Monday, October 31, 2022

M.Sc.बायोटेक्नोलॉजी

M.Sc.बायोटेक्नोलॉजी एक postgraduate कोर्स है। जो छात्र विज्ञान और रिसर्च जैसे क्षेत्रों में काम करना चाहते है उनके लिए यह एक अच्छा विकल्प है। इसकी फुल फॉर्म Master of Science in Biotechnology है। यह एक 2 वर्षीय पाठ्यक्रम है जो कि 4 सेमेस्टरों के रूप में आयोजित किया जाता है।

● अनिवार्यता (Eligibility) – M.Sc.बायोटेक्नोलॉजी कोर्स में प्रवेश के लिए छात्र का किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से 12वी में 50 से 60% अंक के साथ उत्तीर्ण होना अनिवार्य है इसके साथ ही छात्र 12वी में विज्ञान संकाय से होना चाहिये और उसके पास physics, chemistry, biology या mathematics विषय होने चाहिए।

आप किसी मान्यता प्राप्त महाविद्यालय से 50% अंको के साथ विज्ञान संबंधित विषय से ग्रेजुएट होने चाहिए।

BAMS, B.pharm, BHMS से ग्रेजुएट छात्र भी इसमें प्रवेश के लिए elligible होते हैं। M.Sc. biotechnology में एडमिशन मेरिट और इंट्रैन्स एग्जाम के आधार पर होता है।

● फीस (Fees) – सरकारी और प्राइवेट कॉलेज के अनुसार आपके कोर्स की फीस निर्धारित होती है। तो आपके पूरे कोर्स की फीस लगभग 40 हजार से 2 लाख तक हो सकती है।

● कैरियर (Job & Career) – अगर आप आगे पढ़ाई करना चाहते है इस क्षेत्र में तो P.hd in biotechnolgy भी कर सकते हैं।

यदि आप जॉब में कैरियर बनाना चाहते हैं तो आप प्राइवेट और सरकारी दोनो सेक्टर में काम कर सकते हैं। M.Sc. biotechnology डिग्री प्राप्त करने के बाद आप biochemist, lab technician, research scientist, biotech analyst आदि की जॉब कर सकते हैं।

इनके अलावा आप मेडिकल, फ़ूड सेक्टर , केमिकल सेक्टर ,रिसर्च सेंटर, लैबोरेटरी, एजुकेशनल इंस्टिट्यूट, इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी, एग्रीकल्चर विभाग, एनिमल हसबैंडरी, पर्यावरण विभाग आदि में जॉब कर सकते हैं।

● सैलरी (Income) – M.Sc बायोटेक्नोलॉजी के बाद जॉब में सैलरी प्रत्येक पोस्ट के आधार पर अलग अलग होती है यह सैलरी 3 लाख से 9 लाख या उससे ज्यादा प्रतिवर्ष भी होती है।

Tuesday, October 25, 2022

वॉटर मैनेजमेंट में बनाएं करियर

विश्व का बहुत बड़ा भाग जल संकट से जूझ रहा है। ऐसे में यह तक कहा जा रहा है कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिए लड़ा जा सकता है। जल संचयन मौजूदा समय की सबसे बड़ी मांग है। जल संरक्षण व प्रबंधन पर अब सरकारें और औद्योगिक प्रतिष्ठान भी ज्यादा जोर दे रहे हैं। इन समस्याओं से निपटने के लिए वॉटर मैनेजमेंट के प्रोफेशनल्स की जरूरत बढ़ रही है। ये ऐसे प्रशिक्षित लोग होते हैं, जिन्हें वॉटर हार्वेस्टिंग, वेस्ट वॉटर ट्रीटमेंट तथा वॉटर रिसाइक्लिंग की अच्छी समझ होती है। उधर, भूजल के स्तर को सुधारने के लिए आधुनिक तकनीकों की भी मांग बढ़ रही है।

केंद्रीय जल संसाधन विभाग की ओर से जारी राष्ट्रीय जल नीति में भी पानी के कुप्रबंधन पर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट में ज्यादा से ज्यादा वैज्ञानिक प्लानिंग पर जोर देने की बात कही गई है। जाहिर-सी बात है कि दिनो-दिन बढ़ते जल संकट को दूर करने के लिए वॉटर साइंटिस्ट, एन्वायर्नमेंट इंजीनियर, ट्रेंड वॉटर कंजर्वेशनिस्ट या कहें विभिन्न प्रकार के वॉटर मैनेजमेंट प्रोफेशनल्स की मांग बनी रहेगी।

जॉब के अवसर

ग्रीन जॉब्स मार्केट में आकर्षक जॉब्स के अवसर बहुत हैं। वॉटर मैनेजमेंट में ट्रेंड प्रोफेशनल्स की जल प्रबंधन से जुड़े सरकारी विभागों में तथा वॉटर प्रोजेक्ट्स में खूब मांग है। निजी क्षेत्र में भी पेयजल आपूर्ति तथा वेस्ट वॉटर ट्रीटमेंट से संबंध‍ित कार्यों के लिए प्रशिक्षित लोगों को ही हायरिंग में तवज्जो दी जा रही है। बड़े-बड़े उद्योग, रियल एस्टेट सेक्टर और एनजीओ भी वॉटर हार्वेस्टिंग डिजाइनिंग तथा जल संचयन के लिए वॉटर मैनेजमेंट की पृष्ठभूमि वाले प्रोफेशनल्स की सेवाएं ले रहे हैं। आप चाहें, तो कंसल्टेंट बनकर भी करियर बना सकते हैं क्योंकि ऐसे लोगों की वॉटर ट्रीटमेंट सिस्टम्स के संचालन और देखरेख के लिए मांग लगातार बढ़ रही है।

कोर्स व क्वॉलिफिकेशन

जल प्रबंधन और संरक्षण पर आधारित कई तरह के कोर्स देश के विभिन्न सरकारी और निजी संस्थानों में संचालित हो रहे हैं। युवा वॉटर साइंस, वॉटर कंजर्वेशन, वॉटर मैनेजमेंट, वॉटर हार्वेस्टिंग, वॉटर ट्रीटमेंट तथा वॉटर रिसोर्स मैनेजमेंट जैसी किसी भी स्ट्रीम में कोर्स करके अपना करियर बना सकते हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) में वॉटर हार्वेस्टिंग एंड मैनेजमेंट नाम से ऐसा ही एक सर्टिफिकेट कोर्स संचालित हो रहा है। 10वीं पास युवा यह कोर्स कर सकते हैं। अगर आप बायोलॉजी विषय में 12वीं पास हैं, तो एक्वा साइंस या वॉटर साइंस में बीएससी और एमएससी भी कर सकते हैं। एग्रीकल्चर/ सिविल इंजीनियरिंग, केमिकल इंजीनियरिंग, जियोलॉजी, एन्वायर्नमेंटल स्टडीज या बायोलॉजी में बैचलर्स की पढ़ाई करके वॉटर साइंटिस्ट, एन्वायर्नमेंट इंजीनियर, बायोलॉजिस्ट, हाइड्रो जियोलॉजिस्ट या जियोलॉजिस्ट बन सकते हैं।

सैलरी कितनी?

वॉटर मैनेजमेंट में डिप्लोमाधारी युवा शुरूआत में आसानी से 15 से 25 हजार रुपए प्रति माह सैलरी पा सकते हैं। वहीं, वॉटर साइंटिस्ट या इंजीनियर को भी 30 से 40 हजार रुपए प्रति माह की सैलरी मिल जाती है। 

ग्रुप डिस्‍कशन में इन बातों पर अमल करेंगे तो फायदे में रहेंगे

क्या है वॉटर मैनेजमेंट? 

देश-दुनिया में वॉटर कंजर्वेशन एंड मैनेजमेंट की कोशिश कई स्तरों पर चल रही है ताकि दिनो-दिन गहराते जल संकट से पार पाया जा सके। इसके लिए नदियों और भूजल में बढ़ रहे प्रदूषण को कम करने से लेकर भूजल स्तर सुधारने, परंपरागत जल स्रोतों को सुरक्षित रखने तथा आधुनिक तकनीकों के सहारे वॉटर हार्वेस्टिंग की विध‍ियां विकसित करने व वेस्ट वॉटर ट्रीटमेंट जैसे अनेक उपायों पर जोर दिया जा रहा है। कम पानी से कृषि की उत्पादकता बनाए रखने का प्रयास भी इसी मुहिम का हिस्सा है। 

प्रमुख संस्थान

  • इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, दिल्ली
  • अन्ना यूनिवर्सिटी, तमिलनाडु
  • गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज, रायपुर
  • राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की
  • दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी, दिल्ली


Sunday, October 16, 2022

आर्किटेक्चर इंजीनियरिंग में करियर

यदि आप आर्किटेक्चर और सिविल इंजीनियरिंग के बीच चुनाव को लेकर बहुत दुवि‍धा में हैं तो हम आपकी मदद कर सकते हैं।

रियल एस्टेट सेक्टर, खास तौर पर कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री इन दोनों प्रोफेशन पर पूरी तरह से आश्रित रहती है: एक आर्किटेक्ट्स और दूसरे सिविल इंजीनियर्स। कंसट्रक्शन बिजनेस का जहां तक संबंध है, आर्किटेक्ट्स और सिविल

इंजीनियर्स इनके अभिन्ना हिस्से हैं। क्योंकि ये दोनों ही खूबसूरत और सुविधाजनक निर्माण कार्य करने में मदद कर सकते हैं। प्रकृति में एक ही जैसे इन दोनों प्रोफेशंस के लिए इसी इंडस्ट्री में काम के अवसर हैं। और शायद इसीलिए विद्यार्थी दोनों में से क्या चुनें इसे लेकर पसोपेश में पड़ जाते हैं।

ऐसे सीख सकते हैं 'आर्ट ऑफ लि‍सनिंग'

एक बात और भी है कि दोनों के बीच बहुत सारी समानताएं भी हैं। लेकिन इसके साथ ही दोनों के बीच बहुत सूक्ष्म लेकिन बहुत महत्वपूर्ण अंतर भी है। इन्हीं समानताओं और असमानताओं के प्रकाश में दोनों में से किसका चयन किया जाना चाहिए और क्यों इसका जवाब हम ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं।

स्टूडेंट्स की मदद करने के लिए और उनकी रुचि के अनुसार निर्णय करने के लिए हमने विषय का क्षेत्र, परिभाषा, काम करने की प्रकृति, संभावित आय, अच्छे कॉलेज और कुछ दूसरी चीजों की सूचनाएं हमने जमा की हैं।

विषय की परिभाषा 

एक तरफ सिविल इंजीनियरिंग और आर्किटेक्चर दोनों ही अपने कोर्स और कंटेट में एक जैसी ही लगते हैं, तब बात इनकी परिभाषाओं की होती है। दोनों के बीच बहुत सारे फर्क हैं।

आर्किटेक्चर: आर्किटेक्चर शब्द की उत्पत्ति 'आर्किटेक्टोन" से हुई है। जिसका मतलब है 'चीफ-बिल्डर" या 'मुख्य भवन निर्माता"। जब इस शब्द की उत्पत्ति हुई होगी तब हो सकता है कि आर्किटेक्ट्स ही बिल्डर हुआ करते होंगे। लेकिन जब बात असली परिभाषा की होती है तो आर्किटेक्चर बिल्डिंग बनाने से ज्यादा कलात्मकता की मांग करता है। यह एक सृजनात्मक क्षेत्र हैं और यह किसी बिल्डिंग को बनाने की कला और विज्ञान दोनों से संबंद्ध होता है।

सिविल इंजीनियरिंग: सिविल इंजीनियरिंग एक बहुत वृहद् शब्द है। इसमें भवन के डिजाइन, कंस्ट्रक्शन और

उसके प्राकृतिक और भौतिक पर्यावरण के रखरखाव का काम शामिल है। इसमें सड़कें, पुल, नहरें, बांध और भवन हर चीज शामिल हैं। दूसरे शब्दों में सिविल इंजीनियरिंग भवन निर्माण के दूसरे संरचनात्मक तत्वों पर फोकस करता है। तय करता है कि कौन-सा मटेरियल का इस्तेमाल किया जाना है, संरचना लंबे समय तक कैसे टिकी रह सकती है और उसके लिए क्या-क्या प्रयास करने होंगे?

बहुत साधारण शब्दों में आर्किटेक्ट्स दी हुई जगह का सबसे अच्छा इस्तेमाल करते हुए अपनी कल्पनाशीलता और गणितीय कौशल से ज्यादा सुविधाजनक बनाता है। इसके उलट एक सिविल इंजीनियर असल में आर्किटेक्ट द्वारा दी गई डिजाइन को असेस करता है कि वह समय पर और उस जगह में उसी तरह का निर्माण करते हुए उतना मजबूत हो पाएगा? इस दृष्टि से एक पक्ष कलात्मक है और दूसरा व्यवहारिक।

क्या है दोनों विषयों के क्षेत्र का विस्तार?

विषय का क्षेत्र संभवत: सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण अंतर है आर्किटेक्चर और सिविल इंजीनियरिंग के बीच का।

आर्किटेक्चर बिल्डिंग की डिजाइन और संरचना में उसकी व्यवहारिकता और सौंदर्य से संबंध रखता है। आर्किटेक्चर मूलभूत संरचना के तत्वों के साथ बिल्डिंग के सुंदर और व्यावहारिक होने पर जोर देता है।

दूसरी तरफ सिविल इंजीनियर्स उसकी आर्किटेक्चरल डिजाइन के प्लान को लागू करता है और देखता है कि उन्हें किस तरह से एक्जिक्यूट किया जा सकता है। सिविल इंजीनियर उसके संरचनात्मक ढांचे की डिजाइन

पर फोकस करता है और एक्स्ट्रीम कंडीशन्स में उसके रखरखाव और उसकी मजबूती को निश्चित करता है।

कोर्स और एलिजिबिलिटी 

आमतौर पर बी. आर्क का पांच साल का स्नातक कोर्स पूरे देश के आर्किटेक्चर स्कूल में करवाया जाता है। काउंसिल ऑफ आर्किक्टेक्चर द्वारा आयोजित कॉमन इंट्रेंस टेस्ट के माध्यम से एडमिशन होता है। कंपलसरी सब्जेक्ट की जहां तक बात है, वे सब बिल्कुल इंजीनियरिंग की तरह ही होते हैं। बी. आर्क के स्टूडेंट को फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्य जैसे विषयों के साथ 12 वीं बोर्ड की परीक्षा पास करनी होती है। स्नातक कोर्स को पूरा करने के बाद बी. आर्क. के स्टूडेंट्स आर्किटेक्चर में दो साल का स्नातकोत्तर का कोर्स भी कर सकते हैं। सिविल इंजीनियरिंग करने वालों के लिए आमतौर पर दो रास्ते हैं। पहला डिग्री कोर्स कर लें, या फिर कम अवध‍ि का डिप्लोमा कोर्स कर लें। सिविल इंजीनियर बनना चाहने वालों के बीच सिविल इंजीनियरिंग ब्रांच से बी. टेक. करना बहुत लोकप्रिय है।

यह कोर्स पूरे देश के इंजीनियरिंग कॉलेजों में उपलब्‍ध होता है। इन कॉलेजों में एडमिशन जीईई मेन्स, एनआईटी,

आईआईआईटी और जीएफटीआई या फिर आईआईटी और आईएसएम-धनबाद में एडमिशन जेईई एडवांस

के परीक्षा में मेरिट के आधार पर होता है। जो सिविल इंजीनियरिंग करना चाहते हैं उनका 12 वीं बोर्ड में

फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्य लेकर पास होना आवश्यक है। 

रोजगार के अवसर व पैकेज

सिविल इंजीनियरिंग और आर्किटेक्चर जैसे विषय को चुनने की एक सबसे बड़ी वजह ही यह है कि इसमें रोजगार के अवसर भी ज्यादा है और पैकेज भी अच्छा मिलता है। फिर भी दोनों कोर्स के बीच कौन-सा कोर्स चुना जाए इसे लेकर कंफ्यूजन भी कम नहीं है। 

आर्किटेक्चर: आर्किटेक्ट अलग-अलग कंस्ट्रक्शन कंपनियों में डिजाइनर के तौर पर काम करता है। उसकी पहली जिम्मेदारी अपने क्लाइंट की जरूरत को समझना और उस हिसाब से व्यावहारिक, सुविधाजनक और सुंदर डिजाइन तैयार करना है। प्राइवेट बिल्डर्स के साथ-साथ सरकारी एजेंसी भी पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट्स, नेशनल बिल्डिंग ऑर्गेनाइजेशन, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग ऑर्गेनाइजेशन, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स और अन्य में भी आर्किटेक्ट्स की जरूरत हुआ करती है। जहां तक वेतन की बात है तो यह 25 से 30 हजार महीने से शुरू होता है और यह आपके कौशल और अनुभव के आध्ाार पर एक आर्किटेक्ट 1 लाख रुपए महीना तक अर्न कर सकता है। 

सिविल इंजीनियरिंग: सिविल इंजीनियरिंग में आर्किटेक्ट्स से ज्यादा स्कोप है। सिविल इंजीनियर्स के पास सरकारी के साथ-साथ प्राइवेट संस्था के लिए भी बेहतरीन काम करने के अवसर होते हैं। रोजगार के अवसरों की जहां तक बात है, प्राइवेट संस्था में तो अवसर हैं ही, सरकारी संस्थाओं में भी जरूरत होती है। सरकारी संस्थाओं के साथ-साथ सिविल इंजीनियर्स की जरूरत तो इंडियन आर्मी में भी होती है। इसके अलावा वे अपनी खुद की इंजीनियरिंग कंसल्टेंसी फर्म भी स्थापित कर सकते हैं। इसके साथ ही टीचिंग में भी बहुत मांग है। जिनके पास स्वयं लिखने का कौशल है वे अपने ही क्षेत्र में तकनीकी लेखन कर सकते हैं। आपका कौशल और आपकी योग्यता के आधार पर एक सिविल इंजीनियर की अर्निंग 4 से 8 लाख रुपए तक हो सकती है। आर्किटेक्ट्स की तरह की सिविल इंजीनियर्स को भी अनुभव और कौशल के आधार पर बेहतर अर्निंग हो सकती है।

Sunday, October 9, 2022

बायोटेक्नोलॉजी क्या है

दोस्तों अक्सर आपने देखा होगा की मौसम के अनुसार मिलने वाले सब्जियां व फल आज के समय में सालो-साल मिल रहे है। जैसे बिना गर्मी के मौसम के आपको बाजार में अनन्नास, आम, संतरा देखने को मिलेंगे, बिना सर्दी के मौसम के केले, कीवी, अंगूर देखने को मिलेंगे और ऐसी बहुत सी सब्जियां व फल है, जो पहले मौसम के अनुसार मिलते थे व इनका उत्पादन भी मौसम के अनुसार ही किया जाता था। 

लेकिन आज के समय में ये सब चीजे सालो साल बाजार में उपलब्द है। ये सब साइंस और टेक्नोलॉजी की ही देन है। जिसने हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को बहुत आसान बना दिया है। बायोटेक्नोलॉजी इन्ही का एक छोटा सा हिस्सा है, जिसने कृषि क्षेत्र में ही नही बल्कि मेडिकल साइंस के क्षेत्र भी अपना परचम लहरा रखा है। तो दोस्तों आज हम सब इसी विषय पर विस्तार से बात करने वाले है और जानेगे की बायोटेक्नोलॉजी क्या होता है, इसके उपयोग क्या है

बायोटेक्नोलॉजी क्या है.

बायोटेक्नोलॉजी जिसे बायोटेक भी कहा जाता है, बायो यानि जीव प्रणाली और टेक्नोलॉजी मतलब तकनीक, जिसका मतलब जीव प्रणाली पर तकनीक का इस्तेमाल करना है। बायोटेक्नोलॉजी साइंस की एक ऐसी ब्रांच है जिसमे साइंस और टेक्नोलॉजी दोनों शामिल है। 

इस तकनीक के अंतर्गत जीव प्रणाली व उनके प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल कर नए और बेहतर प्रोडक्ट्स बनाये जाते है, ताकि पौधों व पशु नस्ल को और भी बेहतर बनाया जा सके। बायोटेक्नोलॉजी की मदत से फसलों की नयी किस्मे तैयार की जाती है, जिनसे अच्छी खेती व बेटर फ़ूड उपलब्ध कराया जा सके। मानव जाति बायोटेक्नोलॉजी का उपयोग कृषि, दवा और खाद्य उत्पादन के हजारो साल से करता आ रहा है

बायोटेक्नोलॉजी का इतिहास.

बायोटेक्नोलॉजी टर्म देने का क्रेडिट हंगरी के एग्रीकल्चर इंजिनियर Karl Ereky को जाता है, जिन्होंने वर्ष 1919 बायोटेक्नोलॉजी नाम दिया था। वर्ष 1973 में Herber Boyer व  Stanley Coher पुनः संयोजक DNA टेक्नोलॉजी की खोज की, उसके बाद ही ही बायोटेक उद्योग का विकास प्रारंभ हुआ

वर्ष 1980 में कैंसर व हेपेटाइटिस बी जैसी बिमारिओ का इलाज करने के लिए पहली बार बायोटेक मेडिसिन व टीकों का विकाश हुआ था और तब से अब बायोटेक इंडस्ट्री लगातार वृद्धि करता आ रहा है। भारत में बायोटेक्नोलॉजी को शुरू करने का क्रेडिट Kiran Majumdar Shaw को जाता है। ये वर्ल्ड की फेमस बायोटेक कंपनी Biocn ltd की संस्थापक है। इन्होने भारत में बायोटेक इंडस्ट्री में परिवर्तन लाया है

बायोटेक्नोलॉजी के प्रकार.

बायोटेक्नोलॉजी को निम्नलिखित प्रकारों में विभाजित किया गया है-

  • चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी
  • कृषि जैव प्रौद्योगिकी

चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी (Medical biotechnology):-

चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी में मानव स्वास्थ्य में सुधार के लिए प्रौद्योगिकियों को विकसित करने के लिए लिविंग सेल्स का उपयोग शामिल है। चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग इलाज खोजने के साथ साथ बीमारियों को रोकने और उससे छुटकारा पाने के लिए किया जाता है। इसमें मानव स्वास्थ्य को बनाए रखने के अधिक कुशल तरीके खोजने के लिए इन उपकरणों का उपयोग शामिल है

चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी की मदद से टीके और एंटीबायोटिक्स विकसित किए गए हैं जो मानव स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं। कई पौधों को जैव प्रौद्योगिकी की मदद से एंटीबॉडी का उत्पादन करने के लिए आनुवंशिक रूप से निरीक्षण किया जाता है। यह जेनेटिक डिसऑर्डर के कारणों की पहचान करने और उन्हें ठीक करने के तरीकों की पहचान करने के लिए डीएनए के अध्ययन में भी मदद करता है।

कृषि जैव प्रौद्योगिकी (Agricultural Biotechnology):-

यह क्षेत्र पौधे में रुचि के जीन को पेश करके आनुवंशिक रूप से संशोधित पौधों के विकास से संबंधित है। यह बदले में, फसल की उपज बढ़ाने में मदद करता है। विभिन्न pest-resistant फसलें जैसे बीटी-कॉटन और बीटी-ब्रिंजल, बैसिलस थुरिंजिनेसिस के जीन को पौधों में स्थानांतरित करके बनाए जाते हैं। कृषि जैव प्रौद्योगिकी  फसल की पैदावार को बढ़ाने या उन पौधों की विशेषताओं को पेश करने के लिए Genetically modified पौधों की विकास को केन्द्रित करते है

बायोटेक्नोलॉजी का वर्गीकरण.

जैव प्रौद्योगिक का वर्गीकरण निम्नलिखित तरीको से किया गया है जिसके बारे में आप सभी को विस्तार से बताया गया है

  • ग्रीन बायोटेक्नोलॉजी
  • ब्लू बायोटेक्नोलॉजी
  • रेड बायोटेक्नोलॉजी
  • वाइट बायोटेक्नोलॉजी 

ग्रीन बायोटेक्नोलॉजी:-

यह जैविक प्रौद्योगिक की एक शाखा है, जोकि खेती आदि सम्बंधित विकल्पों पर लागू होती है। ग्रीन जैव प्रौद्योगिकी को पोषण गुणवत्ता और उत्पादन तकनिकी में सुधार के लिए, पौधों के लिए जैविक तकनीकों के अनुप्रयोग के रूप में परिभाषित किया गया है। यह आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण प्रजातियों को लगाने के लिए विदेशी जीनों को प्रत्यारोपित करके किया जाता है। 

इसमें तीन मुख्य क्षेत्र शामिल हैं: पादप ऊतक संवर्धन (Plant tissue genetic); प्लांट जेनेटिक इंजीनियरिंग और प्लांट मॉलिक्यूलर ब्रीडिंग। इस बायोटेक्नोलॉजी का उपयोग 1३ मिलियन से भी ज्यादा किसानो द्वारा किटकों से लड़ने व फसलों के पैदावार को बढ़ाने के लिए करते है

ब्लू बायोटेक्नोलॉजी:-

ब्लू जैव प्रौद्योगिकी का समुद्री और जलीय अनुप्रयोगोका वर्णन करने के लिए किया जाता है ब्लू बायोटेक्नोलॉजी समुद्री और मीठे पानी के जीवों के लिए मॉलिक्यूलर बायोलॉजिकल विधियों के application से संबंधित है।

इसमें कई उद्देश्यों के लिए इन जीवों और उनके डेरिवेटिव का उपयोग शामिल है, सबसे उल्लेखनीय समुद्री मूल से नए सक्रिय अवयवों की पहचान प्रक्रिया और विकास है। इसी को ब्लू टेक्नोलॉजी कहते है 

रेड बायोटेक्नोलॉजी:-

रेड बायोटेक्नोलॉजी चिकित्सा सबंधित विकल्पों पर लागु होता है रेड बायोटेक्नोलॉजी का संबंध इनोवेटिव दवाओं और उपचारों की खोज और विकास से है। इसमें जीन थेरेपी, स्टेम सेल, जेनेटिक टेस्टिंग आदि शामिल हैं।

वाइट बायोटेक्नोलॉजी:-

वाइट बायोटेक्नोलॉजी को औद्योगिक उपयोग से संभंध रखता है। वाइट बायोटेक का इस्तेमाल मोल्ड्स, यीस्ट, बक्टएरिया या एंजाइम ग्गोड्स एंड प्रोडक्ट्स के प्रोडक्शन में किया जाता है यह डिटर्जेंट, विटामिन, एंटीबायोटिक्स आदि जैसे जैव-उत्पादों की एक वाइड रेंज  प्रदान करता है। अधिकांश सफेद बायोटेक प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप पारंपरिक तरीकों की तुलना में पानी, ऊर्जा, रसायन और कचरे की बचत होती है।

बायोटेक्नोलॉजी का उपयोग.

बायोटेक्नोलॉजी का उपयोग मुख्य रूप से चिकित्सा और खेती के लिए किया जाता है जिसके बारे में आपको बताया जा रहा है-

चिकित्सा के क्षेत्र में बायोटेक्नोलॉजी का उपयोग.

मेडिकल फील्ड में बायोटेक्नोलॉजी ने एक अहम् भूमिका निभाई है। इसने मेडिकल इंडस्ट्री में रेवोलुतिओंय चेंज लाया है। मेडिकल में बायोटेक्नोलॉजी छोटे मॉलिक्यूलर ड्रग्स के साथ दवाओं के निर्माणऔर खोज में महवपूर्णयोगदान निभाया है। 

बायोटेक्नोलॉजी की मदत से दवाओं का cost भी काफी कम हो गया है और ये आसानी से मिल भी जाते है। इस तकनिकी ने मानव जीवन में काफी सुधर किया है। इसी की वजह से आज के समय में छोटी से छोटी व बड़ी से बड़ी बीमारी का चिकित्सा उपलब्ध है

खेती के क्षेत्र में बायोटेक्नोलॉजी का उपयोग.

देखा जाए तो मेडिकल फील्ड के बाद सबसे ज्यादा जहा बायोटेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता है वो एग्रीकल्चर फील्ड ही है। इस फील्ड में लगातार संसोधन होते आ रहे है, और संसोधन करने का प्रमुख कारण यह भी है, की इससे बेहतर व स्वस्थ फसल उगाई जा सके। 

Genetic मॉडिफाइड क्रॉप का भी प्रचलन बहुत चला है, जिसमे जेनेटिकइंजिनियर की मदत से क्रॉप के DNA में परिवर्तन किये जाते है। हलाकि इसका विरोध भी काफी हुआ था क्यूंकि लोगो का मानना है genetic मॉडिफाइड क्रॉप से उगने वाले फसल स्वास्थ्यके लिए हानिकारक है

लेकिन दोस्तों आपको बता दू की भारत में एग्रीकल्चर फील्ड में काफी स्कोप है, अगर उसे तरीके से किया जाए तो। जैसे एक उदहारण के रूप में आप Hydroponic फार्मिंग भी कर सकते है। इस तकनीक के तहत फासले पानी पर उगाई जाती है। और इसको लेकर बहुत सारी फर्म कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग भी करती है सर्कार भी एग्रीकल्चर फील्ड को बढ़ावा देने के लिए काफी सहयोग स्वरुप सब्सिडी दे रही है। 


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