Sunday, August 9, 2015

खनन इंजीनियरिंग में है सुनहरा भविष्य

गौरतलब है कि हमारे देश में खनिज संपदा का प्रचुर भंडार है। बिहार, झारखंड, उड़ीसा, मध्य प्रदेश व पश्चिम बंगाल आदि राज्यों से भारी मात्रा में खनिज पदार्थ प्राप्त होते हैं। देश की अर्थव्यवस्था में खनिज संपदा का महत्वपूर्ण स्थान है। अतः देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने केलिए शिक्षित- प्रशिक्षित खनन इंजीनियरों की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। 

खनन इंजीनियरिंग के तहत खनिज, पेट्रोलियम तथा अन्य भूगर्भीय पदार्थ शामिल होते हैं। देश में खनन कार्यों में आई भारी तेजी के कारण यह क्षेत्र इंजीनियरिंग की एक प्रमुख शाखा बन चुका है। खनन इंजीनियरिंग के अंतर्गत धरती के भीतर खनिज पदार्थों की मौजूदगी का पता लगाना तथा सुरक्षित तरीके से उनकी खुदाई कर धरती से बाहर निकालना शामिल है।

खनन इंजीनियरिंग के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए विशेष प्रशिक्षण एवं कौशल की जरूरत होती है। जिन युवाओं की खनन इंजीनियरिंग के क्षेत्र में गहन रुचि हो केवल उन्हें ही इस क्षेत्र में कदम आगे बढ़ाना चाहिए क्योंकि इस क्षेत्र में काफी चुनौतियां हैं। खनन इंजीनियरिंग के कार्यक्षेत्र में प्रमुख रूप से उत्खनन, कच्चे खनिज पदार्थों का शुद्धिकरण आदि आते हैं। 

खनन इंजीनियर न केवल खनिजों से धातु और मिश्रधातु का उत्पादन करते हैं, बल्कि इस प्रक्रिया के दौरान वातावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को भी कम करने का प्रयास करते हैं। सामान्य रूप से खनन प्रक्रिया एक सुनियोजित भू-प्रायोगिक सर्वे के बाद ही प्रारंभ की जाती है। जिससे यह पता चल जाता है कि पृथ्वी के अंदर कितनी मात्रा में खनिज पदार्थ मौजूद हैं। एक तरीका यह भी है कि सर्वे के अंतर्गत चिहिंत क्षेत्र के किसी भी भू-भाग से पत्थरों को निकालकर उनका त्रिस्तरीय अध्ययन कर प्रतिशत का आकलन किया जाता है। 

खनन इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने के लिए उम्मीदवार को बारहवीं की परीक्षा भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र एवं गणित विषय से उत्तीर्ण होना आवश्यक है। प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात ही बीटेक, बीई (माइनिंग), बीएससी (माइनिंग इंजीनियरिंग) में प्रवेश दिया जाता है। खनन इंजीनियरिंग के विभिन्न स्नातक पाठ्यक्रमों की अवधि तीन से पांच वर्ष निर्धारित है। इसके बाद छात्र स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम अर्थात एमटेक या एमई जो दो वर्ष का होता है, में प्रवेश के लिए अधिकृत हो जाते हैं।

खनन इंजीनियरिंग का पाठ्यक्रम संचालित करने वाले संस्थानों में प्रवेश परीक्षा के आधार पर ही प्रवेश दिया जाता है। इसके लिए विभिन्न संस्थान अखिल भारतीय स्तर पर लिखित परीक्षा का आयोजन करते हैं। लिखित परीक्षा मुख्यतः बारहवीं स्तर के फिजिक्स, कैमिस्ट्री, मैथ्स व इंग्लिश आदि विषयों पर आधारित होती है। भारत में डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त इंडियन स्कूल ऑफ माइंस, धनबाद में कई तरह के कोर्स जैसे माइनिंग इंजीनियरिंग, पेट्रोलियम इंजीनियरिंग, मिनरल इंजीनियरिंग और मशीनरी माइनिंग आदि पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं। इस संस्थान में प्रवेश के लिए प्रत्येक वर्ष जनवरी-फरवरी में आवेदन पत्र आमंत्रित किए जाते हैं।

रोजगार की दृष्टि से खनन इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अनुभवी व्यक्तियों की सदैव मांग बनी रहती है। सरकारी अथवा प्राइवेट दोनों ही सेक्टरों में रोजगार के पर्याप्त और उजले अवसर विद्यमान हैं। इस क्षेत्र में शिक्षण अथवा शोध की दिशा में भी कदम बढ़ाया जा सकता है। देश की अनेक प्रतिष्ठित कंपनियों जैसे टाटा आयरन एंड स्टील, रिलायंस पेट्रोलियम, इंडियन ऑयल, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया, यूरेनियम कॉपोरेशन ऑफ इंडिया, सरकारी खनन निगम आदि में रोजगार के चमकीले अवसर उपलब्ध हैं। 

प्रमुख सार्वजनिक उपक्रमों जैसे हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड, नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन, इंडियन ब्यूरो ऑफ माइंस लिमिटेड में खनन इंजीनियरों की भारी मांग है। इसके अलावा माइनिंग रिसर्च सेंटर, धनबाद, इंडियन एक्सप्लोसिव लिमिटेड, इंडियन डेटोनेटर्स लिमिटेड आदि में भी रोजगार के प्रचुर अवसर हैं।

यहां से करें कोर्स 

1.  इंडियन स्कूल ऑफ माइंस, धनबाद, झारखंड।

2.  इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।

3.  बिहार इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, सिंदरी, बिहार।

4.  कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी एंड इंजीनियरिंग, उदयपुर, राजस्थान।

5.  विवसवर्या रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज, नागपुर, महाराष्ट्र।

6.  गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज, रायपुर, छत्तीसगढ़।

Friday, August 7, 2015

भू-सूचनाविज्ञान-सरकारी एवं निजी क्षेत्रों में व्यापक अवसर

भू-सूचनाविज्ञान एक ऐसी सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी है जिसमें भू-विज्ञान तथा सूचनाविज्ञान के महत्वपूर्ण घटक होते हैं। यह ऐसे व्यवसाय का उभरता हुआ क्षेत्र है जिसमें चुनौतियां हैं और उद्योगों में शानदार अवसर है तथा जिसका जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में अनुप्रयोग होता है।

फंडामेंटल्स ऑफ ज्योग्राफिक इन्फॉरमेशन सिस्टम के लेखक श्री पी.एल.एन. राजू के अनुसार, ''भू-सूचनाविज्ञान अंतरिक्ष सूचना, इसके अधिकार, इसके वर्गीकरण, योग्यता, इसके भंडारण, प्रोसेसिंग, चित्रण करने के लिए आवश्यक आधारिक संरचना से जुड़ा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी है।” साधारण शब्दों में, भू-सूचनाविज्ञान ऐसा साधन एवं प्रौद्योगिकी है जो संकलन एवं विश्लेषण के लिए अपेक्षित होती है और इसमें पृथ्वी तथा अंतरिक्ष से इसके संसाधन निहित होते हैं, अंतरिक्ष की सूचना पृथ्वी की सीमाओं, महासागर, प्राकृतिक विशेषताओं, मानव-निर्मित संरचनाओं तथा अन्य तथ्यों की भौगालिक अवस्थिति से संबंधित हो सकती है।

यह सूचना भूगोल भू-विज्ञान तथा समवर्गी इंजीनियरी क्षेत्रों में आने वाली चुनौतियों का सामना करने में सहायक होती है। भू-सूचनाविज्ञान इमेज की रिपोर्ट सेंसिंग, मैपिंग, मॉडलिंग, डाटा विश्लेषण, कप्यूटर प्रोग्रामिंग, भूअंतरिक्ष डाटाबेस का विकास करने तथा सूचना प्रणालियों की रूपरेखा तैयार करता है। भूसूचना विज्ञान का, व्योकप्यूटेशन तथा व्याविजुवलाइजेशन नामक तकनीकों का उपयोग करते हुए मूल्यांकन किया जाता है।

संगणन (कप्यूटेशन) एवं विश्लेषण के परिणाम प्रयोक्ताओं के अनुकूल रूप में सुरक्षित रखे जाते हैं इन्हें नियमित रूप में अद्यतन किया जाता है।

इस अंतरविषयीय विज्ञान का अनेक क्षेत्रों में उपयोग किया जाता है, जिनमें सिविल इंजीनियरी, पर्यावरण इंजीनियरी, खनिज अन्वेषण, कृषि, वानिकी, लोक स्वास्थ्य, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, रक्षा, यहां तक कि वाणिज्यिक व्यवसाय जैसे क्षेत्र भी शािमल हैं। इन-कार नौचालन, प्रणालियों, ऑटोमेटिक वेहिकल अवस्थिति प्रणालियों, उड्डयन, समुद्री परिवहन तथा यातायात नेटवर्क नियोजन इसी प्रौद्योगिकी पर आधारित होते हैं।

गूगल मैप्स उपग्रह नेवीगेशन प्रणालियां तथा जीपीएस सक्ष्म कैस भू-सूचनाविज्ञान के अनुप्रयोग हैं। मौसम विज्ञान, महासागर विज्ञान, अपराधविज्ञान तथा अपराध सिमुलेशन भी इसी प्रौद्योगिकी पर निर्भर होते हैं।

भू-सूचनाविज्ञान में हुए विकास भूगोल, भू-जलवायु परिवर्तन अध्ययन, पर्यावरण मॉडलिंग तथा विश्लेषण, आपदा प्रबंधन एवं तैयारी तथा दूरसंचार क्षेत्रों में हो रही प्रगति पर भी अपना प्रभाव छोड़ते हैं। वास्तुकला एवं पुरातात्विक पुनर्गठन में भी इस प्रौद्योगिकी को लागू किया जाता है।

शिक्षा :


भू-सूचनाविज्ञान सामान्यत: एमएससी या एमटेक पाठ्यक्रम के रूप में स्नातकोार स्तर पर पढ़ाया जाता है। भूगोल, भू-विज्ञान, कृषि, इंजीनियरी, आईटी अथवा कप्यूटर विज्ञान की पृष्ठ भूमि रखने वाले छात्र इन पाठ्यक्रमों में प्रवेश ले सकते हैं। यह पाठ्यक्रम सिद्धांत अयास तथा क्षेत्रगत अध्ययन का मिश्रण है, विज्ञान की सशक्त पृष्ठभूमि इस क्षेत्र में अतिरिक्त रूप से लाभप्रद होती है। स्नातकोत्तर योग्यता प्राप्त करने के बाद छात्र इसमें पीएचडी कर सकते हैं। कई विश्वविद्यालय तथा अनुसंधान संगठन छात्रों को इस विषय में पीएचडी के लिए पंजीकरण कराने की सुविधा देते हैं।

भू-सूचनाविज्ञान विषय अल्पकालीन डिप्लोमा तथा प्रमाणपत्र पाठ्यक्रमों के रूप में भी पढ़ाया जाता है। भू-सूचनाविज्ञान के अध्ययन में प्रोजेशन प्रणालियों, एनोवेशन डायमेंशन तथा प्लाटिंग डाटाबेस प्रबंधन 3डी विजुवलाइजेशन, थिमेटिका मैपिंग, रिमोट सेंसिंग प्लेटफार्स, भौगालिक सूचना प्रणालियों एवं सार्वभौमिक स्थितिक प्रणालियों के लिए प्रयुक्त तकनीक प्रौद्योगिकी एवं मॉडल शामिल होते हैं। वेब मैपिंग, फोटोग्रामेट्री कार्टोग्राफी, ज्योडेसी, आपदा प्रबंधन, सार्वभौमिक नौचालन उपग्रह प्रणालियां, रिमोट सेंसिंग एवं भौगोलिक सूचना प्रणालियां आदि कुछ इसके विशेषज्ञता के विषय हैं। इस विषय का अध्ययन छात्रों को भू अंतरिक्ष विज्ञान तथा प्रोद्योगिकी में नवीनतम ट्रैंड्स की जानकारी देता है।

इस क्षेत्र में एक सफल कॅरिअर के लिए उमीदवार विषय में मूल रुचि रखता हो, वह सीखने का इच्छुक हो, अन्वेषण करने समाधान तलाशने की जिज्ञासा रखता हो, विश्लेषिक कौशल, सकारात्मक सोच, सृजनशीलनता, संचार कौशल अन्य ऐसे गुण हैं जो इस क्षेत्र में लाभप्रद होते हैं।

रोज़गार :


भू-सूचनाविज्ञान में व्यवसायियों के लिए केन्द्रीय एवं राज्य सरकारी संगठनों, अनुसंधान संगठनों, शैक्षिक संस्थाओं तथा निजी व्यवसाय संगठनों में रोज़गार के अवसर उपलब्ध हैं। इन व्यवसायियों को कार्य पर रखने वाले कुछ केन्द्रीय सरकारी संगठन इस प्रकार हैं:- अंतरिक्ष विभाग- राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग एजेंसी (एनआरएसए, हैदराबाद) पूर्वोत्तर अंतरिक्ष अनुप्रयोग केन्द्र, शिलांग, क्षेत्रीय रिमोट सेंसिंग अनुप्रयोग केन्द्र खड़गपुर, देहरादून, जोधपुर, नागपुर एवं बंगलौर, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन बंगलौर, उच्च डाटा प्रोसेसिंग अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद तथा अंतरिक्ष अनुप्रयोग केन्द्र, अहमदाबाद। इसके अतिरित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान तथा भारतीय कृषि अनुसंधान संगठन में भी इन व्यवसायियों के लिए रोज़गार के अवसर हैं। राज्य सरकारी संगठनों में राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र (एनआईसी) तथा अंतरिक्ष अनुप्रयोग केन्द्र शामिल हैं ये संगठन विशेष रूप में भूसूचनाविज्ञान के स्नातकों को क.अन.अध्येता, व.अन.अध्येता एवं वैज्ञानिक/इंजीनियर के पदों पर रखते हैं।

निजी क्षेत्र में अवसरों की बात करें तो राष्ट्रीय सर्वेक्षण एवं मैपिंग, पर्यावरण इंजीनियरी, खनिज अन्वेषण, आपात सेवाओं, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अपराध मैपिंग, परिवहन तथा आधारित संरचना, यात्रा एवं पर्यटन, बाजार सर्वेक्षण तथा ई-कॉमर्स से जुड़े संगठन भू-सूचनाविज्ञान के व्यवसायियों को रोज़गार पर रखते हैं।

बड़े नियोताओं में, गूगल, टीसीएस, रिलायंस इंडस्ट्रीज, रिलायंस कयुनिकेशन्स, रिलायंस एनर्जी, साइबर टेक सिस्टस, ज्योफाइनी सर्विसेस, तथा अन्य संगठन शामिल हैं। सरकारी रोज़गार में दिए जाने वाले कुछ पद इस प्रकार हैं:- वैज्ञानिक, परियोजना समन्वयकर्ता, परियोजना वैज्ञानिक, तकनीकी सहायक, अनुसंधान स्कॉलर, अनुसंधान एसोशिएट एसोशिएट, जीआईएस विशेषज्ञ, तथा जीआईएस पर्यावरण विशेषज्ञ। वाणिज्यिक क्षेत्र में इन्हें परियोजना प्रबंधन, वरिष्ठ प्रणाली, विश्लेषक, जीआईएस इंजीनियर, जीआईएस प्रोग्रामर तथा भू-अंतरिक्ष सॉफ्टवेयर इंजीनियर के पद दिए जा सकते हैं। सामान्यत: इस क्षेत्र में कार्यों में निरंतर अलग-अलग स्थानों पर जाना निहित है।

वेतन:


वेतन मुख्य रूप से कार्य-भूमिका, कार्य की प्रकृति, नियोता, स्थान तथा विषय पर निर्भर होता है। वेतन रु. 2,50,000 से लेकर रु. 500000 प्रति वर्ष तक हो सकता है।

भू-सूचनाविज्ञान अभी भी अपने प्रारंभिक चरण पर है। तथापि, उद्योगों द्वारा अपने कार्यों के प्रबंधन में अंतरिक्ष सूचना का उपयोग करने के साथ ही यह क्षेत्र तीव्र गति से विकासशील है। इस विशेषज्ञता पूर्ण क्षेत्र में कुशल व्यवसायियों का भी अत्यधिक अभाव है। इसलिए भू-सूचनाविज्ञान उपलब्ध अवसरों एवं कार्य की प्रकृति दोनों दृष्टि से आशाजनक है।

कॉलेज एवं पाठ्यक्रम


कॉलेज
पाठ्यक्रम
पात्रता
प्रवेश
वेबसाइट
कॉलेज विश्वविद्यालय चेन्नई
भूसूचना विज्ञान में बीई
10+2
प्रवेश परीक्षा में प्रदर्शन
पेट्रोलियम एवं ऊर्जा अध्ययन विश्वविद्यालय देहरादून
भूसूचना विज्ञान इंजी. में बीटेक
हायर एवं सीनियर सेकेंडरी स्तर पर न्यूनतम 60%अंक एवं सीनियर सेकेंडरी स्तर पर भौतिकी, रसायन विज्ञान एवं गणित में न्यूनतम कुल 60%अंक.
यूपीईएस इंजीनियरी अभिरुचि परीक्षा/या एआईईईई में प्रदर्शन
जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी संस्थान, हैदराबाद
भूसूचना विज्ञान एवं सर्वेक्षण प्रौद्योगिकी में एमटेक
संबंधित विष्य में बीई/बीटेक
प्रवेश परीक्षा एवं गेट में प्रदर्शन प्रदर्शन
गुरू जांभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, हिसार
भूसूचना विज्ञान में एमटेक
पृथ्वी विज्ञान/पर्यावरण विज्ञान/कृषि-मौसम विज्ञान/कृषि विज्ञान/मृदा/भौतिक/भू-भौतिकी/अनुप्रयुक्त भूविज्ञान/गणित/रिमोट सेंसिंग/कंप्यूटर विज्ञान/आईटी/सॉफ्टवेयर/भूविज्ञान/महासागर विज्ञान/शहरी एवं क्षेत्रीय नियोजन/भूगोल में एम.एससी/सिविल/आईटी/इलेक्ट्रॉनिकी एवं संचार/कंप्यूटर/यांत्रिक इंजीनियरी/कृषि इंजीनियरी/वैद्युत इंजीनियरी/इलेक्ट्रॉनिक एवं वैद्युत इंजीनियरी में एमसीए/या बीई/बीटेक तथा अर्हता परीक्षा में न्यूनतम 55%अंक
गेट या प्रवेश-परीक्षा में प्रदर्शन तथा अर्हता परीक्षा में प्राप्त अंक
बिरला प्रौद्योगिकी संस्थान, मेसरा
भूसूचना विज्ञान में एमएससी
(क) कृषि/वायुमंडल विज्ञान/कृषि मौसम विज्ञान वनस्पति विज्ञान/रसायन विज्ञान/कंप्यूटर अनुप्रयोग/कंप्यूटर विज्ञान/मात्स्यिकी/वानिकी/भूगोल/सूचना विज्ञान/गणित/महासागर विज्ञान/मृदाविज्ञान/सांख्यिकी/नगर नियोजन/प्राणिविज्ञान/समवर्गी विषयों में स्नातक तथा न्यूनतम 60%अंक
(ख) बारहवीं कक्षा/इंटरमीडिएट में भौतिकी/गणित सहित न्यूनतम 60%अंक अंकों का परिकलन भौतिकी/गणित सहित श्रेष्ठ 5 विषयों के औसत के रूप में किया जाएगा।

(ग) उम्मीदवार स्टीरियोस्कोपिक विजन एवं सामान्य रंग-दृष्टि रखता हो।

भारतीय रिमोट सेंसिंग संस्थान, देहरादून
भू सूचना विज्ञान में एम.एससी
भौतिकी (कंप्यूटर विज्ञान (या अनुप्रयोग)/गणित/प्रकृति विज्ञान, भूविज्ञान, शहरी एवं क्षेत्रीय नियोजन में एमएससी/बीई/बीटेक (सीविल/इलेक्ट्रॉनिकी/कंप्यूटर) तथा बीएससी (4 वर्षीय प्रथम क्षेणी में)
अर्हता परीक्षा में प्राप्त अंक

Tuesday, August 4, 2015

फॉरेस्टर की दुनिया

पर्यावरण संतुलन के लिए जल और जंगल दोनों का संरक्षण जरूरी है। इनके कंजर्वेशन पर जितना ध्यान देंगे, हमारा जीवन उतना ही सिक्योर होगा। भारत सरकार ने 2015-16 को वॉटर कंजर्वेशन वर्ष के रूप में मनाने का फैसला लिया है। साथ ही, वन संपदा को बढ़ाने के लिए ग्रीन जॉब्स को प्रोत्साहन देने पर भी जोर है। देश के पैशनेट युवा फॉरेस्ट्री, फॉरेस्ट मैनेजमेंट, वॉटर मैनेजमेंट, वॉटर कंजर्वेशन आदि सेक्टर्स में अपना बहुमूल्य योगदान दे रहे हैं। वल्र्ड फॉरेस्ट्री डे (21 मार्च) और वल्र्ड वॉटर डे (22 मार्च) के मौके पर जानें इन दोनों क्षेत्रों में आकर्षक करियर संभावनाओं के बारे में ...
बात ग्लोबल वार्मिंग की हो, मौसम में बदलाव की, जल संकट की या प्राकृतिक विपदाओं की। ये सभी समस्याएं कहीं न कहीं, जंगलों से जुड़ी हैं। यानी अगर जंगलों की सही देखरेख और प्रबंधन हो, तो पर्यावरण संतुलन को बनाए रखना काफी हद तक आसान हो जाता है। पर्यावरण और एडवेंचर के शौकीन बहुत से युवा आज इस बात को समझने लगे हैं। इसीलिए फॉरेस्ट्री में करियर बनाने को लेकर दिलचस्पी और रुझान दोनों बढ़े हैं।
फॉरेस्टर की दुनिया
एक फॉरेस्टर के ऊपर वन संसाधनों की सुरक्षा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। वह जंगल को आग, बीमारी, कीड़ों एवं अवैध कब्जे से बचाता है। जंगलों में किस तरह काम किया जाए, कौन-से वृक्ष लगाना सही रहेगा, फिर उन्हें कैसे मार्केट तक पहुंचाया जाए, यह सब एक फॉरेस्टर की निगरानी में होता है। जो लोग जंगलों में काम करते हैं, उन्हें सुपरवाइज करने की जिम्मेदारी भी इन्हीं की होती है। ये वेस्टलैंड के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा, वन्यजीव या पर्यावरण को आसपास के वातावरण से महफूज रखना, इनका काम होता है। ये ईको-टूरिज्म को प्रोत्साहन देने में भी अहम रोल निभाते हैं।
साइंटिफिक टेम्परामेंट की जरूरत
अगर आप आउटडोर रहना पसंद करते हैं, एडवेंचर में मजा आता है, तो फॉरेस्टर एक बेहतरीन करियर विकल्प हो सकता है। हां, इसके लिए आपको फिजिकली फिट रहना होगा। इसमें धैर्य के साथ साइंटिफिक टेम्परामेंट भी जरूरी है। आपके अंदर ऑर्गनाइजिंग क्षमता के साथ-साथ पब्लिक रिलेशन स्किल होनी चाहिए। अगर फॉरेस्टर में निर्णय लेने की क्षमता नहीं होगी, तो वह वन क्षेत्र की सही तरीके से देख-रेख नहीं कर सकेगा। आपमें रिसर्च को लेकर भी दिलचस्पी होनी चाहिए।
कहां-कहां से कर सकते हैं कोर्स
साइंस स्ट्रीम से 12वीं करने वाले फॉरेस्ट्री में ग्रेजुएशन कर सकते हैं। इसके लिए विभिन्न यूनिवर्सिटीज द्वारा आयोजित किए जाने वाले एंट्रेंस एग्जाम को क्लियर करना होगा। हालांकि कुछ यूनिवर्सिटीज में सीधे मेरिट और सीटों की उपलब्धता के आधार पर दाखिला मिल जाता है। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आइसीएआर) के ऑल इंडिया एंट्रेंस एग्जाम उत्तीर्ण करने वाले फॉरेस्ट्री स्टूडेंट्स के लिए भी यूनिवर्सिटीज में अलग से कोटा होता है। कोर्स करने के बाद आप फॉरेस्ट मैनेजमेंट, कॉमर्शियल फॉरेस्ट्री, फॉरेस्ट इकोनॉमिक्स, फूड साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी, वाइल्ड लाइफ साइंस, एग्रो फॉरेस्ट्री में दो साल का मास्टर्स या इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट, भोपाल से दो साल का पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन फॉरेस्ट्री मैनेजमेंट कर सकते हैं। यहां दाखिले के लिए ग्रेजुएशन में 50 प्रतिशत अंक होना चाहिए।
गवर्नमेंट-प्राइवेट सेक्टर में मौके
एक फॉरेस्टर अपनी स्पेशलाइजेशन के अनुसार सरकारी संस्थानों, एनजीओ या लैबोरेट्री में काम कर सकता है। आप इंडस्ट्रियल एवं एग्रीकल्चरल कंसल्टेंट के तौर पर भी करियर शुरू कर सकते हैं। इनके अलावा जू, वाइल्ड लाइफ रेंज, पेटा, वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के साथ भी काम करने के मौके हैं। अगर सरकारी सेवा में जाना चाहते हैं, तो संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा आयोजित होने वाले इंडियन फॉरेस्ट सर्विस एग्जाम में शामिल हो सकते हैं। रिटेन एग्जाम क्लियर करने के बाद आपको पर्सनैलिटी टेस्ट, वॉकिंग टेस्ट और स्टैंडर्ड मेडिकल फिटनेस टेस्ट में शामिल होना होगा। इसके अलावा, स्टेट फॉरेस्ट सर्विस भी ज्वाइन कर सकते हैं, जैसे-केरल, कर्नाटक, झारखंड जैसे राज्यों में फॉरेस्ट्री ग्रेजुएट्स के लिए रेंज ऑफिसर बनने का मौका होता है। आप सॉयल कंजर्वेशन डिपार्टमेंट में भी काम कर सकते हैं। फॉरेस्ट्री में मास्टर्स करने वाले एग्रीकल्चरल रिसर्च सर्विस एग्जाम क्लियर कर साइंटिस्ट बन सकते हैं। वहीं, जो लोग पीएचडी करते हैं, वे किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान, एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी आदि में फैकल्टी, लेक्चरर, जूनियर रिसर्च ऑफिसर के रूप में अपनी सेवा दे सकते हैं।
और भी हैं ऑप्शंस
-डेंड्रोलॉजिस्ट्स 
-एथनोलॉजिस्ट्स
-एन्टमोलॉजिस्ट्स 
-सिल्वीकल्चरिस्ट्स
-जू क्यूरेटर्स
प्रमुख इंस्टीट्यूट्स
-डॉ. वाइ.एस.परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टीकल्चर, सोलन
-तमिलनाडु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, कोयंबटूर
-बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, वाराणसी
-बिरसा एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, रांची
-जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर
-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट, भोपाल,

खानपान की इंजीनियरिंग फूड टेक्नोलॉजी

फूड टेक्नोलॉजी आज के युवाओं के लिए एक आकर्षक करियर के रूप में सामने आयी है। आने वाले समय में इस क्षेत्र में रोजगार की व्यापक संभावनाएं हैं।
देश में कई ऐसे क्षेत्र हैं जो दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की कर रहे हैं। रोजगार प्रदान करने के मामले में भी इनका कोई सानी नहीं है। इन्हीं में से एक फूड टेक्नोलॉजी का क्षेत्र भी है। तेजी से बढ़ती जनसंख्या और लोगों की जीवनशैली में बदलाव व खानपान में दिलचस्पी के चलते इस क्षेत्र का तेजी से विस्तार हुआ है।
क्या है फूड टेक्नोलॉजी
फूड टेक्नोलॉजी विज्ञान की ऐसी शाखा है, जिसके अंतर्गत किसी भी फूड प्रोडक्ट के कैमिकल, फिजिकल व माइक्रोबायोलॉजिकल मेकअप का अध्ययन किया जाता है। साथ ही इसमें किसी भी फूड प्रोडक्ट के उत्पादन, भंडारण, परीक्षण, पैकेजिंग तथा वितरण संबंधी कार्य किए जाते हैं। इसके अंतर्गत सभी प्रकार के भोज्य पदार्थों जैसे मीट, फ्रूट, वेजिटेबल, फिश, अनाज, अंडा, दूध आदि को शामिल किया जाता है। फूड टेक्नोलॉजिस्ट का पहला कार्य कच्चे पदार्थों की जांच, भोज्य पदार्थो की क्वालिटी, भोजन का परीक्षण, न्यूट्रीशन वैल्यू जांचने से संबंधित होता है। ये भोजन की प्रॉसेसिंग, संरक्षण एवं उन्हें खराब होने से बचाने के लिए कई तरह की तकनीक इजाद करते हैं।
बारहवीं के बाद रखें कदम
इसके बैचलर कोर्स में प्रवेश केलिए छात्र के पास न्यूनतम डिग्री 10+2 (फिजिक्स, कैमिस्ट्री, मैथ्स अथवा बॉयोलॉजी सहित) होनी चाहिए, तभी बीएससी में एडमिशन मिल पाएगा, जबकि मास्टर एवं डिप्लोमा पाठय़क्रमों में प्रवेश के लिए शैक्षिक योग्यता स्नातक होना है। यदि किसी ने होम साइंस, न्यूट्रीशन, डायटीशियन एवं होटल मैनेजमेंट में ग्रेजुएशन किया है तो फूड टेक्नोलॉजी में उच्च शिक्षा हासिल कर सकता है।
कई तरह के गुण आवश्यकएक फूड टेक्नोलॉजिस्ट के अंदर साइंटिफिक आंकलन की क्षमता, हेल्थ एवं न्यूट्रीशन में अभिरुचि, काम की पूर्णता जैसे गुण होने जरूरी हैं। उन्हें टीम के एक महत्वपूर्ण अंग के रूप में काम करना होता है, इसलिए उनकी कम्युनिकेशन स्किल मजबूत होनी जरूरी है। फूड एवं न्यूट्रीशन के संदर्भ में होने वाले साइंटिफिक एवं टेक्नोलॉजिकल बदलावों के बारे में अपडेट रहना भी जरूरी है।
कोर्स की रूपरेखा
इसमें बैचलर, मास्टर व डिप्लोमा जैसे कई तरह के कोर्स मौजूद हैं। बैचलर डिग्री तीन साल, मास्टर दो साल तथा डिप्लोमा कोर्स एक साल का होता है। कुछ कोर्स निम्न हैं-
बीएससी इन फूड टेक्नोलॉजी
बीएससी इन फूड साइंस
बीएससी इन फूड एंड न्यूट्रीशन
बीएससी इन फूड प्रिजर्वेशन
एमएससी इन फूड साइंस
एमएससी इन फूड टेक्नोलॉजी
डिप्लोमा कोर्सेज इन फूड एनालिसिस एंड फूड साइंस
सिलेबस फूड टेक्नोलॉजी कोर्स के अंतर्गत विभिन्न बिंदुओं जैसे माइक्रोबायोलॉजी, खाद्य संरक्षण तकनीक, जेनेटिक्स, फूड पैकेजिंग आदि को शामिल किया जाता है। हालांकि पिछले कुछ सालों से इसके सिलेबस में व्यापक बदलाव देखने को मिले हैं। इंडस्ट्री की मांग के मुताबिक समय-समय पर बदलाव किया जाता है, ताकि छात्र नई-नई जानकारी से अवगत होते रहें। थ्योरी के साथ-साथ प्रेक्टिकल की जानकारी विविध रूपों में छात्रों को दी जा रही है।
कई जगह मिलेंगे अवसर
सफलतापूर्वक कोर्स पूरा करने के बाद कई जगह रोजगार के अवसर मिलते हैं। मुख्य रूप से फूड प्रोसेसिंग कंपनियों, फूड रिसर्च लेबोरेटरी, होटल, रेस्तरां, एजुकेशनल इंस्टीट्यूट के अलावा कई सरकारी व प्राइवेट सेक्टर में फूड टेक्नोलॉजिस्ट, फूड इंस्पेक्टर व हेल्थ इंस्पेक्टर के रूप में अपनी सेवा दे सकते हैं। यदि कोई फ्रीलांस कंसल्टेंट या किसी स्कूल/कॉलेज में रिसर्चर, लेक्चरर, एडवाइजर या हेल्थ डॉक्टर के रूप में कार्य करने का इच्छुक है तो उसे भी निराशा नहीं मिलती। विदेशों में भी काफी अवसर मौजूद हैं।
स्कॉलरशिप 
इस क्षेत्र में छात्रों को देश व विदेश में पढ़ने के लिए कई तरह की स्कॉलरशिप दी जाती हैं। एनएएआरएम आईसीएआर सीनियर रिसर्च फैलोशिप, रामालिंगास्वामी फैलोशिप इस क्षेत्र की दो बड़ी स्कॉलरशिप हैं। इसके अलावा एग्री बायोटेक फाउंडेशन, एबीएफ पीएचडी फैलोशिप, एसके पाटिल लोन स्कॉलरशिप व जेएन
टाटा इनडोमेंट स्कॉलरशिप आदि छात्रों की राह आसान बनाती हैं।
अनुभव के साथ बढ़ती है सेलरीफूड टेक्नोलॉजिस्ट को शुरुआती दौर में कम से कम 20,000 से 30,000 रुपए प्रतिमाह मिलते हैं। दो-तीन साल के अनुभव के बाद सेलरी में भी बढ़ोतरी होती है। कई ऐसे फूड टेक्नोलॉजिस्ट हैं, जिनका सालाना पैकेज लाखों में हैं। विदेश में प्रोफेशनल्स को आकर्षक सेलरी मिलती है, जबकि फ्रीलांस कंसल्टेंट या एडवाइजर के रूप में काम करने पर योग्यता के अनुसार कीमत मिलती है। प्रोफेशनल्स चाहें तो अपना काम भी शुरू कर सकते हैं।
एजुकेशनल लोन
छात्रों को प्रमुख राष्ट्रीयकृत, प्राइवेट अथवा विदेशी बैंकों द्वारा एजुकेशन लोन प्रदान किया जाता है। छात्र को जिस संस्थान में एडमिशन लेना होता है, वहां से जारी एडमिशन लेटर, हॉस्टल खर्च, ट्यूशन फीस एवं अन्य खर्चों का ब्योरा बैंक को देना होता है। साथ ही अभिभावक का आय संबंधी प्रमाण पत्र बतौर गारंटर जमा कराना अनिवार्य है। हर बैंक की अपने नियम व शर्तें हैं।
एक्सपर्ट व्यू
तेजी से बढ़ रहा है स्कोप
खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित हो जाने के बाद इस इंडस्ट्री में कई तरह के बदलाव आएंगे। मसलन, असंगठित क्षेत्र की कंपनियों को संगठित क्षेत्र के दायरे में लाने, कंपनियों को क्वालिटी पर विशेष ध्यान देने व प्रोसेसिंग को और मजबूत बनाने संबंधित कार्य प्रमुखता से होंगे। ऐसी संभावना बन रही है कि डिप्लोमा करने वाले छात्रों को भी आसानी से जॉब मिल सकेगी। पिछले कुछ सालों में सरकारी क्षेत्रों के साथ-साथ टीचिंग में भी स्कोप बढम है। इंडस्ट्री में क्वालिफाइड प्रोफेशनल्स की डिमांड भी बढ़ी है।
डॉ. एके सिंह, सीनियर साइंटिस्ट, एनडीआरआई, करनाल, हरियाणा
फैक्ट फाइल
कहती है इंडस्ट्री

भारत में फूड इंडस्ट्री का काफी विस्तृत बाजार है। इसकी स्थापना 1942 में हुई थी। जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ इस इंडस्ट्री का दायरा भी बढ़ता जा रहा है। भारत के कृषि प्रधान देश होने का बड़ा फायदा इस इंडस्ट्री को भी मिलता है।
फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) की रिपोर्ट के अनुसार 2010 में जहां फूड इंडस्ट्री का बाजार 8,14,500 करोड़ था वहीं 2015 तक इसके 11,60,000 करोड़ (30 प्रतिशत ग्रोथ की दर से) तक पहुंचने की उम्मीद है।
यह भी संभावना जताई जा रही है कि 2020 तक इसमें 23 प्रतिशत ग्रोथ के साथ इसका इसका बाजार 14,30,000 करोड़ तक पहुंच जाएगा।
देश में फलों-सब्जियों की प्रोसेसिंग और बेकरी प्रोडक्ट का बड़ा स्पेक्ट्रम मौजूद है। एक आंकड़ों की मानें तो भारत विश्व में फलों के उत्पादन में 9 प्रतिशत, सब्जियों में 9.3 प्रतिशत योगदान देता है।
प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान
नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीटय़ूट, करनाल, हरियाणा
वेबसाइट
www.ndri.res.in
यूनिवर्सिटी ऑफ दिल्ली, दिल्ली
वेबसाइट
www.du.ac.in
गोविन्द बल्लभ पंत यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी, पंतनगर
वेबसाइट:
 www.gbpuat.ac.in
सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीटय़ूट, मैसूर
वेबसाइट:
 www.cftri.com
सीएसके कृषि विश्वविद्यालय, हिमाचल प्रदेश
वेबसाइट:
 www.hillagric.ac.in
एसएनडीटी वुमन यूनिवर्सिटी, मुंबई
वेबसाइट
www.sndt.ac.in
गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर
वेबसाइट
www.gndu.ac.in

Monday, August 3, 2015

व्यंग्य चित्रकारी में बना सकते हैं करियर

नई दिल्ली। व्यंग्य चित्रकार (व्यंग्य चित्रकार) की नजर बड़ी पैनी होती है। गम्भीर विषयों को रोचग ढंग से चित्रण की गहन जानकारी होती है, ताकि पाठक पर अभीष्ट प्रभाव पड़ सके। विनोदप्रियता, विवेक, समाज में विद्यमान असंगतियों को मापने की योग्यता, राजनीतिज्ञों की मूर्खता, सामाजिक, आर्थिक व्याकुलता आदि होना जरूरी है, ताकि विषय को सर्वाधिक प्रभावशाली एवं चुटीले ढंग से व्यक्त किया जा सके। इस प्रकार व्यंग चित्रकार सशक्त पत्रकार होता है।

वह कारगर ढंग से सम्प्रेषण के लिए इस दृश्यात्मक/प्रत्यक्ष माध्यम का इस्तेमाल करता है। दूसरे शब्दों में, कार्टूनिंग की कला प्रत्यक्ष माध्यम के जरिए विनोदपूर्ण ढंग से व्यंग्य कसना या व्यंग्य लेख लिखने की प्रतिभा है, इसका विकास किया जा सकता है।

सृजनात्मक कार्य करने के लिए सामाजिक-आर्थिक तथा राजनीतिक वातावरण की गहन समझ होना जरूरी है। व्यक्ति ललित या व्यावसायिक कला की पृष्ठभूमि या सरल शब्दों में कहें तो प्रतिभा से ही कला में पारंगत हो सकता है, बशर्ते उसमें कार्टून या प्रत्यक्ष तस्वीर के माध्यम से सूक्ष्म या महत्वपूर्ण संदेश देने की योग्यता हो।

आज श्रव्य-दृश्य मीडिया के प्रसार के कारण कम्प्यूटर और नेटवर्क पर आधारित अनुप्रयोगों की वजह से कॉमिक स्ट्रिप्स तैयार की जा सकती है। टेलीविजन, रुपहले परदे पर प्रिंट मीडिया के लिए कार्टून फिल्में बनाई जा सकती हैं।

अमूल मक्खन तथा एयर इंडिया महाराजा जैसे कुछ उल्लेखनीय विज्ञापनों में इस मीडिया का कारगर ढंग से इस्तेमाल हुआ है। यह अभियान लोकप्रिय होने के साथ-साथ संदेश पहुंचाने में भी सफल हुए।

आप कल्पना कर सकते हैं कि यदि किसी समाचार-पत्र में कार्टून नहीं होता तो खून-खराबा, प्राकृतिक आपदओं, दुर्घटनाओं कर संबंधी छापों आदि से भरी निराशाजनक खबरों के कारण समाचार-पत्र कितना उबाऊ होता।

सम्पादकीय लेख, कार्टून तथा राजनीतिज्ञों के व्यंग्य-चित्रों में निर्भीक होकर व्यंग्य शैली में सामाजिक बुराइयों और कमियों को उभारा जाता है या टिप्पणी की जाती है। कॉमिक कलाकार में विनोदप्रियता का गुण होता है। हल्के-फुल्के रोचक ढंग से खबरें प्रस्तुत की जाती हैं।

टीवी एवं फिल्मों में दिखाए जाने वाले सजीव कार्टून ‘मोशन व्यंग चित्रकार’ द्वारा तैयार किए जाते हैं। ये व्यंग्य चित्रकार रहस्यों को प्रकट करते हैं, परियों की कहानियां चित्रित करते हैं, बच्चों की कहानियां तैयार करते हैं। बच्चे इस रचना जगत के वशीभूत हो जाते हैं। मोशन पिक्चर्स, विज्ञापन तथा टीवी और कुछ सीमा तक नेटवर्क पर ये कार्टून लोकप्रिय हैं।

इसमें सृजनात्मक शक्ति को सर्वोत्तम ढंग से अभिव्यक्त किया जाता है, क्योंकि कलाकार इस सशक्त माध्यम का अपने ढंग से प्रयोग करता है। प्रयोग की विधि के अनुसार यह रूप लोकप्रिय होता है, फिर चाहे जन-साधारण तक बढ़ती आबादी पर नियंत्रण पाने का संदेश हो अथवा बच्चों को यह नैतिक शिक्षा देनी हो कि वे कर्तव्यनिष्ठ हों, कर्मठ हों या ईमानदार बनें या ऐसी रचना का लक्ष्य मात्र मनोरंजन करना हो।

स्कूल स्तर से पूर्व स्तर या स्कूली बच्चों को देशभक्ति आदि जैसे मूल्य सिखाने के लिए कार्टून को शिक्षा के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि इससे रचनाशील मस्तिष्क पर स्थाई प्रभाव पड़ता है। कार्टून के माध्यम से एड्स नियंत्रण, सुरक्षित स्वास्थ्य प्रक्रियाओं आदि से संबंधित संदेश लोगों तक पहुंचाए जाते हैं।

योग्यता:

10+2 परीक्षा के बाद कार्टूनिंग को कैरियर के रूप में चुना जा सकता है, हालांकि बारहवीं कक्षा तक पढ़ाई करना आदर्श रहता है। इसके बाद ही यह पाठ्यक्रम किया जाए। मल्टी मीडिया पाठ्यक्रम से तकनीकी पहलुओं को समझने में सहायता मिलती है। तब व्यक्ति विभिन्न सॉफ्टवेयर पैकेज का इस्तेमाल करने का आदी हो जाता है।

तथापि कॉमिक रूपों के आरेखन की कला के लिए किसी औपचारिक प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती है, बशर्ते व्यक्ति में चित्र बनाने, मूल रूप में चित्रण, हास्य शैली में सामाजिक, राजनीतिक संकट एवं विपत्तियों को व्यक्त करने की प्रतिभा हो, जिससे जनता में रुचि जाग्रत हो तथा उसकी कल्पना-शक्ति प्रस्फुटित हो। ऐसा ही व्यक्ति सफल व्यंग चित्रकार बन सकता है।

रोजगार की सम्भावनाएं:

व्यंग्य चित्रकार और एनीमेटर (सजीव चित्रकार) के लिए पब्लिशिंग संस्थानों में नौकरियां उपलब्ध रहती हैं। इसके अलावा पत्रिकाओं, विज्ञापन एजेंसियों, श्रव्य-दृश्य मीडिया और समाचार-पत्रों में भी काफी सम्भावनाएं विद्यमान हैं। यदि व्यक्ति के पास प्रतिभा एवं कल्पना-शक्ति है तो उसका भविष्य उज्जवल है। लेकिन ऐसे कार्यों के लिए बड़े शहरों में ही ज्यादा मांग है। बाधा यही है कि सम्पादकीय कार्य में काफी स्वतंत्रता की जरूरत है लेकिन सौंपे गए कार्य को कर्मचारियों में बांटकर करवाना पड़ता है।

कम्प्यूटर सहायता प्राप्त डिजाइन (सीएडी) प्रौद्योगिकी का श्रव्य-दृश्य प्रस्तुतीकरण में व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किया जाता है। इस संबंध में कड़ी स्पर्धा है, लेकिन उच्च कोटि के कार्य से व्यक्ति को अपनी पसंद का कार्य मिलने में सहायता मिलती है।

भारत में व्यंग्य चित्रकार का कार्यक्षेत्र अभी प्रारम्भिक अवस्था में है। इसकी तुलना चार दर्शक पूर्व ‘पंच’ एवं ‘न्यूयॉर्कर’ से की जा सकती है। प्रारम्भ में व्यंग्य चित्रकार को पैर जमाने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है लेकिन एक बार शुरुआत हो जाने पर पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ती।

संस्थान:

भारत में आर.के. लक्ष्मण, सुधीर तैलंग, रंगा, राजिंद्र पुरी, राशि काल्दा जैसे कुछ नाम उल्लेखनीय है। ये पाठ्यक्रम निम्नलिखित संस्थानों में चलाए जा रहे हैं-

1. शंकर अकादमी ऑफ आर्ट, बहादुर शाह जफर मार्ग, नई दिल्ली।
2. ए.पी.जे. इंस्टीच्यूट ऑफ डिजाइन, 54, तुगलकाबाद इंस्टीट्यूशनल एरिया, एम. बी. रोड, नई दिल्ली-110 062।
3. द दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट, तिलक मार्ग, नई दिल्ली 110 001।
4. सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट, डॉ. डी. एन. रोड, मुम्बई-400 001।
5. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन, पालदी, अहमदाबाद।
6. जाइका स्टूडियो, एसेल वर्ल्ड, गोराई आईलैंड, बोरीचाली (पश्चिम), मुम्बई-400 091।
7. द केरल कार्टून अकादमी, चित्तूर रोड, ऑफ कोची, केरल।

Saturday, August 1, 2015

बायोइन्फॉर्मेटिक्स में कैरियर

20 वीं शताब्दी के शुरुआत में जहां एक बार में एक ही जीन तथा प्रोटीन के बारे में अध्ययन सम्भव था वहीं अब एक ही बार में जीन की पूरी संरचना को जानना सम्भव है। पहले जहां एक-एक केमिकल और ड्रग्स का अध्ययन अलग-अलग करना पड़ता था वहीं अब करीब पांच लाख केमिकल कम्पाउंडों के बारे में एक या दो सप्ताह में ही जाना जा सकता है। जाहिर है इतने बड़े पैमाने पर किए गए अध्ययन से मिलने वाले आंकड़ों को व्यवस्थित रूप से रखना और दूसरे लोगों की जानकारी के लिए सुविधाजनक बनाना जरूरी है। वह शख्स जो इसे सम्भव बनाता है वह है - बायोइन्फॉर्मेटिक्स विशेषज्ञ। एक बायोइन्फॉर्मेटिक्स सूक्ष्म जीव विज्ञानी और कम्प्यूटर प्रोग्रामर का एकीकृत रूप है। 
बायोइन्फॉर्मेटिक्स एक उभरता हुआ क्षेत्र है और इसका उपयोग मुख्य रूप से ड्रग डिजाइन जीन थेरेपी ,डायग्नोस्टिक क्रॉप इम्प्रूवमेंट बॉयोकेमिकल प्रोसेस जैसे जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में होता है । जैव प्रौद्योगिकी में आंकड़ों के विश्लेषण के लिए सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें खास तौर पर प्रोटीन मॉलीक्यूल्स और जीनोम के लिए व्यापक इलेक्ट्रॉनिक्स डाटा बेस का निर्माण तथा बायोमॉलीक्यूल और बायोलॉजिक सिस्टम का त्रिआयामी चित्रण होता है । 
भारत में ऑन लाइन या ऑफ लाइन तरीकों से जैवकीय आंकड़ों के बेहतर इस्तेमाल के लिए एक नेशनल बायोइन्फॉर्मेटिक्स नेटवर्क (एनबीएन) का विकास किया गया है जिसमें एक प्रधान केंद्र दस डिस्ट्रीब्यूटेड इन्फॉर्मेशन सेंटर (डीआईसी) तथा 44 उप सेंटर शामिल हैं। 
शिक्षण तथा प्रशिक्षण 
बायोइन्फॉर्मेटिक्स एक ऐसी विद्या है जिसका अब भी दुनिया भर में विस्तार हो रहा है। भारत में विज्ञान या चिकित्सा विज्ञान इंजीनियरिंग कृषि फॉर्मेसी तथा इससे सम्बंधित स्नातकों के लिए एक वर्षीय एडवांस पोस्ट डिप्लोमा कोर्स का चयन सबसे उपयुक्त है। कुछ विश्वविद्यालयों द्वारा चलाए जा रहे औपचारिक पाठ्यक्रमों के अलावा कई अनौपचारिक प्रशिक्षण भी चलाए जा रहे हैं । लेकिन कोर्स करने के लिए बायोलॉजी के साथ-साथ कंप्यूटर की अच्छी जानकारी होना भी बेहद जरूरी है। जीव विज्ञान की पृष्ठभूमि और कंप्यूटर की बेहतर समझ रखने वाले छात्रों के लिए बायोइन्फॉर्मेटिक्स एक अच्छा विकल्प हो सकता है। 
कुछ औपचारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम 

पुणे विश्वविद्यालय के बायोइन्फॉर्मेटिक सेंटर की स्थापना 1987 में की गई थी। यहां बायोइन्फॉर्मेटिक्स में एक वर्ष का एडवांस डिप्लोमा कोर्स कराया जाता है। 
योग्यता किसी भी विज्ञान विषय- एमबीएससी एमएससी (कृषि) एमफॉर्मा एमडी एमई एमसीए या बीई ,एमबीबीएस अथवा बीटेक में 60 प्रतिशत अंकों के साथ पोस्ट ग्रेजुएट करने वाले छात्र दाखिले के लिए आवेदन कर सकते हैं। आरक्षित वर्ग के छात्रों के लिए छूट दी गई है। 55 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाले आरक्षित वर्ग के छात्र दाखिले के लिए आवेदन कर सकते हैं। दाखिले के लिए आवेदन करने वाले छात्रों का चयन प्रवेश परीक्षा के आधार पर किया जाता है। विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा का आयोजन हर साल जून महीने में करता है। प्रश्नपत्र दो भागों (सेक्शन ए और बी) में बंटा होता है जिसमें बहुविकल्पीय और व्याख्यात्मक दोनों तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। प्रवेश परीक्षा का निर्धारित समय दो घंटे का होता है। 
परीक्षा पत्र के सेक्शन ए में बहुविकल्पीय प्रश्नपत्र होते हैं जिसमें बारहवीं तक के पाठ्यक्रम के आधार पर प्रश्न पूछे जाते हैं। प्रश्नपत्र में तर्कबुद्धि परीक्षा रीजनिंग और अंग्रेजी विषय से सम्बंधित प्रश्न होते हैं। सेक्शन ए के सभी प्रश्न अनिवार्य होते हैं। 
सेक्शन बी में व्याख्यात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं जिसमें भौतिक रसायन सूक्ष्म जीव विज्ञान जैव भौतिकी गणित तथा सांख्यिकी के प्रश्न शामिल होते हैं। सेक्शन बी में पूछे गए करीब 75 प्रश्नों में से 90 प्रश्नों का उत्तर करीब 100-150 शब्दों में देना होता है। 
बायोइन्फार्मेटिक्स सेंटर 
पुणे विश्वविद्यालय पुणे - 411007 
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय 
यहां बायो इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर (बीआईसी) 1989 में स्थापित किया गया था। बीआईसी जेनेटिक इंजीनियरिंग जैव भौतिकी जैव प्रौद्योगिकी तथा बायोकम्प्यूटिंग जैसे विभिन्न क्षेत्रों में शोध तथा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 
योग्यता: जीव विज्ञान की किसी भी शाखा जैसे बायो केमस्ट्री बायो फिजिक्स माइक्रोबायोलॉजी मॉलीक्यूलर बायोलॉजी बायो टेकनेलॉजी लाइफ साइंसेज बॉटनी जूलॉजी एमबीबीएस में द्वितीय श्रेणी (कम से कम 55प्रतिशत अंक तथा समानांतर ग्रेड) में स्नातक और दसवीं कक्षा तक गणित का अनिवार्य विषय के रूप में अध्ययन होना जरूरी है। प्रवेश परीक्षा मई में आयोजित की जाती है। इस परीक्षा में कम्प्यूटर जीनोमिक्स मॉलीक्यूलर ,मॉडलिंग स्टेटिस्टीकल मेथड्स कम्पयूटेशन टेकनीक आदि विषयों से सम्बंधित प्रश्न पूछे जाते हैं। बीआईसी में प्रवेश परीक्षा की सूचना फरवरी में दी जाती है। 
बायोइन्फॉर्मेटिक्स सेंटर स्कूल ऑफ बायोटेकनेलॉजी 
मदुरई कामराज यूनिवर्सिटी पलकलई नगर मदुरई- 625021 
पाठ्यक्रम: बायोइन्फॉर्मेटिक्स में एक वषीर्य एडवांस डिप्लोमा कोर्स 
योग्यता: भौतिक रसायन गणित बायोटेकनेलॉजी माइक्रोबायोलॉजी फॉमेर्कोलॉजी कम्प्यूटर साइंस आदि में स्नातकोत्तर (एमए) या किसी भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से एमटेक या एमबीबीएस डिग्रीधारी आवेदन कर सकते हैं। इंडस्ट्री स्पॉन्सर्ड उम्मीदवार भी दाखिला ले सकते हैं। चयनित उम्मीदवार को हजार रुपये छात्रवृत्ति दी जाती है। उम्मीदवारों का चयन प्रवेश परीक्षा और साक्षात्कार के आधार पर किया जाता है। 
प्रस्तुति: सरोज सिंह

Thursday, July 30, 2015

फिजियोथेरेपी: पैसा भी, सेवा भी

आज के युग में लोग बीमारी का इलाज करने के लिए दवाइयों का प्रयोग कम से कम करना चाहते हैं, जिसके चलते फिजियोथेरेपिस्ट की माँग में इजाफा हुआ है। फिजियोथेरेपी फिजिकल थेरेपी का दूसरा नाम है। यह एक तेजी से उभरता क्षेत्र है जिसमें बीमारियों का उपचार दवाइयों को छोड़ व्यायाम करके किया जाता है। यह चिकित्सा संबंधित क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। 

फिजियोथेरेपी वह विज्ञान है जिसमें शरीर के अंगों को दवाइयों के बिना ही ठीक ढंग से कार्य कराया जाता है। एक फिजियोथेरेपिस्ट का मुख्य काम शारीरिक कामों का आकलन, मेंटिनेंस और रिस्टोरेशन करना है। फिजियोथेरेपिस्ट वाटर थेरेपी, मसाज आदि अनेक प्रक्रियाओं के द्वारा रोगी का उपचार करता है। 

विज्ञान क्षेत्र के छात्र इस क्षेत्र में बना सकते हैं। फिजियोथेरेपिस्ट बनने के लिए मुख्य रूप से दो कोर्सेस बीपीटी, बैचलर ऑफ फिजियोथेरेपी और एमपीटी, मास्टर ऑफ फिजियोथेरेपी होते हैं। इस कोर्स के आखिरी छह महीने में छात्र को किसी हॉस्पिटल से इंटर्नशिप करवाई जाती है। 

एक प्रेक्टिसिंग फिजियोथेरेपिस्ट या किसी अस्पताल और क्लिनिक में काम करने के लिए कम से कम बीएससी डिग्री होनी आवश्यक है। 12वीं पास छात्र इस क्षेत्र से जुड़ा कोर्स कर सकते हैं बशर्ते उनके भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीवविज्ञान और अंग्रेजी में कम से 50 प्रतिशत अंक हो। इंस्टिट्यूट में एडमिशन के लिए प्रवेश परीक्षा होती है। 

इस कोर्स के अंतर्गत छात्रों को मानव शरीर की संरचना के बारे में समझाया जाता है। इस कोर्स का प्रमुख हिस्सा इंटर्नशिप है जहाँ छात्र किसी प्रोफेशनल की देखरेख में हॉस्पिटल में काम करते हैं। फिजियोथेरेपिस्ट का क्षेत्र बहुत बड़ा है अतः आप किसी एक क्षेत्र में स्पेशलाइजेशन भी कर सकते हैं।

कैलाश अस्पताल की फिजियोथेरेपिस्ट पल्लवी कहती हैं कि एक फिजियोथेरेपिस्ट को बातचीत करने की कला में माहिर होना आवश्यक है क्योंकि उसका काम लोगों से ही जुड़ा है। इसके अतिरिक्त एक अच्छे फिजियोथेरेपिस्ट को धैर्यशील, लंबे समय तक काम करना, अच्छी याददाश्त तथा लोगों को समझने की कला आनी चाहिए। फिजियाथेरेपिस्ट का काम एक सिस्टमेटिक ढंग से काम करने की माँग करता है। 

पल्लवी बताती हैं कि कोई भी व्यक्ति पहली बार में ही ऑपरेशन करवाना नहीं चाहता, जिसके चलते फिजियोथैरेपी एक अहम्‌ भूमिका अदा करता है। एक फिजियोथेरेपिस्ट म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन तथा मेडिकल इंस्टिट्यूट में काम कर सकता है।
कहाँ से करें कोर्स

नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ रिहेबिलिटेशन ट्रेनिंग एंड रिसर्च, उड़ीसा
नेशनल इंस्टिट्यूट फॉर द आर्थियोपेडिकली हैंडीकैन्ट, कलकत्ता
इंस्टिट्यूट ऑफ फिजिकली हैंडीकैंट, नई दिल्ली
पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल रिसर्च, चंडीगढ़
सांचती कॉलेज ऑफ फिजियोथैरेपी, पुणे
रविनैय्यर कॉलेज ऑफ फिजियोथैरेपी, वर्द्धा
वीपीएसम कॉलेज ऑफ फिजियोथैरेपी, नागपुर
एसएसबी कॉलेज ऑफ फिजियोथैरेपी, अहमदाबाद
के. एम. पटेल इंस्टिट्यूट ऑफ फिजियोथैरेपी, गोकुल नगर
डॉ. डीवाई पटेल कॉलेज ऑफ फिजियोथैरेपी, पु