Friday, August 30, 2019

Spiritual Theology में करियर

स्पिरिचुअल थियोलॉजी एक ऐसी प्रकार की आध्यात्मिकता है जो साइंस, आर्ट और आस्था पर बेस्ड है। ये एक ऐसा विषय है जिस पर जितनी भी रिसर्च की जाए उतनी कम है। इसलिए बहुत से लोग इस को समझ नहीं पाते हैं और हैरान हो जाते हैं। लेकिन लोग आध्यात्मिकता को पसंद करते हैं वो चाहें तो इसमें अपना करियर भी शुरू कर सकते हैं।


स्पिरिचुअल थियोलॉजी
इस कोर्स में स्टूडेंट्स को पूर्व और पश्चिम की आध्यात्मिकता के बारे में सिखाया जाता है। मनोविज्ञान, चर्च के उपदेश, यूथ एनिमेशन और सिविल लॉ के बारे में विस्तार से जानकारी दी जाती है। स्टूडेंट्स को वैज्ञानिक विधिशास्त्र पर बेस्ड रिसर्च निबंध तैयार करना होता है। स्टूडेंट्स आश्रम के जीवन, अलग-अलग धर्मों के कार्यक्रमों और प्रार्थना सभाओं में हिस्सा लेते हैं। और सभी धर्मों में निहित आध्यात्मिक ज्ञान को ग्रहण करते हैं। बेंगलुरु में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्पिरिचुअलिटी से डिप्लोमा कर सकते हैं।


अपॉर्च्युनिटी
इस कोर्स के बाद स्टूडेंट्स को आध्यात्मिक सलाहकार के रूप में नौकरी मिल सकती है। स्कूल में बच्चों को, घर में बड़ी उम्र के लोगों को और किसी कंपनी के कर्मचारियों को ग्रुप में आध्यात्मिक सलाह और उपदेश देने का कार्य कर सकते हैं। आध्यात्मिक कंसल्टेंट फील्ड देश में बढ़ती जा रही है।


इनकम
इस कोर्स के बाद आपको 20-30 हजार रुपये प्रति माह इनकम हो सकती है और धीरे-धीरे ये इनकम बढ़ती जाएगी।

यहां से करें कोर्स
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्प्रिचुअलिटी, बेंगलुरु

Tuesday, July 23, 2019

टूल्स डिजाइनिंग में करियर


मैन्यूफैक्चरिंग इंजीनियरिंग का ही एक हिस्सा है टूल्स डिजाइनिंग। आज के औद्योगिक माहौल में टूल्स इंजीनियरों की काफी मांग है... उत्पाद का स्वरूप चाहे जैसा भी हों, उनके निर्माण के लिए टूल्स की आवश्यकता होती ही है। टूल्स ही मशीनरी का आधार होते हैं, जिनकी मदद से किसी प्रोडक्ट को मनचाहे रूप में ढाला जा सकता है। उत्पादों के बदलते स्वरूप के अनुसार नई-नई मशीनरी की जरूरत भी निरंतर बनी रहती है। यही कारण है कि वर्तमान औद्योगिक माहौल में टूल्स डिजाइनरों की मांग काफी है। विषय की रूपरेखा टूल्स एनालिसिस, प्लानिंग, डिजाइनिंग और डेवलपमेंट से संबंधित विभिन्न कार्य टूल्स डिजाइनिंग के तहत संपन्न किए जाते हैं। ऐसी डिजाइनिंग का मुख्य मकसद बेहतर टूल्स और मशीनों का निर्माण करके उत्पादकता को सुविधाजनक और गुणवत्तापूर्ण बनाना होता है। मैन्यूफैक्चरिंग इंडस्ट्री की सफलता में टूल्स की बेहतरीन डिजाइनिंग की बेहद खास भूमिका होती है। पाठ्यक्रम और शैक्षणिक योग्यता पीजी डिप्लोमा इन टूल डिजाइन ऐंड सीएडी/सीएएम, मास्टर ऑफ सीएमएम ऐंड सीएनसी टेक्नोलॉजी, बीटेक इन टूल इंजीनियरिंग, मास्टर ऑफ सीएडी, डिप्लोमा इन टूल ऐंड डाई मेकिंग, सर्टिफिकेट कोर्स इन टर्नर/मिलर/फिल्टर, इंटीग्रेटेड कोर्स इन मॉड्यूल डिजाइन आदि इस क्षेत्र के खास पाठ्यक्रम हैं। पाठ्यक्रमों की प्रकृति के अनुसार उनकी अवधि 6 महीने से लेकर 4 वर्ष तक की हो सकती है। जिन विद्यार्थियों ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री अथवा डिप्लोमा किया हो, उनका इन कोर्सेज में नामांकन हो सकता है। इसके अलावा संबंधित स्ट्रीम में आईटीआई करने वाले विद्यार्थी भी एडमिशन के हकदार हैं। कई संस्थान, जैसे सीआईटीडी में विद्यार्थियों को एंट्रेस टेस्ट के माध्यम से दाखिला मिलता है। मौके कहां-कहां टूल्स डिजाइनिंग से संबंधित प्रोफेशनल्स की मांग टूल्स डिजाइन कंपनी, टूल्स मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी आदि में बनी रहती है। औद्योगिक ईकाइयां चाहे जिस भी प्रकृति की हों, टूल्स डिजाइनरों के लिए अवसर उपलब्ध होते हैं।

दिल्ली इंस्टीट्यूट ऑफ टूल इंजीनियरिंग, दिल्ली www.dite.delhigovt.nic.in एनटीटीएफ, बेंगलुरु www.nttftrg.com इंडो-जर्मन टूल रूम, औरंगाबाद www.igtr-aur.org सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ टूल डिजाइन, बेंगलुरु www.citdindia.org इंडियन मशीन टूल मैन्यूफैक्चर्स एसोसिएशन, बेंगलुरु www.imtma.in

Thursday, July 18, 2019

आर्कियोलॉजी

हजारों साल पहले मानव जीवन कैसा रहा होगा? किन-किन तरीकों से जीवन से जुड़े अवशेषों को बचाया जा सकता है? एक सभ्यता, दूसरी सभ्यता से कैसे अलग है? क्या हैं इनकी वजहें? ऐसे अनगिनत सवालों से सीधा सरोकार होता है आर्कियोलॉजिस्ट्स का। 

अगर आप भी देश की धरोहर और इतिहास में रुचि रखते हैं तो आर्कियोलॉजिस्ट के रूप में एक अच्छे करियर की शुरुआत कर सकते हैं। इसमें आपको नित नई चीजें जानने को तो मिलेंगी ही, सैलरी भी अच्छी खासी है। आर्कियोलॉजी के अंतर्गत पुरातात्विक महत्व वाली जगहों का अध्ययन एवं प्रबंधन किया जाता है। 

हेरिटेज मैनेजमेंट के तहत पुरातात्विक स्थलों की खुदाई का कार्य संचालित किया जाता है और इस दौरान मिलने वाली वस्तुओं को संरक्षित कर उनकी उपयोगिता का निर्धारण किया जाता है। इसकी सहायता से घटनाओं का समय, महत्व आदि के बारे में जरूरी निष्कर्ष निकाले जाते हैं। 
जरूरी योग्यता
एक बेहतरीन आर्कियोलॉजिस्ट अथवा म्यूजियम प्रोफेशनल बनने के लिए प्लीस्टोसीन पीरियड अथवा क्लासिकल लैंग्वेज, मसलन पाली, अपभ्रंश, संस्कृत, अरेबियन भाषाओं में से किसी की जानकारी आपको कामयाबी की राह पर आगे ले जा सकती है।
पर्सनल स्किल
आर्कियोलॉजी ने केवल दिलचस्प विषय है बल्कि इसमें कार्य करने वाले प्रोफेशनल्स के लिए यह चुनौतियों से भरा क्षेत्र भी है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए अच्छी विशेलषणात्मक क्षमता, तार्किक सोच, कार्य के प्रति समर्पण जैसे महत्वपूर्ण गुण जरूर होेने चाहिए। कला की समझ और उसकी पहचान भी आपको औरों से बेहतर बनाने में मदद करेगी। इसके अलावा आप में चीजों और उस देशकाल को जानने की ललक भी होनी चाहिए। 
संभावनाएं व वेतन
आर्कियोलॉजिस्ट की मांग सरकारी और निजी हर क्षेत्र में है। इन दिनों कॉरपोरेट हाउसेज में भी नियुक्ति हो रही है। वे अपने रिकॉर्ड्स के रख-रखाव के लिए एक्सपर्ट की नियुक्ति करते हैं। इसी तरह रिचर्स के लिए भी इसकी मांग रहती है। आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ इंडिया में आर्कियोलॉजिस्ट पदों के लिए संघ लोक सेवा आयोग हर वर्ष परीक्षा आयोजित करता है। राज्यों के आर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट में भी असिस्टेंट आर्कियोलॉजिस्ट की मांग भी रहती है। वहीं नेट क्वालीफाई करके लेक्चररशिप भी कर सकते हैं। आर्कियोलॉजी के क्षेत्र में किसी भी पद पर न्यूनतम वेतन 25 हजार रुपए है। उसके बाद वेतन का निर्धारण पद और अनुभव के आधार पर होता है।
कोर्सेज
आर्कियोलॉजी से जुड़े रेगुलर कोर्स जैसे पोस्ट ग्रेजुएशन, एमफिल या पीएचडी देश के अलग-अलग संस्थानों में संचालित किए जा रहे हैं। हालांकि हेरिटेज मैनेजमेंट और आर्किटेक्चरल कंजरवेशन से जुड़े कोर्स केवल गिने-चुने संस्थानों में ही पढ़ाए जा रहे हैं। आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ इंडिया की फंक्शनल बॉडी इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी में दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स की पढ़ाई होती है। अखिल भारतीय स्तर की प्रवेश परीक्षा के आधार पर इस कोर्स में दाखिला दिया जाता है। इसी तरह गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी नई दिल्ली से एफिलिएटेड इंस्टीट्यूट, दिल्ली इंस्टीट्यूट ऑफ हेरिटेज रिसर्च एंड मैनेजमेंट, आर्कियोलॉजी और हेरिटेज मैनेजमेंट में दो वर्षीय मास्टर कोर्स का संचालन होता  

Friday, July 12, 2019

फर्नीचर डिजाइनिंग में बनाएं करियर

एक समय तक फर्नीचर डिजाइनिंग का काम कारपेंटर ही करते थे, लेकिन आज के दौर में यह एक अलग प्रोफेशन बन चुका है। अगर आप की भी इसमें रुचि है और आप क्रिएटिव हैं तो फर्नीचर डिजाइनर बनकर करियर संवार सकते हैं। संबंधित ट्रेनिंग हासिल कर आप किसी कंपनी में जॉब कर सकते हैं या फिर अपना कारोबार भी शुरू कर सकते हैं। इस बारे में विस्तार से जानिए

पर्सनल स्किल्स
फर्नीचर डिजाइनिंग के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए आपमें क्रिएटिव और आर्टिस्टिक सेंस का मजबूत होना अति आवश्यक है, साथ ही कम्युनिकेशन स्किल अच्छी होनी चाहिए। मार्केटिंग स्किल्स और बिजनेस की भी समझ अनिवार्य है। फर्नीचर डिजाइनिंग के क्षेत्र में काम करने के लिए मार्केट में डिजाइनिंग को लेकर क्या कुछ नया किया जा रहा है, उस ओर भी पैनी नजर रखनी होती है क्योंकि फर्नीचर डिजाइनर का काम एक बेजान लकड़ी में डिजाइन के जरिए उसे आकर्षक रूप देना होता है।

बढ़ रही है डिमांड
फर्नीचर डिजाइनिंग व्यवसाय अब केवल कारपेंटर का काम नहीं रह गया है, बल्कि इसमें कुशल डिजाइनरों की मांग व्यापक स्तर पर बढ़ी है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले पांच वर्षों में बाजार में तकरीबन एक लाख फर्नीचर डिजाइनरों की मांग होगी।उल्लेखनीय है कि फर्नीचर डिजाइनिंग में पैसे कमाने के साथ-साथ अपनी कलात्मक क्षमता को अभिव्यक्त करने का मौका और सृजन की संतुष्टि का अहसास भी मिलता है।

एंट्री प्रोसेस
आमतौर पर फर्नीचर डिजाइनिंग कोर्स में प्रवेश के लिए शैक्षणिक योग्यता 10वीं पास है, लेकिन कुछ संस्थानों में नामांकन के लिए आवेदन करते समय उम्मीदवार का किसी भी विषय  से 12वीं पास होना आवश्यक है। कुछ समय पहले तक फर्नीचर डिजाइनिंग के विभिन्न कोर्स सामान्यत: डिजाइनिंग केमुख्य कोर्स केअंतर्गत ही कराए जाते थे लेकिन वर्तमान में कई संस्थाओं में फर्नीचर डिजाइनिंग एक स्वतंत्र स्ट्रीम के रूप में भी पढ़ाया जाने लगा है।

मेन कोर्सेस
ट्रेनिंग कोर्सेस की बात करें तो इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए कई तरह के प्रोफेशनल कोर्स उपलब्ध हैं। कंप्यूटर एडेड डिजाइनिंग के जरिए भी फर्नीचर कला सीखी जा सकती हैै। इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए फर्नीचर डिजाइनिंग में डिप्लोमा, सर्टिफिकेट कोर्स, बैचलर डिग्री कोर्स उपलब्ध हैं। सर्टिफिकेट कोर्स की अवधि एक साल की होती है, जबकि डिप्लोमा कोर्स दो साल की अवधि का होता है। फर्नीचर डिजाइनिंग केकई पाठ्यक्रमों केलिए प्रशिक्षण संस्थानों में प्रवेश अखिल भारतीय स्तर की प्रवेश परीक्षा पास करने के बाद साक्षात्कार में उत्तीर्ण होने के बाद दिया जाता है। इस परीक्षा में आपकी कलात्मक प्रतिभा और सोच को भी परखा जाता है। देश के प्रतिष्ठित नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ डिजाइनिंग, अहमदाबाद में फर्नीचर डिजाइनिंग केपोस्ट ग्रेजुएट कोर्स उपलब्ध हैं। यहां प्रवेश केलिए अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा का आयोजन किया जाता है। इसके अलावा इंटीरियर डिजाइनिंग के तीन वर्षीय डिप्लोमा कोर्स में भी फर्नीचर डिजाइनिंग एक महत्वपूर्ण भाग होता है। इंटीरियर डिजाइनिंग के पाठ्यक्रम में दाखिला लेने के बाद फर्नीचर डिजाइनिंग में अल्पकालिक विशेषज्ञता कोर्स भी किया जा सकता है

जॉब आॅप्शंस
दिनों-दिन बढ़ती मांग और स्वर्णिम भविष्य की कल्पनाओं के कारण फर्नीचर डिजाइनिंग करियर के रूप में आज युवाओं में बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। किसी प्रतिष्ठित संस्थान से फर्नीचर डिजाइनिंग का कोर्स करने के बाद किसी भी डिजाइनर के साथ काम किया जा सकता है। फर्नीचर डिजाइनिंग का कोर्स करने के बाद अपना व्यवसाय भी शुरू किया जा सकता है या इस क्षेत्र में काम कर रही प्रतिष्ठित कंपनियों से जुड़कर काम कर सकते हैं। भारत में फर्नीचर निर्माण के क्षेत्र में कई विदेशी कंपनियाँ भी आ चुकी हैं। रचनात्मकता और नए डिजाइन के लिए कुशलता के साथ-साथ प्रशिक्षण की भी जरूरत होती है इसीलिए क्षेत्र में करियर की असीम संभावनाओं को देखते हुए अनेक संस्थानों ने फर्नीचर डिजाइनिंग के कोर्स शुरू किए हैं।

आप इस क्षेत्र में कई बड़ी कंपनियों के लिए डिजाइनिंग का कार्य कर सकते हैं। कंप्यूटर स्किल्स और कंप्यूटर वर्क की मदद से अपने कार्य को अंजाम दे सकते हैं। अगर आप अपना स्वयं का रोजगार शुरू करना चाहते हैं,तो डिग्री या डिप्लोमा के आधार पर बैंक से लोन मिल जाता है। फर्नीचर की कई बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां समय-समय पर अपने यहां नियुक्तियां निकालती हैं। इसके अलावा कई प्रशिक्षण संस्थान भी इस फील्ड के अनुभवी लोगों को रोजगार केअवसर मुहैया कराते हैं।

इनकम
फर्नीचर डिजाइनिंग के क्षेत्र में अनुभव का महत्व सबसे ज्यादा है। उसी आधार पर बाजार में प्रोफेशनल की मांग बढ़ती है। इस फील्ड में अनुभव के आधार पर ही इनकम का दायरा निर्धारित होता है। आजकल फर्नीचर डिजाइनर्स के लिए स्वतंत्र रूप से कार्य करना काफी महत्वपूर्ण है। इस तरह आप एक साथ कई कंपनियों से जुड़ सकते हैं और उनकेलिए डिजाइनिंग कर सकते हैं। प्रशिक्षुओं से कंप्यूटर स्किल्स और कंप्यूटर वर्क की उम्मीद की जाती है। इंटीरियर  डिजाइनिंग केक्षेत्र में हुए क्रांतिकारी बदलाव ने फर्नीचर डिजाइनिंग को आज अच्छी इनकम वाला व्यवसाय बना दिया है। फर्नीचर डिजाइनर का शुरुआती वेतन दस से बीस हजार रुपए प्रतिमाह तक हो सकता है। इसकेबाद अनुभव के आधार पर वेतन बढ़ता जाता है। अगर आप स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं तो आय लाखों रुपए में हो सकती है।

प्रमुख संस्थान
एनआईडी, अहमदाबाद
गवर्नमेंट पोलीटेक्निक कॉलेज, चंडीगढ़
इंस्टीट्यूट आॅफ फर्नीचर डिजाइनिंग, पटियाला
गवर्नमेंट पॉलीटेक्निक कॉलेज, लखनऊ
इंडियन प्लाइवुड इंडस्ट्रीज रिसर्च इंस्टीट्यूट, बैंगलुरु

Tuesday, July 9, 2019

मानचित्रकला क्रिएटिविटी की दुनिया

आज क्रिएटिविटी की एक अलग दुनिया है। इसमें  मानचित्रकला भी एक है। पिछले पांच-छह साल से लगातार मानचित्रकला  के क्षेत्र में ग्रोथ दिखाई दे रही है। डिमांड के अनुसार इस फील्ड में ट्रेंड प्रोफेशनल्स के लिए स्कोप भी बढ़ा है, लेकिन यह केवल उन्हीं के लिए है, जो अपने विषय के साथ-साथ इसमें प्रयोग होने वाली नई टेक्नोलॉजी में भी पूरी तरह से निपुण हैं। मानचित्र तथा विभिन्न संबंधित उपकरणों की रचना, इनके सिद्धांतों और विधियों का ज्ञान एवं अध्ययन मानचित्रकला  कहलाता है। मानचित्र के अतिरिक्त तथ्य प्रदर्शन के लिये विविध प्रकार के अन्य उपकरण, जैसे उच्चावचन मॉडल, गोलक, मानारेख आदि भी बनाए जाते हैं। मानचित्रकला में विज्ञान, सौंदर्यमीमांसा तथा तकनीक का मिश्रण है। इसका रूपांतर कार्टोग्राफी है जो कि  ग्रीक शब्द से बना है।
योग्यता
मानचित्रकार बनने के लिए बैचलर ऑफ कार्टोग्राफी करनी होती है। अर्थ साइंस और अन्य फिजिकल साइंस ग्रेजुएट स्टूडेंट्स भी इस क्षेत्र में करियर बना सकते हैं। उन्हें अपनी बीएससी या बीटेक में एक विषय कार्टोग्राफी रखना चाहिए। अगर आप मानचित्रकार बनना चाहते हैं तो इससे संबंधित डिग्री या डिप्लोमा कोर्स करके इस फील्ड में एंट्री करें। कार्टोग्राफी में बैचलर डिग्री के अलावा ज्योग्राफी, जियोलॉजी, इंजीनियरिंग, कंप्यूटर साइंस, अर्थ साइंस और फिजिकल साइंस के ग्रेजुएट भी इसमें करियर बना सकते हैं।
मानचित्रकार  की खूबियां
मानचित्रकार साइंटिफिकल, टेक्नोलॉजिकल और ज्योग्राफिकल इन्फॉर्मेशन को डायग्राम, चार्ट, स्प्रेडशीट और मैप के रूप में पेश करता है। इसमें डिजिटल मैपिंग और ज्योग्राफिकल इन्फॉर्मेशन सिस्टम (जीआईएस) सबसे ज्यादा काम में आता है। साथ ही अन्य कौशल का होना भी जरूरी है, जैसे- भूगोल के लिए जुनून, उत्कृष्ट डिजाइन और आईटी कौशल, अच्छी स्थानिक जागरूकता, विश्लेषणात्मक कौशल आदि।
अवसर
मैप का इस्तेमाल एक इंडिविजुअल से लेकर इंडस्ट्रियल पर्पज तक के लिए किया जाने लगा है, इसलिए प्लानर्स, यूटिलिटी कंपनियों, स्टेट एजेंसीज, कंस्ट्रक्शन कंपनियों, सर्वेयर्स, आर्किटेक्ट्स सभी को मानचित्रकार  की जरूरत पड़ती है। इस तरह वेदर फोरकास्टिंग, ट्रैवल एंड टूरिज्म, ज्योलॉजिकल, मिनिरल एक्सप्लोरेशन, मिल्रिटी डिपार्टमेंट, पब्लिशिंग हाउसेज में जॉब के अच्छे मौके हैं। इस कोर्स को करने के बाद रोजगार की कोई समस्या नहीं होती। बहरहाल मानचित्र के बढ़ते हुए प्रयोग को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह क्षेत्र रोजगार की दृष्टि से काफी सुरक्षित है। साथ ही इससे संबंधित निम्न नौकरियां यह भी हैं-मैपिंग तकनीशियन, मैप लाइब्रेरियन, अधिकारी चार्टिग, भौगोलिक सूचना प्रणाली अधिकारी, भूविज्ञानी, भूभौतिकीविद्, ग्राफिक डिजाइनर, जल सर्वेक्षण सर्वेयर, भूमापक सॉफ्टवेयर इंजीनियर।
टेक्निकल जानकारी
वैसे तो मैप बनाने का आर्ट तकरीबन 7 हजार साल से भी ज्यादा पुराना है। पहले मैप बनाने वाले ज्यादातर वक्त फील्ड में बिताते थे और फिर हाथ से मैप बनाते थे, लेकिन अब यह काम कंप्यूटर के जरिए किया जाता है। इसलिए कंप्यूटर स्किल्स के अलावा ज्योग्राफिकल इंफॉर्मेशन सिस्टम और डिजिटल मैपिंग तकनीकी जानकारी रखनी होगी।
मानचित्रकार  एक वर्षीय डिप्लोमा कोर्स होता है, जिसके लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता स्नातक है।
वेतन
शुरुआती दौर में इसमें 15 से 20 हजार रुपये महीना आसानी से कमाया जा सकता है। हालांकि यह संस्थान पर काफी निर्भर करता है। विदेश से अनुभव प्राप्त कार्टोग्राफर 5-10 लाख रुपये प्रति माह भी कमा लेते हैं।
संस्थान
जामिया मिल्लिया इस्लामिया, जामिया नगर, नई दिल्ली 
इंस्टीटय़ूट ऑफ जियोइन्फॉर्मेटिक्स एंड रिमोट सेंसिंग, कोलकाता
मद्रास विश्वविद्यालय
पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़
उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद
नेशनल एटलस एंड थीमैटिक मैपिंग ऑर्गनाइजेशन, कोलकाता
जिम्मेदारियां: मानचित्रकार मुख्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र (स्थानीय अधिकारियों, सरकारी एजेंसियों, रक्षा मंत्रालय, संरक्षण ट्रस्टों और कंपनियों), सर्वेयर और प्रकाशन कंपनियों के लिए काम करते हैं। काम के मुताबिक उन्हें अपना आउटपुट देना होता है

Wednesday, July 3, 2019

ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में करियर

अर्थव्यवस्था की रफ्तार का पता इससे भी चलता है कि कौन-कौन से वाहन किस संख्या में सड़कों पर फिलवक्त दौड़ रहे हैं। इस सेक्टर को चलाने व आगे ले जाने वाले लोगों में ऑटोमोबाइल इंजीनियर्स भी हैं, जो डिजाइन, कम्फर्ट, इकॉनोमी, पावरफुल इंजन के साथ न केवल इस इंडस्ट्री को चलाते हैं, बल्कि अपने करियर को भी एक अनोखी रफ्तार देते हैं। इसी से जुड़ा है ऑटो कम्पोनेंट का तेजी से बढ़ता दायरा और यही वजह है कि ऑटोमोबाइल इंजीनियरों की मांग में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। एक तेज रफ्तार करियर के रूप में इसे चुना जा सकता है।

ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग यानी ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग या व्हीकल इंजीनियरिंग आज का सबसे चुनौती-भरा करियर है, जिसमें संभावनाओं की सीमा नहीं है। इंजीनियरिंग की यह शाखा कार, ट्रक, मोटरसाइकिल, स्कूटर जैसे वाहनों के डिजाइन, विकास, निर्माण, परीक्षण और मरम्मत व सर्विस से जुड़ी होती है। ऑटोमोबाइल के निर्माण व डिजाइनिंग के सम्यक मेल के लिए ऑटोमोबाइल इंजीनियर्स इंजीनियरिंग की विभिन्न शाखाओं जैसे मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक, सॉफ्टवेयर तथा सेफ्टी इंजीनियरिंग की मदद से काम को अंजाम देते हैं। 
एक बेहतरीन ऑटोमोबाइल इंजीनियर बनने के लिए विशेष प्रशिक्षण की जरूरत होती है और साथ ही एक खास किस्म का जुनून चाहिए, जो दृढ़ता, मेहनत व लगन के साथ अपने काम को पूरा करने में किसी दबाव व परेशानी को सामने न आने दे।

ऑटोमोबाइल इंजीनियर किसी भी वाहन की कॉन्सेप्ट स्टेज से लेकर प्रोडक्शन स्टेज तक शामिल होते हैं। यानी कागज से लेकर सड़क तक वाहन के आने तक उन्हें यह देखना होता है कि पूरा कॉन्सेप्ट हूबहू असलियत में उतरे। इस इंजीनियरिंग की कई उप-शाखाएं भी हैं जैसे इंजन, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंट्रोल सिस्टम, फ्ल्यूड मैकेनिज्म, थर्मोडायनेमिक्स, एयरोडायनेमिक्स, सप्लाई चेन मैनेजमेंट इत्यादि।

ऑटोमोबाइल इंजीनियर को मुख्यत: तीन धाराओं में विभाजित किया जाता है-प्रोडक्ट या डिजाइन इंजीनियर, डेवलपमेंट इंजीनियर और मैन्युफैक्चरिंग इंजीनियर। प्रोडक्ट या डिजाइन इंजीनियर वह होता है, जो ऑटोमोबाइल्स के कम्पोनेंट और सिस्टम की डिजाइनिंग व टैस्टिंग करता है। वह हर पुर्जे को डिजाइन व टैस्ट करता है, ताकि वह निर्धारित जरूरतों को पूरा कर सके। मेन्युफैक्चरिंग इंजीनियर ऑटोमोबाइल्स के सभी पार्ट्स को जोड़ने का काम करता है। उसे उपकरणों, ऑटोमेशन उपकरणों और सेफ्टी प्रोसीजर्स को डिजाइन  करना होता है, जबकि मैन्युफैक्चरिंग इंजीनियर ऑटोमोबाइल के सभी हिस्सों को जोड़ कर पूरा वाहन तैयार करता है।
नोएडा स्थित ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग डिविजन चला रहे रूपक सखूजा के मुताबिक ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में करियर तभी बना सकते हैं, जब इसमें आपकी रुचि होगी। वैसे प्रोडक्शन से लेकर, डिजाइनिंग, असेम्बलिंग और मैकेनिकल, कई तरह के जॉब हैं। रिसर्च एंड डेवलपमेंट का बहुत बड़ा दायरा है ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में।

पाठय़क्रम
गणित, भौतिकी, रसायन शास्त्र, जैव प्रौद्योगिकी और कम्प्यूटर साइंस में रुचि व अच्छी पकड़ रखने वाले छात्र ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में शानदार करियर बनाने की सोच सकते हैं। इनमें कई पाठय़क्रम कराए जाते हैं, जैसे-

बीई ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग
बीटेक ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग
सर्टिफिकेट प्रोग्राम इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग
डिप्लोमा इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग
एमटेक इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग
पीजी डिप्लोमा इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग

शैक्षिक योग्यता
ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में बीई या बीटेक करने के लिए 12वीं या समकक्ष योग्यता होनी चाहिए, जिसमें गणित, भौतिकी, रसायन शास्त्र, जैव प्रौद्योगिकी और कम्प्यूटर साइंस जैसे विषय हों। ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में स्नातक होने के बाद एमई या एमटेक किया जा सकता है। उसके बाद यदि और विशेषज्ञता हासिल करनी है तो पीएचडी की जा सकती है। दसवीं बाद डिप्लोमा किया जा सकता है।

कैसे होता है चयन 
बीई या बीटेक पाठय़क्रमों में दाखिला 12वीं के अंकों व प्रवेश परीक्षाओं (आईआईटीजेईई, एआईईईई, बिटसैट इत्यादि) की मेरिट के आधार पर होता है, जो अखिल भारतीय व राज्य स्तर पर आयोजित की जाती है। एमई या एमटेक के लिए गेट यानी ग्रेजुएट एप्टीटय़ूड टैस्ट इन इंजीनियरिंग के माध्यम से दाखिला मिलता है। जिन्होंने डिप्लोमा कर रखा है, वे एआईएमई परीक्षा देकर डिग्री धारकों के समकक्ष हो सकते हैं। कुछ संस्थान अपनी परीक्षा लेते हैं।

बीई या बीटेक कोर्स 4 साल का होता है, जबकि एमई या एमटेक और पीजी डिप्लोमा 2 साल का होता है। ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग के डिप्लोमा कोर्स 3 साल के होते हैं।

व्यक्तिगत गुण
विषय की जानकारी होने के साथ-साथ कम्युनिकेशन स्किल, कंप्यूटर स्किल, एनालिटिकल व प्रोब्लम सॉल्विंग स्किल होनी चाहिए। किसी भी चीज की बारीकी को पकड़ना आना चाहिए। शारीरिक रूप से स्वस्थ होना भी बहुत जरूरी है, क्योंकि काम के घंटे लम्बे हो सकते हैं।

करियर विकल्प
बताने की जरूरत नहीं है कि ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री किस तेजी से बढ़ रही है। लिहाजा न सिर्फ निर्माण में, बल्कि मेंटेनेंस व सर्विस में भी लोगों की जरूरतें बढ़ रही हैं। ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग की जितनी शाखाएं हैं, उनमें अवसर हैं। जिसे डिजाइन पसंद है, वह उसे चुन सकता है और जिसे मैन्युफैक्चरिंग भाती है, वह उसमें जा सकता है। वाहन बनाने वाली कंपनियों से लेकर सर्विस स्टेशन, स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन, प्राइवेट ट्रांसपोर्ट कंपनियों, इंश्योरेंस कंपनियों जैसी जगहों पर अवसरों की भरमार है। जरूरत है तो कुशल और समर्पित लोगों की, जिन्होंने ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रखी हो। सबकी योग्यता के हिसाब से कोई न कोई काम उपलब्ध है। कंप्यूटर के आ जाने से डिजाइन में क्रांति आ गई है। जो लोग इसमें महारत रखते हैं, वे इसे चुन सकते हैं। इसके अलावा अपना गैरेज, वर्कशॉप या सर्विस सेंटर खोला जा सकता है। जिसके पास मास्टर डिग्री है और ग्रेजुएट स्तर पर पांच साल तक पढ़ाने का अनुभव है, वह लेक्चरर बन सकता है। पीएचडी वाले रिसर्च में जा सकते हैं।

आमदनी का स्रोत 
यह उम्मीदवार की योग्यता, अनुभव और उस कंपनी के स्टेटस पर निर्भर करता है कि किसी को क्या वेतन मिलता है। शुरुआत में किसी भी नए ऑटोमोबाइल इंजीनियर को 15,000 से 20,000 रुपए वेतन मिल सकता है। आईआईटी या अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़ने वालों के लिए वेतन की कोई सीमा नहीं है। इसके अलावा जैसे-जैसे अनुभव बढ़ता जाता है, वेतन में भी बढ़ोतरी होती रहती है, जो लाखों रुपये प्रतिमाह तक हो सकती है।

प्रमुख संस्थान
दिल्ली कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट, पलवल, हरियाणा
वेबसाइट- www.dctm.org.in

मणिपाल इंस्टीटय़ूट ऑफ टेक्नोलॉजी, मणिपाल, कर्नाटक
वेबसाइट- www.manipal.edu
गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज, मोडासा, साबरकांठा, गुजरात
वेबसाइट- www.gecmodasa.org
कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड रूरल टेक्नालॉजी, मेरठ उत्तरप्रदेश
वेबसाइट- www.cert.ac.in
हिन्दुस्तान कॉलेज ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, मथुरा उत्तरप्रदेश
वेबसाइट- www.hcst.edu.in

10 से 12 हजार होगी, लेकिन 2 से 3 साल के तजुर्बे के बाद उसकी आमदनी तीन गुणा बढ़ जाएगी। मैं तो यही कहूंगा कि छात्र ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में करियर बनाएं। यहां प्रशिक्षित ऑटोमोबाइल इंजीनियरों की बेहद कमी है।