर स्किल, अच्छी कम्युनिकेशन स्किल और टीम भावना होना भी जरूरी है। इस क्षेत्र में शिफ्ट-वाइज भी काम करना पड़ सकता है। इसलिए आपको दिन-रात किसी भी समय काम करने के लिए तैयार रहना होगा। मानसिक रूप से मजबूत होना बहुत जरूरी है।
जॉब के अवसर

रेडियोलॉजी के जानकारों के लिए हैल्थ सेक्टर में ढेर सारे अवसर हैं। ऐसे प्रोफेशनल्स की मांग सरकारी अस्पतालों के अलावा प्राइवेट अस्पतालों, नर्सिंग होम्स, क्लीनिक्स, इमेजिंग सेंटर्स, आर्मी के मेडिकल कोर, रिसर्च फील्ड तथा शैक्षणिक संस्थानों में हमेशा रहती है। रेडियोलॉजिस्ट के लिए विदेशों में भी जॉब के बहुत अवसर हैं। अमेरिका, योरप, अफ्रीका तथा खाड़ी के देशों में ऐसे लोगों के लिए रेडियो इमेजिंग तकनीशियन, रेडियोग्राफर, रेडियोलॉजिस्ट, प्रयोगशाला सहायक, क्लीनिक सहायक, एक्सरे तकनीशियन या अल्ट्रासाउंड विशेषज्ञ के तौर पर जॉब के स्कोप हैं। चाहें, तो खुद का डायग्नॉस्टिक सेंटर भी खोल सकते हैं।
कोर्स व क्वॉलिफिकेशन

यह करियर फील्ड लड़कों व लड़कियों दोनों के लिए उपयुक्त है। रेडियोलॉजी या रेडिएशन फिजिक्स में आप पीजी, डिप्लोमा, पीजी डिप्लोमा या सर्टिफिकेट कोर्स कर सकते हैं। बीएससी या डिप्लोमा कोर्स के लिए न्यूनतम योग्यता 50 प्रतिशत अंकों के साथ फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी विषयों से 12वीं पास होना है। यदि आप बीएससी हैं, तो एमएससी या पीजी डिप्लोमा कोर्स कर सकते हैं। पाठ्यक्रम में विद्यार्थियों को शरीर रचना विज्ञान, शरीर विज्ञान, विकिरण भौतिकी, इमेजिंग भौतिकी, रेडियोग्राफी आदि की जानकारी दी जाती है।
सैलरी पैकेज

रेडियोलॉजिस्ट का सैलरी पैकेज सरकारी और प्राइवेट दोनों क्षेत्रों में काफी अच्छा होता है। शुरूआत में इन्हें 15 हजार से 20 हजार रुपए प्रति माह मिल जाते हैं। अनुभव के बाद सैलरी और आकर्षक हो जाती है।

Saturday, September 24, 2016

न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्र में करियर

भारत-अमेरिकी न्यूक्लियर डील के बाद देश में न्यूक्लियर एनर्जी (परमाणु ऊर्जा) के उत्पादन में अत्यधिक बढ़ोतरी की संभावनाएँ देश-विदेश के इस क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों द्वारा जताई जा रही हैं। फिलहाल देश के कुल ऊर्जा उत्पादन में परमाणु रिएक्टरों के जरिए मात्र तीन प्रतिशत विद्युत ऊर्जा का उत्पादन हो रहा है।
बायोफ्यूल की लगातार घटती मात्रा और देश में बढ़ती ऊर्जा की माँग देखते हुए ऊर्जा उत्पादन पर बल देना सरकार की प्राथमिकता बन गया है। इसी सोच के तहत वर्ष 2050 तक परमाणु रिएक्टरों के माध्यम से कुल विद्युत उत्पादन का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा उत्पादित करने की दीर्घकालिक योजना तैयार की गई है। इसी क्रम में वर्ष 2020 तक बीस हजार मेगावाट विद्युत का अतिरिक्त उत्पादन परमाणु ऊर्जा स्रोतों से किया जाएगा।
जाहिर है, ऐसे परमाणु रिएक्टरों के निर्माण कार्य से लेकर इनके संचालन और रख-रखाव तक में ट्रेंड न्यूक्लियर प्रोफेशनल की बड़े पैमाने पर आवश्यकता पड़ेगी। इस प्रकार के कोर्स देश के चुनींदा संस्थानों में फिलहाल उपलब्ध हैं लेकिन समय की मांग देखते हुए यह कहा जा सकता है कि न सिर्फ सरकारी बल्कि निजी क्षेत्र के संस्थान भी इस प्रकार के कोर्सेज की शुरुआत बड़े स्तर पर करने की सोच सकते हैं।
यह कतई जरूरी नहीं कि इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए न्यूक्लियर साइंस से संबंधित युवाओं के लिए ही अवसर होंगे बल्कि एनर्जी इंजीनियर, न्यूक्लियर फिजिक्स, सिविल इंजीनियर, मेकेनिकल इंजीनियर, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरों के अलावा भी तमाम ऐसे संबंधित प्रोफेशनलों की आवश्यकता आने वाले दिनों में होगी। सही मायने में देखा जाए तो एनर्जी इंजीनियरिंग अपने आप में अंतर्विषयक धारा है जिसमें इंजीनियरिंग की विविध शाखाओं का ज्ञान समाया हुआ देखा जा सकता है। यही कारण है कि सभी इंजीनियरिंग शाखाओं के युवाओं की जरूरत दिन-प्रतिदिन इस क्षेत्र में बढ़ेगी।
ऊर्जा मंत्रालय के अनुमान को अगर रेखांकित किया जाए तो आगामी पांच वर्षों में भारत को इस क्षेत्र पर लगभग पांच लाख करोड़ रुपए का निवेश करना होगा तभी बढ़ती ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति कर पानी संभव होगी। इसमें विद्युत उत्पादन के विभिन्न स्रोतों जल, थर्मल तथा वायु से तैयार होने वाली विद्युत के अलावा परमाणु भट्टियों से निर्मित विद्युत की भी भागीदारी होगी। अमेरिका के साथ हुई परमाणु संधि के बाद ऐसे रिएक्टरों की स्थापना बड़ी संख्या में होने की संभावना है।
न सिर्फ देश की बड़ी-बड़ी कंपनियां (एलएंडटी) बल्कि विश्व की तमाम अन्य बड़ी न्यूक्लियर रिएक्टर सप्लायर कंपनियां (जीई हिटैची, वेस्टिंग हाउस इत्यादि) भी इस ओर नजर गड़ाए बैठी हैं। यह कारोबार जैसा कि उल्लेख किया गया है कि कई लाख करोड़ रुपए के बराबर आने वाले दशकों में होने जा रहा है। इसके अलावा अभी सामरिक क्षेत्र में न्यूक्लियर एनर्जी के इस्तेमाल के विभिन्न विकल्पों की भी बात करें तो समूचे परिदृश्य का अंदाजा और वृहद् रूप में मिल सकता है।
जहां तक न्यूक्लियर इंजीनियरों के कार्यकलापों का प्रश्न है तो उनके ऊपर न्यूक्लियर पावर प्लांट की डिजाइनिंग, निर्माण तथा ऑपरेशन का लगभग संपूर्ण दायित्व होता है। जिसका सफलतापूर्वक संचालन, वे अन्य टेक्नीशियन और विशेषज्ञों की मदद से करते हैं। इनके लिए नौकरी के अवसर मेटेरियल इंजीनियरिंग के कार्यकलापों, एमआरआई उपकरण निर्माता कंपनियों, संबंधित उपकरण उत्पादक कंपनियों के अलावा अध्यापन और शोध में भी देश-विदेश में व्यापक पैमाने पर हो सकते हैं। अंतरिक्ष अनुसंधान, कृषि क्षेत्र, आयुर्विज्ञान तथा अन्य क्षेत्रों में भी ये अपने करियर निर्माण के बारे में सोच सकते हैं।
किस प्रकार की योग्यता जरूरी

विज्ञान की दृढ़ पृष्ठभूमि के साथ भौतिकी एवं गणित में गहन दिलचस्पी रखने वाले युवाओं के लिए यह तेजी से उभरता हुआ क्षेत्र निस्संदेह सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित करने में काफी मददगार साबित हो सकता है। विदेशी विश्वविद्यालयों में ग्रेजुएट अथवा पोस्ट ग्रेजुएट स्कॉलरों को हाथोहाथ लिया जाता है। अमूमन स्कॉलरशिप मिलना ऐसे युवाओं के लिए मुश्किल नहीं होता।

संस्‍थान:

इंडि‍यन इंस्‍टि‍ट्यूट ऑफ टेक्‍नोलॉजी, कानपुर
इंडि‍यन इंस्‍टि‍ट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु
साहा इंस्‍टि‍ट्यूट ऑफ न्‍यूक्‍लि‍यर फि‍जि‍क्‍स कोलकाता

Friday, September 23, 2016

टॉक्सीकोलॉजी में करियर

मेडिकल टॉक्सीकोलॉजी, टॉक्सीकोलॉजी की वो ब्रांच है जिसे फिजिशियन द्वारा ऑपरेट किया जाता है. मेडिकल टॉक्सीकोलॉजी का फोकस डायग्नोसिस, मेडिकेशन, पर्यावरण के जहरीले टॉक्सीन की रोकथाम और मैनेजमेंट पर होता है. टॉक्सीकोलॉजी में मनुष्य, पशु, पौधों और पर्यावरण पर जहरीली चीजों की वजह से होने वालों नुकसानों के प्रभाव का अध्ययन करता है. इनका काम केमिकल, नुकसानदायक गैसों के इफेक्ट की स्टडी करना है. जहरीले पदार्थों और रेडिएशन का लोगों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है इसका निरीक्षण टॉक्सीकॉलॉजिस्ट ही करते हैं. 
कहां मिलेगी नौकरी
फॉरेंसिक टॉक्सीकोलॉजी में भी जॉब के कई मौके हैं. फॉरेंसिक टॉक्सीकोलॉजी एक टीम होती है जो क्राइम की इंवेस्टीगेशन करती है. इसके अलावा आप फार्मास्युटिकल, केमिकल, एग्रीकल्चरल, कॉस्मेटिक, एकेडमिक इंस्टिट्यूट, गवर्नमेंट एजेंसियों, टॉक्सीकोलॉजी लैब्स में भी नौकरी पा सकते हैं.
कहां से कर सकते हैं कोर्स
डॉ बी आर राव अंबेडकर यूनिवर्सिटी, उत्तर प्रदेश
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सीकोलॉजी रिसर्च, लखनऊ
इंडियन वेटरिनरी रिसर्च इंस्टिट्यूट, बरेली
जामिया हमदर्द, दिल्ली
सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टिट्यूट, लखनऊ
कितनी होगी सैलरी
टॉक्सीको

Thursday, September 22, 2016

ओशनोग्राफी में करियर

आपको जोखिम लेना पसंद है और लीक के हटकर कुछ करने की चाहत है, तो आप ओशनोग्राफी के फील्ड में कदम रख सकते हैं। ओशनोग्राफी का आशय समुद्र विज्ञान से है। इसके अंतर्गत समुद्र तथा इसमें पाए जाने वाले जीव-जंतुओं के बारे में अध्ययन किया जाता है। वैसे, यह तो हम सभी जानते हैं कि पृथ्वी के दो-तिहाई से अधिक हिस्से में समुद्र है। दरअसल, यह एक ऐसा विज्ञान है जिसमें बायोलॉजी, केमिस्ट्री, जियोलॉजी, मेटियोरोलॉजी और फिजिक्स के सिद्धांत लागू होते हैं। यह एक रोमांच से भरा क्षेत्र है, जहां आपको हमेशा कुछ न कुछ सीखने को मिलता है।

क्वालिफिकेशन
विज्ञान विषयों जुड़े स्टूडेंट्स ओशनोग्राफी का कोर्स कर सकते हैं। इसके हर क्षेत्र में गणित की जरूरत पड़ती है, लेकिन मैरीन रिसर्च के लिए पोस्ट ग्रेजुएट या डॉक्टरेट की उपाधि होना जरूरी है। इसके अधिकतर कोर्स तीन वर्षीय होते हैं। समुद्र विज्ञान असल में एक अंत: विषयक अध्ययन है, जिसमें जीव विज्ञान, भौतिकी, रसायन विज्ञान, भूगर्भ विज्ञान तथा मौसम विज्ञान को भी काफी हद तक शामिल किया जाता है।

यह मूलत: शोध एवं अनुसंधान पर आधारित प्रोफेशनल विषय है। इसमें अधिकांश समय समुद्र की लहरों एवं प्रयोगशाला में व्यतीत होता है। अन्य विषयों की भांति इस क्षेत्र में भी उपशाखाएं मौजूद हैं और युवा अपनी दिलचस्पी के अनुसार करियर निर्माण के लिए इनका चयन कर सकते हैं। इन उपशाखाओं में प्रमुख हैं : समुद्री जीव विज्ञान, भूगर्भ समुद्र विज्ञान, रासायनिक समुद्र विज्ञान आदि। महत्व की दृष्टि से किसी भी उपशाखा को कम करके नहीं आंका जा सकता है।


पर्सलन स्किल
महासागरों के बारे में जानने और नया खोजने की उत्सुकता, सी वर्दीनेस (ओशन सिकनेस न होना), शारीरिक क्षमता, सहनशीलता, अकेलेपन और बोरियत के बीच मानसिक संबल बनाए रखना, टीम में काम करने के लिए सही माहौल बनाए रखना आवश्यक है। इन सबके अलावा तैराकी और डाइविंग में प्रशिक्षित होना यहां की प्राथमिक योग्यताओं में शामिल है।

वर्क प्रोफाइल
विकासशील देशों के लिए ओशनोग्राफी का काफी महत्व है। इस क्षेत्र में काम करना चुनौतीपूर्ण है, लेकिन यह उन लोगों का स्वागत करता है जिन्हें समुंद्र अपार गहराई से के बारे में जानने और सीखने की जिज्ञासा है। इनके कार्य में नमूने चुनना, सर्वे करना और अत्याधुनिक उपकरणों से डाटा का आकलन करना शामिल है। इस क्षेत्र में काम करने वालों को ओशनोग्राफर कहा जाता है। इनके काम में पानी के घुमाव और बहाव की दिशा, उसकी फिजिकल व केमिकल सामग्री के आकलन का कार्य शामिल है। इससे यह भी पता चलता है कि इनका तटीय इलाकों, वहां के मौसम और आबोहवा पर क्या असर होता है।

इस क्षेत्र से ज्यादातर केमिस्ट, फिजिसिस्ट, बायोलॉजिस्ट और जियोलॉजिस्ट जुड़े रहते हैं, जो अपनी विशेषज्ञता का इस्तेमाल ओशन स्टडीज में करते हैं। यह पूरी तरह अध्ययन से जुड़ा क्षेत्र है। ऐसे में इस काम को करने के लिए समुद्र में लंबा वक्त गुजारना पड़ सकता है। इसके लिए मानसिक स्तर पर मजबूती की जरूरत होती है। इस काम में थोड़ा अनुभव होने के बाद अधिकांश लोगों को उनकी विशेषज्ञता के अनुरूप अलग-अलग तरह का काम सौंपा जाता है। जिसमें मैरीन बायोलॉजी, जियोलॉजिकल ओशनोग्राफी, फिजिकल ओशनोग्राफी और केमिकल ओशनोग्राफी शामिल है।

केमिकल ओशनोग्राफी- यहां पानी के संयोजन और क्वालिटी का आकलन होता है। यह समुद्र की तलहटी में होने वाले केमिकल रिएक्शन पर नजर रखते हैं। इनका मकसद ऐसी टेक्नोलॉजी भी खोज निकालना है जिससे समुद्र से महत्वपूर्ण बातें पता लगाई जा सकें। बढ़ते प्रदूषण के चलते इनके काम की चुनौतियां और बढ़ती जा रही हैं। आज कल समुंद्र में आर्थिक हलचल की वजह से केमिकल ओशनोग्राफर की डिमांड लगातार बढ़ती जा रही है।

जियोलॉजिकल ओशनोग्राफी- जियोलॉजिकल और जियोफिजिकल ओशनोग्राफर्स सी-फ्लोर की वास्तविक स्थिति के बारे में पता लगाने का काम करते हैं। समुद्र की तलहटी में पाए जाने वाले खनिजों की जानकारी भी यहीं से पता लगती है। यही लोग पता लगाते हैं कि समुद्र की भीतरी चट्टानें किस तरह और कितने समय के अंतराल में बनी हैं।

फिजिकल ओशनोग्राफी- फिजिकल ओशनोग्राफी समुद्र के अध्ययन की विधा है। फिजिकल ओशनोग्राफर्स तापमान, लहरों की गति व चाल, ज्वार, घनत्व और करंट का पता लगाते हैं। यह ऐसा कार्यक्षेत्र है जहां समुद्र, मौसम और आबोहवा तीनों का जुड़ाव होता है।

मैरीन बायोलॉजी- समुद्र की अतल गहराइयों में बसने वाले जीव-जंतुओं की अपनी एक अलग रंग-बिरंगी दुनिया होती है। ये जीव-जंतु हमारे लिए कितने और कैसे उपयोगी हो सकते हैं, इनसे जुडे विभिन्न पहलुओं का अध्ययन मैरीन बायोलॉजिस्ट ही करते हैं। इस विषय के अध्ययन से कई क्षेत्रों में अनगिनत लाभ मिलते हैं। मैरीन बायोलॉजिस्ट की मदद से ही आज कई कंपनियां तेल और गैस के स्त्रोतों का पता लगा पाने में सक्षम साबित हो रही हैं। उल्लेखनीय है कि भारत का समुद्री तट भी करीब सात हजार किलोमीटर में फैला हुआ है। इस तरह देखा जाए, तो समुद्री संसाधनों की हमारे देश में भी कोई कमी नहीं है। समुद्री लहरों के साथ गोते लगाकर और सागर की अतल गहराई में इन संसाधनों की खोज करना न केवल बेहद रोमांचक है, बल्कि देश और करियर के लिहाज से भी बेहतर है।

रोजगार की संभावनाएं
ओशनोग्राफर्स निजी, सार्वजनिक और कई सरकारी संस्थानों में वैज्ञानिक, इंजीनियर या तकनीशियन बतौर नौकरी पा सकते हैं। सरकार से जुड़े जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, मेटिरियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और डिपार्टमेंट ऑफ ओशनोग्राफी में रोजगार की संभावनाएं मौजूद हैं। निजी क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों, मैरीन इंडस्ट्री या इस क्षेत्र से जुड़ी रिसर्च संबंधी संस्थाओं में भी रोजगार के बेहतर विकल्प हैं। देश में समुद्र विज्ञान विभाग, ऑयल इंडिया, भारतीय भौगोलिक सर्वेक्षण विभाग, समुद्र आधारित उद्योगों आदि में बतौर वैज्ञानिक, इंजीनियर अथवा तकनीकी प्रशिक्षित व्यक्ति के रूप में रोजगार प्राप्त कर सकते हैं।


सैलरी पैकेज
पोस्ट ग्रेजुएट के बाद इस क्षेत्र में करियर की शुरुआत करने पर 15-20 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता है। पीएचडी डिग्रीधारियों का वेतन शुरुआती दौर में 15-25 हजार रुपये हो सकता है। हालांकि हर कंपनियों में सैलरी स्ट्रक्चर अलग-अलग होती है।


इंस्टीट्यूट वॉच
u गोवा यूनिवर्सिटी, गोवा
www.goauniversity.org

u यूनिवर्सिटी ऑफ मद्रास
www.unom.ac.in

u कोचीन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी, कोच्चि
www.cusat.ac.in

u मैंगलौर यूनिवर्सिटी
www.mangaloreuniversity.ac.in

u उत्कल यूनिवर्सिटी
www.utkal-university.org

u अन्नामलाई यूनिवर्सिटी, तमिलनाडु
www.annamalaaiuniversity.ac.in

u भावनगर यूनिवर्सिटी, गुजरात
www.bhavuni.edu

u कोचीन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी, केरल
www.cusat.ac.in

u पांडिचेरी यूनिवर्सिटी, पांडिचेरी
www.pondiuni.org

u बरहामपुर यूनिवर्सिटी, उडीसा
www.bamu.nic.in

Wednesday, September 21, 2016

एमएससी निरूपण विज्ञान में बनाएं करियर

एमएससी निरूपण विज्ञान नए उत्पादों को तैयार करने के विज्ञान के क्षेत्र में ज्ञान की गहराई में की पेशकश, अभिनव इन दोनों क्षेत्रों, विशिष्ट और ब्रिटेन में अद्वितीय है, इन नई दवाओं और कंज्यूमर केयर उत्पादों, पेंट, खाद्य पदार्थ या तेजी से बढ़ उपभोक्ता वस्तुओं रहे हैं।
कार्यक्रम में आप अलग अलग-अलग सामग्री के मिश्रण से तैयार उत्पादों को बनाने के सिद्धांतों को समझने के लिए अनुमति देगा। दवा उद्योग से वर्तमान उदाहरण पर ड्राइंग, और अकादमिक स्टाफ के औद्योगिक अनुभव का उपयोग करते हैं, तो आप भी इस तरह के उपभोक्ता उत्पादों और सौंदर्य प्रसाधन के रूप में तैयार करने के विज्ञान के अन्य क्षेत्रों में औद्योगिक रूप से प्रासंगिक समस्याओं के लिए इन सिद्धांतों को लागू होंगे।
इस कार्यक्रम के व्यावहारिक प्रयोगशाला आधारित जांच और सेमिनारों के पूरक एक व्याख्यान श्रृंखला शामिल है। मामले के अध्ययन के लिए एक ही रास्ता है कि एक औद्योगिक सेटिंग simulates में एक टीम के हिस्से के रूप में काम कर रहे अपनी रचनात्मकता और समस्या को हल करने के लिए बढ़ाने का मौका प्रदान करते होंगे। अनुसंधान के अनुभव की विविधता के साथ कर्मचारियों के नेतृत्व में एक सुसज्जित विभाग में एक अनुसंधान परियोजना आप उपन्यास अनुसंधान बाहर ले जाने और परियोजनाओं और पालक स्वतंत्रता प्रबंधन करने की क्षमता को बढ़ाने के लिए अवसर दे देंगे। डिग्री पार, आप दर्शकों की एक श्रृंखला के लिए रूपों की एक रेंज में स्पष्ट रूप से अपने विज्ञान संवाद और उभरती सूचना और संचार प्रौद्योगिकियों का उपयोग करने का अवसर होगा।
डिग्री के पूरा होने पर आप एक अनुसंधान कौशल पोर्टफोलियो है कि निर्माण विज्ञान में अपने सतत व्यावसायिक विकास के लिए एक ठोस नींव के रूप में काम करेगा विकसित करना होगा।
हमारे पूर्व स्नातकों पर चले गए हैं औद्योगिक क्षेत्रों की एक विस्तृत श्रृंखला में सफल करियर का विकास करने के लिए, aggrochemical और उपभोक्ता वस्तुओं के लिए औषधि विज्ञान से। वे प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए काम करने के साथ ही विशेषज्ञ उद्यमों में पनपे पर चले गए हैं। पूर्व स्नातकों को भी छात्र पीएचडी के लिए सफलतापूर्वक अध्ययन करने के लिए आगे बढ़े हैं।

अंतर्वस्तु
  • कोलाइड और योगों में संरचित सामग्री (30 क्रेडिट)
  • उपभोक्ता सामान, सौंदर्य प्रसाधन और कोटिंग्स के निरूपण (30 क्रेडिट)
  • अंग्रेजी भाषा का समर्थन (विज्ञान के स्कूल में स्नातकोत्तर छात्रों के लिए)
  • विश्लेषणात्मक तरीकों और क्यूए / क्यूसी सिद्धांतों (30 क्रेडिट)
  • परियोजना (एमएससी निरूपण विज्ञान) (60 क्रेडिट)
  • आधुनिक दवा प्रौद्योगिकी और प्रोसेस इंजीनियरिंग (30 क्रेडिट)
    प्रवेश हेतु आवश्यक शर्ते
    आवेदक होना चाहिए: आम तौर पर 2.1 या इसके बाद के संस्करण, या रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, जैव रसायन, फार्मेसी या औषधि विज्ञान या पर्याप्त अनुभव में बराबर में एक बीएससी सम्मान की डिग्री। * जो उनकी पहली भाषा के रूप में अंग्रेजी नहीं है, छात्र, एक अन्य मान्यता प्राप्त भाषा परीक्षण प्रणाली में 6.5 या उससे ऊपर की एक IELTS स्कोर या समकक्ष रेटिंग होनी चाहिए। * वैकल्पिक रूप से, छात्रों को ग्रीनविच अंतर्राष्ट्रीय पूर्व मास्टर्स 'कार्यक्रम के विश्वविद्यालय के माध्यम से प्रवेश कर सकते हैं। * अन्य पृष्ठभूमि से आवेदकों को माना जाता है, लेकिन चाहिए science-queries@gre.ac.uk पर आवेदन करने से पहले कार्यक्रम नेता ई मेल
    मूल्यांकन
    पाठ्यक्रम पढ़ाया परीक्षाओं का एक संयोजन, एक मामले का अध्ययन, और एक परियोजना थीसिस / शोध पत्र से मूल्यांकन कर रहे हैं।
    कैरियर विकल्पों
    इस कार्यक्रम के सफल समापन पर छात्रों को इस तरह फार्मास्यूटिकल्स, कंज्यूमर हेल्थकेयर, सौंदर्य प्रसाधन, पेंट और रसायन के रूप में तैयार करने के उद्योगों में काम करते हैं या इस तरह के एक पीएचडी के लिए के रूप में उच्च अध्ययन के लिए पर जाने के लिए सक्षम हो जाएगा।
  • Tuesday, September 20, 2016

    सिविल इंजीनियरिंग में करियर

    आज देश प्रगति के पथ पर सरपट दौड़ रहा है। बड़े शहरों के अलावा छोटे शहरों में भी विकास की प्रक्रिया तेजी से चल रही है। रियल एस्टेट के कारोबार में आई चमक ने कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों को रोशन किया है। इन्हीं में से एक प्रमुख क्षेत्र ‘सिविल इंजीनियिरग’ भी है। इंजीनियरिंग के क्षेत्र में कदम रखने वाले अधिकांश छात्र सिविल इंजीनियरिंग की तरफ तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। वह रियल एस्टेट के अलावा भी कई सारे कंट्रक्शन कार्य जैसे पुल निर्माण, सड़कों की रूपरेखा, एयरपोर्ट, ड्रम, सीवेज सिस्टम आदि को अपने कौशल द्वारा आगे ले जाने का कार्य कर रहे हैं।
    क्या है सिविल इंजीनियरिंग?जब भी कोई योजना बनती है तो उसके लिए पहले प्लानिंग, डिजाइनिंग व संरचनात्मक कार्यों से लेकर रिसर्च एवं सॉल्यूशन तैयार करने का कार्य किया जाता है। यह कार्य किसी सामान्य व्यक्ति से न कराकर प्रोफेशनल लोगों से ही कराया जाता है, जो सिविल इंजीनियरों की श्रेणी में आते हैं। यह पूरी पद्धति ‘सिविल इंजीनियरिंग’ कहलाती है। इसके अंतर्गत प्रशिक्षित लोगों को किसी प्रोजेक्ट, कंस्ट्रक्शन या मेंटेनेंस के ऊपर कार्य करना होता है। साथ ही इस कार्य के लिए उनकी जिम्मेदारी भी तय होती है। ये स्थानीय अथॉरिटी द्वारा निर्देशित किए जाते हैं। किसी भी प्रोजेक्ट एवं परियोजना की लागत, कार्य-सूची, क्लाइंट्स एवं कांट्रेक्टरों से संपर्क आदि कार्य भी सिविल इंजीनियरों के जिम्मे होता है।
    काफी व्यापक है कार्यक्षेत्रसिविल इंजीनियरिंगका कार्यक्षेत्र काफी फैला हुआ है। इसमें जरूरत इस बात की होती है कि छात्र अपनी सुविधानुसार किस क्षेत्र का चयन करते हैं। इसके अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में हाइड्रॉलिक इंजी..., मेटेरियल इंजी..., स्ट्रक्चरल इंजी.....,  अर्थक्वेक इंजी., अर्बन इंजी..., एनवायर्नमेंटल इंजी..., ट्रांसपोर्टेशन इंजी... और जियो टेक्निकल इंजीनियरिंग आदि आते हैं। देश के साथ-साथ विदेशों में भी कार्य की संरचना बढ़ती जा रही है। प्रमुख कंपनियों के भारत आने से यहां भी संभावनाएं प्रबल हो गई हैं।
    सिविल इंजीनियर बनने की योग्यतासिविल इंजीनियर बनने के लिए पहले छात्र को बीटेक या बीई करना होता है, जो 10+2 (भौतिकी, रसायन शास्त्र व गणित) या समकक्ष परीक्षा में उच्च रैंक प्राप्त करने के बाद ही संभव हो पाता है, जबकि एमएससी या एमटेक जैसे पीजी कोर्स के लिए बैचलर डिग्री होनी आवश्यक है। इन पीजी कोर्स में दाखिला प्रवेश परीक्षा के जरिए हो पाता है। इंट्रिग्रेटेड कोर्स करने के लिए 10+2 होना जरूरी है। बारहवीं के बाद पॉलिटेक्निक के जरिए सिविल इंजीनियरिंग का कोर्स भी कराया जाता है, जो कि डिप्लोमा श्रेणी में आते हैं।
    प्रवेश प्रक्रिया का स्वरूपइसमें दो तरह से प्रवेश परीक्षा आयोजित की जाती है। एक पॉलीटेक्निनक तथा दूसरा जेईई व सीईई। इसमें सफल होने के बाद ही कोर्स में दाखिला मिलता है। कुछ ऐसे भी संस्थान हैं, जो अपने यहां अलग से प्रवेश परीक्षा आयोजित करते हैं। बैचलर डिग्री के लिए आयोजित होने वाली प्रवेश परीक्षा जेईई (ज्वाइंट एंट्रेंस एग्जाम) के जरिए तथा पीजी कोर्स के लिए आयोजित होने वाली परीक्षा सीईई (कम्बाइंड एंट्रेंस एग्जाम) के आधार पर होती है।
    ली जाने वाली फीससिविल इंजीनियरिंग के कोर्स के लिए वसूली जाने वाली फीस अधिक होती है। बात यदि प्राइवेट संस्थानों की हो तो वे छात्रों से लगभग डेढ़ से दो लाख रुपए प्रतिवर्ष फीस लेते हैं, जबकि आईआईटी स्तर के संस्थानों में एक से डेढ़ लाख प्रतिवर्ष की सीमा होती है। इसमें काफी कुछ संस्थान के इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर करता है, जबकि प्राइवेट संस्थानों का प्रशिक्षण शुल्क विभिन्न स्तरों में होता है।
    आवश्यक अभिरुचिसिविल इंजीनियर की नौकरी काफी जिम्मेदारी भरी एवं सम्मानजनक होती है। बिना रचनात्मक कौशल के इसमें सफलता मिलनी या आगे कदम बढ़ाना मुश्किल है। नित्य नए प्रोजेक्ट एवं चुनौतियों के रूप में काम करना पड़ता है। एक सिविल इंजीनियर को शार्प, एनालिटिकल एवं प्रैक्टिकल माइंड होना चाहिए। इसके साथ-साथ संवाद कौशल का गुण आपको लंबे समय तक इसमें स्थापित किए रखता है, क्योंकि यह एक प्रकार का टीमवर्क है, जिसमें लोगों से मेलजोल भी रखना पड़ता है।
    इसके अलावा आप में दबाव में बेहतर करने, समस्या का तत्काल हल निकालने व संगठनात्मक गुण होने चाहिए, जबकि तकनीकी ज्ञान, कम्प्यूटर के प्रमुख सॉफ्टवेयरों की जानकारी, बिल्डिंग एवं उसके सुरक्षा संबंधी अहम उपाय, ड्रॉइंग, लोकल अथॉरिटी व सरकारी संगठनों से बेहतर तालमेल, प्लानिंग का कौशल आदि पाठय़क्रम का एक अहम हिस्सा हैं।
    रोजगार से संबंधित क्षेत्रएक सिविल इंजीनियर को सरकारी विभाग, प्राइवेट और निजी क्षेत्र की इंडस्ट्री, शोध एवं शैक्षिक संस्थान आदि में काम करने का अवसर प्राप्त होता है। अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा इसमें संभावनाएं काफी तेजी से बढ़ी हैं। इसका प्रमुख कारण रियल एस्टेट में आई क्रांति ही है। इसके चलते हर जगह बिल्डिंग, शॉपिंग, मॉल, रेस्तरां आदि का निर्माण किया जा रहा है। यह किसी भी यूनिट को रिपेयर, मेंटेनेंस से लेकर कंस्ट्रक्शन तक का कार्य करते हैं। बीटेक के बाद रोड प्रोजेक्ट, बिल्डिंग वक्र्स, कन्सल्टेंसी फर्म, क्वालिटी टेस्टिंग लेबोरेटरी या हाउसिंग सोसाइटी में अवसर मिलते हैं। केन्द्र अथवा प्रदेश सरकार द्वारा भी काम के अवसर प्रदान किए जाते हैं। इसमें मुख्य रूप से रेलवे, प्राइवेट कंस्ट्रक्शन कंपनी, मिल्रिटी, इंजीनियरिंग सर्विसेज, कंसल्टेंसी सर्विस भी रोजगार से भरे हुए हैं। अनुभव बढ़ने के बाद छात्र चाहें तो अपनी स्वयं की कंसल्टेंसी सर्विस खोल सकते हैं।
    इस रूप में कर सकते हैं कामसिविल इंजीनियरिंग
    कंस्ट्रक्शन प्लांट इंजीनियर
    टेक्निशियन
    प्लानिंग इंजीनियर
    कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट इंजीनियर
    असिस्टेंट इंजीनियर
    एग्जीक्यूटिव इंजीनियर
    सुपरवाइजर
    प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर
    साइट/प्रोजेक्ट इंजीनियर
    सेलरीइसमें मिलने वाली सेलरी ज्यादातर केन्द्र अथवा राज्य सरकार के विभाग पर निर्भर करती है, जबकि प्राइवेट कंपनियों का हिसाब उससे अलग होता है। बैचलर डिग्री के बाद छात्र को 20-22 हजार रुपए प्रतिमाह तथा दो-तीन साल का अनुभव होने पर 35-40 हजार के करीब मिलने लगते हैं। मास्टर डिग्री करने वाले सिविल इंजीनियरों को 25-30 हजार प्रतिमाह तथा कुछ वर्षों के बाद 45-50 हजार तक हासिल होते हैं। इस फील्ड में जम जाने के बाद आसानी से 50 हजार रुपये तक कमाए जा सकते हैं। विदेशों में तो लाखों रुपए प्रतिमाह तक की कमाई हो जाती है।
    एजुकेशन लोनइस कोर्स को करने के लिए कई राष्ट्रीयकृत बैंक देश में अधिकतम 10 लाख व विदेशों में अध्ययन के लिए 20 लाख तक लोन प्रदान करते हैं। इसमें तीन लाख रुपए तक कोई सिक्योरिटी नहीं ली जाती। इसके ऊपर लोन के हिसाब से सिक्योरिटी देनी
    आवश्यक है।
    प्रमुख संस्थान
    इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ टेक्नोलॉजी, नई दिल्ली
    वेबसाइट-
     www.iitd.ernet.in
    (मुंबई, गुवाहाटी, कानपुर, खडगपुर, चेन्नई, रुड़की में भी इसकी शाखाएं मौजूद हैं)
    बिड़ला इंस्टीटय़ूट ऑफ टेक्नोलॉजी (बीआईटीएस), रांची
    वेबसाइट
    www.bitmesra.ac.in
    दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली
    वेबसाइट
    www.dce.edu
    इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ साइंस, बेंग्लुरू
    वेबसाइट
    www.iisc.ernet.in
    नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ कंस्ट्रक्शन मैनेजमेंट एंड रिसर्च, नई दिल्ली
    वेबसाइट-
      www.nicmar.ac.in( गुड़गांव, बेंग्लुरू, पुणे, मुंबई, गोवा में भी शाखाएं मौजूद)
      

    Saturday, September 17, 2016

    ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग रफ्तार का करियर

    अर्थव्यवस्था की रफ्तार का पता इससे भी चलता है कि कौन-कौन से वाहन किस संख्या में सड़कों पर फिलवक्त दौड़ रहे हैं। इस सेक्टर को चलाने व आगे ले जाने वाले लोगों में ऑटोमोबाइल इंजीनियर्स भी हैं, जो डिजाइन, कम्फर्ट, इकॉनोमी, पावरफुल इंजन के साथ न केवल इस इंडस्ट्री को चलाते हैं, बल्कि अपने करियर को भी एक अनोखी रफ्तार देते हैं। इसी से जुड़ा है ऑटो कम्पोनेंट का तेजी से बढ़ता दायरा और यही वजह है कि ऑटोमोबाइल इंजीनियरों की मांग में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। एक तेज रफ्तार करियर के रूप में इसे चुना जा सकता है।
    ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग यानी ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग या व्हीकल इंजीनियरिंग आज का सबसे चुनौती-भरा करियर है, जिसमें संभावनाओं की सीमा नहीं है। इंजीनियरिंग की यह शाखा कार, ट्रक, मोटरसाइकिल, स्कूटर जैसे वाहनों के डिजाइन, विकास, निर्माण, परीक्षण और मरम्मत व सर्विस से जुड़ी होती है। ऑटोमोबाइल के निर्माण व डिजाइनिंग के सम्यक मेल के लिए ऑटोमोबाइल इंजीनियर्स इंजीनियरिंग की विभिन्न शाखाओं जैसे मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक, सॉफ्टवेयर तथा सेफ्टी इंजीनियरिंग की मदद से काम को अंजाम देते हैं।
    एक बेहतरीन ऑटोमोबाइल इंजीनियर बनने के लिए विशेष प्रशिक्षण की जरूरत होती है और साथ ही एक खास किस्म का जुनून चाहिए, जो दृढ़ता, मेहनत व लगन के साथ अपने काम को पूरा करने में किसी दबाव व परेशानी को सामने न आने दे।
    ऑटोमोबाइल इंजीनियर किसी भी वाहन की कॉन्सेप्ट स्टेज से लेकर प्रोडक्शन स्टेज तक शामिल होते हैं। यानी कागज से लेकर सड़क तक वाहन के आने तक उन्हें यह देखना होता है कि पूरा कॉन्सेप्ट हूबहू असलियत में उतरे। इस इंजीनियरिंग की कई उप-शाखाएं भी हैं जैसे इंजन, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंट्रोल सिस्टम, फ्ल्यूड मैकेनिज्म, थर्मोडायनेमिक्स, एयरोडायनेमिक्स, सप्लाई चेन मैनेजमेंट इत्यादि।
    ऑटोमोबाइल इंजीनियर को मुख्यत: तीन धाराओं में विभाजित किया जाता है-प्रोडक्ट या डिजाइन इंजीनियर, डेवलपमेंट इंजीनियर और मैन्युफैक्चरिंग इंजीनियर। प्रोडक्ट या डिजाइन इंजीनियर वह होता है, जो ऑटोमोबाइल्स के कम्पोनेंट और सिस्टम की डिजाइनिंग व टैस्टिंग करता है। वह हर पुर्जे को डिजाइन व टैस्ट करता है, ताकि वह निर्धारित जरूरतों को पूरा कर सके। मेन्युफैक्चरिंग इंजीनियर ऑटोमोबाइल्स के सभी पार्ट्स को जोड़ने का काम करता है। उसे उपकरणों, ऑटोमेशन उपकरणों और सेफ्टी प्रोसीजर्स को डिजाइन  करना होता है, जबकि मैन्युफैक्चरिंग इंजीनियर ऑटोमोबाइल के सभी हिस्सों को जोड़ कर पूरा वाहन तैयार करता है।
    नोएडा स्थित ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग डिविजन चला रहे रूपक सखूजा के मुताबिक ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में करियर तभी बना सकते हैं, जब इसमें आपकी रुचि होगी। वैसे प्रोडक्शन से लेकर, डिजाइनिंग, असेम्बलिंग और मैकेनिकल, कई तरह के जॉब हैं। रिसर्च एंड डेवलपमेंट का बहुत बड़ा दायरा है ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में।
    पाठय़क्रम
    गणित, भौतिकी, रसायन शास्त्र, जैव प्रौद्योगिकी और कम्प्यूटर साइंस में रुचि व अच्छी पकड़ रखने वाले छात्र ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में शानदार करियर बनाने की सोच सकते हैं। इनमें कई पाठय़क्रम कराए जाते हैं, जैसे-
    बीई ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग
    बीटेक ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग
    सर्टिफिकेट प्रोग्राम इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग
    डिप्लोमा इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग
    एमटेक इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग
    पीजी डिप्लोमा इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग
    शैक्षिक योग्यता
    ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में बीई या बीटेक करने के लिए 12वीं या समकक्ष योग्यता होनी चाहिए, जिसमें गणित, भौतिकी, रसायन शास्त्र, जैव प्रौद्योगिकी और कम्प्यूटर साइंस जैसे विषय हों। ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में स्नातक होने के बाद एमई या एमटेक किया जा सकता है। उसके बाद यदि और विशेषज्ञता हासिल करनी है तो पीएचडी की जा सकती है। दसवीं बाद डिप्लोमा किया जा सकता है।
    कैसे होता है चयन
    बीई या बीटेक पाठय़क्रमों में दाखिला 12वीं के अंकों व प्रवेश परीक्षाओं (आईआईटीजेईई, एआईईईई, बिटसैट इत्यादि) की मेरिट के आधार पर होता है, जो अखिल भारतीय व राज्य स्तर पर आयोजित की जाती है। एमई या एमटेक के लिए गेट यानी ग्रेजुएट एप्टीटय़ूड टैस्ट इन इंजीनियरिंग के माध्यम से दाखिला मिलता है। जिन्होंने डिप्लोमा कर रखा है, वे एआईएमई परीक्षा देकर डिग्री धारकों के समकक्ष हो सकते हैं। कुछ संस्थान अपनी परीक्षा लेते हैं।
    बीई या बीटेक कोर्स 4 साल का होता है, जबकि एमई या एमटेक और पीजी डिप्लोमा 2 साल का होता है। ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग के डिप्लोमा कोर्स 3 साल के होते हैं।
    व्यक्तिगत गुण
    विषय की जानकारी होने के साथ-साथ कम्युनिकेशन स्किल, कंप्यूटर स्किल, एनालिटिकल व प्रोब्लम सॉल्विंग स्किल होनी चाहिए। किसी भी चीज की बारीकी को पकड़ना आना चाहिए। शारीरिक रूप से स्वस्थ होना भी बहुत जरूरी है, क्योंकि काम के घंटे लम्बे हो सकते हैं।
    करियर विकल्प
    बताने की जरूरत नहीं है कि ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री किस तेजी से बढ़ रही है। लिहाजा न सिर्फ निर्माण में, बल्कि मेंटेनेंस व सर्विस में भी लोगों की जरूरतें बढ़ रही हैं। ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग की जितनी शाखाएं हैं, उनमें अवसर हैं। जिसे डिजाइन पसंद है, वह उसे चुन सकता है और जिसे मैन्युफैक्चरिंग भाती है, वह उसमें जा सकता है। वाहन बनाने वाली कंपनियों से लेकर सर्विस स्टेशन, स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन, प्राइवेट ट्रांसपोर्ट कंपनियों, इंश्योरेंस कंपनियों जैसी जगहों पर अवसरों की भरमार है। जरूरत है तो कुशल और समर्पित लोगों की, जिन्होंने ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रखी हो। सबकी योग्यता के हिसाब से कोई न कोई काम उपलब्ध है। कंप्यूटर के आ जाने से डिजाइन में क्रांति आ गई है। जो लोग इसमें महारत रखते हैं, वे इसे चुन सकते हैं। इसके अलावा अपना गैरेज, वर्कशॉप या सर्विस सेंटर खोला जा सकता है। जिसके पास मास्टर डिग्री है और ग्रेजुएट स्तर पर पांच साल तक पढ़ाने का अनुभव है, वह लेक्चरर बन सकता है। पीएचडी वाले रिसर्च में जा सकते हैं।
    आमदनी का स्रोत
    यह उम्मीदवार की योग्यता, अनुभव और उस कंपनी के स्टेटस पर निर्भर करता है कि किसी को क्या वेतन मिलता है। शुरुआत में किसी भी नए ऑटोमोबाइल इंजीनियर को 15,000 से 20,000 रुपए वेतन मिल सकता है। आईआईटी या अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़ने वालों के लिए वेतन की कोई सीमा नहीं है। इसके अलावा जैसे-जैसे अनुभव बढ़ता जाता है, वेतन में भी बढ़ोतरी होती रहती है, जो लाखों रुपये प्रतिमाह तक हो सकती है।
    प्रमुख संस्थान
    दिल्ली कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट, पलवल, हरियाणा
    वेबसाइट
    www.dctm.org.in
    मणिपाल इंस्टीटय़ूट ऑफ टेक्नोलॉजी, मणिपाल, कर्नाटक
    वेबसाइट-
     www.manipal.edu
    गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज, मोडासा, साबरकांठा, गुजरात
    वेबसाइट
    www.gecmodasa.org
    कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड रूरल टेक्नालॉजी, मेरठ उत्तरप्रदेश
    वेबसाइट-
     www.cert.ac.in
    हिन्दुस्तान कॉलेज ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, मथुरा उत्तरप्रदेश
    वेबसाइट
    www.hcst.edu.in
    बेशुमार जॉब्स हैं
    डॉक्टर प्रदीप कुमार
    (चेयरमैन-दिल्ली कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट)
    ट्रेनी इंजीनियर से लेकर ऑपरेशंस रिसर्च, डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग में ऊंचे से ऊंचे पद पर जा सकते हैं। एक ऑटोमोबाइल इंजीनियर अपनी वर्कशॉप खोल सकता है। लघु उद्योग स्थापित कर सकता है या जहां भी ऑटोमेशन हो रहा है या मशीनी काम हो रहा है, वहां वह नौकरी तलाश सकता है। शुरुआत में भले ही सैलरी 10 से 12 हजार होगी, लेकिन 2 से 3 साल के तजुर्बे के बाद उसकी आमदनी तीन गुणा बढ़ जाएगी। मैं तो यही कहूंगा कि छात्र ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में करियर बनाएं। यहां प्रशिक्षित ऑटोमोबाइल इंजीनियरों की बेहद कमी है।

    Thursday, September 15, 2016

    Genetic Counsellor डिकोडिंग द डिसऑर्डर


    ह्यूमन बॉडी में मौजूद क्रोमोजोम्स में करीब 25 से 35 हजार के बीच जीन्स होते हैं। कई बार इन जीन्स का प्रॉपर डिस्ट्रीब्यूशन बॉडी में नहीं होता है, जिससे थैलेसेमिया, हीमोफीलिया, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, क्लेफ्ट लिप पैलेट, न्यूरोडिजेनेरैटिव जैसी एबनॉर्मलिटीज या हेरेडिटरी प्रॉब्लम्स हो सकती है। इससे निपटने के लिए हेल्थ सेक्टर में ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट और दूसरे इनेशिएटिव्स लिए जा रहे हैं, जिसे देखते हुए जेनेटिक काउंसलिंग का रोल आज काफी बढ गया है। अब जो लोग इसमें करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए स्कोप कहीं ज्यादा हो गए हैं।

    जॉब आउटलुक

    एक अनुमान के अनुसार, करीब 5 परसेंट आबादी में किसी न किसी तरह का इनहेरेटेड डिसऑर्डर पाया जाता है। ये ऐसे डिसऑर्डर्स होते हैं, जिनका पता शुरुआत में नहीं चल पाता है, लेकिन एक जेनेटिक काउंसलर बता सकता है कि आपमें इस तरह के प्रॉब्लम होने की कितनी गुंजाइश है। काउंसलर पेशेंट की फैमिली हिस्ट्री की स्टडी कर इनहेरेटेंस पैटर्न का पता लगाते हैं। वे फैमिली मेंबर्स को इमोशनल और साइकोलॉजिकल सपोर्ट भी देते हैं।

    स्किल्स रिक्वायर्ड

    जेनेटिक काउंसलिंग के लिए सबसे इंपॉर्टेट स्किल है कम्युनिकेशन। इसके अलावा, कॉम्पि्लकेटेड सिचुएशंस से डील करने का पेशेंस। एक काउंसलर का नॉन-जजमेंटल होना भी जरूरी है, ताकि सब कुछ जानने के बाद मरीज अपना डिसीजन खुद ले सके। उन्हें पेशेंट के साथ ट्रस्ट बिल्ड करना होगा।

    करियर अपॉच्र्युनिटीज

    अगर इस फील्ड में ऑप्शंस की बात करें, तो हॉस्पिटल में जॉब के अलावा प्राइवेट प्रैक्टिस या इंडिपेंडेंट कंसलटेंट के तौर पर काम कर सकते हैं। इसी तरह डायग्नॉस्टिक लेबोरेटरीज में ये फिजीशियन और लैब के बीच मीडिएटर का रोल निभा सकते हैं। कंपनीज को एडवाइज देने के साथ टीचिंग में भी हाथ आजमा सकते हैं। वहीं, जेनेटिक रिसर्च प्रोजेक्ट्स में स्टडी को-ओर्डिनेटर के तौर पर काम कर सकते हैं। बायोटेक और फार्मा इंडस्ट्री में भी काफी मौके हैं।

    क्वॉलिफिकेशन

    जेनेटिक काउंसलर बनने के लिए बायोलॉजी, जेनेटिक्स और साइकोलॉजी में अंडरग्रेजुएट की डिग्री के साथ-साथ लाइफ साइंस या जेनेटिक काउंसलिंग में एमएससी या एमटेक की डिग्री होना जरूरी है।

    सैलरी

    जेनेटिक काउंसलिंग के फील्ड में फाइनेंशियल स्टेबिलिटी भी पूरी है। हालांकि जॉब प्रोफाइल और सेक्टर के मुताबिक सैलरी वैरी करती है। प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाला प्रोफेशनल महीने में 50 हजार रुपये तक अर्न कर सकता है, जबकि गवर्नमेंट डिपार्टमेंट में काम करने वाले महीने में 25 से 40 हजार के बीच अर्न कर सकते हैं।

    ट्रेनिंग

    -गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर

    -कामिनेनी इंस्टीट्यूट, हैदराबाद

    -संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट, लखनऊ

    -सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज, बेंगलुरु

    -महात्मा गांधी मिशन, औरंगाबाद

    -जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, दिल्ली

    -सर गंगाराम हॉस्पिटल, नई दिल्ली

    एक्सपर्ट बाइट

    जेनेटिक काउंसलिंग इंडिया में काफी तेजी से पॉपुलर हो रहा है। एप्लीकेशन के नजरिए से इसमें बहुत स्कोप है। नई लेबोरेटरीज खुल रही हैं, जिनके लिए जेनेटिक काउंसलर्स की काफी डिमांड है। वैसे, ट्रेडिशनल हॉस्पिटल्स के अलावा फार्मा कंपनीज में, कॉरपोरेट एनवॉयरनमेंट के बीच काम करने के पूरे मौके मिलते हैं। अब तक मेडिकल प्रोफेशन से जुडे स्टूडेंट्स ही इसमें आते थे, लेकिन अब नॉन-मेडिकल स्टूडेंट्स भी आ रहे हैं।

    Tuesday, September 13, 2016

    रसायन विज्ञान में B.S. कार्यक्रम

     आईआईटी बंबई में रसायन विज्ञान विभाग के 5 साल एकीकृत एमएससी की पेशकश की है लगभग 30 वर्षों के लिए अब डिग्री। इस साल के रूप में, हम एक संशोधित और होनहार बी एस / बी एस + M.Sc पेशकश करने के लिए बेहद उत्साहित हैं। रसायन विज्ञान में कार्यक्रम। उसी के लिए पाठ्यक्रम वर्तमान छात्रों से प्रतिक्रिया के साथ शिक्षकों द्वारा विकसित किया गया है, और इससे पहले कार्यक्रम की अखंडता को बरकरार रखे हुए है, जबकि यह अधिक एकजुट, लचीला बनाने और निवेश छात्र उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए अधिक से अधिक मौका देता है। हमारे पाठ्यक्रम Chemistry- भौतिक, जैविक, और अकार्बनिक के तीन मुख्य शाखाओं दोनों सैद्धांतिक और प्रायोगिक में एक में गहराई से समझ प्रदान करता है। यह भी अन्य fields- भौतिक विज्ञान, गणित, इंजीनियरिंग, और humanities- में एक प्रारंभिक आधार प्रदान करता है और आप ऐच्छिक और नाबालिगों के माध्यम से आगे का पता लगाने के लिए अनुमति देता है। एक ही समय में, यह दोनों विभाग ऐच्छिक और सम्मान के माध्यम से चौड़ाई और गहराई में रसायन विज्ञान के भीतर विकल्पों की एक श्रृंखला की अनुमति देता है। इन सुविधाओं है कि पारंपरिक परास्नातक और स्नातक कार्यक्रमों भारत में की पेशकश से हमारे कार्यक्रम भेद कर रहे हैं। इस विभाग का एक हिस्सा होने के नाते भी एक संकाय है कि विविध और अत्यधिक उनके काम में सम्मान है के लिए जोखिम प्रदान करता है। परास्नातक कार्यक्रम स्वाभाविक एक प्रोफेसर की देखरेख में नए शोध के अन्वेषण की आवश्यकता है। यहाँ तक कि इस के अलावा, विभाग की अनुमति देता है और विभिन्न क्षेत्रों में एक बहुत ही प्रारंभिक चरण से निवेश हासिल करने के लिए एक रुचि स्नातक के अवसरों की अधिकता के लिए प्रोत्साहित करती है। विभाग देश में सबसे अच्छा प्रायोगिक सुविधाओं, और व्यापक कम्प्यूटेशनल शक्ति के कुछ घरों। हम भी मजबूत अंतर्विभागीय और औद्योगिक सहयोग किया है। 

    रसायन विज्ञान का अवलोकन

    रसायन विज्ञान में विभिन्न स्तरों पर इस मामले की घटना के अध्ययन है, और निम्नलिखित के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है:

    सैद्धांतिक रसायन विज्ञान

    यह क्षेत्र उन्हें उनके मौलिक आणविक स्तर को कम करने और उन्हें शारीरिक बलों के संदर्भ में अध्ययन करके रासायनिक घटना को समझने के लिए प्रयास करता है। क्षेत्र के प्राथमिक लक्ष्यों में से एक लगातार आणविक सिस्टम के व्यवहार को सफलतापूर्वक और सही मॉडल के लिए नई समझ विकसित करना है। खेतों सबसे बड़े पैमाने पर इस काम में शामिल क्वांटम मैकेनिक्स और सांख्यिकीय यांत्रिकी हैं। अनुप्रयोगों बायोफिज़िक्स, जैव रसायन और दवा से, भौतिक विज्ञान, और स्पेक्ट्रोस्कोपी को लेकर। इस क्षेत्र भौतिकी और गणित के साथ रसायन विज्ञान के एक ओवरलैप है।

    और्गॆनिक रसायन

    कार्बनिक रसायन विज्ञान में एक आधार है कि आप के साथ परिचित हैं जनरल कार्बनिक रसायन विज्ञान और जैविक प्रतिक्रियाओं के साथ शुरू होता है, और उसके गहरे पहलुओं और आवेदन करने के लिए पर ले जाता है। संश्लेषण कार्बनिक रसायन है, जो दवा डिजाइन, प्राकृतिक उत्पादों के निर्माण, कटैलिसीस में लागू किया जाता है की एक बड़ी घटक है। अन्य अनुप्रयोगों semiconducting जैविक पॉलिमर और कार्बनिक सौर कोशिकाओं में शामिल हैं। शोध और labwork माध्यम से, हम प्रतिक्रियाओं है कि संश्लेषण और इस तरह नियंत्रित regioselectivity, stereoselectivity, और chemoselectivity सिद्धांतों के रूप में गठन सीखते हैं। हम भी बड़े पैमाने स्पेक्ट्रोस्कोपी और रासायनिक विधि का उपयोग कर कार्बनिक यौगिकों का विश्लेषण सीखते हैं।

    विश्लेषणात्मक रसायन विज्ञान और स्पेक्ट्रोस्कोपी

    विश्लेषणात्मक रसायन विज्ञान जुदाई, पहचान और कृत्रिम रूप से संश्लेषित यौगिकों या रसायनों प्राकृतिक स्रोतों से पृथक की मात्रा का ठहराव शामिल है। विश्लेषणात्मक रसायन विज्ञान ज्यादातर labwork के रूप में पता लगाया है। स्पेक्ट्रोस्कोपी आणविक दुनिया की एक तस्वीर प्राप्त करने के लिए प्रयोग किया जाता है। एमआरआई स्कैन एनएमआर स्पेक्ट्रोस्कोपी के रूप में इसी अवधारणा पर आधारित हैं। पाठ्यक्रम सामग्री स्पेक्ट्रोस्कोपी, स्पेक्ट्रोस्कोपी के विभिन्न प्रकार के निहित क्वांटम यांत्रिक प्रकृति के लिए परिचय।

    अकार्बनिक रसायन शास्त्र

    अकार्बनिक रसायन संरचना और सहसंयोजक पॉलिमर धातुओं से गैर धातु को लेकर तत्वों, गैसों और ईओण लवण करने के लिए ठोस का बना यौगिकों की एक विस्तृत श्रृंखला की जेट शामिल हैं। कोर पाठ्यक्रम की अवधि और उसके परिणामों, चुंबकत्व, जटिल गठन और जेट सहित संक्रमण धातुओं के गुणों पर ध्यान केंद्रित। अकार्बनिक रसायन हाइड्रोजन गैस भंडारण सामग्री आणविक मैग्नेट में आवेदन, उत्प्रेरक, ईंधन, कृषि आदि पाता है

    Computational रसायन विज्ञान

    कंप्यूटर, काल्पनिक या प्रयोगात्मक दुर्गम अणुओं और रासायनिक प्रणालियों संभव करने के लिए उपयोग कर दिया है। यह सूक्ष्म स्तर (यहां तक ​​कि व्यक्तिगत अणुओं) या कम समय फ्रेम शामिल (सिर्फ एक femtosecond के रूप में ज्यादा!) सिमुलेशन भौतिक बलों की एक बुनियादी समझ का उपयोग करें कि की मदद से इस मामले का अध्ययन है। यह प्रोटीन का अध्ययन करने के लिए स्थूल बंधन तोड़ने के एक अध्ययन से भिन्न होता है। इस अध्ययन के कार्यक्रमों है कि अणुओं और परमाणुओं के रसायन विज्ञान के एक सैद्धांतिक और सांख्यिकीय समझ का उपयोग के बीच बातचीत अनुकरण का उपयोग करता है। यह क्षेत्र एक दो तरफा दृष्टिकोण, समझ और कम्प्यूटेशनल रसायन विज्ञान के तरीकों से विकसित हो रहा है, साथ ही परिणाम है कि प्राप्त कर रहे हैं का विश्लेषण करने के लिए देता है। इस विधि अक्सर सैद्धांतिक रसायन विज्ञान के साथ हाथ में हाथ जाता है।

    भौतिक रसायन

    भौतिक रसायन विज्ञान स्थूल और आणविक स्तर पर बात, रसायन, और अणुओं के भौतिक गुणों का अध्ययन करता है। जबकि आणविक स्तर पर, रासायनिक बांड की क्वांटम यांत्रिक गुणों उनके प्रयोगात्मक manifestation- स्पेक्ट्रोस्कोपी में अध्ययन कर रहे हैं स्थूल गुण, thermodynamic और विद्युत शामिल हैं। biomolecules के thermodynamic के गुण बहुत रुचि के हैं और हमारे विभाग में बड़े पैमाने पर अध्ययन कर रहे हैं। Electrochemistry बढ़त समस्याओं को काटने, उदाहरण के लिए सौर कोशिकाओं की है कि में विशद जानकारी देता है।

    बी एस कार्यक्रम

    बी एस कार्यक्रम ऐसी है कि एक छात्र एक स्नातक की डिग्री के साथ स्नातक करने के लिए, या एक अतिरिक्त वर्ष के साथ आगे बढ़ाने के लिए एक और अधिक गहन और अनुसंधान गहन मास्टर्स डिग्री चुनते (एम.एससी। कैमिस्ट्री) विकल्प चुन सकते हैं संरचित है। विकल्प के चौथे वर्ष के लिए खुला है। एक इच्छुक छात्र भी सम्मान विभाग द्वारा की पेशकश की ऐच्छिक की एक सूची से 24 क्रेडिट (4 पाठ्यक्रम) को पूरा करने से एक सम्मान की डिग्री प्राप्त कर सकते हैं। यह आपको रसायन विज्ञान की एक उप डोमेन में विशेषज्ञ का अवसर देता है। एक निगरानी लर्निंग परियोजना (एसएलपी) जो कि एक साहित्य सर्वेक्षण या अपने तीसरे वर्ष में एक अनुसंधान परियोजना के रूप में हो सकता है के रूप में 12 इन 24 क्रेडिट का - छात्रों को भी पूरा करने के लिए 6 विकल्प चुन सकते हैं।

    Monday, September 12, 2016

    डर्मेटोलॉजी में करियर

    डिसिन में स्पेशलाइजेशन के लिए उपलब्ध विकल्पों में ‘डर्मेटोलॉजी’ काफी लोकप्रिय हो गया है। मौजूदा वक्त में ‘फर्स्ट इम्प्रेशन इज द लास्ट इम्प्रेशन’ कहावत को इतनी गंभीरता से लिया जा रहा है कि व्यक्ति के रूप को व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण अंग माना जाने लगा है। इस कारण लोगों में अपने रूप और व्यक्तित्व को लेकर चिंता का स्तर भी तेजी से बढ़ रहा है। यहां तक कि कॉलेज जाने वाले छात्र भी खुद को आकर्षक दिखाने की गरज से काफी रुपये खर्च कर रहे हैं।
    अपने रूप को लेकर लोगों में गंभीरता का स्तर इस कदर बढ़ गया है कि वह चेहरे पर छोटा-सा मुंहासा हो जाने भर से परेशान हो उठते हैं। कई बार वह ऐसी परेशानियों को इस कदर अपने ऊपर हावी कर लेते हैं कि घर से बाहर निकलना भी छोड़ देते हैं। ऐसे माहौल में रूप निखारने का दावा करने वाली फेयरनेस क्रीमों की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। खुजली और घमौरियों (रैशेज) जैसे त्वचा संबंधी रोग आम हो चुके हैं। गर्मी और बरसात के मौसम में इनकी अधिकता काफी बढ़ जाती है। इनके सही उपचार के लिए डॉंक्टर का परामर्श जरूरी होता है। कई बार उपचार के लिए डॉंक्टर के पास कुछ दिनों या हफ्तों के अंतराल पर बार-बार जाने की जरूरत होती है। ऐसे में लोग अपनी त्वचा के लिए ज्यादा खर्च करने में जरा भी नहीं हिचकते।
    त्वचा और रूप के प्रति लोगों के बढ़ती सजगता के कारण डर्मेटोलॉजिस्ट की मांग में इजाफा हो रहा है। डर्मेटोलॉजी मेडिसिन की एक शाखा है, जिसमें त्वचा और उससे संबंधित रोगों के निदान का अध्ययन किया जाता है। यह एक स्पेशलाइज्ड विषय है, जिसकी पढ़ाई एमबीबीएस के बाद होती है। डर्मेटोलॉजिस्ट रोगों के उपचार के अलावा त्वचा, बाल और नाखूनों से संबंधित कॉस्मेटिक समस्याओं का भी निदान करते हैं।
    डर्मेटोलॉजिस्ट का काम 
    इनका मुख्य कार्य लोगों की उन बीमारियों का उपचार करना होता है, जो त्वचा, बाल, नाखूनों और मुंह पर दुष्प्रभाव डालती हैं। एलर्जी से प्रभावित त्वचा, त्वचा संबंधी दागों, सूर्य की रोशनी में झुलसे या अन्य तरह के विकारों से ग्रसित त्वचा को पूर्व अवस्था में लाने में ये रोगियों की मदद करते हैं। इसके लिए वह दवाओं या सर्जरी का इस्तेमाल करते हैं। त्वचा कैंसर और उसी तरह की बीमारियों से जूझ रहे रोगियों के उपचार में भी वह सहयोग करते हैं। क्लिनिक या अस्पताल में वह सबसे पहले मरीजों के रोग प्रभावित अंग का निरीक्षण करते हैं। जरूरी होने पर वह रोग की गंभीरता जांचने के लिए संबंधित अंग से रक्त, त्वचा या टिश्यू का नमूना भी लेते हैं। इन नमूनों के रासायनिक और जैविक परीक्षणों से वह पता लगाते हैं कि रोग की वजह क्या है। रोग का पता लगने के बाद उपचार शुरू कर देते हैं। इस कार्य में वह दवाओं, सर्जरी, सुपरफिशियल रेडियोथेरेपी या अन्य उपलब्ध उपचार विधियों का उपयोग करते हैं।
    अन्य कार्य 
    कई बार शरीर में पोषक तत्वों की कमी के कारण भी त्वचा संबंधी रोग हो जाते हैं। ऐसे में डर्मेटोलॉजिस्ट रोगियों की स्थिति को देखते हुए उनके लिए ‘डाइट प्लान’ भी तैयार करते हैं। इसी तरह वह रोगियों को व्यायाम के साथ त्वचा और बालों की देखरेख से संबंधित सलाह भी देते हैं। इसके अलावा मरीजों के उपचार से संबंधित चिकित्सकीय दस्तावेजों (दी गई दवाओं और पैथोलॉजिकल जांच से संबंधित) का प्रबंधन भी उनके कार्यक्षेत्र का एक हिस्सा है।
    करते हैं कॉस्मेटिक सर्जरी: चेहरे और अन्य अंगों को आकर्षक बनाने के लिए डर्मेटोलॉजिस्ट कॉस्टमेटिक सर्जरी भी करते हैं। त्वचा की झुर्रियों और दाग-धब्बों को खत्म करने के लिए वह डर्माब्रेशन जैसी तकनीक और बोटोक्स इंजेक्शन का इस्तेमाल करते हैं। इन तकनीकों के अलावा वह लेजर थेरेपी का भी उपचार में उपयोग करते हैं। इस तकनीक की मदद से वह झुर्रियों और त्वचा पर होने वाले सफेद दाग का ईलाज करते हैं।
    योग्यता: फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी के साथ बारहवीं पास करके एमबीबीएस डिग्री प्राप्त करना डर्मेटोलॉजिस्ट बनने की पहली शर्त है। इसके बाद डर्मेटोलॉजी, वेनेरियोलॉजी और लेप्रोलॉजी में तीन वर्षीय एमडी या दो वर्षीय डिप्लोमा पाठय़क्रम की पढ़ाई की जा सकती है।
    स्पेशलाइजेशन के लिए उपलब्ध विषय
    मेडिकल डर्मेटोलॉजी         सर्जिकल डर्मेटोलॉजी
    डर्मेटोपैथोलॉजी                हेअर एंड नेल डिस्ऑर्डर्स
    जेनिटल स्किन डिजीज       पीडियाट्रिक डर्मेटोलॉजी
    इम्यूनोडर्मेटोलॉजी             पब्लिस्टरिंग डिस्ऑर्डर्स
    कनेक्टिव टिश्यू डिजीज     फोटोडर्मेटोलॉजी
    कॉस्मेटिक डर्मेटोलॉजी      जेनेटिक स्किन डिजीज
    संभावनाएं
    डर्मेटोलॉजी विषय के पोस्ट ग्रेजुएट पाठय़क्रम की पढ़ाई के बाद आप किसी निजी अस्पताल, नर्सिंग होम या सरकारी डिस्पेंसरी में डर्मेटोलॉजिस्ट के तौर पर काम कर सकते हैं। शिक्षण कार्य में रुचि होने पर आप किसी मेडिकल कॉलेज, यूनिवर्सिटी या इंस्टीटय़ूट में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में अध्यापन या शोध-कार्यों का निर्देशन भी कर सकते हैं।
    संबंधित शिक्षण संस्थान
    एम्स, नई दिल्ली
    मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, नई दिल्ली
    पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीटय़ूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़
    डिपार्टमेंट ऑफ डर्मेटोलॉजी एंड वेनेरियोलॉजी, दिल्ली यूनिवर्सिटी
    एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर
    एएफएमसी, पुणे
    डिपार्टमेंट ऑफ डर्मेटोलॉजी, पांडिचेरी इंस्टीटय़ूट ऑफ मेडिकल साइंसेज
    डॉं एमजीआर मेडिकल यूनिवर्सिटी, तमिलनाडु
    जरूरी गुण: 
    अच्छा सौंदर्यबोध और स्वास्थ्य हो
    मरीजों के साथ सहानुभूतिपूर्वक संवाद करने में कुशलता हो
    हर तरह की स्थितियों से निपटने का पर्याप्त धैर्य हो
    भावनात्मक और मानसिक रूप से मजबूत हो
    दूसरों की मदद करने की इच्छा हो