Friday, December 30, 2022

वेटरनरी डॉक्टर के तौर पर बनाएं करियर

इंडिया एक ऐसा देश है जहां पर जमीन के साथ जंगलों को भी काफी महत्‍व दिया जाता है। यही कारण है कि विश्व में सबसे ज्यादा पशु-पक्षी पाए जाने वाले देशों में भारत भी शामिल है। इनमें पालतु और जंगली दोनों प्रकार के पशु-पक्षी शामिल है। इतनी भारी संख्या में पशु होने के बावजूद आज भी हमारे देश में वेटरनरी डॉक्टर की भारी कमी है। यही कारण है कि कई बार बीमारी या फिर किसी दुर्घटना में घायल हुए जानवर को समय पर इलाज नहीं मिल पाता और वे मर जाते हैं।
इस पृथ्‍वी पर जबसे इंसानों का अस्तित्व रहा है तभी से उसने जानवरों को पालने का शौक रखा है। इसलिए इस फील्‍ड में बाकियों की अपेक्षा कई संभावनाएं है। अगर आप पशु चिकित्सक रूप में अपना करियर बनाना चाहते है सिर्फ दो साल का डिप्लोमा करके, आप अपना ये सपना पूरा कर सकते है। पशु चिकित्सा विज्ञान भी मानव चिकित्सा विज्ञान जैसा ही है लेकिन पशु-पक्षी अपनी बीमारी के बारे में किसी को बता नहीं सकते है इसलिए यह चिकित्सा थोड़ी जटिल हो जाती है। लेकिन इसका कोर्स करने के बाद आप इस फील्‍ड में एक्सपर्ट हो जाते हैं और ऐसे बेजुबान जानवरों की मदद कर पाएंगे।
वेटरनरी डॉक्टर का कार्य
एक वेटरनरी डॉक्टर के तौर पर आप पशु-पक्षियों की बीमारी का पता लगाकर उनका इलाज करते हैं। इसके अलावा जानवरों का टीकाकरण, सर्जरी और ऑपरेशन जैसे काम भी एक वेटरनरी डॉक्टर को ही करना होता है। वहीं पेट्स और फार्म में रहने वाले पशुओं की देखभाल जैसे काम करना और समय-समय पर उनके टेस्ट लेना जैसे काम भी एक वेटरनरी डॉक्टर को ही करना होता है। हम कह सकते हैं कि एक पशु की सभी बीमारियों से जुड़ा इलाज इन्‍हें ही करना होता है।

जरूरी योग्यता
अगर आपको पशु-पक्षियों से लगाव है और आप एक वेटरनरी डॉक्टर बनकर अपना करियर बनाना चाहते हैं तो आपको इसमें डिग्री और डिप्लोमा कोर्स करना होगा। इस फील्‍ड में किसी भी तरह का कोर्स करने के लिए न्‍यूनतम योग्‍यता के रूप में अभ्यर्थी का 12वीं में फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी विषयों में न्यूनतम 50 प्रतिशत अंको से पास होना जरूरी है।
प्रमुख कोर्स
इस क्षेत्र में पढ़ाई करने के लिए कई तरह के डिग्री और डिप्लोमा कोर्स उपलब्ध हैं। आप इनमें से कोई भी कोर्स कर सकते है।, इसमें बैचलर ऑफ वेटरनरी साइंस एंड एनिमल हस्बैंड्री जो 5 वर्षीय डिग्री है, इसके अलावा दो वर्षीय डिप्लोमा इन वेटरनरी फार्मेसी, दो वर्षीय मास्टर ऑफ वेटरनरी साइंस और दो वर्षीय पीएचडी इन वेटरनरी साइंस मुख्‍य रूप से शामिल है।
इस तरह मिलेगा एडमिशन
प्रतिवर्ष वेटरनरी साइंस में बैचलर डिग्री कोर्स में एडमिशन लेने के लिए प्रवेश परीक्षा आयोजित की जाती है। इस प्रवेश परीक्षा को वेटरनरी काउंसिल ऑफ इंडिया मई और जून के महीने में आयोजित करता है। इस प्रवेश परीक्षा के माध्यम से दूसरे राज्यों के अभ्यर्थी को 15 प्रतिशत सीटों पर एडमिशन दिया जाता है। इसके अलावा बाकी की सीटें उस राज्य के अभ्यर्थियों द्वारा भरी जाती है जिस राज्य में वो इंस्टीट्यूट है।

प्रमुख संस्थान
  1. नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट, करनाल
  2. कॉलेज ऑफ वेटरनरी एंड एनिमल सांइस, बिकानेर
  3. इंडियन वेटरनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बरेली यूपी
  4. मद्रास वेटरनरी कॉलेज, चेन्नई
  5. खालसा कॉलेज ऑफ वेटरनरी एंड एनिमल साइंसेज, पंजाब
  6. इंडियन वेटरनरी रिसर्च इंस्टीट्यूटस, कोलकाता
  7. आनंद एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, आनंद, गुजरात
  8. यहां मिलेगी जॉब
    वेटरनरी साइंस में कोर्स पूरा करने के बाद आप कई सरकारी और गैर सरकारी पशु चिकित्सा हॉस्पिटल में एक डॉक्टर के रूप में काम कर सकते हैं। इसके अलावा एनिमल रिसर्च सेंटर, डेरी फार्म, शिक्षण संस्थान, फार्मास्यूटिकल कंपनी आदि में आपको आसानी से नौकरी मिल सकती है। आप चाहे तो खुद का पशु क्‍लीनिक खोलकर भी अपना अच्छा करियर बना सकते है। वहीं रिसर्च में जाकर आप कई देशों में फेलोशिप भी कर सकते है।

    सैलरी
    नॉर्मल डॉक्‍टर की तरह ही एक वेटरनरी डॉक्टर की सैलरी भी उसके पद और अनुभव के आधार पर तय की जाती है। अगर आप किसी सरकारी वेटरनरी विभाग या अस्‍पताल में कार्य कर रहे हैं तो आपको सरकार के पे ग्रेड के अनुसार प्रतिमाह लाखों रूपये मिल सकते हैं। वहीं आप प्राइवेट सेक्‍टर में या अपना क्‍लीनिक शुरू कर प्रतिमाह 30 हजार से 60 हजार रूपये कमा सकते हैं। कुछ सालों के अनुभव के बाद आपको अच्छी सैलरी मिल सकती है।

Tuesday, December 20, 2022

ग्रामीण हेल्थकेयर वर्कर बनकर संवारें कॅरियर

ग्रामीण हेल्थ केयर वर्कर्स एक मध्य स्तरीय स्वास्थ्य कर्मचारी होते हैं जो सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं का निदान और इलाज करने के लिए प्रशिक्षित किए जाते हैं, ताकि किसी भी आपातकालीन स्थिति में प्रारंभिक प्रबंधन यानी शुरुआती इलाज उपलब्ध करा सकें और आगे के इलाज के लिए गंभीर रूप से बीमार या घायल मरीजों को अस्पतालों तक पहुंचाया जा सके। एक ग्रामीण हेल्थ केयर वर्कर हमारे देश की स्वास्थ्य से जुड़ी आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ग्रामीण हेल्थ केयर वर्कर की प्राथमिक जिम्मेदारियों में मामूली बीमारियों का इलाज, बुजुर्ग लोगों की देखभाल, गर्भवती महिलाओं और बच्चों की देखभाल शामिल होते हैं। इसके अलावा वे परिवार नियोजन सेवाओं, स्वच्छता के लिए जागरुकता फैलाना और स्वच्छता को बढ़ावा देना, संचारी रोगों के लिए स्क्रीनिंग, स्वास्थ्य शिक्षा गतिविधियों का प्रदर्शन, आंकड़े इकट्ठा करना, रिकॉर्ड बनाए रखना और स्वास्थ्य ज्यादा खराब होने पर क्षेत्रीय लोगों को अस्पतालों तक पहुंचवाने का काम भी करते हैं। वे मेडिकल प्रोफेशनल्स और शिक्षकों के लिए डाटा एकत्र करने से लेकर सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक पूरा करने में भी मदद करते हैं। ग्रामीण हेल्थ केयर वर्कर ग्रामीण समुदाय के साथ मिलकर गांवों में स्वास्थ्य और स्वच्छता जागरुकता पर चर्चाएं भी करते हैं।

कैसे बने हेल्थ केयर वर्कर

इस काम को वही कर सकता है जो सेवाभावी हो। जिसके मन में स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों को जड़ से निकाल फेंकने का सपना हो। अगर आपमें यह सभी खूबियां हैं तो इस फील्ड को कॅरियर चुन सकते हैं। इस फील्ड में कॅरियर बनाने के लिए अभ्यर्थी को किसी भी संकाय से और मान्यता प्राप्त बोर्ड से 12वीं पास करना जरूरी होता है।
क्या होगी सैलेरी

डिप्लोमा इन रूरल हेल्थ केयर का कोर्स करने के बाद आप बतौर कर्मचारी कॅरियर की शुरुआत कर सकते हैं। इन्हें शुरुआत में 10 हजार से लेकर 15 हजार रुपए तक मिल सकता है। अनुभव होने के साथ ही आप सुपरवाइजर या डवलपमेंट ऑफिसर बन सकते हैं।
कोर्स के बारे में जानकारी

अभ्यर्थी रूरल हेल्थ केयर में 1 वर्ष और 2 वर्ष का डिप्लोमा लेकर इस फील्ड में एक्सपर्ट बन सकते हैं और इस फील्ड से जुड़े हर एक कार्य को प्रैक्टिकली जान और समझ सकते हैं। कोर्स के दौरान उन्हें सिखाया जाता है कि ग्रामीण इलाकों में आपातकालीन स्थिति में किस तरह समुचित मेडिकल सुविधाओं का प्रबंध कराया जाए। उन्हें अलग-अलग माध्यमों का इस्तेमाल करके जागरुकता के संदेश लोगों तक पहुंचाना और किसी परेशानी के समय गर्भवती महिलाओं और बच्चों की देखभाल करने की ट्रेनिंग दी जाती है।
अवसर: आप स्वास्थ्य विभाग, परिवार नियोजन मंत्रालय, पर्यावरण विभाग के अलावा सरकारी व गैर सरकारी एनजीओ में नौकरी कर सकते हैं। आप चाहें तो प्राइवेट कंपनी के सीएसआर विभाग में नौकरी कर सकते हैं।
ग्रामीण हेल्थकेयर वर्कर बनकर आप ग्रामीण इलाकों में आपातकालीन स्थिति में मेडिकल सुविधाओं का बेहतरीन प्रबंधन कर सकते हैं।

प्रमुख संस्थान

महर्षि मर्केंडेश्वर यूनिवर्सिटी, अम्बाला, हरियाणा
www.mmumullana.org
इंडियन मेडिकल इंस्टीट्यूट ऑफ नर्सिंग, जालंधर
www.iminursing.in
इंस्टीट्यूट ऑफ एलाइड हेल्थ साइंसेज, कोलकाता
www.iahs.co.in
दिल्ली पैरा एंड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली
www.dpmiindia.com

Sunday, December 11, 2022

ईसीजी टेक्निशन बनकर कमाएं खूब

 ईसीजी टेक्निशन को कार्डियोग्रैफ़िक टेक्निशन भी कहा जाता है। ईसीजी मशीन का इस्तेमाल करके पेशेंट्स का हार्ट रेट्स मापना, कार्डियक रिदम को मॉनिटर करना, दिल और आर्टरीज में अनियमितताओं को खोजने में चिकित्सकों की मदद करना, अधिग्रहीत डेटा एकत्रित करना, रोगी की चिकित्सा की स्थिति पर नजर रखना और हृदय रोग विशेषज्ञों की सहायता करना ही इसका काम होता है। इसमें करियर बनाने के काफी फायदे भी हैं जैसे कि देशभर के हॉस्पिटल्स, क्लिनिक्स और लैब आदि में आपको नौकरी के भरपूर मौके हैं।

कोर्स और योग्यता
कोर्स के दौरान स्टूडेंट को 1 साल में यानी 2 सेमेस्टर में कोर्स को पूरा करना होता है जिसमें उन्हें थिअरी और प्रैक्टिकल दोनों प्रदान तरीकों से पढ़ाया जाता है। यह कोर्स दिल और सीने की शरीर रचना विज्ञान और शरीर क्रिया विज्ञान पर महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि को भी कवर करता है। दिल कैसे काम करता है और ईसीजी किस तरह काम करता है, यह भी इसकोर्स में पढ़ाया जाता है।
अवसर
डिप्लोमा इन इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम टेक्नॉलजी कोर्स करने के बाद स्टूडेंट्स के लिए गवर्नमेंट और गैरसरकारी विभागों में कई अवसर खुल जाते हैं। आपदा स्थिति में सबसे ज्यादा जरूरत मेडिकल सहयोगियों की होती है जिसमें यही टेक्निशन मेडिकल की सुविधाएं प्रदान कराने में काम आते हैं।

सैलरी
इस फील्ड में करियर की शुरुआत के साथ आप कम से कम 20 हजार रुपये महीने तो कमा ही लेंगे। अनुभव के साथ आपकी सैलरी भी बढ़ती जाएगी।


संस्थान
इंडियन मेडिकल इंस्टिट्यूट ऑफ नर्सिंग, जालंधर, पंजाब
दिल्ली पैरामेडिकल एंड मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट, नई दिल्ली
महर्षि मार्केंडेश्वर यूनिवर्सिटी, अंबाला, हरियाणा
इंस्टिट्यूट ऑफ अलाइड हेल्थ साइंसेज, कोलकाता

Tuesday, December 6, 2022

डायलिसिस टेक्नीशियन

आज के समय में अगर आप 12 साइंस सब्जेक्ट के पास करते हैं तो 12th के बाद आपको बहुत सारे करियर ऑप्शन्स मिलते हैं आप जिस फील्ड में इंट्रेस्टेड है उस फील्ड में जा सकते हो इन्ही बहुत सारी फ़ील्ड्स में से एक फील्ड आपकी डायलीसिस टेक्नीशियन की होती है आप मे से बहुत से स्टूडेंट्स को पता होगा कि डायलिसिस टेक्नीशियन कौन होता है और डायलिसिस टेक्नीशियन बनने के लिए कोर्स कौनसा करना होता है लेकिन कुछ स्टूडेंट्स ऐसे भी होंगे जिन्हें इस कोर्स के बारे में जानकारी नहीं होगी इसलिए आज आर्टिकल में हम आपको डायलिसिस टेक्नीशियन बनने से रिलेटेड की जाने वाली पढ़ाई के बारे में पूरी जानकारी देंगे

जब हमारे शरीर में किडनी (किडनी हमारे शरीर में फिल्टर का काम करती है हमारे ब्लड में जो खराब चीजें होती हैं उनको फिल्टर करके बाहर निकालती है) सही से काम नहीं करती है हमें किडनी डिजीज हो जाता है तो ऐसी स्थिती में डायलिसिस किया जाता है जब किडनी सही से काम नहीं करती है तो मशीनों के द्वारा फ़िल्टर का काम किया जाता है तो इसे ही डायलिसिस कहते हैं. और जो डॉक्टर्स टेकनीशियन मशीनों के द्वारा इस फिल्टर करने के काम को करते हैं उन्हें डायलिसिस टेक्नीशियन कहा जाता है.

डायलिसिस टेक्नीशियन बनने के लिए आप डिप्लोमा या डिग्री कोर्स कर सकते हैं लेकिन इसमें हम आपको डिग्री कोर्स के बारे में बताएंगे डायलिसिस टेक्नीशियन बनने के लिए आप बीएससी इन डायलिसिस टेक्नोलॉजी कोर्स कर सकते हैं.

डायलिसिस टेक्नीशियन बनने के लिए योग्यता क्या होनी चाहिए?

बीएससी इन डायलिसिस टेक्नोलॉजी कोर्स करने के लिए कैंडिडेट का साइंस स्ट्रीम से 12th पास होना जरूरी होता है और साथ ही कैंडिडेट के 12th में 50% मार्क्स भी होने चाहिए इसमें रिज़र्व कैटेगरी के कैंडिडेट्स को कुछ छूट भी दी जाती है उनके 12th में 45% मार्क्स होना जरूरी होता हैं.

डायलिसिस टेक्नीशियन बनने के लिए कौन सा कोर्स करना होता है?

डायलिसिस टेक्नीशियन बनने के लिए आपको डायलिसिस टेक्नोलॉजी से रिलेटेड कोर्स करना होता है इसमें आपको डिप्लोमा और डिग्री दोनों तरह के कोर्सेस मिल जाएंगे आपको जिसमे सूटेबल हो आप वो कोर्स कर सकते हैं लेकिन इस आर्टिकल में हम आपको बीएससी इन डायलिसिस टेक्नोलॉजी कोर्स के बारे में जानकारी दे रहे हैं यह एक अंडर ग्रेजुएट कोर्स है और इस कोर्स की ड्यूरेशन 3 साल की होती है.

बीएससी इन डायलिसिस टेक्नोलॉजी कोर्स का सिलेबस क्या होता है?

बीएससी इन डायलिसिस टेक्नोलॉजी कोर्स मे आपको

  • ह्यूमन इकोनॉमी एंड फिजियोलॉजी
  • बायोकेमिस्ट्री
  • माइक्रोबायोलॉजी
  • पैथोलॉजी
  • डायलिसिस सिस्टम एंड इक्विपमेंट
  • Renal disease
  • Safety and hygiene
  • डायलीसिस टेक्नोलॉजी, इत्यादि सब्जेक्ट्स के बारे में डिटेल में पढ़ाया जाता है और प्रैक्टिकली चीजें भी सिखाई जाती है.

अगर आप डिप्लोमा कोर्स करते हैं तो उसमें भी आपके यही सब्जेक्ट रहते हैं लेकिन उसमें आपके कुछ सब्जेक्ट कम होते हैं.

बीएससी इन डायलिसिस टेक्नोलॉजी कोर्स में एडमिशन कैसे लें?

बीएससी इन डायलिसिस टेक्नोलॉजी कोर्स मे एडमिशन लेने के लिए आपको ज्यादातर entrance एग्जाम क्लियर करना होता है बहुत कम कॉलेज ऐसे मिलेंगे जहाँ पर आप 12th के मेरिट के बेस पर एडमिशन आपको डायरेक्ट एडमिशन दे देते हैं  लेकिन अगर आप किसी अच्छे कॉलेज में एडमिशन लेते हैं तो इस कोर्स में एडमिशन लेने के लिए आपको एंट्रेंस एग्जाम पास करना होगा.

डायलिसिस टेक्नीशियन बनने के लिए फीस कितनी लगती है?

डायलिसिस टेक्नीशियन मे डिग्री और डिप्लोमा दोनों कोर्सेज अवेलेबल होते है दोनों में से आप कोई भी कोर्स कर सकते हैं तो अगर एक एवरेज तौर पर डिप्लोमा और डिग्री कोर्स की फीस देखी जाए तो आपकी ये फीस 50,000 से ₹3,00,000 तक हो सकती है आप डिप्लोमा कोर्स करे या डिग्री कोर्स करें, इसके अलावा आपकी ये फीस आपके कॉलेज पर भी डिपेंड करती है कि आप कौन से कॉलेज में एडमिशन ले रहे हैं.

बीएससी इन डायलिसिस टेक्नोलॉजी कोर्स करने के बाद कौन-कौन सी जॉब ओप्पोर्चुनिटीस पा सकते हैं?

बीएससी इन डायलिसिस टेक्नोलॉजी कोर्स करने के बाद आप प्राइवेट और गवर्नमेंट दोनों सेक्टर में जॉब ले सकते हैं आप प्राइवेट और गवर्नमेंट हॉस्पिटल्स, हेल्थकेयर, इंस्टिट्यूट्स, कॉलेज, यूनिवर्सिटीज़, और इंटरनेशनल हेल्थ केयर आदि में जॉब ले सकते हैं

बीएससी इन डायलिसिस टेक्नोलॉजी कोर्स करने के बाद आप डायलीसिस टेक्नीशियन, निफ्ट्रोलॉजिस्ट, लैब टेक्नीशियन, मेडिकल असिस्टेंट आदि जैसे पदों पर जॉब पा सकते हैं.

डायलिसिस टेक्नीशियन की सैलरी कितनी होती है?

डायलिसिस टेक्नीशियन (Dialysis Technician kaise bane) आपको स्टार्टिंग में 20,000 से ₹25,000 के लगभग पर मंथ सैलरी मिलती है आपकी ये सैलरी आपके एक्सपीरियंस और स्किल्स पर डिपेंड करती है धीरे धीरे समय और एक्सपीरियंस बढ़ने के साथ साथ आपकी सैलरी भी बढ़ती जाती है.

Thursday, December 1, 2022

बीएससी रीनल डायलिसिस टेक्नोलॉजी

बैचलर ऑफ साइंस इन रीनल डायलिसिस टेक्नोलॉजी (बीएससी रीनल डायलिसिस टेक्नोलॉजी) 3 साल की पैरामेडिकल साइंस में अंडरग्रेजुएट डिग्री है। जिसके लिए साइंस स्ट्रीम वाले 12वीं पास छात्र आवेदन कर सकते है। भारत में जामिया हमदर्द, जेएनयू नई दिल्ली, और जिपमर जैसे टॉप कॉलेज बीएससी रीनल डायलिसिस टेक्नोलॉजी में कोर्स प्रदान करते हैं, जिनमें प्रवेश या तो कक्षा 12 वीं की अंको के आधार पर या जेईई मेन, बिटसैट, वीआईटीईईई और अन्य विश्वविद्यालय स्तर की आयोजित एंट्रेंस एग्जाम के आधार पर किया जाता है।
जबकि इग्नू, सिम्बायोसिस पुणे, शारदा यूनिवर्सिटी ग्रेटर नोएडा जैसे कॉलेज से भी ये कोर्स डिस्टेंस एजुकेशन के माध्यम से भी किया सकता है। बीएससी रीनल डायलिसिस टेक्नोलॉजी कोर्स की फीस लगभग 20,000 - 3,00,000 रुपये है। इस कोर्स को खास उन विद्यार्थियों के लिए डिजाइन किया गया है जो कि एक नर्स या चिकित्सक के रूप में गुर्दे की विफलता वाले रोगियों के लिए हेमोडायलिसिस इलाज करने के योग्य हो।
 बीएससी रीनल डायलिसिस टेक्नोलॉजी कोर्स कने के बाद, कोई भी छात्र सरकारी या प्राइवेट अस्पतालों और क्लीनिकों में क्लिनिकल कोऑर्डिनेटर, मेडिकल टेक्निशियन, डायलिसिस टेक्नीशियन, लेक्चरर आदि के रूप में नौकरी पा सकता है। जिसका की औसत सालाना शुरुआती वेतन 2,00,000 है और छात्र के फिल्ड के अनुभव के साथ यह 27,00,00 तक पहुंच सकता है।
 बीएससी रीनल डायलिसिस टेक्नोलॉजी: प्रवेश प्रक्रिया बैचलर ऑफ साइंस (रीनल डायलिसिस टेक्नोलॉजी) में प्रवेश निम्नलिखित में से किसी भी तरीके से संभव है: प्रवेश आधारित प्रवेश • 80% सीटों के लिए UPESEAT के माध्यम से प्रवेश। • प्रवेश के इस तरीके के लिए जेईई मेन्स योग्यता के अलावा उच्च और वरिष्ठ माध्यमिक स्तर (10 वीं और 12 वीं कक्षा) में न्यूनतम कुल स्कोर 60% के अलावा 12 वीं कक्षा में मुख्य विषयों के रूप में फिजिक्स, केमेस्ट्री, बायोलॉजी और मैथ्स जैसे विषयों की आवश्यकता होती है। • जेईई मेन्स का कटऑफ जेईई मेन्स के परिणाम घोषित होने के बाद घोषित किया जाता है।

मेरिट आधारित प्रवेश • सीट के 20% तक मेरिट / जेईई मेन्स स्कोर के माध्यम से प्रवेश। • प्रवेश के इस तरीके के लिए उच्च और वरिष्ठ माध्यमिक स्तर (10वीं और 12वीं) में न्यूनतम कुल 80% अंकों की आवश्यकता होती है, जिसमें फिजिक्स, केमेस्ट्री, बायोलॉजी और मैथ्स मुख्य विषय होते हैं। बीएससी रीनल डायलिसिस टेक्नोलॉजी: एलिजिबिलिटी • आवेदकों को मान्यता प्राप्त शिक्षा बोर्ड से विज्ञान की धारा में अपनी कक्षा 12 वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा में पास होना चाहिए। • आवेदकों को फिजिक्स, केमेस्ट्री, बायोलॉजी और मैथ्स जैसे विषयों में प्रमाणित परीक्षा में 45 से 50 प्रतिशत (%) के कुल अंक प्राप्त करने चाहिए। • कुछ विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर प्रवेश प्रदान करते हैं, इसलिए, आवेदकों को अपनी पसंद के विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित विशिष्ट परीक्षा में बैठने की आवश्यकता होती है। बीएससी रीनल डायलिसिस टेक्नोलॉजी: प्रवेश के लिए आवेदन कैसे करें? चरण 1: उम्मीदवार को लॉगिन आईडी और पासवर्ड बनाना होगा। चरण 2: विश्वविद्यालय के आधिकारिक पोर्टल के माध्यम से लॉगिन करें। चरण 3: सभी आवश्यक विवरण भरें और फिर आवश्यक दस्तावेज अपलोड करें। आवश्यक दस्तावेज नीचे दिए गए हैं: • स्कैन की गई 10वीं कक्षा की मार्कशीट • स्कैन की गई 12वीं कक्षा की मार्कशीट • चरित्र प्रमाण पत्र • प्रवासन प्रमाणपत्र • आधार कार्ड • पासपोर्ट के आकार की तस्वीर • उम्मीदवार के हस्ताक्षर • जाति प्रमाण पत्र (यदि लागू हो) • ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र (यदि लागू हो) • पीडब्ल्यूडी प्रमाणपत्र (यदि लागू हो) चरण 4: सभी आवश्यक दस्तावेज अपलोड करने के बाद, आवेदन शुल्क का भुगतान डेबिट कार्ड / क्रेडिट कार्ड / नेट बैंकिंग के माध्यम से करें। चरण 5: 'सबमिट बटन' पर क्लिक करें। ये वे चरण हैं जिनका उम्मीदवारों को पालन करना होता है और अधिकांश विश्वविद्यालयों में समान होते हैं।

Wednesday, November 23, 2022

निस्थीसिया असिस्टेंट/टेक्नीशियन

किसी तरह की सर्जरी से पहले मरीज को पहले बेहोश किया जाता है, ताकि उसे ऑपरेशन के वक्त होने वाले दर्द का एहसास न हो। अब आधुनिक मेडिकल साइंस में शरीर के खास हिस्से को ही सुन्न करने का चलन चल पड़ा है, जिसका उपचार सर्जरी के जरिये किया जाना होता है। इस तरह से मरीज को बेहोश या सुन्न करने के लिए एनिस्थीसिया का प्रयोग आमतौर पर किया जाता है। किस मरीज को उसकी सेहत के अनुसार कितनी कम या ज्यादा मात्रा में एनिस्थीसिया का डोज दिया जाए, इसका निर्धारण विशेषज्ञों द्वारा किया जाता है। एनिस्थीसिया डिप्लोमाधारकों द्वारा इन्हीं विशेषज्ञों की सहायता की जाती है।
महत्व 
सर्जरी अथवा उपचार की विभिन्न स्थितियों में एनिस्थीसिया का प्रयोग मजबूरीवश किया जाता है। सामान्य डॉक्टर या सर्जन द्वारा इसकी मात्रा का निर्धारण नहीं किया जाता है, बल्कि इसी फील्ड के ट्रेंड लोगों द्वारा यह जिम्मेदारी निभाई जाती है। जरा सी लापरवाही मरीज को कोमा में ले जाने के लिए काफी होती है। इसलिए मेडिकल स्पेशियलाइजेशन के इस दौर में एनिस्थीसिया के क्षेत्र से जुड़े डॉक्टर्स या पैरा मेडिकल स्टाफ की उपस्थिति को सर्जरी के दौरान नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है

 ट्रेनिंग 

यह दो वर्षीय डिप्लोमा स्तर का कोर्स है और इसमें बायोलॉजी तथा अन्य साइंस विषयों सहित कम से कम 50 प्रतिशत अंक बारहवीं में लाने वाले युवा प्रवेश ले सकते हैं। अधिकांश संस्थानों द्वारा मेरिट के आधार पर दाखिले दिए जाते हैं। यह कोर्स, विशेष तौर,पर उन युवाओं के लिए अत्यंत उपयोगी कहा जा सकता है, जो अपना भविष्य इसी क्षेत्र में विशेषज्ञ के तौर पर बनाना चाहते हैं। कोर्स के दौरान इस विषय के महत्व और मेडिकल साइंस में इसके विभिन्न प्रकार के उपयोगों से छात्रों को अवगत करवाया जाता है। एनिस्थीसिया की अधिकतम कितनी मात्रा किस तरह के रोगियों में दी जानी चाहिए, इससे जुड़े सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक पहलुओं से छात्रों को ट्रेनिंग के दौरान भली-भांति परिचित करवाया जाता है। सिलेबस में ह्यूमन एनाटॉमी एंड फिजियोलॉजी, फार्माकोलॉजी, एनिस्थीसिया मैनेजमेंट, मॉनिटरिंग ऑफ एनिस्थीसिया, रिकॉर्ड कीपिंग इन एनिस्थीसिया, स्टैंडर्ड्स इन एनिस्थीसिया, पेन मैनेजमेंट आदि पहलुओं पर एक्सपर्ट्स द्वारा जानकारी दी जाती है। इसी विषय में आगे पढ़ने के इच्छुक युवाओं के लिए बीएससी और उच्च शिक्षा की संभावनाएं देश-विदेश में हो सकती हैं

नौकरियां
कहने की जरूरत नहीं कि बड़े और नामी हॉस्पिटल्स के अलावा ऐसे प्रोफेशनल्स के लिए नर्सिंग होम्स,मैटरनिटी होम्स तथा छोटे- बड़े मेडिकल सेंटर्स में भी नौकरी की संभावनाएं हो सकती हैं। इनकी सेवाएं फ्रीलांस आधार पर कभी-कभी हॉस्पिटल्स द्वारा ली जाती हैं। फार्मास्युटिकल कंपनियों में भी ऐसे एक्सपर्ट्स की जरूरत पड़ती  है। प्रोफेशनल अनुभव और कार्यकुशलता के आधार पर इनकी फीस का निर्धारण किया जाता है। हायर एजुकेशन के बाद मेडिकल कॉलेज और यूनिवर्सिटी में भी टीचिंग जॉब्स के अवसर मिल सकते हैं। रिसर्च, एक अन्य कार्यक्षेत्र है, जहां पर ऐसे पारंगत लोगों के लिए करियर संवारने के मौके हो सकते हैं।

चुनौतियां 

  • अत्यंत जिम्मेदारी भरा पेशा
  • दिन-रात कभी भी कॉल पर जाना पड़ सकता है और मनाही की गुंजाइश नहीं के बराबर 
  • जॉब्स की संख्या बहुत अधिक नहीं 
  • अधिकतर प्राइवेट हॉस्पिटल्स या मेडिकल संस्थानों में रोजगार 
  • स्किल्स  

    •   बायोलॉजी और साइंस में दिलचस्पी 
    •   मरीज के प्रति सहानुभूतिपूर्ण सोच 
    •   आपात स्थितियों में जान बचाने के लिए तत्परता 
    •   टीम वर्क में विश्वास 
    •   स्वभाव में लापरवाही का न होना 
    •   सॉफ्ट स्किल्स में माहिर  

    प्रमुख संस्थान

    •   अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ http://www.amu.acin
    •   इंटीग्रल यूनिवर्सिटी, लखनऊ  www.iul.ac.in
    •   यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, जयपुर  www.universityoftechnology.edu.in
    •   कोहिनूर कॉलेज ऑफ पैरामेडिकल साइंसेज,मुंबई https://kcps.ac.in

Sunday, November 13, 2022

फिजियोथैरेपी में शानदार करियर,

 आजकल पैरा मेडिकल फील्ड युवाओं की रुचि काफी बढ़ रही है. इस वजह से फिजियोथेरेपी में करियर ही काफी संभावनाएं लगातार देखने को मिल रही हैं. कई ऐसी बीमारियों जिनका इलाज सिर्फ फिजियोथेरेपी के इस्तेमाल से किया जा रहा है. इसकी सबसे बाड़ी खासियत यह है कि इसका कोई भी साइड इफेक्ट नहीं है.

बता दें, फिजियोथेरेपी चिकित्सा विज्ञान की एक ऐसी शाखा है जिसकी मदद से शरीर के बाहरी हिस्से का इलाज आसानी से किया जाता है. फिजियोथेरेपी की मदद से कई लोगों के फिसिक को भी ठीक करने की कोशिश की जाती हैं. ये ज़्यादातर शरीर के ऐसे अंगों पर इस्तेमाल होता है जो सही से काम नहीं कर पाते.

फिजियोथेरेपी कोर्स
फिजियोथेरेपी में कैंडिडेट्स डिप्लोमा से लेकर पीएचडी तक की पढ़ाई कर सकते हैं. इसमें बैचलर कोर्स करने के लिए लगभग साढ़े चार साल तक का समय देना होता है. जिसके आखिरी के छह महीने में इस कोर्स के दौरान कैंडिडेट्स की इंटर्नशिप करवायी जाती है. वहीं मास्टर्स की बात करें तो ये कोर्स दो साल का होता है और इसके लिए कैंडिडेट्स के पास फिजियोथेरेपी में बैचलर्स की डिग्री का होना ज़रूरी है. इसमें करियर बनाने के लिए कैंडिडेट्स न्यूरोलॉजिकल फिजियोथेरेपी, स्पोर्ट्स फिजियोथेरेपी, पिडियाट्रिक फिजियोथेरेपी, ऑब्सेक्ट्रिक्स फिजियोथेरेपी, ऑर्थेपेडिक फिजियोथेरेपी, पोस्ट ऑपरेटिव फिजियोथेरेपी, कार्डियोवस्कुलर फिजियोथेरेपी में स्पेशलाइजेशन चुन सकते हैं.

कितनी होगी कोर्स की फीस
फिजियोथेरेपी कोर्स की फीस लगभग 30 हजार से शुरू होती है. जोकि अलग-अलग यूनिवर्सिटीज के नियम अनुसार अलग-अलग है. कई यूनिवर्सिटीज इस कोर्स के लिए स्कॉलरशिप भी प्रदान करवाती हैं. ताकि आर्थिक तंगी के चलते किसी छात्र को अपनी पढ़ाई बीच में न छोड़नी पड़े.

कितनी होगी सैलरी
इस कोर्स को पूरी तरह करने के बाद शुरूआती सैलरी 10 से 15 हजार रुपये महीने के बीच होगी. लेकिन अनुभव साथ इस क्षेत्र में पैसे भी ज्यादा मिलने लगते हैं. कई जगहों पर फिजियोथेरेपी इंटर्नशिप के दौरान ही पैसे मिलने शुरू हो जाते हैं. इसके अलावा एक अच्छा अनुभव होने के बाद खुद का क्लीनिक भी खोला जा सकता है, या फिर किसी बड़े हॉस्पिटल में फिजियोथेरिपिस्ट के तौर पर भी काम कर सकते हैं.

एंट्रेंस एग्जाम 
अगर फिजियोथेरेपी कोर्स में एडमिशन लेना है, तो सबसे पहले एंट्रेंस एग्जाम क्लियर करना होगा. इसमें अलग-अलग यूनिवर्सिटियां अलग-अलग समय पर अपने एंट्रेस एग्जाम आयोजित करती हैं. इसके लिए मार्च से लेकर जून महीने तक के बीच में फॉर्म भरा जाता है. इसके बाद एंट्रेंस एग्जाम में आए मार्क्स के आधार पर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में एडमिशन होता है.

फिजियोथेरेपी कोर्स के लिए संस्थान
1. अपोलो फिजियोथेरेपी कॉलेज, हैदराबाद
2. पंडित दीनदयाल उपाध्याय इंस्टिट्यूट फॉर फिजिकली हैंडिकैप्ड, नई दिल्ली
3. इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ एजुकेशन एंड रिसर्च, पटना
4. पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़
5. एसडीएम कॉलेज ऑफ फिजियोथेरेपी, कर्नाटक
6. महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल एजुकेशन, केरल
7. के.जे. सौम्या कॉलेज ऑफ फिजियोथेरेपी, मुंबई
8. डिपार्टमेंट ऑफ फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन, तमिलनाडु
9. जे.एस.एस. कॉलेज ऑफ फिजियोथेरेपी, मैसूर

Tuesday, November 8, 2022

OT कोर्स क्या है

इस कोर्स के माध्यम से विद्यार्थी ऑपरेशन थिएटर में डॉक्टर के सहायक के रूप में कार्य कर सकता है। जिसमें ऑपरेशन थिएटर से संबंधित उपकरणों की जांच कर ऑपरेशन से पहले तैयार रखना तथा ऑपरेशन के दौरान मुख्य डॉक्टर की मदद करना आदि कार्य होते हैं।

विद्यार्थी इस कोर्स को लेकर काफी असमंजस में रहते हैं कि, यह कोर्स डिप्लोमा कोर्स है या डिग्री कोर्स है। इस प्रकार की और भी दुविधा विद्यार्थी के मन में होती हैं। जैसे कि

  • ओटी कोर्स क्या होता है
  • ओटी कोर्स कैसे करें
  • ऑपरेशन थियेटर टेक्निशियन कैसे बने
  • ओटी कोर्स फीस कितनी होती है
  • OT Full Form क्या है
  • OT Technician Course Duration क्या है

इस प्रकार के और भी बहुत सारे प्रश्न होते हैं। जो विद्यार्थी को इस कोर्स का चयन करने से पहले परेशान करते हैं।

इस आर्टिकल में विद्यार्थी के इन्हीं सभी सवालों का हिंदी में ( OT Course Details in Hindi) विस्तार पूर्वक जवाब दिया गया है। OT Assistant Syllabus, ओटी टेक्नीशियन टॉप कॉलेज आदि प्रकार की संपूर्ण जानकारी इस आर्टिकल में दी गई है।

इस आर्टिकल में आगे बढ़ते हुए सबसे पहले मुख्य सवाल कि ओटी कोर्स क्या है यह एक डिप्लोमा कोर्स है या फिर ग्रेजुएशन डिग्री कोर्स है के बारे में विस्तार पूर्वक जानते हैं।

ओटी कोर्स क्या है

Operation theatre technician कोर्स एक ऐसा कोर्स है, जिसे डिप्लोमा और ग्रेजुएशन डिग्री दोनों माध्यमों से किया जा सकता है। इस कोर्स में ऑपरेशन थिएटर से संबंधित कार्यों की शिक्षा प्रदान की जाती है। इस कोर्स को पूरा करने के पश्चात Operation theatre में सहायक के रूप में कार्य कर सकते हैं।

भारत में यह कोर्स डिप्लोमा तथा ग्रेजुएशन डिग्री दोनों में उपलब्ध है। जिन विद्यार्थियों के पास समय की कमी होती है। वह विद्यार्थी ग्रेजुएशन डिग्री की स्थान पर डिप्लोमा कोर्स diploma in operation theatre technology को प्राथमिकता देते हैं। क्योंकि इसमें सिर्फ 2 वर्ष का समय लगता है ।

ओटी टेक्निशियन कोर्स को ग्रेजुएशन डिग्री के रूप में करने के लिए बीएससी ग्रेजुएशन डिग्री में ओटी टेक्नीशियन विशेषज्ञता का चयन करना होता है। इसे करने में 3 वर्ष का समय लगता है।

ओटी टेक्निशियन कोर्स क्या होता है की जानकारी प्राप्त करने के बाद विद्यार्थी के लिए OT Full Form के बारे में विस्तार पूर्वक जानना जरूरी है।

आगे OT Course Details in Hindi में ओटी फुल फॉर्म के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी दे रहे हैं।

ओटी कोर्स कौन कर सकता है


जैसा कि आप ऊपर जान ही चुके हैं कि इस कोर्स को दो माध्यमों से किया जा सकता है। भारत में यह कोर्स डिप्लोमा और डिग्री दोनों के रूप में कराया जाता है।
दोनों ही कोर्स में एडमिशन लेने के लिए कुछ मुख्य बिंदु नीचे दिए गए हैं। जिनके आधार पर विद्यार्थी OT Technician Course में प्रवेश ले सकता है।

  • विद्यार्थी का किसी भी मान्यता प्राप्त बोर्ड से बारहवीं कक्षा का उत्तीर्ण होना जरूरी होता है।
  • 11वीं और 12वीं कक्षा में विद्यार्थी के पास विज्ञान के विषयों का होना अनिवार्य है।
  • प्रवेश लेते समय विद्यार्थी की आयु कम से कम 17 वर्ष होनी आवश्यक है।
  • कुछ संस्थान में इस कोर्स में एडमिशन के लिए प्रवेश परीक्षा भी देनी होती है।
  • अन्य संस्थानों में 12वीं कक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर प्रवेश दिया जाता है।

जो विद्यार्थी ऊपर दिए गए सभी पड़ाव को पार कर लेता है उसको इस कोर्स में प्रवेश ले सकता है।

OT Course Details in Hindi की जानकारी को आगे बढ़ाते हुए अब बात कर लेते हैं OT Technician Course Duration के बारे में। यानी ओटी कोर्स करने में कितना समय लगता है इसके बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं।

ओटी टेक्निशियन कोर्स में कितना समय लगता है

Operation theatre technician कोर्स की ग्रेजुएशन डिग्री करने में 3 वर्ष का समय लगता है। जबकि ओटी टेक्निशियन कोर्स का डिप्लोमा करने में 2 वर्ष का समय लगता है।

ओटी टेक्नीशियन डिप्लोमा के बाद कोर्स


जो विद्यार्थी OT Technician Diploma Course करने के बाद हायर एजुकेशन के लिए जाना चाहते हैं। उनके लिए भारत में ग्रेजुएशन डिग्री के रूप में बहुत सारे कोर्स उपलब्ध है। कुछ मुख्य कोर्सों के नाम नीचे दिए गए है।

  • बीएससी इन ऑपरेशन थियेटर टेक्नोलॉजी ( Bsc in Operation Theatre Technology)
  • बीएससी इन मेडिकल लैब टेक्नोलॉजी ( Bsc in Medical Lab Technology)
  • बीएससी इन ऑपरेशन थिएटर एंड एनेस्थेसिया मैनेजमेंट ( Bsc in Anaesthesia Technology)
  • बीएससी इन सर्जरी टेक्नोलॉजी ( Bsc in Surgery Technology)

यह कोर्स उन विद्यार्थियों के लिए थे जो डिप्लोमा के बाद आगे ग्रेजुएशन डिग्री करना चाहते हैं। लेकिन जो विद्यार्थी ऑपरेशन थियेटर टेक्निशियन विशेषज्ञता के साथ बीएससी डिग्री करते हैं। तथा बाद में आगे और पढ़ाई करना चाहते हैं। उन के लिए नीचे जानकारी दी गई है

Friday, November 4, 2022

नेचुरोपैथी में कैरियर

अगर आपका इंजीनियर Career in Naturopathy: अकाउंटेंट न बन कर कुछ हटके कैरियर बनाना private job चाहते हैं तो आज हम career tips आपको बताने जा रहे हैं। एक नए कैरियर लाइन के बारे में। अगर आपका प्राकृतिक चीजों की ओर रूझान है तो आप नेचुरोपैथी में शानदार कैरियर अपना सकते हैं। तो चलिए आज हम आपको बताने जा रहे हैं।

आखिर क्या है नेचुरोपैथी – Naturopathy
यह उपचार की एक ऐसी पद्धति है जिसमें बिना किसी अंग्रेजी दवाई से नहीं बल्कि प्राकृतिक चीजों और औषधियों से गंभीर बीमारी का उपचार किया जाता है। इस नेचुरोपैथी कोर्स में स्नातक करने में साढ़े पांच वर्ष लग जाएंगे। इसकी पढ़ाई में प्राकृतिक औषधियों का अध्ययन कराया जाता है। जिसे सरकार द्वारा भी बढ़ावा दिया जाता है।

नेचुरोपैथी का स्कोप क्या है – what is Naturopathy

  • अगर आपने नेचुरोपैथी का कोर्स पूरा कर लिया है तो समझ जाइए कि आप उन अस्पताल, इंस्टीट्यूट, पर्सनल क्लीनिक, वृद्ध आश्रम, मेडिटेशन और योग सेंटर में काम कर सकते हैं।
  • इन जगहों पर नेचुरोपैथी फिजिशियन बनकर सालाना 8 से 9 लाख रुपये आसानी से कमा सकते हैं।
  • नेचुरोपैथी योगा थेरेपिस्ट ट्रेनर बनके भी 2 से 3 लाख रुपये कमाए जा सकते हैं।
  • पोषण विशेषज्ञ बन 3 से 4 लाख रुपये की कमाई कर सकते हैं।

कोर्स करने के लिए कौन सी योग्यता होनी चाहिए – qualification for Naturopathy course 

  • यदि कोई छात्र नेचुरोपैथी कोर्स में डिप्लोमा करना चाहता है तो उसके लिए, नेचुरोपैथी कोर्स में डिप्लोमा, सर्टिफिकेट, स्नातक, पोस्ट ग्रेजुएट और मास्टर्स कर सकते हैं।
  • नेचुरोपैथी में स्नातक कोर्स का नाम बैचलर ऑफ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस बीएनवाईएस है।
  • बीएनवाईएस कोर्स को पूरा करने में 5ः5 साल लगेंगे।
  • जिसमें छह महीने का इंटर्नशिप शामिल है।
  • बीएनवाईएस कोर्स को करने के लिए किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से पीसीबी विषय में कक्षा 12वीं को 50 फीसदी नंबर से पास करना होगा।
  • इस कोर्स को करने में 3 से 4 लाख रुपये खर्च आएंगे।

इन संस्थानों से करें नेचुरोपैथी की पढ़ाई –  institute of Naturopathy

1: इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेजए बनारस हिंदू यूनिवर्सिटीए उत्तर प्रदेश
2: डॉ एनटीआर स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय,आंध्र प्रदेश
3: स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थानए कर्नाटक
4: पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति स्वास्थ्य विज्ञान और छत्तीसगढ़ के आयुष विश्वविद्यालय
5: डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय जोधपुर, राजस्थान

Monday, October 31, 2022

M.Sc.बायोटेक्नोलॉजी

M.Sc.बायोटेक्नोलॉजी एक postgraduate कोर्स है। जो छात्र विज्ञान और रिसर्च जैसे क्षेत्रों में काम करना चाहते है उनके लिए यह एक अच्छा विकल्प है। इसकी फुल फॉर्म Master of Science in Biotechnology है। यह एक 2 वर्षीय पाठ्यक्रम है जो कि 4 सेमेस्टरों के रूप में आयोजित किया जाता है।

● अनिवार्यता (Eligibility) – M.Sc.बायोटेक्नोलॉजी कोर्स में प्रवेश के लिए छात्र का किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से 12वी में 50 से 60% अंक के साथ उत्तीर्ण होना अनिवार्य है इसके साथ ही छात्र 12वी में विज्ञान संकाय से होना चाहिये और उसके पास physics, chemistry, biology या mathematics विषय होने चाहिए।

आप किसी मान्यता प्राप्त महाविद्यालय से 50% अंको के साथ विज्ञान संबंधित विषय से ग्रेजुएट होने चाहिए।

BAMS, B.pharm, BHMS से ग्रेजुएट छात्र भी इसमें प्रवेश के लिए elligible होते हैं। M.Sc. biotechnology में एडमिशन मेरिट और इंट्रैन्स एग्जाम के आधार पर होता है।

● फीस (Fees) – सरकारी और प्राइवेट कॉलेज के अनुसार आपके कोर्स की फीस निर्धारित होती है। तो आपके पूरे कोर्स की फीस लगभग 40 हजार से 2 लाख तक हो सकती है।

● कैरियर (Job & Career) – अगर आप आगे पढ़ाई करना चाहते है इस क्षेत्र में तो P.hd in biotechnolgy भी कर सकते हैं।

यदि आप जॉब में कैरियर बनाना चाहते हैं तो आप प्राइवेट और सरकारी दोनो सेक्टर में काम कर सकते हैं। M.Sc. biotechnology डिग्री प्राप्त करने के बाद आप biochemist, lab technician, research scientist, biotech analyst आदि की जॉब कर सकते हैं।

इनके अलावा आप मेडिकल, फ़ूड सेक्टर , केमिकल सेक्टर ,रिसर्च सेंटर, लैबोरेटरी, एजुकेशनल इंस्टिट्यूट, इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी, एग्रीकल्चर विभाग, एनिमल हसबैंडरी, पर्यावरण विभाग आदि में जॉब कर सकते हैं।

● सैलरी (Income) – M.Sc बायोटेक्नोलॉजी के बाद जॉब में सैलरी प्रत्येक पोस्ट के आधार पर अलग अलग होती है यह सैलरी 3 लाख से 9 लाख या उससे ज्यादा प्रतिवर्ष भी होती है।

Tuesday, October 25, 2022

वॉटर मैनेजमेंट में बनाएं करियर

विश्व का बहुत बड़ा भाग जल संकट से जूझ रहा है। ऐसे में यह तक कहा जा रहा है कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिए लड़ा जा सकता है। जल संचयन मौजूदा समय की सबसे बड़ी मांग है। जल संरक्षण व प्रबंधन पर अब सरकारें और औद्योगिक प्रतिष्ठान भी ज्यादा जोर दे रहे हैं। इन समस्याओं से निपटने के लिए वॉटर मैनेजमेंट के प्रोफेशनल्स की जरूरत बढ़ रही है। ये ऐसे प्रशिक्षित लोग होते हैं, जिन्हें वॉटर हार्वेस्टिंग, वेस्ट वॉटर ट्रीटमेंट तथा वॉटर रिसाइक्लिंग की अच्छी समझ होती है। उधर, भूजल के स्तर को सुधारने के लिए आधुनिक तकनीकों की भी मांग बढ़ रही है।

केंद्रीय जल संसाधन विभाग की ओर से जारी राष्ट्रीय जल नीति में भी पानी के कुप्रबंधन पर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट में ज्यादा से ज्यादा वैज्ञानिक प्लानिंग पर जोर देने की बात कही गई है। जाहिर-सी बात है कि दिनो-दिन बढ़ते जल संकट को दूर करने के लिए वॉटर साइंटिस्ट, एन्वायर्नमेंट इंजीनियर, ट्रेंड वॉटर कंजर्वेशनिस्ट या कहें विभिन्न प्रकार के वॉटर मैनेजमेंट प्रोफेशनल्स की मांग बनी रहेगी।

जॉब के अवसर

ग्रीन जॉब्स मार्केट में आकर्षक जॉब्स के अवसर बहुत हैं। वॉटर मैनेजमेंट में ट्रेंड प्रोफेशनल्स की जल प्रबंधन से जुड़े सरकारी विभागों में तथा वॉटर प्रोजेक्ट्स में खूब मांग है। निजी क्षेत्र में भी पेयजल आपूर्ति तथा वेस्ट वॉटर ट्रीटमेंट से संबंध‍ित कार्यों के लिए प्रशिक्षित लोगों को ही हायरिंग में तवज्जो दी जा रही है। बड़े-बड़े उद्योग, रियल एस्टेट सेक्टर और एनजीओ भी वॉटर हार्वेस्टिंग डिजाइनिंग तथा जल संचयन के लिए वॉटर मैनेजमेंट की पृष्ठभूमि वाले प्रोफेशनल्स की सेवाएं ले रहे हैं। आप चाहें, तो कंसल्टेंट बनकर भी करियर बना सकते हैं क्योंकि ऐसे लोगों की वॉटर ट्रीटमेंट सिस्टम्स के संचालन और देखरेख के लिए मांग लगातार बढ़ रही है।

कोर्स व क्वॉलिफिकेशन

जल प्रबंधन और संरक्षण पर आधारित कई तरह के कोर्स देश के विभिन्न सरकारी और निजी संस्थानों में संचालित हो रहे हैं। युवा वॉटर साइंस, वॉटर कंजर्वेशन, वॉटर मैनेजमेंट, वॉटर हार्वेस्टिंग, वॉटर ट्रीटमेंट तथा वॉटर रिसोर्स मैनेजमेंट जैसी किसी भी स्ट्रीम में कोर्स करके अपना करियर बना सकते हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) में वॉटर हार्वेस्टिंग एंड मैनेजमेंट नाम से ऐसा ही एक सर्टिफिकेट कोर्स संचालित हो रहा है। 10वीं पास युवा यह कोर्स कर सकते हैं। अगर आप बायोलॉजी विषय में 12वीं पास हैं, तो एक्वा साइंस या वॉटर साइंस में बीएससी और एमएससी भी कर सकते हैं। एग्रीकल्चर/ सिविल इंजीनियरिंग, केमिकल इंजीनियरिंग, जियोलॉजी, एन्वायर्नमेंटल स्टडीज या बायोलॉजी में बैचलर्स की पढ़ाई करके वॉटर साइंटिस्ट, एन्वायर्नमेंट इंजीनियर, बायोलॉजिस्ट, हाइड्रो जियोलॉजिस्ट या जियोलॉजिस्ट बन सकते हैं।

सैलरी कितनी?

वॉटर मैनेजमेंट में डिप्लोमाधारी युवा शुरूआत में आसानी से 15 से 25 हजार रुपए प्रति माह सैलरी पा सकते हैं। वहीं, वॉटर साइंटिस्ट या इंजीनियर को भी 30 से 40 हजार रुपए प्रति माह की सैलरी मिल जाती है। 

ग्रुप डिस्‍कशन में इन बातों पर अमल करेंगे तो फायदे में रहेंगे

क्या है वॉटर मैनेजमेंट? 

देश-दुनिया में वॉटर कंजर्वेशन एंड मैनेजमेंट की कोशिश कई स्तरों पर चल रही है ताकि दिनो-दिन गहराते जल संकट से पार पाया जा सके। इसके लिए नदियों और भूजल में बढ़ रहे प्रदूषण को कम करने से लेकर भूजल स्तर सुधारने, परंपरागत जल स्रोतों को सुरक्षित रखने तथा आधुनिक तकनीकों के सहारे वॉटर हार्वेस्टिंग की विध‍ियां विकसित करने व वेस्ट वॉटर ट्रीटमेंट जैसे अनेक उपायों पर जोर दिया जा रहा है। कम पानी से कृषि की उत्पादकता बनाए रखने का प्रयास भी इसी मुहिम का हिस्सा है। 

प्रमुख संस्थान

  • इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, दिल्ली
  • अन्ना यूनिवर्सिटी, तमिलनाडु
  • गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज, रायपुर
  • राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की
  • दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी, दिल्ली


Sunday, October 16, 2022

आर्किटेक्चर इंजीनियरिंग में करियर

यदि आप आर्किटेक्चर और सिविल इंजीनियरिंग के बीच चुनाव को लेकर बहुत दुवि‍धा में हैं तो हम आपकी मदद कर सकते हैं।

रियल एस्टेट सेक्टर, खास तौर पर कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री इन दोनों प्रोफेशन पर पूरी तरह से आश्रित रहती है: एक आर्किटेक्ट्स और दूसरे सिविल इंजीनियर्स। कंसट्रक्शन बिजनेस का जहां तक संबंध है, आर्किटेक्ट्स और सिविल

इंजीनियर्स इनके अभिन्ना हिस्से हैं। क्योंकि ये दोनों ही खूबसूरत और सुविधाजनक निर्माण कार्य करने में मदद कर सकते हैं। प्रकृति में एक ही जैसे इन दोनों प्रोफेशंस के लिए इसी इंडस्ट्री में काम के अवसर हैं। और शायद इसीलिए विद्यार्थी दोनों में से क्या चुनें इसे लेकर पसोपेश में पड़ जाते हैं।

ऐसे सीख सकते हैं 'आर्ट ऑफ लि‍सनिंग'

एक बात और भी है कि दोनों के बीच बहुत सारी समानताएं भी हैं। लेकिन इसके साथ ही दोनों के बीच बहुत सूक्ष्म लेकिन बहुत महत्वपूर्ण अंतर भी है। इन्हीं समानताओं और असमानताओं के प्रकाश में दोनों में से किसका चयन किया जाना चाहिए और क्यों इसका जवाब हम ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं।

स्टूडेंट्स की मदद करने के लिए और उनकी रुचि के अनुसार निर्णय करने के लिए हमने विषय का क्षेत्र, परिभाषा, काम करने की प्रकृति, संभावित आय, अच्छे कॉलेज और कुछ दूसरी चीजों की सूचनाएं हमने जमा की हैं।

विषय की परिभाषा 

एक तरफ सिविल इंजीनियरिंग और आर्किटेक्चर दोनों ही अपने कोर्स और कंटेट में एक जैसी ही लगते हैं, तब बात इनकी परिभाषाओं की होती है। दोनों के बीच बहुत सारे फर्क हैं।

आर्किटेक्चर: आर्किटेक्चर शब्द की उत्पत्ति 'आर्किटेक्टोन" से हुई है। जिसका मतलब है 'चीफ-बिल्डर" या 'मुख्य भवन निर्माता"। जब इस शब्द की उत्पत्ति हुई होगी तब हो सकता है कि आर्किटेक्ट्स ही बिल्डर हुआ करते होंगे। लेकिन जब बात असली परिभाषा की होती है तो आर्किटेक्चर बिल्डिंग बनाने से ज्यादा कलात्मकता की मांग करता है। यह एक सृजनात्मक क्षेत्र हैं और यह किसी बिल्डिंग को बनाने की कला और विज्ञान दोनों से संबंद्ध होता है।

सिविल इंजीनियरिंग: सिविल इंजीनियरिंग एक बहुत वृहद् शब्द है। इसमें भवन के डिजाइन, कंस्ट्रक्शन और

उसके प्राकृतिक और भौतिक पर्यावरण के रखरखाव का काम शामिल है। इसमें सड़कें, पुल, नहरें, बांध और भवन हर चीज शामिल हैं। दूसरे शब्दों में सिविल इंजीनियरिंग भवन निर्माण के दूसरे संरचनात्मक तत्वों पर फोकस करता है। तय करता है कि कौन-सा मटेरियल का इस्तेमाल किया जाना है, संरचना लंबे समय तक कैसे टिकी रह सकती है और उसके लिए क्या-क्या प्रयास करने होंगे?

बहुत साधारण शब्दों में आर्किटेक्ट्स दी हुई जगह का सबसे अच्छा इस्तेमाल करते हुए अपनी कल्पनाशीलता और गणितीय कौशल से ज्यादा सुविधाजनक बनाता है। इसके उलट एक सिविल इंजीनियर असल में आर्किटेक्ट द्वारा दी गई डिजाइन को असेस करता है कि वह समय पर और उस जगह में उसी तरह का निर्माण करते हुए उतना मजबूत हो पाएगा? इस दृष्टि से एक पक्ष कलात्मक है और दूसरा व्यवहारिक।

क्या है दोनों विषयों के क्षेत्र का विस्तार?

विषय का क्षेत्र संभवत: सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण अंतर है आर्किटेक्चर और सिविल इंजीनियरिंग के बीच का।

आर्किटेक्चर बिल्डिंग की डिजाइन और संरचना में उसकी व्यवहारिकता और सौंदर्य से संबंध रखता है। आर्किटेक्चर मूलभूत संरचना के तत्वों के साथ बिल्डिंग के सुंदर और व्यावहारिक होने पर जोर देता है।

दूसरी तरफ सिविल इंजीनियर्स उसकी आर्किटेक्चरल डिजाइन के प्लान को लागू करता है और देखता है कि उन्हें किस तरह से एक्जिक्यूट किया जा सकता है। सिविल इंजीनियर उसके संरचनात्मक ढांचे की डिजाइन

पर फोकस करता है और एक्स्ट्रीम कंडीशन्स में उसके रखरखाव और उसकी मजबूती को निश्चित करता है।

कोर्स और एलिजिबिलिटी 

आमतौर पर बी. आर्क का पांच साल का स्नातक कोर्स पूरे देश के आर्किटेक्चर स्कूल में करवाया जाता है। काउंसिल ऑफ आर्किक्टेक्चर द्वारा आयोजित कॉमन इंट्रेंस टेस्ट के माध्यम से एडमिशन होता है। कंपलसरी सब्जेक्ट की जहां तक बात है, वे सब बिल्कुल इंजीनियरिंग की तरह ही होते हैं। बी. आर्क के स्टूडेंट को फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्य जैसे विषयों के साथ 12 वीं बोर्ड की परीक्षा पास करनी होती है। स्नातक कोर्स को पूरा करने के बाद बी. आर्क. के स्टूडेंट्स आर्किटेक्चर में दो साल का स्नातकोत्तर का कोर्स भी कर सकते हैं। सिविल इंजीनियरिंग करने वालों के लिए आमतौर पर दो रास्ते हैं। पहला डिग्री कोर्स कर लें, या फिर कम अवध‍ि का डिप्लोमा कोर्स कर लें। सिविल इंजीनियर बनना चाहने वालों के बीच सिविल इंजीनियरिंग ब्रांच से बी. टेक. करना बहुत लोकप्रिय है।

यह कोर्स पूरे देश के इंजीनियरिंग कॉलेजों में उपलब्‍ध होता है। इन कॉलेजों में एडमिशन जीईई मेन्स, एनआईटी,

आईआईआईटी और जीएफटीआई या फिर आईआईटी और आईएसएम-धनबाद में एडमिशन जेईई एडवांस

के परीक्षा में मेरिट के आधार पर होता है। जो सिविल इंजीनियरिंग करना चाहते हैं उनका 12 वीं बोर्ड में

फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्य लेकर पास होना आवश्यक है। 

रोजगार के अवसर व पैकेज

सिविल इंजीनियरिंग और आर्किटेक्चर जैसे विषय को चुनने की एक सबसे बड़ी वजह ही यह है कि इसमें रोजगार के अवसर भी ज्यादा है और पैकेज भी अच्छा मिलता है। फिर भी दोनों कोर्स के बीच कौन-सा कोर्स चुना जाए इसे लेकर कंफ्यूजन भी कम नहीं है। 

आर्किटेक्चर: आर्किटेक्ट अलग-अलग कंस्ट्रक्शन कंपनियों में डिजाइनर के तौर पर काम करता है। उसकी पहली जिम्मेदारी अपने क्लाइंट की जरूरत को समझना और उस हिसाब से व्यावहारिक, सुविधाजनक और सुंदर डिजाइन तैयार करना है। प्राइवेट बिल्डर्स के साथ-साथ सरकारी एजेंसी भी पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट्स, नेशनल बिल्डिंग ऑर्गेनाइजेशन, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग ऑर्गेनाइजेशन, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स और अन्य में भी आर्किटेक्ट्स की जरूरत हुआ करती है। जहां तक वेतन की बात है तो यह 25 से 30 हजार महीने से शुरू होता है और यह आपके कौशल और अनुभव के आध्ाार पर एक आर्किटेक्ट 1 लाख रुपए महीना तक अर्न कर सकता है। 

सिविल इंजीनियरिंग: सिविल इंजीनियरिंग में आर्किटेक्ट्स से ज्यादा स्कोप है। सिविल इंजीनियर्स के पास सरकारी के साथ-साथ प्राइवेट संस्था के लिए भी बेहतरीन काम करने के अवसर होते हैं। रोजगार के अवसरों की जहां तक बात है, प्राइवेट संस्था में तो अवसर हैं ही, सरकारी संस्थाओं में भी जरूरत होती है। सरकारी संस्थाओं के साथ-साथ सिविल इंजीनियर्स की जरूरत तो इंडियन आर्मी में भी होती है। इसके अलावा वे अपनी खुद की इंजीनियरिंग कंसल्टेंसी फर्म भी स्थापित कर सकते हैं। इसके साथ ही टीचिंग में भी बहुत मांग है। जिनके पास स्वयं लिखने का कौशल है वे अपने ही क्षेत्र में तकनीकी लेखन कर सकते हैं। आपका कौशल और आपकी योग्यता के आधार पर एक सिविल इंजीनियर की अर्निंग 4 से 8 लाख रुपए तक हो सकती है। आर्किटेक्ट्स की तरह की सिविल इंजीनियर्स को भी अनुभव और कौशल के आधार पर बेहतर अर्निंग हो सकती है।

Sunday, October 9, 2022

बायोटेक्नोलॉजी क्या है

दोस्तों अक्सर आपने देखा होगा की मौसम के अनुसार मिलने वाले सब्जियां व फल आज के समय में सालो-साल मिल रहे है। जैसे बिना गर्मी के मौसम के आपको बाजार में अनन्नास, आम, संतरा देखने को मिलेंगे, बिना सर्दी के मौसम के केले, कीवी, अंगूर देखने को मिलेंगे और ऐसी बहुत सी सब्जियां व फल है, जो पहले मौसम के अनुसार मिलते थे व इनका उत्पादन भी मौसम के अनुसार ही किया जाता था। 

लेकिन आज के समय में ये सब चीजे सालो साल बाजार में उपलब्द है। ये सब साइंस और टेक्नोलॉजी की ही देन है। जिसने हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को बहुत आसान बना दिया है। बायोटेक्नोलॉजी इन्ही का एक छोटा सा हिस्सा है, जिसने कृषि क्षेत्र में ही नही बल्कि मेडिकल साइंस के क्षेत्र भी अपना परचम लहरा रखा है। तो दोस्तों आज हम सब इसी विषय पर विस्तार से बात करने वाले है और जानेगे की बायोटेक्नोलॉजी क्या होता है, इसके उपयोग क्या है

बायोटेक्नोलॉजी क्या है.

बायोटेक्नोलॉजी जिसे बायोटेक भी कहा जाता है, बायो यानि जीव प्रणाली और टेक्नोलॉजी मतलब तकनीक, जिसका मतलब जीव प्रणाली पर तकनीक का इस्तेमाल करना है। बायोटेक्नोलॉजी साइंस की एक ऐसी ब्रांच है जिसमे साइंस और टेक्नोलॉजी दोनों शामिल है। 

इस तकनीक के अंतर्गत जीव प्रणाली व उनके प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल कर नए और बेहतर प्रोडक्ट्स बनाये जाते है, ताकि पौधों व पशु नस्ल को और भी बेहतर बनाया जा सके। बायोटेक्नोलॉजी की मदत से फसलों की नयी किस्मे तैयार की जाती है, जिनसे अच्छी खेती व बेटर फ़ूड उपलब्ध कराया जा सके। मानव जाति बायोटेक्नोलॉजी का उपयोग कृषि, दवा और खाद्य उत्पादन के हजारो साल से करता आ रहा है

बायोटेक्नोलॉजी का इतिहास.

बायोटेक्नोलॉजी टर्म देने का क्रेडिट हंगरी के एग्रीकल्चर इंजिनियर Karl Ereky को जाता है, जिन्होंने वर्ष 1919 बायोटेक्नोलॉजी नाम दिया था। वर्ष 1973 में Herber Boyer व  Stanley Coher पुनः संयोजक DNA टेक्नोलॉजी की खोज की, उसके बाद ही ही बायोटेक उद्योग का विकास प्रारंभ हुआ

वर्ष 1980 में कैंसर व हेपेटाइटिस बी जैसी बिमारिओ का इलाज करने के लिए पहली बार बायोटेक मेडिसिन व टीकों का विकाश हुआ था और तब से अब बायोटेक इंडस्ट्री लगातार वृद्धि करता आ रहा है। भारत में बायोटेक्नोलॉजी को शुरू करने का क्रेडिट Kiran Majumdar Shaw को जाता है। ये वर्ल्ड की फेमस बायोटेक कंपनी Biocn ltd की संस्थापक है। इन्होने भारत में बायोटेक इंडस्ट्री में परिवर्तन लाया है

बायोटेक्नोलॉजी के प्रकार.

बायोटेक्नोलॉजी को निम्नलिखित प्रकारों में विभाजित किया गया है-

  • चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी
  • कृषि जैव प्रौद्योगिकी

चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी (Medical biotechnology):-

चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी में मानव स्वास्थ्य में सुधार के लिए प्रौद्योगिकियों को विकसित करने के लिए लिविंग सेल्स का उपयोग शामिल है। चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग इलाज खोजने के साथ साथ बीमारियों को रोकने और उससे छुटकारा पाने के लिए किया जाता है। इसमें मानव स्वास्थ्य को बनाए रखने के अधिक कुशल तरीके खोजने के लिए इन उपकरणों का उपयोग शामिल है

चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी की मदद से टीके और एंटीबायोटिक्स विकसित किए गए हैं जो मानव स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं। कई पौधों को जैव प्रौद्योगिकी की मदद से एंटीबॉडी का उत्पादन करने के लिए आनुवंशिक रूप से निरीक्षण किया जाता है। यह जेनेटिक डिसऑर्डर के कारणों की पहचान करने और उन्हें ठीक करने के तरीकों की पहचान करने के लिए डीएनए के अध्ययन में भी मदद करता है।

कृषि जैव प्रौद्योगिकी (Agricultural Biotechnology):-

यह क्षेत्र पौधे में रुचि के जीन को पेश करके आनुवंशिक रूप से संशोधित पौधों के विकास से संबंधित है। यह बदले में, फसल की उपज बढ़ाने में मदद करता है। विभिन्न pest-resistant फसलें जैसे बीटी-कॉटन और बीटी-ब्रिंजल, बैसिलस थुरिंजिनेसिस के जीन को पौधों में स्थानांतरित करके बनाए जाते हैं। कृषि जैव प्रौद्योगिकी  फसल की पैदावार को बढ़ाने या उन पौधों की विशेषताओं को पेश करने के लिए Genetically modified पौधों की विकास को केन्द्रित करते है

बायोटेक्नोलॉजी का वर्गीकरण.

जैव प्रौद्योगिक का वर्गीकरण निम्नलिखित तरीको से किया गया है जिसके बारे में आप सभी को विस्तार से बताया गया है

  • ग्रीन बायोटेक्नोलॉजी
  • ब्लू बायोटेक्नोलॉजी
  • रेड बायोटेक्नोलॉजी
  • वाइट बायोटेक्नोलॉजी 

ग्रीन बायोटेक्नोलॉजी:-

यह जैविक प्रौद्योगिक की एक शाखा है, जोकि खेती आदि सम्बंधित विकल्पों पर लागू होती है। ग्रीन जैव प्रौद्योगिकी को पोषण गुणवत्ता और उत्पादन तकनिकी में सुधार के लिए, पौधों के लिए जैविक तकनीकों के अनुप्रयोग के रूप में परिभाषित किया गया है। यह आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण प्रजातियों को लगाने के लिए विदेशी जीनों को प्रत्यारोपित करके किया जाता है। 

इसमें तीन मुख्य क्षेत्र शामिल हैं: पादप ऊतक संवर्धन (Plant tissue genetic); प्लांट जेनेटिक इंजीनियरिंग और प्लांट मॉलिक्यूलर ब्रीडिंग। इस बायोटेक्नोलॉजी का उपयोग 1३ मिलियन से भी ज्यादा किसानो द्वारा किटकों से लड़ने व फसलों के पैदावार को बढ़ाने के लिए करते है

ब्लू बायोटेक्नोलॉजी:-

ब्लू जैव प्रौद्योगिकी का समुद्री और जलीय अनुप्रयोगोका वर्णन करने के लिए किया जाता है ब्लू बायोटेक्नोलॉजी समुद्री और मीठे पानी के जीवों के लिए मॉलिक्यूलर बायोलॉजिकल विधियों के application से संबंधित है।

इसमें कई उद्देश्यों के लिए इन जीवों और उनके डेरिवेटिव का उपयोग शामिल है, सबसे उल्लेखनीय समुद्री मूल से नए सक्रिय अवयवों की पहचान प्रक्रिया और विकास है। इसी को ब्लू टेक्नोलॉजी कहते है 

रेड बायोटेक्नोलॉजी:-

रेड बायोटेक्नोलॉजी चिकित्सा सबंधित विकल्पों पर लागु होता है रेड बायोटेक्नोलॉजी का संबंध इनोवेटिव दवाओं और उपचारों की खोज और विकास से है। इसमें जीन थेरेपी, स्टेम सेल, जेनेटिक टेस्टिंग आदि शामिल हैं।

वाइट बायोटेक्नोलॉजी:-

वाइट बायोटेक्नोलॉजी को औद्योगिक उपयोग से संभंध रखता है। वाइट बायोटेक का इस्तेमाल मोल्ड्स, यीस्ट, बक्टएरिया या एंजाइम ग्गोड्स एंड प्रोडक्ट्स के प्रोडक्शन में किया जाता है यह डिटर्जेंट, विटामिन, एंटीबायोटिक्स आदि जैसे जैव-उत्पादों की एक वाइड रेंज  प्रदान करता है। अधिकांश सफेद बायोटेक प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप पारंपरिक तरीकों की तुलना में पानी, ऊर्जा, रसायन और कचरे की बचत होती है।

बायोटेक्नोलॉजी का उपयोग.

बायोटेक्नोलॉजी का उपयोग मुख्य रूप से चिकित्सा और खेती के लिए किया जाता है जिसके बारे में आपको बताया जा रहा है-

चिकित्सा के क्षेत्र में बायोटेक्नोलॉजी का उपयोग.

मेडिकल फील्ड में बायोटेक्नोलॉजी ने एक अहम् भूमिका निभाई है। इसने मेडिकल इंडस्ट्री में रेवोलुतिओंय चेंज लाया है। मेडिकल में बायोटेक्नोलॉजी छोटे मॉलिक्यूलर ड्रग्स के साथ दवाओं के निर्माणऔर खोज में महवपूर्णयोगदान निभाया है। 

बायोटेक्नोलॉजी की मदत से दवाओं का cost भी काफी कम हो गया है और ये आसानी से मिल भी जाते है। इस तकनिकी ने मानव जीवन में काफी सुधर किया है। इसी की वजह से आज के समय में छोटी से छोटी व बड़ी से बड़ी बीमारी का चिकित्सा उपलब्ध है

खेती के क्षेत्र में बायोटेक्नोलॉजी का उपयोग.

देखा जाए तो मेडिकल फील्ड के बाद सबसे ज्यादा जहा बायोटेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता है वो एग्रीकल्चर फील्ड ही है। इस फील्ड में लगातार संसोधन होते आ रहे है, और संसोधन करने का प्रमुख कारण यह भी है, की इससे बेहतर व स्वस्थ फसल उगाई जा सके। 

Genetic मॉडिफाइड क्रॉप का भी प्रचलन बहुत चला है, जिसमे जेनेटिकइंजिनियर की मदत से क्रॉप के DNA में परिवर्तन किये जाते है। हलाकि इसका विरोध भी काफी हुआ था क्यूंकि लोगो का मानना है genetic मॉडिफाइड क्रॉप से उगने वाले फसल स्वास्थ्यके लिए हानिकारक है

लेकिन दोस्तों आपको बता दू की भारत में एग्रीकल्चर फील्ड में काफी स्कोप है, अगर उसे तरीके से किया जाए तो। जैसे एक उदहारण के रूप में आप Hydroponic फार्मिंग भी कर सकते है। इस तकनीक के तहत फासले पानी पर उगाई जाती है। और इसको लेकर बहुत सारी फर्म कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग भी करती है सर्कार भी एग्रीकल्चर फील्ड को बढ़ावा देने के लिए काफी सहयोग स्वरुप सब्सिडी दे रही है।