Wednesday, February 20, 2019

आर्कियोलॉजी में कॅरिअर

हजारों साल पहले मानव जीवन कैसा रहा होगा? किन-किन तरीकों से जीवन से जुड़े अवशेषों को बचाया जा सकता है? एक सभ्यता, दूसरी सभ्यता से कैसे अलग है? क्या हैं इनकी वजहें? ऐसे अनगिनत सवालों से सीधा सरोकार होता है आर्कियोलॉजिस्ट्स का। 

अगर आप भी देश की धरोहर और इतिहास में रुचि रखते हैं तो आर्कियोलॉजिस्ट के रूप में एक अच्छे करियर की शुरुआत कर सकते हैं। इसमें आपको नित नई चीजें जानने को तो मिलेंगी ही, सैलरी भी अच्छी खासी है। आर्कियोलॉजी के अंतर्गत पुरातात्विक महत्व वाली जगहों का अध्ययन एवं प्रबंधन किया जाता है। 

हेरिटेज मैनेजमेंट के तहत पुरातात्विक स्थलों की खुदाई का कार्य संचालित किया जाता है और इस दौरान मिलने वाली वस्तुओं को संरक्षित कर उनकी उपयोगिता का निर्धारण किया जाता है। इसकी सहायता से घटनाओं का समय, महत्व आदि के बारे में जरूरी निष्कर्ष निकाले जाते हैं। 

जरूरी योग्यता


एक बेहतरीन आर्कियोलॉजिस्ट अथवा म्यूजियम प्रोफेशनल बनने के लिए प्लीस्टोसीन पीरियड अथवा क्लासिकल लैंग्वेज, मसलन पाली, अपभ्रंश, संस्कृत, अरेबियन भाषाओं में से किसी की जानकारी आपको कामयाबी की राह पर आगे ले जा सकती है।

पर्सनल स्किल


आर्कियोलॉजी ने केवल दिलचस्प विषय है बल्कि इसमें कार्य करने वाले प्रोफेशनल्स के लिए यह चुनौतियों से भरा क्षेत्र भी है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए अच्छी विशेलषणात्मक क्षमता, तार्किक सोच, कार्य के प्रति समर्पण जैसे महत्वपूर्ण गुण जरूर होेने चाहिए। कला की समझ और उसकी पहचान भी आपको औरों से बेहतर बनाने में मदद करेगी। इसके अलावा आप में चीजों और उस देशकाल को जानने की ललक भी होनी चाहिए। 

संभावनाएं व वेतन


आर्कियोलॉजिस्ट की मांग सरकारी और निजी हर क्षेत्र में है। इन दिनों कॉरपोरेट हाउसेज में भी नियुक्ति हो रही है। वे अपने रिकॉर्ड्स के रख-रखाव के लिए एक्सपर्ट की नियुक्ति करते हैं। इसी तरह रिचर्स के लिए भी इसकी मांग रहती है। आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ इंडिया में आर्कियोलॉजिस्ट पदों के लिए संघ लोक सेवा आयोग हर वर्ष परीक्षा आयोजित करता है। राज्यों के आर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट में भी असिस्टेंट आर्कियोलॉजिस्ट की मांग भी रहती है। वहीं नेट क्वालीफाई करके लेक्चररशिप भी कर सकते हैं। आर्कियोलॉजी के क्षेत्र में किसी भी पद पर न्यूनतम वेतन 25 हजार रुपए है। उसके बाद वेतन का निर्धारण पद और अनुभव के आधार पर होता है।

कोर्सेज


आर्कियोलॉजी से जुड़े रेगुलर कोर्स जैसे पोस्ट ग्रेजुएशन, एमफिल या पीएचडी देश के अलग-अलग संस्थानों में संचालित किए जा रहे हैं। हालांकि हेरिटेज मैनेजमेंट और आर्किटेक्चरल कंजरवेशन से जुड़े कोर्स केवल गिने-चुने संस्थानों में ही पढ़ाए जा रहे हैं। आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ इंडिया की फंक्शनल बॉडी इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी में दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स की पढ़ाई होती है। अखिल भारतीय स्तर की प्रवेश परीक्षा के आधार पर इस कोर्स में दाखिला दिया जाता है। इसी तरह गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी नई दिल्ली से एफिलिएटेड इंस्टीट्यूट, दिल्ली इंस्टीट्यूट ऑफ हेरिटेज रिसर्च एंड मैनेजमेंट, आर्कियोलॉजी और हेरिटेज मैनेजमेंट में दो वर्षीय मास्टर कोर्स का संचालन होता  

Monday, February 18, 2019

फोटोग्राफी में बनाए कॅरि‍यर

फोटोग्राफी एक कला है जिसमें विजुअल कमांड के साथ-साथ टेक्निकल नॉलेज भी जरूरी है। फोटोग्राफी एक बेहतर कॅरि‍यर ऑप्शन साबित हो सकता है उन सभी छात्रों के लिए जिन्हें नेचर से प्यार है। वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी एक ऐसी फील्ड है जहां एक तरफ घने जंगलों के बीच खूंखार जानवरों को अपने कैमरे में कैद करने व उनके अलग-अलग मूवमेंट्स को दुनिया के सामने लाने का रोमांच है तो वहीं दूसरी तरफ इस क्षेत्र में खतरे भी कम नहीं हैं।
 
फोटोग्राफी एक क्रिएटिव क्षेत्र है जिसमें वर्तमान में बेहतर कॅरि‍यर की संभावनाएं मौजूद हैं। एक अच्छा वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर बनने के लिए बेसिक फोटोग्राफी की जानकारी होना बेहद जरूरी है। हालांकि एक साधारण डिजिटल कैमरा लेकर शौकिया तौर पर शुरुआत की जा सकती है। एक-दो साल का अनुभव हो जाने के बाद डिजिटल एसएलआर ख़रीद कर प्रोफेशनली इस क्षेत्र में एंट्री की जा सकती है।
सैलरी पैकेज
अभी तक यह क्षेत्र हमारे देश में ज्यादा फेमस नहीं था तो कमाई के साधन भी सीमित थे, लेकिन ग्लोबलाइजेशन के बाद अब इस क्षेत्र में अच्छा पैसा कमाया जा सकता है। किसी संस्थान से जुड़ने पर आसानी से 10 से 20 हजार रुपए प्रतिमाह की कमाई हो सकती है। एक अनुभवी वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर प्रतिमाह आसानी से एक लाख रुपए कमा सकता है। इसके अलावा कुछ सीनियर फोटोग्राफर्स भी अपने असिस्टेंट रखते हैं, जो न केवल सिखाते हैं बल्कि 10 से 12 हजार रुपए का स्टाइपेंड भी देते हैं।
योग्यता
फोटोग्राफी एक क्रिएटिव क्षेत्र है जिसमें वर्तमान में बेहतर करियर की संभावनाएं मौजूद हैं। बारहवीं या ग्रेजूएशन करने के बाद इस क्षेत्र में प्रवेश लिया जा सकता है। फोटोग्राफी का कोर्स सरकारी और निजी स्तर पर कई संस्थान कराते हैं। एक अच्छा वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर बनने के लिए बेसिक फोटोग्राफी की जानकारी होना बेहद जरूरी है। 
कोर्स और संस्थान
किसी भी सरकारी या निजी संस्थान से फोटोग्राफी का कोर्स करने के बाद इस क्षेत्र में प्रवेश किया जा सकता है। हालांकि भारत में अभी इस क्षेत्र के लिए कोई स्पेशलाइज्ड कोर्स उपलब्ध नहीं है। फोटोग्राफी में डिप्लोमा और सर्टिफिकेट दो तरह के कोर्स कराए जाते हैं।

1. इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट इन एजुकेशन एंड एडवांस्ड स्टडीज, अहमदाबाद । 
2. कॉलेज ऑफ आर्ट्स, तिलक मार्ग, दिल्ली एजेके मास कम्युनिकेशन सेंटर, जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली ।
3. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन, अहमदाबाद । 
4. सेंटर फॉर रिसर्च आर्ट ऑफ फिल्म्स ऐंड टेलीविजन नई दिल्ली । 
5. दिल्ली स्कूल ऑफ फोटोग्राफी । 6. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फोटोग्राफी, मुंबई

Tuesday, February 12, 2019

चिप डिजाइनर के रूप में करियर

टेक्‍नोलॉजी ने जहां लोगों के जीवन को सरल और आधुनिक बना दिया है, वहीं टेक्‍नोलॉजी के कई क्षेत्रों में करियर के शानदार विकल्‍प भी उभ्‍ार कर सामने आए हैं। टेक्‍नोलॉजी के क्षेत्र में जो प्रगति हुई है उसमें चिप डिजाइनिंग इंडस्‍ट्री ने महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है। अगर आप भी इंजीनियरिंग में रूचि रखते हैं और साथ ही चैलेंजिंग काम करना चाहते हैं तो चिप डिजाइनिंग में करियर बना सकते हैं। चिप सिलिकॉन का एक छोटा और पतला टुकड़ा होता है जो मशीनों के लिए इंटीग्रेटेड सर्किट बेस का काम करता है। चिप डिजाइनिंग की मदद से बड़े आकार के उपकरणों को भी छोटे आकार में बदला जा सकता है।
बढ़ रही है डिमांड 
चिप डिजाइन के रूप में आप एक सुनहरा करियर बना सकते हैं। इसकी हर सेक्‍टर में मांग है। एक चिप डिजाइनर का मुख्‍य काम छोटी-बड़ी इलेक्‍ट्रॉनिक डिवाइसेस की कार्यक्षमता को बढ़ाना और उसे आसान बनाना है। मोबाइल, टीवी रिमोट से लेकर कंज्‍यूमर इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स, ऑटोमोबाइल सेक्‍टर तक में चिप का इस्‍तेमाल हो रहा है। आप इस इंडस्ट्री से डिजाइन इंजीनियर, प्रोडक्ट इंजीनियर, टेस्ट इंजीनियर, सिस्टम्स इंजीनियर, प्रॉसेस इंजीनियर, पैकेजिंग इंजीनियर, सीएडी इंजीनियर आदि के रूप में जुड सकते हैं।
योग्‍यता 
चिप डिजानिंग में करियर बनाने के लिए आपके पास इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स, टेली कम्‍यूनिकेशन या कम्‍प्‍यूटर साइंस में बीई या बीटेक डिग्री होना चाहिए। चिप डिजाइनिंग इंडस्‍ट्री में विशेष रूप से डिजाइन, प्रोडक्‍शन, टेस्टिंग, एप्‍लीकेशंस और प्रॉसेस इं‍जीनियरिंग शामिल होता है। वैसे इस क्षेत्र में कुछ संस्थानों द्वारा शॉर्ट टर्मकोर्सेस भी कराए जाते हैं, जिनका संबंध आईसी, सर्किट डिजाइन और माइक्रो प्रोसेसर से होता है।
जरूरी स्किल्‍स 
इस क्षेत्र में करियर बनाने के इच्‍छुक युवाओं को हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का नॉलेज होना जरूरी है। इसके अलावा अच्‍छी कम्‍यूनिकेशन स्किल्‍स, टीम वर्क, प्रॉब्‍लम सॉल्विंग एटिट्यूड बहुत जरूरी है। प्रोग्रामिंग और मैथमेटिकल स्किल्‍स बहुत जरूरी है। इस क्षेत्र में करियर बनाने के इच्‍छुक युवाओं को टेक्‍नोलॉजी डेवलपमेंट्स और लेटेस्‍ट इनोवेशन का ज्ञान होना जरूरी है।
प्रमुख संस्‍थान: 
- बिटमैपर इंट्रीगेशन टेक्नोलजी, पुणे, महाराष्ट्र
- सेंट्रल फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांसड कंप्यूटिंग, बेंगलूर 
- जामिया मिलीया इस्लामिया, नई दिल्ली

Sunday, February 10, 2019

मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग में कॅरियर

मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग में कॅरियर हमारी जरूरतों में वक्त के साथ कई ऐसी चीजें भी जुड़ी हैं, जो प्राकृतिक होकर भी अपने मूल रूप में हम तक नहीं पहुंचतीं। उनमें एक महत्वपूर्ण चीज है मेटल यानी धातु। प्रकृति में कई प्रकार की धातु हैं, जो कई तत्वों (एलीमेंट्स) के रासायनिक संयोग से बनी हैं। इस कारण उनके गुणों (कैरेक्टरीस्टिक) में भी भौतिक और रासायनिक स्तर पर कई तरह की विशेषताएं देखने को मिलती हैं। ये विशेषताएं ही उनकी उपयोगिता (इंसानी जरूरत) का निर्धारण करती हैं। एल्यूमीनियम, तांबा, लोहा और टिन आदि धातुओं का इस्तेमाल वाहन निर्माण, विद्युत उपकरण और मशीनों के निर्माण में बड़े पैमाने पर किया जाता है। प्राकृतिक रूप में ये धातु अयस्क (ओर) के रूप में मिलते हैं। इनमें अशुद्धियों (मिट्टी और अन्य तत्व) की भारी मात्रा होती है। इस कारण इनका तत्काल उपयोग संभव नहीं होता। अयस्क से धातुओं को निकालने और उन्हें उपयोग लायक बनाने का कार्य मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग के जरिए होता है। इस विधा के जरिए ही खनन में मिले खनिजों से धातु अयस्क और फिर उससे धातु प्राप्त करने की सुगम प्रक्रियाओं का विकास किया जाता है।
इंजीनियरिंग की इस शाखा के विकास का प्रमाण हैं विभिन्न प्रकार के एलॉय (मिश्रधातु)। औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न धातुओं के मेल से तैयार एलॉय का काफी क्षेत्रों में इस्तेमाल हो रहा है। उदाहरण के लिए स्टेनलेस स्टील को लिया जा सकता है, लोहे में निकिल और क्रोमियम के मेल से तैयार यह मिश्रधातु जंगरहित और चमकदार होती है। इसी तरह ड्यूरेलुमिन है, जो एल्युमीनियम के साथ कॉपर, मैंगनीज और मैग्नीशियम के मेल से बना है। इस मिश्रधातु का उपयोग हवाई जहाजों के निर्माण में होता है। इसकी खासियत है हल्का वजन और भारी वहन क्षमता। ऐसे कई मिश्रधातु हैं, जिनका विकास मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग के कारण संभव हो पाया है। आने वाले वक्त में भी निर्माण और उत्पादन का क्षेत्र लोगों की बढ़ती भौतिक जरूरतों के कारण बढ़ता रहेगा। स्वाभाविक रूप से इस कारण  सहयोगी के रूप में मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग का क्षेत्र भी विस्तृत होगा। ऐसे में उसके पेशेवरों के लिए यह क्षेत्र आगे भी अवसरों की दृष्टि से आकर्षक बना रहेगा।
क्या है मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग
मेटलिक एलीमेंट (धातु तत्व) और उनसे बनने वाले यौगिकों (कंपाउंड्स) व मिश्रणों (मिक्सचर्स) के रासायनिक और भौतिक गुणों का अध्ययन मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग के तहत किया जाता है। मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग में धातु अयस्क के प्राकृतिक भंडारों से धातु को प्राप्त करने, उनमें मौजूद अशुद्धियों को दूर करने और औद्योगिक आवश्यकताओं के लिए धातुओं के मेल से मिश्रधातुओं (एलॉय) का निर्माण करने संबंधी प्रकियाओं और सिद्धांतों के बार में बताया जाता है। विभिन्न प्रक्रियाओं की प्रायोगिक जानकारी प्राप्त करने के लिए इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप, स्पेक्ट्रोग्राफ्स और एक्स-रे मशीन आदि तकनीकों का भी इस्तेमाल किया जाता है।  इंजीनियरिंग की यह शाखा मुख्य रूप से तीन भागों में बंटी है। इनके नाम हैं-फिजिकल मेटलर्जी, एक्सट्रेक्टिव मेटलर्जी और मिनरल प्रोसेसिंग। बैचलर डिग्री में इन भागों के आधारभूत सिद्धांतों के बारे में बताया जाता है, जबकि मास्टर्स में इनमें से किसी एक को स्पेशलाइजेशन का विषय बनाया जा सकता है।
इंजीनियर के कार्य 
- धातुओं को उपयोग के लायक बनाने की कम खर्चीली और तकनीकी दृष्टि से सुविधाजनक प्रक्रियाओं को विकसित करना। अयस्क में से धातु को अलग करने के लिए अयस्क की काफी बड़ी मात्रा को साफ (रिफाइन) करना पड़ता है।
- उपलब्ध धातुओं से विभिन्न उद्योगों (परिवहन, रक्षा, आटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, निर्माण और मशीनरी आदि) की जरूरत के अनुरूप नए उत्पाद विकसित करना।
-  मेटलर्जी के क्षेत्र में हुए नवीनतम शोध और तकनीकी विकास की जानकारी हासिल करते रहना। इसका इस्तेमाल कार्य को बेहतर बनाने में के लिए जरूरी होता है। 
- धातु निर्माण कंपनियों में प्रोडक्शन सुपरवाइजर के तौर पर काम करते हुए प्रयोग में लाई जा रही प्रक्रियाओं के पर्यावरणीय प्रभाव और ऊर्जा की खपत आदि पहलुओं पर गौर करते हुए उपयोगी उपाय तलाशना।
योग्यता
डिप्लोमा कोर्स

किसी मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी या स्कूल शिक्षा बोर्ड से 10वीं पास करने के बाद इंजीनियरिंग के डिप्लोमा कोर्स में दाखिला लिया जा सकता है। मेटलर्जी में डिप्लोमा कोर्स देश के कई विश्वविद्यालयों और पॉलिटेक्नीक संस्थानों में चल रहा है। इनमें दाखिले आमतौर पर प्रवेश परीक्षा के जरिए होते हैं। कुछ संस्थान दसवीं में प्राप्त अंकों के आधार पर भी दाखिला करते हैं। तीन वर्षीय डिप्लोमा कोर्स करने के बाद लेटरल एंट्री स्कीम के तहत सीधे बीई/ बीटेक कोर्स के दूसरे वर्ष (तीसरा सेमेस्टर) में प्रवेश लिया जा सकता है।
बैचलर कोर्स
विज्ञान विषयों (फिजिक्स और मैथ्स के अलावा केमिस्ट्री जरूरी) के साथ बारहवीं पास करके मेटलर्जी के बीई या बीटेक कोर्स में प्रवेश लिया जा सकता है। शैक्षणिक सत्र 2013-14 से इंजीनियरिंग के सभी कोर्स में प्रवेश के लिए सिंगल एंट्रेंस टेस्ट को माध्यम बनाया गया है। एनआईटी और राज्य स्तरीय इंजीनियरिंग संस्थानों की सीटें भरने के लिए आईआईटी (मेंस) परीक्षा का आयोजन होगा। इसमें प्राप्त अंक और 12वीं के अंक को मेरिट सूची बनाने में क्रमश: 60 और 40 फीसदी की वेटेज (राज्यों में वेटेज का अनुपात बदल भी सकता है) दी जाएगी। आईआईटी सीटों पर दाखिले के लिए आईआईटी (मेंस) के शीर्ष डेढ़ लाख छात्रों में चुने जाने के अलावा आईआईटी (एडवांस्ड) परीक्षा में पास होना होगा। इस परीक्षा में बैठने के लिए संबंधित स्कूल शिक्षा बोर्ड के शीर्ष 20 पर्सेंटाइल में भी आना होगा। 
मास्टर्स कोर्स
मेटलर्जी में इंजीनियरिंग की बैचलर डिग्री हासिल करने या केमिस्ट्री में एमएससी करने के बाद मेटलर्जी या उससे संबंधित विषयों में एमटेक किया जा सकता है। इसके लिए आईआईटी द्वारा आयोजित गेट (ग्रेजुएट एप्टीट्यूड टेस्ट इन इंजीनियरिंग) को पास करना पड़ता है।
स्पेशलाइजेशन के विषय
- फिजिकल मेटलर्जी
- मिनरल प्रोसेसिंग
- एक्सट्रेक्टिव मेटलर्जी
कार्य का दायरा
इंजीनियरिंग के इस क्षेत्र में रोजगार की काफी संभावनाएं हैं। धातु निर्मित उत्पादों के विकास और निर्माण से जुड़ी कंपनियों में मेटलर्जिकल इंजीनियर की काफी मांग होती है। इसके लिए धातुओं का निर्माण करने वाली कंपनियों (टाटा स्टील, सेल, जिंदल स्टील, हिंडाल्को इंडस्ट्रीज) में मेटलर्जिकल कंसल्टेंट के पद पर इंजीनियरों की नियुक्ति की जाती है। निजी और सरकारी कंपनियों की शोध व विकास शाखाओं में रिसर्चर के तौर पर मेटलर्जी के विशेषज्ञों की नियुक्ति की जाती है। इसके लिए मास्टर्स डिग्री का होना जरूरी होता है। मास्टर्स डिग्री और सीएसआईआर-यूजीसी नेट परीक्षा पास करने के बाद इंजीनियरिंग संस्थानों में लेक्चरर के रूप में भी अपनी योग्यता और अनुभव का उपयोग किया जा सकता है। 
इन पदों पर मिलेगा काम
- मेटलर्जिस्ट 
-  रिसर्चर
-  वेल्डिंग इंजीनियर 
-  प्रोसेस इंजीनियर
-  प्लांट इक्विपमेंट इंजीनियर 
- बैलिस्टिक इंजीनियर
-  क्वालिटी प्लानिंग इंजीनियर
वेतन
कोर्स करने के बाद पहली नौकरी में वेतन का स्तर कंपनी की बाजार स्थिति और कारोबार पर निर्भर करता है। डिप्लोमा कोर्स के बाद शुरुआती वेतन 15 से 18 हजार रुपये के बीच होता है, जबकि बैचलर डिग्री के बाद औसत वेतन 30 हजार रुपये मासिक होता है।
प्रमुख कोर्स
- डिप्लोमा इन मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग
- बीई/ बीटेक इन मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग
- एमटेक इन मेटलर्जिकल एंड मेटेरियल्स इंजीनियरिंग ऋ एमटेक इन स्टील टेक्नोलॉजी
प्रमुख संस्थान
-  इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (कानपुर, रुड़की, मद्रास)
-  नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (राउरकेला, जमशेदपुर, दुर्गापुर, वारंगल, तिरुचिरापल्ली)
-  इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी, वाराणसी
-  इंडियन स्कूल ऑफ माइंस
-  बंगाल इंजीनियरिंग एंड साइंस यूनिवर्सिटी, हावड़ा
-  बिरसा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, धनबाद
-  जादवपुर यूनिवर्सिटी, कोलकाता
-  जवाहरलाल नेहरू टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी, हैदराबाद

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