Friday, September 11, 2015

इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में बीएससी

इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में बीएससी

इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में B.Sc प्रोग्राम एक उच्च गुणवत्ता और तकनीकी शिक्षा की मांग सक्षम और योग्य छात्रों के लिए बनाया गया है. अंग्रेजी में एक प्रतिष्ठित संकाय द्वारा सिखाया विशेष curriculum- - गणित, भौतिकी और इंजीनियरिंग विज्ञान के एक मजबूत बुनियादी कोर के आसपास बनाया गया है. कार्यक्रम अनुसंधान एवं विकास और पूरे मध्य पूर्व की उच्च तकनीक हब के भीतर इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में जानने के लिए अंतरराष्ट्रीय और इजरायल के छात्रों के लिए एक विश्व स्तरीय ढांचा प्रदान करता है.

इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर्स क्या करते हैं?

इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर्स अनुसंधान, डिजाइन, विकास, परीक्षण, और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों के विकास और बिजली और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और उपकरणों के निर्माण की निगरानी. लगातार भारी बिजली जनरेटरों के लिए एक वाहन के स्थान प्रदान कर सकते हैं कि ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम से, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर्स प्रौद्योगिकियों की एक विस्तृत श्रृंखला के लिए जिम्मेदार हैं. इलेक्ट्रिकल इंजीनियर भी ऑटोमोबाइल और विमान की विद्युत प्रणालियों के डिजाइन. बिजली के नियम और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग अक्सर शिक्षाविदों और उद्योग में उपयोग किया जाता है हालांकि इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर्स सिस्टम या सिग्नल प्रोसेसिंग नियंत्रित करने के लिए बिजली के आवेदन पर काम किया है, जबकि बिजली के इंजीनियरों परंपरागत रूप से, पीढ़ी और बिजली की आपूर्ति पर ध्यान केंद्रित किया है. बिजली इंजीनियरों ऐसी पावर सिस्टम इंजीनियरिंग या इलेक्ट्रिकल उपकरण विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञ.

मिशन

हमारे कार्यक्रम के उद्देश्यों इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग के क्षेत्र के लिए तत्काल और महत्वपूर्ण योगदान करके, उद्योग, शिक्षा, और सार्वजनिक संस्थानों में अपने चुने करियर में अग्रिम करने के लिए सक्षम हैं. हम उपकरणों और प्रणालियों के विकास, डिजाइन, निर्माण, उपयोग और संचालन की जिम्मेदारी लेने के लिए शिक्षा और व्यावहारिक उपकरण के साथ छात्रों को प्रदान करते हैं.
उपरोक्त उद्देश्यों छात्रों को उपलब्ध कराने के द्वारा प्राप्त कर रहे हैं:
  • गणित, बुनियादी विज्ञान, इंजीनियरिंग प्रथाओं, और डिजाइन कौशल में एक ठोस नींव उच्च रोजगार, अनुकूलनशीलता, और विकसित करने और नई प्रौद्योगिकी को लागू करने की क्षमता बनाए रखने के लिए;
  • प्रभावी संचार कौशल विश्व स्तर पर अपने करियर में प्रगति के लिए सक्षम होने के लिए;
  • संस्कृति और नेटवर्क में विविध एक अंतरराष्ट्रीय वातावरण,;
  • नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारियों के बारे में जागरूकता;
  • एक की क्षमता एक टीम के वातावरण में प्रभावी ढंग से काम करने के लिए.

प्रवेश एवं सहायता

एडमिशन संबंध विषयों में आवेदक की शैक्षणिक और पेशेवर प्रदर्शन पर आधारित है. अपने देश में विश्वविद्यालय में भाग लेने के लिए पात्र हैं, जो गैर देशी अंग्रेजी बोलने वाले छात्रों ताऊ नियमों के अनुसार भर्ती हैं. गैर अंग्रेजी भाषी देशों, पर्याप्त अंग्रेजी भाषा कौशल का सबूत से आवेदकों के लिए आवश्यक है. हम एक अध्ययन वीजा प्राप्त करने के सफल आवेदक पर्याप्त समय को सक्षम करने, अगस्त के अंत से पहले स्वीकृति पत्र वितरित. विशिष्ट मामलों में हम वीजा आवेदन प्रक्रिया में सहायता करने में सक्षम हो सकता है.
इंजीनियरिंग के तेल अवीव विश्वविद्यालय के इंटरनेशनल स्कूल को नए आवेदकों हाई स्कूल के चार साल पूरा किया और गणित और भौतिक विज्ञान में उत्कृष्टता का प्रदर्शन किया जाना चाहिए.
कॉलेज स्थानान्तरण उनके कॉलेज में उपलब्ध अगर नए और sophomore वर्ष से कम सूचीबद्ध गणित, भौतिक विज्ञान, और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों के अनुक्रम पूरा कर लिया जाना चाहिए.

Tuesday, September 8, 2015

न्यूक्लियर मेडिसिन – सही जांच और सटीक कॅरिअर के लिए

बहुत जल्द ही पारंपरिक जांच-परख के तौर-तरीके बदलने वाले हैं, खासतौर पर गंभीर बीमारियों के संबंध में। दरअसल, मौजूदा चिकित्सा पद्धति चाहे वह जिस तौर-तरीके पर आधारित हो, आमतौर पर बीमारियों का अनुमान ही लगाती है और फिर उस अनुमान के आधार पर इलाज होता है। जब अनुमान सही साबित हो जाता है तो चिकित्सा कामयाब रहती है और अगर अनुमान लगाने में कोई गलती रह गई तो दवाइयां असर नहीं करतीं। दवाइयों की कामयाबी का प्रतिशत भी दरअसल चिकित्सकों द्वारा बीमारियों के लगाए जाने वाले सटीक अनुमान पर ही निर्भर है।
लेकिन अनुमानों की यह दुनिया बहुत ही जल्द बदलने वाली है। अनुमान की जगह लेगी अब न्यूक्लियर मेडिसिन, जो न सिर्फ जांच-परख की सौ प्रतिशत शुद्धता सुनिश्र्चित करेगी अपितु इस्तेमाल होने वाली दवाइयों का कारगर होना भी तय करेगी। इसलिए अगर आपसे कोई डॉक्टर कहे कि आपको न्यूक्लियर मेडिसिन की जरूरत है तो इससे घबराएं नहीं। इसका न तो परमाणु बम से कोई रिश्ता है और न ही रेडियोधर्मी विकिरणों से। न्यूक्लियर मेडिसिन आने वाले भविष्य की हकीकत बनने जा रही है। इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल संभवतः उन खतरनाक बीमारियों का सटीक विश्लेषण करने, उनकी परख करने के लिए किया जाए जो असाध्य बीमारियों की कोटि में आती हैं। थायराइड कैंसर, न्यूरल क्रिस्ट ट्यूमर, बार-बार उभर आने वाली ऑर्थराइटिस जैसी बीमारियों का पता लगाने और उनके निदान में न्यूक्लियर मेडिसिन जबरदस्त भूमिका निभा सकती है।
लेकिन चिकित्सा की इस शाखा को सीटी स्कैन, अल्ट्रासाउंड या एमआरआई से जोड़कर देखने की गलती नहीं करनी चाहिए। यह इससे पूरी तरह से अलग, अपने आप में स्वतंत्र और स्पष्ट चिकित्सा शाखा है। पारंपरिक शारीरिक अनुमान और उसके प्रतिविंबन के तौर-तरीके अपनी जगह पहले की तरह मौजूद रहेंगे। यह इन सबसे अलग और इनको उन्नत बनाने वाली चिकित्सा शाखा है। सच बात तो यह है कि यह अब तक की संभवतः पहली ऐसी चिकित्सा शाखा बनने जा रही है जो रोगी और डॉक्टर दोनों को ही सौ प्रतिशत संतुष्टिदायक नतीजे दे पाने में सक्षम होगी। ऐसा इस क्षेत्र के वरिष्ठ विशेषज्ञों का कहना है या ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि इसमें किसी रोग को शुरूआती स्थिति से भी पहले पकड़ पाने की कुव्वत होगी। जबकि शारीरिक तस्वीर प्रविधि (एनाटोमिकल इमेजिंग मॉडेलिटीज) में किसी रोग को पकड़ पाना तभी संभव है, वह जब न सिर्फ पैदा हो जाए बल्कि पैदा होकर विकसित भी हो जाए। मसलन, अल्ट्रासाउंड या एमआरआई तकनीक के जरिए हम किसी टिश्यू या शरीर के अंदर किसी खतरे को तभी भाप पाते हैं, जब खतरा खतरनाक स्थिति तक पहुंच जाता है। जब ट्यूमर बढ़ चुका होता है और ज़िंदगी दॉंव पर लग चुकी होती है।
कस्तूरबा गांधी मेडिकल कॉलेज, मणिपाल के न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राजेश कुमार कहते हैं, “न्यूक्लियर मेडिसिन इमेजिंग तकनीक न सिर्फ बीमारी को बहुत शुरूआती अवस्था में पकड़ पाने में सक्षम रहती है अपितु यह प्रभावशाली इलाज और दवाइयों के बारे में भी स्पष्टता से बहुत कुछ बता पाने में सक्षम है। इससे हम किसी भी बीमारी की विस्तृत जानकारी, उसके विस्तृत प्रभाव और उससे निपटने के प्रभावशाली तरीकों आदि के बारे में जान जाते हैं। यही नहीं इससे बीमारी के आगे बढ़ने के बारे में यानी भविष्य में इसके फैलने की रफ्तार, दिशा और तरीके का भी ज्ञान हो जाता है। जिस कारण यह बीमारी किस अंग को किस तरह से प्रभावित करती है, कैसे फैलती है, इससे कैसे प्रभावशाली तरीके से छुटकारा पाया जा सकता है? इस सबका पता चल जाता है।’
न्यूक्लियर मेडिसिन में चिकित्सा उन्नति का भविष्य छुपा है। जाहिर है, इसका भविष्य शानदार है। ऐसे में भला न्यूक्लियर मेडिसिन का हिस्सा कौन नहीं बनना चाहेगा। इसे एक शानदार कॅरियर के रूप में अपनाने वालों की लंबी कतार है। आप भी न्यूक्लियर मेडिसिन में विशेषज्ञता हासिल कर सकते हैं। मगर याद रखें, यह 9 साल या इससे भी ज्यादा समय का एक जटिल पाठ्यक्रम है। इसलिए इसमें मेहनत बहुत जरूरी है। एमबीबीएस पूरा करने के बाद आप डीआरएम यानी डिप्लोमा इन न्यूक्लियर मेडिसिन हासिल कर सकते हैं। चाहें तो न्यूक्लियर मेडिसिन में एमडी की डिग्री भी हासिल कर सकते हैं। आप में अगर पूर्ण समर्पण और कठोर श्रम करने का माद्दा है तो आप इस क्षेत्र में आंतरिक श्रेष्ठता वाले क्षेत्रों जैसे- इमरजेंसी न्यूक्लियर मेडिसिन या न्यूक्लियर कार्डियोलॉजी का चयन कर सकते हैं। चूंकि न्यूक्लियर मेडिसिन या न्यूक्लियर कार्डियोलॉजी से संबंधित मरीज कैंसर से पीड़ित होते हैं और आमतौर पर खतरनाक स्थिति में होते हैं इसलिए इनकी जांच-परख करने वालों को न सिर्फ बेहद संवेदनशील अपितु खतरों के प्रति पूरी तरह से आगाह रहने वाला स्वभाव होना चाहिए।
चूंकि रेडियोआइसोटॉप्स शरीर में पहुंचते ही रेडिएशन का खतरा पैदा कर देते हैं इसलिए इस क्षेत्र में जाने वालों को सुरक्षा मानकों के प्रति बेहद संवेदनशील होना जरूरी है। ऐसे किसी भी विशेषज्ञ को भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर या एटोमिक एनर्जी रेग्यूलेटरी बोर्ड, मुंबई से लाइसेंस लेना जरूरी होता है। इसके बाद ही न्यूक्लियर मेडिसिन में कोई विशेषज्ञ प्रैक्टिस कर सकता है। अगर आप यह विशेषज्ञता हासिल करके नौकरी करते हैं तो शुरूआत में ही आपको 35 से 40 हजार रुपये प्रतिमाह मिल जाते हैं।
हालांकि हमारे देश में अभी न्यूक्लियर मेडिसिन को लेकर लोगों की जानकारी बड़ी सीमित है। यह वह क्षेत्र है जो आने वाले दिनों में भारी मांग में होगा। इस क्षेत्र में डिग्री-डिप्लोमा हासिल करना भविष्य में विशिष्ट रोजगार हासिल होने की गारंटी है। डॉ. धनराज जांगिड़ एसोसिएट डायरेक्टर न्यूक्लियर मेडिसिन एंड कार्डिक इमेजिंग एस्कॉट्र्स कहते हैं, “न्यूक्लियर मेडिसिन की क्षमता अभी तक भारत में उपयोग में नहीं लाई गई, क्योंकि इसके उपकरण बहुत महंगे हैं। रेडिएशन के फैलने का खतरा भी बना रहता है अगर आप इस तकनीक में दक्ष नहीं हैं और आपके पास उपकरण संवेदनशील नहीं हैं। लेकिन आने वाले दिनों में इसका भविष्य बहुत उज्जवल है।’ ज्यादा से ज्यादा कैंसर और हृदय रोग का इलाज करने वाले अस्पताल न्यूक्लियर मेडिसिन की तरफ देख रहे हैं। इसलिए यह कहना पूरी तरह से सुरक्षित है कि आने वाले दिनों में भारत में न्यूक्लियर मेडिसिन में विशेषज्ञ लोगों की भारी मांग होगी। चूंकि यह एक विशिष्ट क्षेत्र है इसलिए इसमें दक्षता हासिल करने के लिए समर्पण, जुनून के साथ-साथ पैसा और पेशेंस की भी जरूरत होती है।
एमबीबीएस के बाद डीआरएम (डिप्लोमा इन न्यूक्लियर मेडिसिन), एमडी, डीएनबी हासिल करने के लिए आप देश के कई महत्वपूर्ण मेडिकल संस्थानों में पढ़ाई कर सकते हैं। सबसे अच्छे संस्थानों में हैं –
– ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, एम्स, दिल्ली
वेबसाइट – www.aiims.edu
फोन नंबर : 011-26588500/26588900
– किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी, लखनऊ
वेबसाइट – www.kgmcindia.edu
फोन नंबर : 0522-2257540
– पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़
वेबसाइट – www.pgimer.nic.in
फोन नंबर- 0172-2746018/2756565
– कस्तूरबा गांधी मेडिकल कॉलेज, मणिपाल
वेबसाइट – www.manipal.edu
फोन नंबर-080-41474392/93

Career in नर्सिंग (परिचर्या)

नर्सिंग (परिचर्या) के बारे में तो कुछ कहने की ही ज़रुरत नहीं है. हम सभी जानते हैं कि यह कितना श्रेष्ठ व पवित्र कार्य है. हालांकि यह युगों-युगों से चलता आ रहा है परन्तु इसे नर्सिंग प्रोफेशन के रूप में ख्याति महान अंग्रेज़ नर्स फ्लोरेंस नाइटिंगेल के कार्यों से मिली. इन्हीं दया की देवी को आधुनिक नर्सिंग प्रोफेशन का जनक माना जाता है.
सभी प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोगियों की देखभाल करने को ही नर्सिंग (परिचर्या) कहते हैं. नर्स को मरीजों की लगातार देखभाल करनी होती है तथा डॉक्टर द्वारा दी गयी दवाओं को बताये गए समयानुसार देती हैं. ये मेडिकल डॉक्टरों व विशेषज्ञों की ऑपरेशन थियेटर तथा प्रयोगशाला में उपकरण इत्यादि संयोजित करने में सहायता भी करती हैं. परिचारिकायें उन रोगियों की भी सहायता करती हैं जो किसी कारणवश सामान्य ज़िंदगी नहीं जी सकते हैं तथा ये रोगियों को किसी लम्बी बीमारी की स्थिति में उनके पुनः सामान्य जीवन की तरफ लौटने में मदद करती हैं. इन सामान्य कार्यों के अलावा परिचारिकाएं निम्न क्षेत्रों में विशेषज्ञता भी हासिल कर सकती हैं: प्रसव, ह्रदय रोगों में देखभाल, इंटेंसिव केयर, विकलांग तथा बच्चों की देखभाल इत्यादि.
नर्स केवल बीमार लोगों की देखभाल करने के बारे में ही नहीं है. नर्सों के लिए अन्य उपलब्ध अवसर भी हैं: शिक्षण, प्रशासन अनुसंधान से जुड़े जॉब. इस क्षेत्र का सबसे रोचक तथ्य है कि इसमें ज़्यादातर महिलाएं ही होती हैं हालांकि अब पुरुषों ने भी इस प्रोफेशन में रूचि दिखाना शुरू कर दिया है.

चरणबद्ध प्रक्रिया

नर्स (परिचर्या) बनने के इच्छुक लोग विभिन्न स्तरों से इस की शुरूआत कर सकते हैं. आप सहायक नर्स मिडवाइफ/हेल्थ वर्कर (एएनएम) कोर्स से शुरू कर सकते हैं. इस डिप्लोमा कोर्स की अवधि डेढ़ वर्ष है तथा न्यूनतम योग्यता है- दसवीं पास.  इसके अलावा आप जनरल नर्स मिडवाइफरी (जीएनएम) कोर्स भी कर सकते हैं जो की साढ़े तीन वर्षो का होता है तथा इसके लिए न्यूनतम योग्यता है - 40 प्रतिशत अंकों के साथ भौतिक, रासायनिक एवं जीव विज्ञान में बारहवीं उत्तीर्ण.
एएनएम व जीएनएम के अलावा देश भर में फैले हुए विभिन्न नर्सिंग स्कूलों व कॉलेजों से नर्सिंग में स्नातक भी किया जा सकता है. इसके लिए न्यूनतम योग्यता है- 45 प्रतिशत अंकों के साथ अंग्रेज़ी, भौतिक, रासायनिक एवं जीव विज्ञान में बारहवीं उत्तीर्ण तथा आयु कम से कम 17 वर्ष. बीएससी नर्सिंग (बेसिक के पश्चात) पाठ्यक्रम के लिए आप दो वर्ष के रेगुलर कोर्स या त्रिवर्षीय दूरस्थ शिक्षा वाले पाठ्यक्रम में से किसी एक को चुन सकते हैं. रेगुलर कोर्स के लिए जहां न्यूनतम योग्यता है- 10+2+जीएनएम, वहीं दूरस्थ शिक्षा से यह कोर्स करने के लिए न्यूनतम योग्यता है- 10+2+जीएनएम+ दो वर्ष का अनुभव. यह पोस्ट बेसिक बीएससी नर्सिंग कोर्स ही आधुनिक माना जाता है.
भारतीय रक्षा सेवाओं द्वारा संचालित बीएससी (नर्सिंग) कोर्स के लिए 17 से 24 वर्ष की महिलाओं का चयन किया जाता है. यहाँ भी न्यूनतम योग्यता भौतिक, रसायन, जीव विज्ञान तथा अंग्रेज़ी विषयों में 45 प्रतिशत अंकों के साथ 12वीं है. प्रार्थी को एक लिखित परीक्षा भी पास करनी होती है. उसे शारीरिक रूप से भी फिट रहना चाहिए. चयनित लोगों को रक्षा सेवाओं के लिए पांच वर्ष का अनुबंध करना होता है.
किसी भी आयुर्विज्ञान संस्थान में नौकरी प्राप्त करने के लिए जीएनएम अथवा बीएससी ही पर्याप्त होता है.  प्रत्येक राज्य में नर्सों को रजिस्टर करने वाली अलग-अलग संगठन होते हैं. शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात आप अपने राज्य की नर्सिंग काउंसिल में अपना पंजीकरण करा सकते है. पंजीयन आपको जॉब प्राप्त करने में सहायता करता है.
नर्सिंग के बेसिक कोर्स के अलावा आप पोस्ट-बेसिक स्पेशियलिटी (एक-वर्षीय डिप्लोमा) कोर्स करके निम्न क्षेत्रों में विशेषज्ञता भी हासिल कर सकते हैं:
१. कार्डिएक थोरेकिक नर्सिंग
२. क्रिटिकल-केयर नर्सिंग
३. इमरजेंसी एवं डिजास्टर नर्सिंग
४. नए-जन्मे बच्चे की परिचर्या (नियो-नेटल नर्सिंग)
५. मस्तिष्क-संबंधी रोगों में परिचर्या (न्यूरो नर्सिंग)
६. नर्सिंग शिक्षा एवं प्रशासन
७. कर्क-रोग संबंधी नर्सिंग (ऑनकोलोजी नर्सिंग)
८. ऑपरेशन-रूम नर्सिंग
९. विकलांग चिकित्सा नर्सिंग
१०. मिड वाइफरी प्रैक्टिशनर
११. मनोरोग परिचर्या (साइकैट्रिक नर्सिंग)
जो छात्र उच्चतम शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं वह एमएससी, एमफिल तथा पीएचडी भी कर सकते हैं.

पदार्पण

यदि आप नर्सिंग को ही अपना प्रोफेशन बनाना चाहते हैं तो १०वीं के उपरान्त ही एएनएम कोर्स के लिए आवेदन करना बेहतर रहेगा अन्यथा आप स्कूलिंग करने के उपरान्त जीएनएम या बीएससी कोर्स कर सकते हैं.

क्या यह मेरे लिए सही करियर है?

मानवता की सेवा के लिए नर्सिंग की जॉब बहुत ही उद्देश्यपूर्ण है. यदि आप लगनशील हैं, आपमें दृढ़ इच्छाशक्ति है तथा रोगियों और दुखियों की सेवा करने का जूनून है और तनावपूर्ण परिस्थितियों में लम्बे समय तक काम करने की क्षमता है तो यह आपके लिए सही करियर है. नयी तकनीकों को आत्मसात करने तथा विभिन्न परिस्थितियों को संभालने की क्षमता रखना इस व्यवसाय की दो प्रमुख मांगें हैं.

खर्चा कितना आएगा?

नर्सिंग की पढ़ाई का खर्च संस्थान पर निर्भर करता है. सरकारी व सरकारी सहायता प्राप्त कॉलेज, निजी संस्थानों की अपेक्षा कम दर पर शिक्षा मुहैय्या कराते हैं. निजी संस्थान बीएससी नर्सिंग कोर्स के लिए 40,000 से 1,80,000 तक वार्षिक फीस वसूलते हैं. जीएनएम कोर्स के लिए यहाँ फीस होती है- 45,000 से 1,40,000 के बीच.

छात्रवृत्ति

कई संस्थान योग्य छात्रों को मेरिट के आधार पर छात्रवृत्ति प्रदान करते हैं. छात्रवृत्ति एवं उसकी अवधि भिन्न संस्थानों में भिन्न होती हैं.

रोज़गार के अवसर

नर्स कभी भी बेरोजगार नहीं रहतीं हैं. इन्हें आसानी से सरकारी अथवा निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम, अनाथाश्रम, वृद्धाश्रम, आरोग्य निवास, विभिन्न अन्य उद्योगों एवं रक्षा सेवाओं में नौकरी मिल जाती है. इनके लिए इन्डियन रेड-क्रॉस सोसाइटी, इन्डियन नर्सिंग काउंसिल, स्टेट नर्सिंग काउन्सिल्स तथा अन्य नर्सिंग संस्थानों में भी कई अवसर हैं. यहाँ तक कि एएनएम कोर्स के बाद ही इन्हें सारे देश में फैले हुए प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों पर प्राथमिक स्वास्थय सेवक के रूप में नौकरी मिल जाती है.
नर्सें मेडिकल कॉलेज व नर्सिंग स्कूलों में शिक्षण कार्य के अलावा प्रशासनिक कार्य भी कर सकती हैं.  उद्यमी लोग अपना खुद का नर्सिंग ब्यूरो शुरू कर सकते हैं तथा अपनी शर्तों पर काम कर सकते हैं.
देश में ही उपलब्ध अपार अवसरों के अलावा  नर्सें बेहतर अवसरों की तलाश में विदेश भी जा सकती हैं जिसके लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय नर्सिंग प्रमाणपत्र प्राप्त करना होता है तथा सम्बंधित देश में प्रवास की कुछ शर्तों का पालन करना होता है.

वेतनमान

इस क्षेत्र में शुरूआती तौर पर आपको 7 से 17 हज़ार रूपये तक मासिक वेतन मिल सकता है.  मिड-लेवल पदों पर नर्सें 18 से 37 हज़ार रूपये प्राप्त कर लेती हैं.  अधिक अनुभवी नर्सों को 48 से 72 हज़ार रूपये तक भी मासिक वेतन के रूप में मिल सकते हैं.  यूएस, कनाडा,  इंग्लैण्ड व मध्य-पूर्व के देशों में रोज़गार पाने वाली नर्सों को इससे भी अधिक वेतन मिलता है.

मांग एवं आपूर्ति

तेज़ी से बढ़ती जनसंख्यां के साथ बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती मांग के कारण देश में नर्सों की कभी न समाप्त होने वाली मांग बन चुकी है. हालांकि इस बढ़ती मांग की तुलना में आपूर्ति बहुत कम है.
एक हालिया अध्ययन के अनुसार, सारे देश में नर्सिंग काउंसिल में पंजीकृत नर्सों की संख्या 10.3 लाख है परन्तु वास्तव में इनमें से केवल 4 लाख नर्स ही कार्यरत हैं.  इनमें से ज़्यादातर नर्स या तो सेवानिवृत्त हो चुकी हैं या शादी कर चुकी हैं. इनमें से कुछ नर्सें विदेश चली गयी हैं. इसलिए इस क्षेत्र में मांग एवं आपूर्ति में बहुत बड़ा अंतर है.

मार्केट वॉच

स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता की वजह से इस क्षेत्र में रोज़गार के अवसर पहले से कहीं ज्यादा हैं. आज ज्यादा से ज्यादा अस्पताल एवं नर्सिंग होम स्थापित हो रहे हैं. सरकार भी अपनी तरफ से नर्सिंग सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत है. सरकार ने अभी हाल ही में 130 एएनएम तथा इतने ही जीएनएम स्कूल स्थापित करने की योजना बनायी है. इसके अलावा राज्यों की नर्सिंग काउंसिल व नर्सिंग सेल को मजबूत बनाने की भी योजना है. इन योजनाओं में देश भर में नए नर्सिंग कॉलेज स्थापित करना भी शामिल है.
सरकार ने तो अस्पतालों को बिना स्नातक कोर्स संचालित किये एमएससी  कोर्स  चलाने की भी अनुमति दे दी है. नर्सिंग कॉलेजों में दाखिले की न्यूनतम योग्यताओं में भी ढील दी गयी है जिससे कि अब विवाहित महिलाएं भी इसमें प्रवेश पा सकें.

अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शन

विदेशों में उच्च शिक्षित नर्सों की बहुत मांग है. भारत कई देशों में नर्सों की आपूर्ति करने वाला सबसे बड़ा देश बन चुका है.  अच्छे पैसे व बेहतर रहन-सहन की चाहत में अनुभवी भारतीय नर्सें विदेशों का रुख करने लगी हैं. देश में नर्सों की संख्या में कमी की एक बड़ी वजह यह भी है

सकारात्मक/नकारात्मक पहलू

सकारात्मक
1. यह एक सुरक्षित प्रोफेशन है.
2. इस क्षेत्र में अवसरों की कमी नहीं है चाहे वह देश में हों या विदेश में.
3. आप रोगियों को ठीक होते हुए देखकर संतुष्ट हो सकतीं हैं.
नकारात्मक
4. साधारणतः नर्सें शिफ्ट में काम करती हैं और रात की ड्यूटी एक बहुत साधारण बात है.
5. तनावपूर्ण परिस्थितियाँ मन तथा स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती हैं. 
6. दया की इन देवियों द्वारा किये गए कार्य अक्सर गुमनामी के अंधेरों में खो जाते हैं. 
7. विवाहित और पारिवारिक जीवन के बाद ये कार्य बहुत मुश्किल हो जाता है.

भूमिका एवं पदनाम

नर्स का पहला काम है- ज़रूरतमंद लोगों को चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराना तथा उनकी देखभाल करना.  फिर भी उनके कामों को निम्न भागों में विभक्त किया जा सकता है:
जनरल नर्स: इस श्रेणी की नर्सें अस्पताल,  नर्सिंग होम व अन्य मिकल संस्थानों में कार्य करती हैं.  इनका कार्य मरीजों की देखभाल करना, डॉक्टर की सहायता करना एवं प्रशासनिक कार्यों का निष्पादन करना होता है.
मिड-वाइफ: ये नर्सें गर्भवती महिलाओं की देखभाल तथा प्रसव के दौरान डॉक्टरों की सहायता करती हैं.
स्वास्थ्य-सेविका: ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना इनका कार्य होता है. 

इनके अलावा विशेषज्ञता जैसे विकलांग चिकित्सा नर्सिंग, कर्क-रोग संबंधी नर्सिंग (ऑनकोलोजी नर्सिंग), कार्डिओ थोरेकिक नर्सिंग, मनोरोग परिचर्या (साइकैट्रिक नर्सिंग) और क्रिटिकल-केयर नर्सिंग इत्यादि के आधार पर भी इन्हें वर्गीकृत किया जा सकता है.

अग्रणी कम्पनियों की सूची

1. इन्डियन रेड-क्रॉस सोसाइटी
2. इन्डियन नर्सिंग काउंसिल, विभिन्न राज्य-स्तरीय नर्सिंग काउंसिल
3. विभिन्न नर्सिंग स्कूल एवं संगठन
4. सभी प्रकार के अस्पताल एवं नर्सिंग होम्स
5. रक्षा सेवा
6. शिक्षण संस्था तथा उद्योग
7. अनाथाश्रम तथा वृद्धाश्रम जैसे विशेष संसथान

रोज़गार प्राप्त करने के लिए सुझाव

1. किसी प्रतिष्ठित संस्थान से डिग्री या डिप्लोमा अवश्य करें.
2. किसी क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करना आपके लिए लाभकारी सिद्ध होगा. 
3. रोज़गार प्राप्त करने की सबसे महत्वपूर्ण शर्त है की स्वयं को किसी भी राज्य की नर्सिंग काउंसिल में पंजीकृत कराना.
4. चूंकि नर्सों को हमेशा रोगियों तथा अन्य मेडिकल स्टाफ से बात करनी होती है अतः उनकी संवाद क्षमता उच्च स्तर की होनी चाहिए
कुछ टॉप हॉस्पिटल्स
u India Institutes of Medical Sciences
www.aiims.edu

u Apollo Hospitals
www.apollohospitals.com

u Escorts heart institute & Research center
www.ehirc.com

u Pd Hiduja National Hospitals & Research center
www.hidujahospitals.com

u Sir Ganga Ram Hospital
www.sgrh.com

u Tata Memorial Hospital
http:tmc.gov.in

आप इन हॉस्पिटल्स में बेवसाइट के माध्यम से जॉब से संबंधित अधिक जानकारी एकत्रित कर सकते हैं।

प्रमुख संस्थान


u ALakshmi Bai Batra College of Nursing
45 & 47, Tulkarbar Instutional Area
Pushpa Bhavan, Delhi - 110062
Phone:(11) 29956890 , 29958747

u Bombay Nurses Training Institute
Bombay Hospital ,
New Marine Lines, Mumbai - 400020
Phone: (22) 23711094

u Bharati Vidyapeeth's College of Nursing
Katraj - Dhankawadi Campus,
Satara Road, Pune - 411043
Phone: (20) 24373226

u J.M.J. College of Nursing
Principal Street, Sanat Nagar Industrial Estate
Hyderabad - 500018
Phone: (40) 23814631

u Apollo College of Nursing
Vanagaram to Ambattur Main Road,
Kil Avanambakkam, Chennai - 600095
Phone: (44) 26534387

u W.B.Govt.College of Nursing
244, Acharya Jagdish Chandra Bose Road
Kolkata - 700020
Phone: (33) 22239896

u K.M.C.H. College of Nursing
KMCH Campus, Civil Aerodrome P.O
Avinashi Road, Coimbatore - 641014 Tamilnadu India
Phone: (422) 2627784


Sunday, September 6, 2015

स्वच्छ वातावरण के लिए एन्वायरमेंटल इंजीनियरिंग

एक प्रशिक्षित एन्वायरमेंटल इंजीनियर से यह अपेक्षा की जाती है कि वह बेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम को इस तरह डिजाइन, कन्सट्रक्ट और मेंटेन करे, ताकि ग्रामीण और शहरी इलाकों में रहने वाले लोग स्वस्थ्य जीवन जी सकें।

संपूर्ण विश्व में पर्यावरण प्रदूषण जिस तेजी से बढ़ रहा है उसे कम करने की दिशा में आए दिन नए शोध और विकास कार्य होते रहते हैं। यही वजह है कि इस दिशा में कार्य कर रहे एन्वायरमेंटल इंजीनियर्स की मांग न सिर्फ देश में, बल्कि विदेश में भी काफी बढ़ रही है। एन्वायरमेंटल इंजीनियर्स विज्ञान और इंजीनियरंग के तरीकों को मिला –जुलाकर पर्यावरण सुधारने का कार्य करते हैं, ताकि लोगों को पीने के लिए स्वच्छ पानी, सांस लेने के लिए प्रदूषण रहित हवा और अनाज आदि पैदा करने के लिए उपजाऊ भूमि मिल सके।

पिछले कुछ दशकों में तो इस क्षेत्र में संभावनाएं और भी बढ़ी है। अब इस क्षेत्र के प्रेफेशनल्श की मांग कैमिकल, जियोलॉजिकल, पेट्रोलियम और माइनिंग सेक्टर्स से जुड़ी कंपनियों में भी हैं। एक प्रशिक्षित एन्वायरनमेंटल इंजीनियर से यह अपेक्षा की जाती है कि वह वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम को इस तरह डिजाइन, कन्स्ट्रक्ट और मेंटेन करे, ताकि ग्रामीण और शहरी इलाकों में रहने वाले लोग स्वस्थ जीवन जी सकें।


शैक्षणिक योग्यता


शैक्षणिक स्तर पर एन्वायरनमेंटल इंजीनियरिंग स्नातक और स्नातकोतर और शोध तीनों स्तरों पर उपलब्ध है। एन्वायरनमेंटल साइंस में बीएससी तीन वर्षीय स्नातक कोर्स है, वहीं एन्वायरमेंट इंजीनियरिंग में एमएससी दो साल का स्नातकोतर कोर्स है। इस कोर्स को करने के लिए फिजिक्स, कैमिस्ट्री और बायोलॉजी में 12वीं पास छात्र एन्वायरमेंटल साइंस में बीएससी कर सकते हैं। इसी प्रकार एन्वायरमेंटल इंजीनियरिंग में एमएससी करने के लिए छात्र का एन्वायरमेंटल साइंस में बीएससी होना अनिवार्य है। इस क्षेत्र में स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के अलावा छात्र पीजी डिप्लोमा भी कर सकते हैं जो इस क्षेत्र में आपके ज्ञान और योग्यताओं को नया आयाम देता है। वहीं अगर आपके पास 12वीं में फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स रहा है तो आप एन्वायरमेंटल इंजीनियरिंग में बीई कर सकते हैं। इसके अलावा एनर्जी एंड एन्वायरमेंट मैनेजमेंट में एमटेक भी की जा सकती है जो आप एन्वायरमेंट में बीई या सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक करने के बाद कर सकते हैं।

संभावनाएं


कैमिकल, बायोलॉजिकल, थर्मल, रेडियोएक्टिव और यहां तक कि मैकेनिकल इंजीनियरिंग में क्वालिफाइड छात्रों के लिए भारत में एन्वायरमेंटल इंजीनियिंग के क्षेत्र में काफी स्कोप है। इसके अलावा प्रोसेस इंजीनियरिंग, एन्वायरमेंटल केमिस्ट्री, वॉटर एंड सीवेज ट्रीटमेंट, वेस्ट रिडक्शन मेनेजमेंट, पॉल्यूशन प्रीवेन्शन आदि क्षेत्रों के प्रोफेशनल्श की भी यहां काफी मांग है। गैर सरकारी संस्थाएं और कई सरकारी विभाग भी हरित विकास की दिशा में कार्य कर रहे हैं। शोध से जुड़े कार्यक्रम में भी इस क्षेत्र केम प्रोफशनल्श की अच्छी-खासी मांग है। एमटेक इंजीनियंरिग कर चुके छात्र सरकारी एसेसमेंट कमेटियों में भी कार्य कर सकते हैं।

विदेश में संभावनाएं


कई अंतरराष्ट्रीय विभाग और यूएनओ जैसी संस्थाओं में एन्वायरमेंटल टेक्नोलॉजी से जुड़े प्रशिक्षितों की मांग है। पर्यावरण से जुड़े कई प्रोजेक्ट्स पर फ्रीलांस कम करने का मौका भी मिल सकता है। ऐसे प्रोजेक्ट्स पर काम करने की ऐवज में अच्छा-खासा वेतन भी मिलता है, साथ ही कई जरूरी सुविधाएं भी दी जाती हैं। यूएस में एन्वायमेंटल इंजीनियर्स को अच्छी मोटी तनख्वाह दी जाती है।

वेतन


एन्वायरमेंटल इंजीनियर्स केंद्र और राज्य स्तरीय पाल्यूशन कंट्रोल बोर्ड्स के साथ काम करने का अवसर मिलता है। स्टेट पाल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के साथ काम कर रहे प्रशिक्षितों को 15 से 30 हजार रुपए तक का वेतन मिल सकता है। वहीं एन्वायरमेंटल इंजीनियरिंग में एमटेक कर चुके छात्र इस क्षेत्र में 50 हजार रुपए तक कमा सकते हैं। बात करें इस क्षेत्र में बड़े स्तर पर होने वाले शोध कार्यों की तो इसमें 75 हजार रुपए तक कमाए जा सकते हैं।

संस्थान


• साउथ गुजरात यूनीवर्सिटी, सूरत
• दिल्ली विश्वविद्यालय
• मैसूर यूनिवर्सिटी
• दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग
• राजीव गांधी प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय, इंदौर
• आईआईटी, दिल्ली, कानपुर, खड़गपुर और मद्रास

एन्वायमेंटल इंजीनियरिंग का क्षेत्र चुनने के लिए आपके अंदर इस विषय के लिए पैशन होना बहुत जरूरी है। साथ ही अपनी योग्यताओं और क्षमताओं के बारे में भी आपको ज्ञान होना चाहिए। यह करिअर बेशक चुनौतियों भरा है, क्योंकि यहां आपसे पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं पर हर बार क्रांतिकारी समाधान देने की अपेक्षा की जाएगी। पर बात करें वेतनमान की तो यह काफी आकर्षित करने वाला होता है।

Thursday, September 3, 2015

पोषण एवं आहार विज्ञान में करियर के अवसर

विज्ञान पोषण के सिद्धांतों पर आधारित मनुष्य के भोजन का विज्ञान एवं कला है। इसे ‘‘मनुष्य की पोषणिक देख-रेख का विज्ञान एवं कला” भी कहा जाता है। रोगियों से जुड़ी संस्थापनाओं में आहार चिकित्सा-विज्ञान तथा इसका अनुप्रयोग आहार विज्ञान का एक मुख्य केंद्र बिंदु है। इस तरह आहार-विज्ञान (क) व्यक्ति पर संकेन्द्रित पोषण देख-रेख एवं निगरानी तथा (ख) समूह पर संकेन्द्रित पोषण देख-रेख एवं निगरानी से संबंधित हो सकता है।

आहार किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य तथा स्वस्थता वर्धन में एक अहम भूमिका निभाता है। एक अच्छे तथा संतुलित आहार की आदत जीवन क्षमता को बेहतर बनाती है तथा घटिया आहार रूग्णता और रोगों को बढ़ाता है। आहार-विज्ञान भोजन प्रबंधन से संबंधित होता है और पोषण स्वास्थ्य वर्धन से जुड़ा होता है।

अधिकांश शहरी जनसंख्या की भोजन-आदतों में परिवर्तन होने के कारण पोषण विज्ञानियों और आहार विज्ञानियों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है। वे, किसी व्यक्ति के विभिन्न पहलुओं जैसे आयु, कार्य दिनचर्या तथा बीमारी आदि को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त भोजन आदतों तथा चिकित्सा विज्ञान का सुझाव देते हैं और उससे उनकी जीवन क्षमता में सुधार लाते हैं। वे अपने ग्राहकों को पोषण के सिद्धांतों के अनुसार भोजन बनाने की शिक्षा भी देते हैं। वे खाद्य उत्पादन एवं प्रसंस्करण, खाद्य पसंद को प्रभावित करने वाले मनोवैज्ञानिक तथ्यों, पाचन तथा पोषण संबंधित पहलुओं पर इसके प्रभाव के बारे में जानते हैं। बढ़ रही तथा जरण की ओर अग्रसर जनसंख्या नर्सिंग होम, स्कूलों, कारागारों, सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों तथा गृह स्वास्थ्य देखरेख एजेंसियों में भोजन एवं पोषण संबंधी परामर्श की मांग में वृद्धि करेगी।

स्वास्थ्य देखभाल में आहार विज्ञानी की भूमिका


आहार विज्ञानी की भूमिका 19 वीं शताब्दी के प्रारंभ से ही काफी महत्वपूर्ण रही है। उनकी भूमिका से अब भी अनेक व्यक्ति अनभिज्ञ हैं। कुछ व्यक्ति सोचते हैं कि आहार विज्ञानी केवल व्यक्तियों को अपना वजन कम करने के लिए आहार संबंधी राय देते हैं, जबकि यह उनकी भूमिका का एक छोटा सा भाग है। आहार विज्ञानी पोषण संबंधी देखभाल के बारे में कठिन निर्णय लेने में रोगी तथा चिकित्सा दल या फिजिशियन के बीच एक सम्पर्क-कड़ी होता है। एशियन सोसायटी ऑफ पैरेंटरल एंड एंटरल न्यूट्रीशन (ए.एस.ई.ए.एन.) का कथन है कि पोषण देखभाल में आहार विज्ञानी की भूमिका ने, देखभाल के पूर्व-स्थापित मानकों के अनुसार संतुलित पोषक तत्वों के पर्याप्त स्रोतों और मात्रा की सिफारिश की है। रोगी की रोग-दशा पोषण संबंधी समर्थन अपर्याप्तता को अस्त व्यस्त कर देती है तो एक दुविधा की स्थिति आ जाती है, जिसके परिणाम-स्वरूप रोगी कुपोषण ग्रस्त हो जाता है आहार विज्ञानी को निम्नलिखित कार्य करने चाहिएं :-

• खाद्य एवं पोषण कार्यक्रमों की योजना बनाना।
• स्कूलों तथा अस्पतालों में भोजन व्यवस्था का पर्यवेक्षण करना।
• आहार संबंधी परिवर्तन का सुझाव देना।
• रोगियों को आहार की शिक्षा देना जो उनकी स्थिति में सुधार कर सकती है।
• बहु-विषयक स्वास्थ्य देख-भाल सोच जागृत करने के लिए अन्य स्वास्थ्य देख-भाल व्यवसायियों के साथ कार्य करना।
• बीमारी की गंभीरता तथा उपचार की जटिलता और सभी कल्पनीय मार्गों में भोजन लाभों तथा भार पर जानकारी देना।
• रोगी की पोषण संबंधी स्थिति पर आहर विज्ञानी के रूप में देते हुए तथा फिजिशियन एवं चिकित्सा-दल के सलाहकार के रूप में रोगी की देखभाल में सक्रिय रहना, और
• रोगी की देखभाल के उपायों जैसे अधिक आक्रामकता या प्रशामक देख-भाल करने में सहायक विधिक निर्णयों की जानकारी देना।

आहार विज्ञान में विभिन्न विशेषज्ञता-क्षेत्र :


नैदानिक आहार विज्ञानी अस्पतालों, आउटपेशेंट क्लीनिक्स तथा प्राइवेट प्रैक्टिस में खाद्य पोषण सेवा विशेषज्ञ होते हैं। वे रोगी की पोषण आवश्यकता का मूल्यांकन करते हैं, उनकी आहार-योजना बनाते हैं, रोगी को सलाह देते हैं और रोगी के ठीक होने की प्रगति पर निगरानी रखते हैं।

सामुदायिक आहार विज्ञानी सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियों, स्वास्थ्य एवं फिटनेस क्लबों तथा डे-केयर सेंटरों में कार्य करते हैं। वे पोषण संबंधी जागरूकता तथा रोग-निवारण में खाद्य विकल्पों और प्रत्यक्ष कार्यक्रमों पर व्यक्तियों को सलाह देते हैं।

प्रबंधन आहार विज्ञानी खाद्य सेवा प्रणालियों या नैदानिक प्रबंधन में विशेषज्ञ होते हैं। वे अस्पतालों, नर्सिंग होम्स, स्कूल खाद्य सेवा, कैफेटेरिया तथा रेस्तरां में कार्य करते हैं। वे कार्मिकों का प्रबंधन करते हैं, कर्मचारी प्रशिक्षण कार्यक्रमों की योजना बनाते हैं और उन्हें संचालित करते हैं, खाद्य व्यवस्था की रूपरेखा तैयार करते हैं और बजट योजना बनाते हैं।

सलाहकार आहार विज्ञानी स्वतंत्र व्यवसाय व्यक्ति होते हैं जो नर्सिंग होम सलाहकार, पुस्तक लेखक होते हैं तथा चिकित्सा केंद्रों एवं फिटनेस कार्यक्रमों में रोगी के सलाहकार के रूप में कार्य करते हैं। वे खाद्य सेवा व्यवस्था का विकास एवं मूल्यांकन भी करते हैं और उद्योग के स्वतंत्र सलाहकार के रूप में कार्य करते हैं।

करियर के अवसर :


सरकारी क्षेत्र : सरकारी अस्पतालों, सरकारी स्वास्थ्य देखभाल विभागों, स्कूलों, कॉलेजों, कारखानों और कैफेटेरिया में पोषण संबंधी आवश्यकताओं के नियोजन के कार्य कर सकते हैं।

खेल एवं स्वास्थ्य क्लब : खेल होस्टलों और एथलीट कैम्पों के लिए भी कार्य कर सकते हैं। स्वास्थ्य तथा मनोरंजन क्लबों, कैंटीन तथा नर्सिंग देख-भाल संस्थाओं को भी पोषण विज्ञानियों और आहार विज्ञानियों की सेवाओं की आवश्यकता होती है। सितारा होटलों तथा रेस्तरां के खानपान विभाग में भी उनके लिए रोज़गार के अवसर विद्यमान होते हैं।

अध्यापन, अनुसंधान एवं विकास : अनुसंधान एवं विकास कार्य में विभिन्न खाद्य मदों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए उन मदों पर अनुसंधान करना और विभिन्न प्रकार के आहारों के शरीर पर प्रभाव का प्रयोगशालाओं में अध्ययन करना शामिल होता है। अनुसंधान आहार विज्ञानी या पोषण विज्ञानी खाद्य पदार्थों के पोषण-मूल्यों पर अनुसंधान करते हैं, जो हमारे द्वारा खाए जाने वाले भोजन के विभिन्न घटकों और मानव-शरीर के लिए आवश्यक विटामिन, खनिज आदि जैसे अनिवार्य तत्वों की संतुलित मात्रा देने वाले सही प्रकार के भोजन को समझने में सहायता करते हैं। वे विश्वविद्यालयों, को समझने में सहायता करते हैं। वे विश्वविद्यालयों, सार्वजनिक या निजी क्षेत्र के अनुसंधान संस्थानों, खाद्य उत्पादन विनिर्माता कंपनियों तथा अस्पतालों में भी अनुसंधान करियर चुन सकते हैं। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में आहार विज्ञान या पोषण विज्ञान अध्यापन भी एक अच्छा विकल्प है।

मास मीडिया : इन सबके अतिरिक्त वे मास मीडिया में भी अवसर तलाश सकते हैं जहां स्वस्थ जीवन-यापन/रहन-सहन पर महत्वपूर्ण सूचना के प्रचार-प्रसार को उच्च प्राथमिकता दी जाती है।

जिम, स्लिमिंग सेंटर :


निजी सलाहकार/प्रेक्टिशनर अनुभवी आहार विज्ञानी किसी आहार विभाग के सहायक, एसोसिएट, या निदेशक बन सकते हैं या स्व-रोज़गार प्राप्त व्यक्ति बन सकते हैं। कुछ आहार विज्ञानी बाल आहार विज्ञान जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता प्राप्त करते हैं। इन सबके अतिरिक्त वे निजी सलाहकार या निजी प्रेक्टिशनर के रूप में भी कार्य कर सकते हैं।

वेतन : आहार विज्ञान एवं पोषण एक वेतनग्राही कार्य है। सरकारी अस्पतालों, शैक्षिक संस्थाओं, अनुसंधान संस्थाओं तथा अन्य एजेंसियों में वेतन कार्य-प्रोफाइल एवं अनुभव के आधार पर सरकार द्वारा निर्धारित होता है। कुछ निजी क्षेत्र के होटलों, रेस्तरां, खाद्य विनिर्माता उच्च वेतन तथा आकर्षक लाभ देते हैं। स्वतंत्र प्रेक्टिशनर एवं निजी सलाहकार भी अच्छी आय कमाते हैं। जो उनके ग्राहकों की संख्या तथा प्रकृति पर निर्भर होती है।

एंट्री स्तर पर : वेतन क्षमता तथा अनुभव के आधार पर 10000 रु. से 25000/- रु. प्रतिमाह होता है।

उच्च पद पर : वेतन योग्यताओं, धारित पद, अनुभव तथा स्थान के आधार पर 25000 रु. से 90000/- रु. प्रतिमाह तक होता है।

कार्य संभावनाएं अच्छी हैं और औसत कार्य के साथ क्षेत्र में उन्नति होने की प्रत्याशा होती है।

भारत में पोषण एवं आहार विज्ञान संस्थानों की सूची


कॉलेज/विश्वविद्यालय का नामपात्रतापाठ्यक्रम के विषय
अविनासीलिंगम महिला गृह विज्ञान एवं उच्च शिक्षा संस्थान कोयम्बत्तूर-641043विज्ञान विषयों सहित 10+2खाद्य विज्ञान एवं  परिरक्षण
अखिल भारतीय स्वास्त्य विज्ञान एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान्, चितरंजन एवेन्यू, कोलकाता –700073भारतीय चिकित्सा परिषद द्वारा मान्यताप्राप्त औषधि एवं शल्य चिकित्सा स्नातक अथवा शरीर विज्ञान या रसायन विज्ञान या नैदानिक पोषण सहित विश्वविद्यालय की डिग्री तथा आहार विज्ञान एक विषय के रुप में रहा हो। किसी मान्यताप्राप्त संस्था या विश्वविद्यालय से डोमेस्टिक अथवा नर्सिंग में डिग्रीधारीआहार विज्ञान में एक वर्षीय डिप्लोमा
श्रीमती नत्थीबाई दामोदर ठाकरसे महिला विश्वविद्यालय (एस.एन.डी.टी.) मुंबई-400020नैदानिक पोषण या पोषण एवं आहार विज्ञान में बी.एससी.एम.एससी-नैदानिक पोषण, आहार विज्ञान एवं पोषण में पी.जी. डिप्लोमा
गृह अर्थशास्त्र विश्वविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय)विज्ञान विषयों सहित 10+2आहार विज्ञान एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य पोषण में डिप्लोमा
लेडी इर्विन कॉलेज, नई दिल्लीविज्ञान विषयों सहित 10+2आहार विज्ञान में डिप्लोमा
सैम हिगीन्बोटम इन्स्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर इलाहाबाद उ.प्र.एस.सी. –खाद्य, पोषण एवं आहार विज्ञानएम. एस.सी. खाद्य, पोषण एवं आहार-विज्ञान
ओस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद, आं.प्र.विज्ञान सहित 10+2बी. एससी-गृह विज्ञान या खाद्य पोषण तथा आहार विज्ञानपोषण एवं आहार-विज्ञान में बी.एससी. पोषण एवं आहार-विज्ञान में एम.एससी.
मुंबई विश्वविद्यालय, मुंबईविज्ञान विषयों सहति 10+2/पोषण एवं आहार विज्ञान में स्नातकपोषण एवं आहार विज्ञान में बी.एससी/एम.एससी
महाराज सायाजीराव बड़ौदा विश्वविद्यालय, वड़ोदराविज्ञान विषयों सहित 10+2/पोषण एवं आहार विज्ञान में स्नातकपोषण एवं आहार विज्ञान में बी.एस.सी/एम.एस.सी
महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुरविज्ञान विषयों सहित 10+2/खाद्य पोषण एवं आहार विज्ञान में स्नातकपोषण एवं आहार विज्ञान में बी.एससी/एम.एससी.
आचार्य एन.जी.रंगा कृषि विश्वविद्यालय, हैदराबादविज्ञान विषयों सहित 10+2/खाद्य पोषण एवं आहार विज्ञान में स्नातकपोषण एवं आहार-विज्ञान में बी.एससी/एम.एससी.
एल्फोंजा कॉलेज पाला-686574 (स्व वित्त पोषण) (महात्मा गांधी विश्वविद्यालय से संबद्ध)बी.एससी. खाद्य, पोषण एवं आहार विज्ञान या बी. एससी. गृह विज्ञानएम.एस.सी. नैदानिक पोषण एवं आहार-विज्ञान (स्व-वित्त पोषण) www.alphonsacollege.org
सेंट टेरेसा कॉलेज, एर्नाकुलम-682011गृह विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, प्राणि विज्ञान, जैव रसायन विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी, खाद्य विज्ञान, एवं गुणवत्ता नियंत्रण तथा नैदानिक पोषण एवं आहार विज्ञान में न्यूनतम 55%अंकों सहित किसी मान्यताप्राप्त विश्वविद्यालय विश्वविद्यालय की स्नातक डीग्री।नैदानिक पोषण एवं आहार विज्ञान में पी.जी. डिप्लोमा www.terasas.ac.in
क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, तोरापड़ी पोस्ट, बागायम, वेल्लोर-632बी.एससी. खाद्य पोषम एवं आहार विज्ञान या बी.एससी-गृह विज्ञानआहार विज्ञान में पीजी डिप्लोमा
श्री रामचंद्र चिकित्सा कॉलेज एवं अनुसंधान संस्थान (मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय), चेन्नै-600116बी.एससी-खाद्य, पोषण एवं आहार विज्ञान या बीएससी गृह प्रवेश एक प्रवेश परीक्षा पर आधारित होता है।नैदानिक पोषण में एक वर्षीय पीजी डिप्लोमा।
मुंबई विश्वविद्यालय, एमजी रोड, फोर्ट, मुंबई-400032बी.एससी-खाद्य, पोषण एवं आहार विज्ञान या बी.एससी कृषि विज्ञानआहार विज्ञान एवं अनुप्रयुक्त पोषण में पी.जी. डिप्लोमा
श्री पद्मावती महिला विश्वविद्यालय, तिरुपति 517502बी.एससी खाद्य, पोषण एवं आहार विज्ञान या बी.एससी गृह विज्ञानपोषण एवं आहार विज्ञान में पी.जी. डिप्लोमा
विवेकानंद महिला कला एवं विज्ञान कॉलेज, विज्ञान नामक्कल, तमिलनाडुबी.एससी, पोषण एवं आहार विज्ञानएम.एससी. पोषण
हॉली क्रॉस होम साइंस कॉलेज, थूथुकुड़ी, विज्ञान तमिलनाडुबी.एससी, पोषण एवं आहार विज्ञानपोषण एवं आहार-में पी.जी. डिप्लोमा;आहार-विज्ञान एवं खाद्य प्रबंधन में एम.एससी
श्री रामचन्द्र विश्वविद्यालय, चेन्नै, तमिलनाडुनैदानिक पोषण या पोषण एवं आहार विज्ञान में बी.एससीनैदानिक पोषण में एमएससी.
भारत में दूरस्थ शिक्षा माध्यम के पोषण एवं आहार विज्ञान संस्थानों की सूची
मदुरई कामराज विश्वविद्यालय, मदुरई (तमिलनाडु) www.mkudde.org देखेंआहार विज्ञान, खाद्य एवं पोषण में या किसी संबंधित क्षेत्र में स्नातक डिग्रीअनुप्रयुक्त पोषण एवं आहार विज्ञान में एक वर्षीय डिप्लोमा, पोषण एवं आहार विज्ञान/नैदानिक पोषण/गृह विज्ञान में बी.एससी. डिग्री
पोषण संस्थान (एमटीआर स्वास्थ्य विज्ञान से संबद्ध)एम.बी.बी.एस. या जैव रसायन विज्ञान/शरीर विज्ञान/खाद्य एवं पोषण/आहार विज्ञान में मास्टर डिग्रीएम.एससी (अनुप्रयुक्त पोषण)
श्री पद्मावती महिला विश्वविद्यालय, तिरुपति (आ.प्र.)बी.एस.सी गृह विज्ञान (50%अंक)पोषण एवं आहार-विज्ञान में एक वर्षीय डिप्लोमा
बबई विश्वविद्यालय, एम.जी.रोड, फोर्ट, मुंबई-400032बी.एससी.-गृह विज्ञानपोषण एवं आहार विज्ञान में एक वर्षीय डिप्लोमा
बंगलौर विश्वविद्यालय, सेंट्रल कॉलेज, कैम्पस, डॉ. अम्बेडकर वीधि, बंगलौर-560001गृह विज्ञान/रसायन विज्ञान एक वैकल्पिक विषय के रूप में लेकर पी.यू.सी. या समकक्ष परीक्षा उत्तीर्ण होंअनुप्रयुक्त पोषण एवं आहार विज्ञान में एक वर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रम (इंजी माध्यम)
गृह अर्थशास्त्र विश्वविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय)विज्ञान सहित 10+2आहार विज्ञान एवं सार्वजनिक स्वास्त्य पोषण में डिप्लोमा
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, www.ignou.ac. पद देखेंगृह विज्ञान या खाद्य एवं पोषण/या आहार विज्ञान एवं खाद्य सेवा प्रबंधन में बी.एससी. या संबंधित क्षेत्र में स्नातकआहार विज्ञान एवं खाद्य सेवा प्रबंधन में एससी
उत्कल विश्वविद्यालय, भुवनेश्वरगृह विज्ञान या खाद्य एवं पोषण/या आहार विज्ञान एवं खाद्य सेवा प्रबंधन में बी.एस.सीआहार विज्ञान एवं पोषण प्रबंधन में पी.जी. डिप्लोमा
मध्य प्रदेश भोज (मुक्त) विश्वविद्यालय भोपालगृह विज्ञान या खाद्य एवं पोषण/या आहार विज्ञान एवं खाद्य सेवा प्रबंधन में बी.एससीस्नातकों के लिए आहार विज्ञान एवं थेराप्यूटिक पोषण में पी.जी. डिप्लोमा



स्नातक व्यक्ति पीएच.डी. या एम.डी प्राप्त करने के अपने ध्येय के साथ अपना अध्ययन चालू रख सकते हैं। आहार विज्ञान एवं जीव विज्ञान कार्यक्रम छात्रों को आहार विज्ञान डिग्री प्राप्त करने का अवसर देता है।

Wednesday, September 2, 2015

शोध में करियर की खोज

देश में अनुसंधान के क्षेत्र में पिछले कुछ समय से हलचल देखी जाने लगी है। शोध का महत्व विज्ञान और अन्य विषयों में स्पष्ट होने लगा है। इसमें रोजगार के अवसर भी सामने आ रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञता इसकी सबसे पहली शर्त है। शोध क्षेत्र में रोजगार के अवसरों पर विशेष।
शोध या अनुसंधान को कई तरीकों से पारिभाषित किया जा सकता है। व्यापक रूप से देखें तो शोध में ज्ञान की अगले पायदान पर जाने के लिए आंकड़ों, सूचनाओं और तथ्यों को जुटाना और उनके आधार पर किसी नतीजे पर पहुंचना शामिल है। दरअसल किसी भी विषय को समझने के लिए उससे संबंधित सामग्री की जरूरत होती है। सबसे पहले एक प्रश्न खड़ा होता है, फिर उस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए आंकड़े जुटाए जाते हैं और उनके आधार पर उत्तर हासिल किया जाता है।
रिसर्च के लिए निम्न बिंदुओं पर काम करना होता है-
शोध के विषय की पहचान,
शोध का उद्देश्य,
शोध से संबंधित प्रश्न,
आंकड़ों का संग्रह,
आंकड़ों का विश्लेषण,
निष्कर्ष
ये सारे कदम शोध की संपूर्ण प्रक्रिया बताते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि यही वे कदम हैं, जिनको अपना कर हर अनुसंधान पूरा किया जाता है। नये बिंदु हमेशा शामिल हो सकते हैं। रिसर्च ऐसी प्रक्रिया है, जो स्थापित सिद्धांतों से आगे चलते हुए नए मानकों व नई व्याख्याओं की तलाश करती है, ताकि हर क्षेत्र में नया और बेहतर किया जा सके और मानव सभ्यता उसका अधिक से अधिक लाभ उठा सके। शोध की गुंजाइश हर क्षेत्र में है, चाहे मानव विज्ञान हो, सामाजिक विज्ञान हो, साहित्य हो, अभियांत्रिकी हो या विज्ञान हो, जिसमें भौतिकी, रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान शामिल हैं।
बेशक हमारे देश में शोध अभी उस स्तर तक नहीं पहुंचा है, जो अधिक से अधिक विद्यार्थियों को अपनी तरफ आकर्षित करे, लेकिन काफी सुधार हो रहा है। भारत के विश्वविद्यालयों में इस तरफ काफी गंभीरता दिखाई जा रही है। कहा जा रहा है कि अगले 10 से 12 सालों में देश रिसर्च के क्षेत्र में सुपरपावर बन सकता है।
एक अध्ययन के मुताबिक, भारत में शोध के स्तर में तेजी से सुधार आ रहा है और वे सभी चीजें मुहैया करवाई जाने लगी हैं, जो इसके लिए जरूरी हैं।
शैक्षणिक योग्यता
अगर आप किसी भी विषय में शोध या रिसर्च करना चाहते हैं तो आप 55 फीसदी अंकों के साथ पोस्ट ग्रेजुएट होने चाहिए। तभी किसी मान्यताप्राप्त विश्वविद्यालय के गाइड के अधीन शोध या अनुसंधान कर सकते हैं। कुछ विश्वविद्यालयों में प्री-पीएचडी टैस्ट भी होता है, जिसे पास करने के बाद अनुभवी, मान्यताप्राप्त गाइड चुना जा सकता है। जो भी पीएचडी करेगा, उसका गाइड सर्टिफाई करेगा कि जो काम रिसर्चर ने किया है, वह मौलिक है।
नया हो विषय
शोध का विषय चाहे जो हो, लेकिन शोध कार्य ऐसा होना चाहिए, जिससे सबको फायदा हो। सिनॉप्सिस और रिसर्च प्रपोजल रिसर्च का पहला कदम है। सिनॉप्सिस में आपकी रिसर्च का सारा लेखा-जोखा होता है। इसके लिए कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है-
रिसर्च का विषय नया हो।
ऐसे गाइड का चयन करें, जो विषय का विशेषज्ञ हो।
सिनॉप्सिस बनाने से पहले आधारभूत चीजों की जानकारी ले लें।
सिनॉप्सिस को कई अध्यायों में बांट लें।
नौकरी के अवसर
रिसर्च के बाद आप विश्वविद्यालय, डिग्री कॉलेज, संस्थानों में असिस्टेंट प्रोफेसर, रिसर्च एसोसिएट जैसे पदों पर जॉब्स पा सकते हैं। निजी संस्थानों एवं कंपनियों के आरएंडडी डिपार्टमेंट, सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी डिपार्टमेंट में भी वरिष्ठ पदों पर नौकरी पा सकते हैं। इसके अलावा, इन दिनों अलग-अलग विषय के अनुवादक के रूप में भी नियुक्ति होने लगी है।
शोध के विषय
मानव विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, साहित्य, अभियांत्रिकी, विज्ञान के अलावा आज मार्केट रिसर्च, क्लीनिकल रिसर्च, ऑपरेशनल रिसर्च, आईटी और हेल्थ क्षेत्रों में काफी शोध हो रहा है। इन विषयों पर अगर छात्र शोध कार्य करने पर जोर दें तो बेहतरी की उम्मीद है, क्योंकि ये विषय जॉब ओरिएंटेड हैं।
मार्केट रिसर्च
मार्केट रिसर्च एक तरह की मार्केटिंग तकनीक है, जिसमें सर्वे, लोगों से बातचीत करने के बाद नए उत्पाद के बारे में जानकारी ली जाती है। मार्केट रिसर्च के तहत किसी नए उत्पाद या सेवाओं को बाजार में फैलाने के लिए सबसे पहले डेटा इकट्ठा करने की जरूरत पड़ती है, जिसे अंजाम देते हैं मार्केट रिसर्चर।
क्लीनिकल रिसर्च
भारत में क्लीनिकल रिसर्च का बाजार तकरीबन 50 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। जब कोई दवा जारी करने की तैयारी होती है तो वह दवा लोगों के लिए कितनी सुरक्षित है, इसके लिए क्लीनिकल ट्रायल होता है।
अगर आप भी इसका हिस्सा बनना चाहते हैं तो क्लीनिकल ट्रायल या क्लीनिकल रिसर्च से जुड़े कोर्स कर सकते हैं।
ऑपरेशनल रिसर्च
ऑपरेशनल रिसर्च टीम ऐसे प्रोजेक्टों पर काम करती है, जिसके लिए जरूरी बिजनेस स्किल्स की जरूरत होती है। यह एक अच्छा प्रोफेशन है, जहां क्रिएटिविटी, उत्साह और काम करने की उतनी ही जरूरत है, जितनी टेक्नोलॉजी को समझने की।
डिफेंस
डिफेंस के क्षेत्र में शोध बेहद काम आता है। सेल्फ डिफेंस के लिए नए उपकरणों और हथियारों का निर्माण करना पड़ता है। इसके लिए लगातार शोध चलता है।
आईटी
आईटी में रिसर्च में करियर बनाने के लिए आपको डेटाबेस सिस्टम, नॉलेज मैनेजमेंट, बिजनेस इंटेलिजेंस विषयों की जानकारी होनी चाहिए, ताकि वे तकनीकी तौर पर किसी भी समस्या का आकलन कर सकें।
स्वास्थ्य क्षेत्र
हेल्थ सेक्टर पूरी तरह शोध पर आधारित है। इसमें लगातार शोध करने पड़ते हैं।
सोशल वेलफेयर
इसका क्षेत्र काफी व्यापक है। शिक्षा, गरीबी, ग्रामीण विकास, आपदा प्रबंधन वगैरह में रिसर्च की बेहद गुंजाइश है।
क्या-क्या सावधानी बरतें?
रिसर्च के बारे में मूलभूत जानकारी होनी चाहिए। यह भी प्रयास करें कि जो विषय चुना है, उसका संपूर्ण संदर्भ या ज्ञान, जो पहले से उपलब्ध है, उस पर संग्रह प्रस्तुत करें और यह भी प्रकाश डालें कि उन्होंने अनुसंधान पूर्ण करने पर उस विषय में क्या उपलब्धियां प्राप्त की हैं, अर्थात् उनका क्या योगदान है। पीएचडी के लिए प्रस्तुत किए जाने वाले शोध का पैनल डिस्कशन होना चाहिए, जो स्पष्ट करे कि छात्र ने इस क्षेत्र में अच्छा अध्ययन किया है।
केवल उन्हीं विषयों पर शोध की इजाजत मिलनी चाहिए, जिन पर पहले से कार्य या अनुसंधान न हुआ हो या अगर हुआ है तो वह स्तर का न हो या उसे एक निश्चित निष्कर्ष के रूप में मान्यता न मिली हो। रिसर्च के दो रूप होते हैं। पहला- जिसमें किसी विषय पर थोड़ा बहुत प्रारंभिक ज्ञान दिया गया हो, परंतु वह पूर्ण न माना जाए। दूसरा- कोई विद्यार्थी उसमें अतिरिक्त ज्ञान हासिल करके उस विषय को और स्पष्ट कर दे। कुछ अनछुए विषय हैं, जिन पर नये सिरे से खोजबीन हो, क्योंकि ऐसे अनुसंधान अपेक्षाकृत ज्यादा लाभदायक और ज्ञानवर्धक होते हैं।
प्रमुख संस्थान
डीआरडीओ (डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट) तिमारपुर, दिल्ली
वेबसाइट:
www.drdo.gov.in
सीएसआईआर (काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च), अनुसंधान भवन, रफी मार्ग, नई दिल्ली
वेबसाइट:
  www.csir.res.in
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
वेबसाइट
: www.jnu.ac.in
साई नाथ विश्वविद्यालय, रांची, झारखंड
वेबसाइट
: www.sainathuniversity.com
आईआईटी, कानपुर।
वेबसाइट
: www.iitk.ac.in
आधुनिक तकनीक के साथ परंपरागत शोध के क्षेत्र में उतने अवसर नहीं हैं, जितने इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, नैनो टेक्नोलॉजी, बायोटेक्नोलॉजी, माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक्स, मार्केट रिसर्च, क्लीनिकल रिसर्च, ऑपरेशनल रिसर्च और हेल्थ सेक्टर आदि में। ये सभी जॉब ओरिएंटेड क्षेत्र हैं। अपने देश में रिसर्च के क्षेत्र में तेजी से सुधार हो रहा है और सुधार की गुंजाइश है।

Tuesday, September 1, 2015

गांव के विकास में भविष्य की आस, रूरल डेवलपमेंट

ग्रामीण क्षेत्र में विकास के लिए सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं की भागीदारी इधर तेजी से बढ़ी है। यही कारण है कि यहां रोजगार की संभावनाएं भी तेजी से सामने आ रही हैं। रूरल डेवलपमेंट में क्या हैं 
ग्रामीण भारत का चेहरा बदल रहा है। सरकार ग्रामीण विकास के लिए लगातार अपने बजट में इजाफा कर रही है, विभिन्न मंत्रालय भी लगातार ग्रामीण विकास में अपनी भागीदारी बढ़ा रहे हैं। बेशक डेवलपमेंट एजेंसीज के लिए ग्रामीण विकास एक मिशन हो, लेकिन इस क्षेत्र में विभिन्न स्तरों पर नौकरियों के अवसर काफी बढ़ रहे हैं। एक करियर के रूप में ग्रामीण विकास को इसलिए भी महत्त्व मिल रहा है, क्योंकि यह एक व्यापक क्षेत्र है और इस क्षेत्र में हर साल अवसर बढ़ते जा रहे हैं। विभिन्न शैक्षणिक संस्थान रूरल डेवलपमेंट में प्रोफेशनल कोर्सेज ऑफर कर रहे हैं, जिसके चलते देश में प्रशिक्षित रूरल डेवलपमेंट प्रोफेशनल्स तैयार हो रहे हैं। अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के तहत कॉरपोरेट सेक्टर द्वारा इस काम में रुचि लेने के कारण एक पेशे के रूप में रूरल डेवलपमेंट की जड़ें मजबूत होती जा रही हैं।
रूरल डेवलपमेंट के क्षेत्र में कार्यलोगों को सामाजिक, मानसिक और राजनीतिक स्तर पर जागरूक करने के साथ-साथ आत्मनिर्भर बनाने का काम रूरल डेवलपमेंट के अंतर्गत आता है। ग्रामीण लोगों की समस्याओं को समझने और उनको दूर करना, आर्थिक मंदी और महंगाई इत्यादि समस्याओं को समझना व इससे उबरने के उपाय तथा आमजान को आए दिन होने वाली चुनौतियों के बारे में बताना व उनका सामना करने के लिए उन्हें तैयार करना भी इसी क्षेत्र के जुड़े लोग  करते हैं। एंटी करप्शन मूवमेंट चलाना, वुमन हेल्थ पर काम करना, ग्रामीणों के अधिकार के लिए लड़ना व उनका हक उन्हें दिलवाना, अर्बन और इंटरनेशनल लोगों के प्रभाव से इनको मुक्ति दिलाना भी रूरल डेवलपमेंट के क्षेत्र में काम कर रहे लोगों का है।
कैसे चुनें इस क्षेत्र में करियर
रूरल डेवलपमेंट को प्रोफेशनल कोर्स के अंतर्गत माना जाता है। इस क्षेत्र में सबसे अधिक आपकी स्किल्स और रुचियां मायने रखती हैं। इतना ही नहीं, इस क्षेत्र में जैसे-जैसे आपका अनुभव बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे आप तरक्की करने लगते हैं। आमतौर इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए मास्टर ऑफ सोशल वर्क (एमएसडब्ल्यू) के दौरान आप तीन फील्ड- टीचिंग, रिसर्च और प्रैक्टिस में से किसी एक क्षेत्र में जा सकते हैं। टीचिंग में आप किसी संस्थान या यूनिवर्सिटी में जाकर पढ़ा सकते हैं। जैसे दिल्ली यूनिवर्सिटी में एमएसडब्ल्यू में फर्स्ट डिवीजन आने और मेहनती छात्र होने पर आपको यूनिवर्सिटी टीचर असिस्टेंस (यूटीए) में लगभग 30 हजार रुपए प्रतिमाह पर काम करने का मौका मिल सकता है। इसके साथ ही आप दो साल का अनुभव प्राप्त करते-करते पीएचडी के लिए भी एप्लाई कर सकते हैं।
रिसर्च क्षेत्र में आप एमफिल करके जा सकते हैं या फिर एमएसडब्ल्यू करके आप सरकारी और गैरसरकारी संस्थानों पर रिसर्च कर सकते हैं। इसमें आप रूरल डेवलपमेंट में किए जाने वाले विकास के क्षेत्रों जैसे हेल्थ, कम्युनिटी वर्क, एचआईवी एड्स, ह्यूमन रिलेशंस डेवलपमेंट (एचआरडी) इत्यादि में काम कर सकते हैं।
रिसर्चर के तौर पर आप एसोसिएट रिसर्चर या फिर रिसर्च डिजाइनर या किसी संस्थान के प्रोजेक्ट में पार्टीसिपेट करके काम कर सकते हैं। शुरुआत में आप 20 से 25 हजार रुपए वेतन आराम से पा सकते हैं, लेकिन यह आपके काम, अनुभव, क्षमता, कंपनी और लोकेशन इत्यादि पर भी निर्भर करता है।
प्रैक्टिस के दौरान आप ग्रामीण लोगों के साथ मेलजोल कर अपना काम कर सकते हैं या फिर आप पॉलिसी प्रैक्टिस में ग्रामीणों के लिए बनाई गई पॉलिसीज में कमियां, खूबियां, सोशल एक्टिविज्म, आरटीआई  इत्यादि में ग्रामीण लोगों को जागरूक कर, उनको दी जा रही सुविधाओं को बताने जैसे काम कर सकते हैं। आने वाली आपदाओं से ग्रामीण लोगों को उबारने का काम भी इसी सेक्टर के अंतर्गत आता है। इस क्षेत्र में आप रहने, खाने-पीने की सुविधा के साथ ही 10 हजार रुपए प्रतिमाह से अपना काम कर सकते हैं। लेकिन यदि कैम्पस प्लेसमेंट के जरिए आप जाते हैं तो आप 25 से 35 हजार रुपए प्रतिमाह भी पा सकते हैं।
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प्रमुख संस्थान
जामिया मिल्लिया इस्लामिया, एमिटी, दिल्ली यूनिवर्सिटी और दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क से अलग-अलग कोर्स करवाए जाते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के दो कॉलेजों, अदिती महाविद्यालय, बवाना और अंबेडकर कॉलेज से बैचलर ऑफ सोशल वर्क (बीएसडब्ल्यू) करवाया जाता है। दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क से एमएसडब्ल्यू, एमफिल और पीएचडी करवाई जाती है। इसके अलावा भारत में लगभग 150 से भी अधिक यूनिवर्सिटीज और संस्थानों में रूरल डेवलपमेंट और सोशल वर्क के अलग-अलग प्रोग्राम्स करवाए जाते हैं। इनमें लगभग 33 सेंट्रल यूनिवर्सिटीज हैं। हिमाचल, लखनऊ, इंदौर, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक इत्यादि राज्यों में खासतौर पर रूरल डेवलपमेंट और सोशल वर्क संबंधित प्रोग्राम्स चलाने वाले संस्थान उपलब्ध हैं।
कोर्स
’डिप्लोमा इन सोशल वर्क ’बीएसडब्ल्यू ’एमएसडब्ल्यू ’एमफिल ’पीएचडी
इसके अलावा आप इग्नू जैसी अन्य यूनिवर्सिटीज से ऑनलाइन लर्निंग सेंटर्स से भी डिप्लोमा और सर्टिफिकेट या फिर डिस्टेंस लर्निग कोर्स कर सकते हैं।
शैक्षिक योग्यता
रूरल डेवलपमेंट में करियर बनाने के लिए 12वीं के बाद बीए, एमए इत्यादि के बाद सीधे तौर पर ग्रामीण विकास के लिए काम किया जा सकता है, लेकिन करियर को बेहतर बनाने के लिए जरूरी है कि बैचलर ऑफ सोशल वर्क (बीएसडब्ल्यू) या मास्टर्स ऑफ सोशल वर्क (एमएसबीएसडब्ल्यू) किया जाए।
प्रवेश प्रक्रिया
बीएसएच में दाखिला लेने के लिए जहां कुछ यूनिवर्सिटीज में 12वीं में 45 प्रतिशत अंक होने जरूरी हैं, वहीं कुछेक यूनिवर्सिटीज और संस्थानों में 50 प्रतिशत अंक 12वीं में होने जरूरी हैं। हर संस्थान और यूनिवर्सिटीज में दाखिला लेने के अलग-अलग नियम व शर्ते हैं। इसके अलावा कुछेक यूनिवर्सिटीज में क्वालिफिकेशन, परसेंटेज, एलीजिबिलिटी, सेलेक्शन प्रोसेस और प्रवेश परीक्षा इत्यादि पर खासा गौर किया जाता है। दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क में प्रवेश परीक्षा पास करना जरूरी है। वहीं एमएसडब्ल्यू में दाखिला लेने के लिए बीए प्रोग्राम्स या अन्य किसी विषय पर ग्रेजुएशन कर अपनी स्किल्स और मार्क्स के आधार पर दाखिला लिया जा सकता है। एमफिल में दाखिले के लिए एमएसडब्ल्यू में 55 प्रतिशत अंक होने जरूरी हैं। इसके अलावा रिटन टेस्ट और पैनल इंटरव्यू को पास करना भी जरूरी है।
समय सीमा
रूरल डेवलपमेंट क्षेत्र में काम करने के लिए 12वीं के बाद बीएसडब्ल्यू तीन साल करके सीधे फील्ड का काम कर अनुभव पा सकते हैं या फिर बीएसडब्ल्यू के बाद दो साल की एमएसडब्ल्यू करके कैम्पस प्लेसमेंट से जॉब हासिल कर सकते हैं। रिसर्च क्षेत्र में जाने के लिए दो साल की एमफिल भी कर सकते हैं। टीचिंग और रिसर्च, दोनों ही फील्ड में काम करने के लिए चार साल में पीएचडी की डॉक्टरेट डिग्री भी हासिल कर सकते हैं।
संभावनाएं
ग्रामीण लोगों के रहन-सहन, शिक्षा, हेल्थ मामलों से लेकर, सरकार से संबंधित मुद्दों जैसे पंचायतें, अल्पसंख्यक, आरक्षण, रोजगार के तहत योजनाएं, सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं के क्रियान्‍वयन, उनमें बदलाव, उनकी कमियों को कम करने, उनका लाभ उठाने और लोगों को जागरूक करने आदि क्षेत्रों में काम किया जा सकता है।
सेलरी
रूरल डेवलपमेंट क्षेत्र में आपकी सेलरी आपके अनुभव और काम करने की क्षमता के साथ ही आप किस संस्थान के साथ काम करने जा रहे हैं, इस पर निर्भर करती है। इसके अलावा आपकी कम्युनिकेशन स्किल्स भी आपका करियर बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। आप 12वीं के बाद ही किसी एनजीओ के साथ रूरल डेवलपमेंट क्षेत्र में काम करते हैं तो आप न्यूनतम सेलरी के साथ अपनी पढ़ाई भी आगे जारी रख सकते हैं और फील्ड का अनुभव लगातार पा सकते है। यदि आप सीधे तौर पर कम्युनिटी के लिए काम कर रहे हैं तो कैम्पस प्लेसमेंट में 30 से 35 हजार और सामान्य तौर पर 15 हजार के आसपास सेलरी पा सकते हैं, जो धीरे-धीरे बढ़ कर 60-65 हजार तक जा सकती है