Tuesday, October 20, 2015

वकालत में करें करियर को पेटेंट

सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाने का जज्बा सिर्फ गिने-चुने प्रोफेशन में ही है। इन्हीं में से एक ‘लॉ’ भी है। लॉ का महत्त्व वैसे तो हमेशा से ही रहा है, परन्तु जिस हिसाब से लोगों में अपने अधिकारों एवं कानून को लेकर जागरूकता बढ़ी है, वकालत के पेशे ने भी उड़ान भरनी शुरू कर दी है। भारत में सस्ती लॉ सुविधाओं के चलते विदेशी संस्थाएं भी भारतीय वकीलों की ओर देख रही हैं। यही वजह है कि आज वकालत का प्रोफेशन अपने बूम पर है। संजीव चंद की रिपोर्ट
39 वर्षीय बृजेश चन्द्र कौशिक इलाहाबाद हाईकोर्ट में सिविल एवं साइबर कानून विशेषज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। उनका वकालत तक का सफर भी काफी रोचक रहा है। इस बारे में कौशिक बताते हैं कि ‘बीएससी एवं एमएससी कैमिस्ट्री में करने के पश्चात सिविल सेवाओं की तैयारी की ओर कदम बढ़ाया। कई बार इंटरव्यू के दौर से भी गुजरा, लेकिन इंटरव्यू देने के बाद भी सफल न होने की वजह से मेरा रुझान धीरे-धीरे सामाजिक चिंतन की ओर होने लगा। फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मैंने एलएलबी की तथा लॉ प्रोफेशन में प्रवेश किया।’ शुरुआती कुछ संघर्षो के बाद आज वे सफल हैं तथा अपने प्रोफेशन से खुश भी हैं।
उनका कहना है कि लॉ में करियर बनाने के बाद मेरी सिविल सेवाओं में असफलता की जो टीस थी, वह काफी हद तक कम हो गई। आज भी मैं इसमें बेहतर संभावनाओं की तलाश में रहता हूं। उनका मत है कि इस प्रोफेशन में शुरुआती दौर में हर वकील को कई झंझावातों से होकर गुजरना पड़ता है। इन्हीं झंझावातों से जूझ कर एक पेशेवर वकील बनने का सपना पूरा हो पाता है। इसमें दो राय नहीं कि लॉ का क्षेत्र हमेशा उपयोगी रहा है, क्योंकि समाज में विभिन्न प्रकार के अपराधों की संख्या बढ़ रही है। इनके नियंत्रण के लिए तमाम तरह के कानून बनाए गए हैं। उन कानूनों की जानकारी रखने वाले पेशेवर वकीलों की मांग दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। आज के दौर में कम्प्यूटर क्रांति की वजह से साइबर अपराधों की संख्या में भी तेजी से इजाफा हुआ है। इनके नियंत्रण के लिए साइबर कानून, साइबर न्यायालय इत्यादि बनाए गए हैं।
भारत की लीगल एजुकेशन में हमेशा बदलाव आते रहते हैं। कई यूनिवर्सिटीज एवं नेशनल लॉ स्कूल मिल कर इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं। बार काउंसिल ऑफ इंडिया एवं यूजीसी की सहायता से इसकी गुणवत्ता को निखारा जा रहा है। यही कारण है कि देश में लीगल एजुकेशन में हालिया कुछ वर्षों में व्यापक बदलाव देखने को मिला है। हालांकि किसी भी संस्थान का पाठय़क्रम या विषय अन्य लॉ स्कूलों से अलग नहीं होते, परंतु संस्थान विशेष में पढ़ाई का तरीका उसे अपने आप में अनोखा बनाता है। सुप्रीम कोर्ट के वकील एसके उपाध्याय का कहना है कि ‘मल्टीनेशनल कंपनियां अच्छे पैकेज पर वकीलों को अपने यहां रखती हैं। भारत के कोर्स की मान्यता विदेशों में भी है। बस वहां के लोकल लॉ का अध्ययन आवश्यक हो जाता है। जिन-जिन देशों में इंग्लैंड का शासन रहा है, वहां सीआरपीसी एवं आईपीसी संबंधी धाराएं समान रूप से लागू होती हैं।’ इस प्रोफेशन में सफल होने के बारे में श्री उपाध्याय बताते हैं कि ‘एक वकील के पास लॉ का ज्ञान, इंटरप्रीटेशन ऑफ लॉ, अभिव्यक्ति की क्षमता आदि की विशेषज्ञता का विकास होना अधिक मायने रखता है। तभी एक अच्छे वकील के रूप में आप देश-विदेश की विभिन्न लॉ फर्मो को अपनी सेवाएं देकर उचित पारिश्रमिक एवं सम्मान दोनों हासिल कर सकते हैं। इसमें थ्योरी के साथ-साथ प्रैक्टिकल नॉलेज काफी कारगर होती है। वैसे भी यह प्रोफेशन हमेशा से फलदायी रहा है। भारत और विदेशों में बड़ी लॉ फर्मो के आने और आकर्षक सेलरी देने के कारण कई छात्र कानून की शिक्षा ले रहे हैं।’
लॉ में हैं अनेक शाखाएं
लॉ के अंतर्गत आने वाले कोर्स का स्ट्रक्चर काफी फैला हुआ है। इसमें कई विषयों को शामिल किया जाता है। एक वकील अथवा जज को कई विषयों का ज्ञान रखना पड़ता है। अपनी विशेषज्ञता के हिसाब से वे अपनी फील्ड भी चुनते हैं। इसके सब्जेक्ट को लेकर रोचकता इसीलिए बनी रहती है, क्योंकि इसमें हिस्ट्री, पॉलिटिकल साइंस, इकोनॉमिक्स तथा एनवायरमेंट जैसे विषयों में से किसी एक का चयन करना पड़ता है। कुछ शाखाएं इस प्रकार हैं-
कॉरपोरेट लॉ- वर्तमान समय में वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए कॉरपोरेट लॉ की उपयोगिता बढ़ गई है। इसके तहत कॉरपोरेट जगत में होने वाले अपराधों के लिए उपाय या कानून बताए गए हैं। कॉरपोरेट कानूनों के बन जाने से कॉरपोरेट जगत में होने वाले अपराधों को रोकने तथा कॉन्ट्रेक्ट नेगोसिएशन, फाइनेंस प्रोजेक्ट, टैक्स लाइसेंस और ज्वॉइंट स्टॉक से संबंधित काम किए जाते हैं। इसमें वकील किसी फर्म से जुड़ कर उसे कॉरपोरेट विधि के बारे में सलाह देते हैं।
पेटेंट अटॉर्नी- पेटेंट अटॉर्नी, पेटेंट लॉ का काफी प्रचलित शब्द है। इसका मतलब है कि एक ऐसा अधिकार, जिसके तहत कोई व्यक्ति अपना पूर्ण स्वामित्व रखता है। बिना उसकी मर्जी या सहमति के कोई अन्य व्यक्ति उस अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता। यदि वह अधिकार किसी दूसरे व्यक्ति को स्थानांतरित (आंशिक या पूर्ण रूप से) करता है तो इसके बदले उस फर्म या व्यक्ति से कॉन्टेक्ट करता है।
साइबर लॉ- हर क्षेत्र में कंप्यूटर के बढ़ते उपयोग से साइबर क्राइम का भी ग्राफ बढ़ा है। आज इस कानून का विस्तार आम आदमी के साथ-साथ लॉ फर्म, बैंकिंग, रक्षा आदि कई क्षेत्रों में हो रहा है। इस कानून के तहत साइबर क्राइम के मुद्दों और उस पर कैसे लगाम लगाई जा सकती है, इसकी जानकारी दी जाती है।
क्रिमिनल लॉ- इसे लॉ की दुनिया का सबसे प्रचलित कानून माना जाता है। इस कानून से हर छात्र का सामना पड़ता है। हालांकि इसमें भी शुरुआती चरण में कई तरह की दिक्कतों से दो-चार होना पड़ता है, परन्तु एक बार नाम हो जाने पर फिर सरपट दौड़ शुरू हो जाती है।
फैमिली  लॉ- यह क्षेत्र महिलाओं का पसंदीदा क्षेत्र है। इसके अंतर्गत पर्सनल लॉ, शादी, तलाक, गोद लेने, गाजिर्यनशिप एवं अन्य सभी पारिवारिक मामलों को शामिल किया जा सकता है। लगभग सभी जिलों में फैमिली कोर्ट की स्थापना की जाती है, ताकि पारिवारिक मामलों को उसी स्तर तक सुलझाया जा सके।
बैंकिंग लॉ- जिस तरह से देश की विकास दर में वृद्धि हो रही है, ठीक वैसे ही बैंकिंग क्षेत्र का दायरा भी बढ़ रहा है। इसमें खासतौर पर लोन, लोन रिकवरी, बैंकिंग एक्सपर्ट आदि से संबंधित कार्यो का निपटारा होता है।
टैक्स लॉ- इस शाखा के अंतर्गत सभी प्रकार के टैक्स जैसे इनकम टैक्स, सर्विस टैक्स, सेल टैक्स से जुड़े मामलों को वकीलों की सहायता से निपटाया जाता है।
कब कर सकते हैं कोर्स
इसमें प्रवेश की पहली सीढ़ी 10+2 के बाद ही मिल जाती है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) द्वारा प्रायोजित पांच वर्षीय इंटीग्रेटेड एलएलबी कोर्स में छात्रों को बुनियादी चीजों को लेकर स्पेशलाइजेशन तक की जानकारी दी जाती है, जबकि ग्रेजुएशन  के पश्चात एलएलबी (तीन वर्षीय, पार्टटाइम/फुलटाइम) तथा उसके बाद एलएलएम (2 वर्षीय) में दाखिला आसान हो जाता है। बीए एलएलबी में छात्र को किसी स्पेशलाइज्ड फील्ड जैसे कॉरपोरेट लॉ, पेटेंट लॉ, क्रिमिनल लॉ, साइबर लॉ, फैमिली लॉ, बैकिंग लॉ, टैक्स लॉ, इंटरनेशनल लॉ, लेबर लॉ, रीयल एस्टेट लॉ आदि में विशेषता हासिल करनी होती है।
कोर्स के प्रश्चात छात्र को एक से दो वर्ष तक इंटर्नशिप या किसी वरिष्ठ अधिवक्ता के सहायक के रूप में काम करना पड़ता है। उसके बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया या अन्य किसी संस्था में रजिस्ट्रेशन कराया जाता है।
आवश्यक स्किल्स
इस प्रोफेशन की सबसे खास बात यह है कि इसमें छात्र जीवन से ही जुझारू प्रवृत्ति अपनानी पड़ती है। किताबों एवं घटनाओं से निरंतर जुड़े रहना किसी भी प्रोफेशनल को आगे ले जाता है। रिसर्च एवं एनालिसिस के आधार पर ही किसी विषय पर कमांड हासिल हो सकती है, इसलिए मेहनत करने से भागे नहीं।
एक एडवोकेट के रूप में आपको मृदुभाषी, वाकपटु, मेहनती तथा लीडर जैसे गुण भी अपनाने पड़ते हैं। महज परीक्षा पास करने से ही एक अच्छा वकील नहीं बना जा सकता, बल्कि तार्किक, धैर्यवान, एकाग्रता, बहस करने की क्षमता, आत्मविश्वास तथा पिछले केसों के बारे में अच्छी जानकारी रखने वाला भी होना चाहिए। आपके पास एक अच्छी लाइब्रेरी तथा किताबों का संग्रह भी आवश्यक है।
एंट्रेंस एग्जाम का स्वरूप
ज्यादातर बड़े संस्थानों में दाखिला एंट्रेंस एग्जाम के ही जरिये मिलता है। यह एक ऑब्जेक्टिव टाइप पेपर होता है, जिसमें रीजनिंग, जनरल अवेयरनेस, न्यूमेरिक एप्टीटय़ूड, लीगल एप्टीटय़ूड एवं राजनीति शास्त्र से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं। थोड़ी- सी मेहनत से ही उम्मीदवार इसमें सफलता हासिल कर सकता है, पर लॉ के क्षेत्र में जाने का फायदा तभी है, जब आपकी इसमें विशेष रुचि हो। दिल्ली विश्वविद्यालय की लॉ फैकल्टी ने अपनी प्रवेश तिथियां घोषित कर दी हैं, जबकि 2008 के पश्चात सात नेशनल लॉ स्कूल मिल कर कॉमन लॉ एडमिशन टैस्ट का आयोजन करते हैं, जिसके पश्चात अंडरग्रेजुएट व पोस्टग्रेजुएट प्रोग्राम में प्रवेश मिलता है।
प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाएं
विगत कुछ वर्षो से लॉ के प्रोफेशन में काफी बदलाव आया है। इसमें अच्छे छात्रों के चयन के लिए लगभग सभी बड़े संस्थानों ने एंट्रेंस एग्जाम की प्रथा शुरू कर दी है। इसलिए अच्छे लॉ कॉलेज में पढ़ने की संभावना तभी बन पाएगी, जब एंट्रेंस एग्जाम पास करेंगे। कुछ एंट्रेंस एग्जाम एवं उसे कराने वाले संस्थान निम्न हैं-
क्लैट (कॉमन लॉ एडमिशन टैस्ट)
एसएसएलसी, पुणे (सिम्बायोसिस सोसायटी लॉ कॉलेज)
फैकल्टी ऑफ लॉ, दिल्ली यूनिवर्सटिी
क्यूएलटीटी (क्वालिफाइड लॉयर्स ट्रांसफर टैस्ट)
एमिटी लॉ स्कूल, दिल्ली

कैसे लें लॉ कॉलेज की जानकारी
जहां एक ओर नामी लॉ कॉलेजों की भरमार है, वहीं फर्जी संस्थानों की भी कमी नहीं है। ऐसे फर्जी संस्थान विज्ञापन के माध्यम से अपने संस्थान का 100 प्रतिशत प्लेसमेंट दर्शाते हैं, इसलिए एडमिशन से पूर्व उस संस्थान की सत्यता की जांच-परख अवश्य कर लें। कोई भी इच्छुक छात्र, जो लॉ में अपना करियर बनाना चाहता है या वह संस्थान के बारे में जानकारी हासिल करना चाहता है तो ‘बार काउंसिल ऑफ इंडिया’ उसकी मददगार साबित हो सकती है। यह संस्थान कानूनी शिक्षा एवं व्यवसाय के साथ-साथ कानूनों में सुधार लाने के लिए अपने परामर्श भी देता है। इसकी वेबसाइट

वकालत के पेशे के लिए भारत का माहौल कैसा है?
देखा जाए तो यह काफी अच्छा प्रोफेशन है, क्योंकि इसमें एक वकील के रूप में कई विषयों की जानकारी होती है। मंदी के दौर में जहां हर प्रोफेशन प्रभावित हुआ, वहां लॉ प्रोफेशन पर कोई असर नहीं पड़ा। पिछले कुछ सालों में इसमें कई बदलाव देखने को मिले हैं। आने वाले समय में यह फील्ड और भी कारगर हो सकती है।
किस तरह के गुण एक वकील को औरों से अलग बनाते हैं?
हालांकि शुरुआती दिनों में इस पेशे में काफी संघर्ष की स्थिति है, लेकिन एक-दो वर्षो के संघर्ष के बाद स्थिति पूरी तरह काबू में आ जाती है। लॉ की अच्छी एवं अपडेट जानकारी, कम्युनिकेशन स्किल्स, ऑन द स्पॉट जवाब देने की योग्यता जैसे गुण एक वकील को अलग श्रेणी में खड़ा कर सकते हैं।
शुरुआती चरण में किस तरह की दिक्कतें आती हैं?
करियर शुरू करने पर सबसे बड़ी दिक्कत पैसे की आती है। यदि पारिवारिक बैकग्राउंड वकालत की है तो काफी फायदा पहुंचता है। एक लंबा वक्त उन्हें अपनी पहचान बनाने में लग जाता है तथा सीनियरों का सहयोग अथवा उनसे काम मिलने में परेशानी आती है, इसलिए इसमें धैर्य की बहुत जरूरत होती है।
दो-तीन साल प्रैक्टिस के बाद वकील कैसे आगे बढ़ सकता है?
हालांकि हाईकोर्ट अथवा सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने में वकील को कई तरह की दिक्कतें आनी स्वाभाविक हैं, इसलिए उन्हें कोशिश करनी चाहिए कि वे लोअर कोर्ट से ही अपनी प्रैक्टिस शुरू करें। 2-3 साल के बाद रुचि विकसित हो जाने के बाद अपनी फील्ड का चुनाव कर सकते हैं।
विदेशों में वकालत में कितनी संभावनाएं हैं?
सच कहा जाए तो भारत से ज्यादा विदेशों में वकालत में संभावनाएं मौजूद हैं। आजकल बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने विदेशी लोगों को यहां प्रैक्टिस की इजाजत दे रखी है। इसी तरह से यहां के लोग भी विदेशों में जाकर प्रेक्टिस कर रहे हैं। अभी इसमें और भी खुला परिदृश्य नजर आएगा। साथ ही कई सारी एमएनसी एवं लॉ फर्म भी भारत आ चुकी हैं।
रजिस्ट्रेशन संबंधी प्रक्रिया क्या है?
जैसे ही छात्र अपना कोर्स पूरा करते हैं, उन्हें अपने अटेंडेंस सर्टिफिकेट के साथ स्टेट बार काउंसिल में अप्लाई करना होता है। उसके बाद उन्हें प्रैक्टिस संबंधी लाइसेंस दे दिया जाता है।
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प्रमुख संस्थान
नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (एनएलएसआईयू)
29 अगस्त सन् 1987 में स्थापित संस्थान लीगल एजुकेशन, लीगल रिसर्च एवं ट्रेनिंग का खास गढ़। संस्थान में ही छात्र-टीचर्स के रहने की व्यवस्था।
संस्थान के फुल टाइम प्रोग्राम के छात्रों को एसबीए मेंबर होना जरूरी है।
पता - एनएलएसआईयू, पो. बॉ. - 7201, नागरभावी, बेंगलुरू-560072
वेबसाइट - www.nis.ac.in
अन्य प्रमुख संस्थान
- एनएएलएसएआर, हैदराबाद
वेबसाइट - www.nalsar.ac.in
- एनयूजेएस, कोलकाता
वेबसाइट - www.nugs.edu
 -  एनएलयू, जोधपुर
वेबसाइट - www.nlujodhpur.ac.in
- फैकल्टी ऑफ लॉ, (डीयू), दिल्ली
वेबसाइट - www.du.ac.in
- एमिटी लॉ स्कूल, नई दिल्ली,
वेबसाइट - www.amity.edu
- फैकल्टी ऑफ लॉ (बीएचयू), वाराणसी,
वेबसाइट - www.bhu.ac.in
- फैकल्टी ऑफ लॉ (एएमयू), अलीगढ़
वेबसाइट - www.amu.ac.in
कोचिंग संस्थान
- करियर लॉन्चर (एलएसटी)
वेबसाइट - www.careerlauncher.com
- पीटी एजुकेशन
वेबसाइट - www.pteducation.com
- श्रीराम लॉ एकेडमी
वेबसाइट - www.lawentrancecoaching.com
स्कॉलरशिप
देश में मिलने वाली स्कॉलरशिप-एनएलएसआईयू स्कॉलरशिप, हेमंत नरिचानिया स्कॉलरशिप, ललित भसीन स्कॉलरशिप एवं शंकर रामा मेमोरियल ट्रस्ट स्कॉलरशिप। विदेशों में लॉ से संबंधित स्कॉलरशिप- अमेरिकन बार एसोसिएशन, यूनिफिकेशन ऑफ प्राइवेट लॉ (यूएनआईडीआरओआईटी) रोम आदि हैं। कुछ प्रमुख वेबसाइट भी निम्न हैं- www.nelliemae.com, www.accessgroup.org लॉ एवं एचआर मिनिस्ट्री से भी सहायता मिलती है।
एजुकेशन लोन
लॉ सरीखे प्रफेशनल कोर्स के लिए देश व विदेश में पढ़ाई के लिए कई राष्ट्रीयकृत बैंक 10 से लेकर 20 लाख तक एजुकेशन लोन उपलब्ध कराते हैं। हालांकि फॉरेन एजुकेशन को लेकर कुछ शर्तें जरूर हैं। इलाहाबाद बैंक, आंध्रा बैंक, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, विजया बैंक प्रमुखता के साथ लोन देते हैं।
नौकरी के अवसर
इसमें प्रोफेशनल्स को सरकारी एवं प्राइवेट, दोनों ही सेक्टर में जॉब के अवसर मिलते हैं। प्राइवेट सेक्टर में जहां एडवोकेट, लीगल कंसल्टेंट, टीचर, राइटर, लीगल एजवाइजर आदि बनने का रास्ता खुलता है, वहीं सरकारी सेक्टर में सॉलीसिटर, लीगल कंसल्टेंट, (पार्टटाइम व फुलटाइम), लॉ ऑफीसर, असिस्टेंट एडवाइजर, डिप्टी लीगल एडवाइजर के रूप में अवसर सामने आते हैं। लॉ सर्विस कमीशन एवं स्टेट पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा पास करने के बाद मुंशफ एवं प्रमोशन के पश्चात उप न्यायाधीश, जिला एवं सत्र न्यायाधीश बना जा सकता है। एडवोकेट के रूप में हाइकोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट तक का रास्ता अख्तियार किया जा सकता है।
वेतन
इसमें प्रारम्भ में किसी भी प्रेक्टिशनर को 5 से 7 हजार रुपए प्रतिमाह मिलते हैं। एक-दो साल का अनुभव होने पर प्रोफेशनल्स को 10-12 हजार प्रतिमाह तक आसानी से मिल जाते हैं, जबकि प्राइवेट प्रेक्टिशनर्स को इस क्षेत्र में अच्छा पारिश्रमिक मिलता है। गवर्नमेंट सर्विस के अंतर्गत जब प्रोफेशनल्स सब जज के रूप में नियुक्त होते हैं तो 8-12 लाख रुपये प्रतिवर्ष का पैकेज लेते हैं।
सेलरी की सीमा काफी कुछ संस्थान, फर्म्स अथवा कंपनी पर निर्भर करती है।