Tuesday, August 4, 2015

फॉरेस्टर की दुनिया

पर्यावरण संतुलन के लिए जल और जंगल दोनों का संरक्षण जरूरी है। इनके कंजर्वेशन पर जितना ध्यान देंगे, हमारा जीवन उतना ही सिक्योर होगा। भारत सरकार ने 2015-16 को वॉटर कंजर्वेशन वर्ष के रूप में मनाने का फैसला लिया है। साथ ही, वन संपदा को बढ़ाने के लिए ग्रीन जॉब्स को प्रोत्साहन देने पर भी जोर है। देश के पैशनेट युवा फॉरेस्ट्री, फॉरेस्ट मैनेजमेंट, वॉटर मैनेजमेंट, वॉटर कंजर्वेशन आदि सेक्टर्स में अपना बहुमूल्य योगदान दे रहे हैं। वल्र्ड फॉरेस्ट्री डे (21 मार्च) और वल्र्ड वॉटर डे (22 मार्च) के मौके पर जानें इन दोनों क्षेत्रों में आकर्षक करियर संभावनाओं के बारे में ...
बात ग्लोबल वार्मिंग की हो, मौसम में बदलाव की, जल संकट की या प्राकृतिक विपदाओं की। ये सभी समस्याएं कहीं न कहीं, जंगलों से जुड़ी हैं। यानी अगर जंगलों की सही देखरेख और प्रबंधन हो, तो पर्यावरण संतुलन को बनाए रखना काफी हद तक आसान हो जाता है। पर्यावरण और एडवेंचर के शौकीन बहुत से युवा आज इस बात को समझने लगे हैं। इसीलिए फॉरेस्ट्री में करियर बनाने को लेकर दिलचस्पी और रुझान दोनों बढ़े हैं।
फॉरेस्टर की दुनिया
एक फॉरेस्टर के ऊपर वन संसाधनों की सुरक्षा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। वह जंगल को आग, बीमारी, कीड़ों एवं अवैध कब्जे से बचाता है। जंगलों में किस तरह काम किया जाए, कौन-से वृक्ष लगाना सही रहेगा, फिर उन्हें कैसे मार्केट तक पहुंचाया जाए, यह सब एक फॉरेस्टर की निगरानी में होता है। जो लोग जंगलों में काम करते हैं, उन्हें सुपरवाइज करने की जिम्मेदारी भी इन्हीं की होती है। ये वेस्टलैंड के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा, वन्यजीव या पर्यावरण को आसपास के वातावरण से महफूज रखना, इनका काम होता है। ये ईको-टूरिज्म को प्रोत्साहन देने में भी अहम रोल निभाते हैं।
साइंटिफिक टेम्परामेंट की जरूरत
अगर आप आउटडोर रहना पसंद करते हैं, एडवेंचर में मजा आता है, तो फॉरेस्टर एक बेहतरीन करियर विकल्प हो सकता है। हां, इसके लिए आपको फिजिकली फिट रहना होगा। इसमें धैर्य के साथ साइंटिफिक टेम्परामेंट भी जरूरी है। आपके अंदर ऑर्गनाइजिंग क्षमता के साथ-साथ पब्लिक रिलेशन स्किल होनी चाहिए। अगर फॉरेस्टर में निर्णय लेने की क्षमता नहीं होगी, तो वह वन क्षेत्र की सही तरीके से देख-रेख नहीं कर सकेगा। आपमें रिसर्च को लेकर भी दिलचस्पी होनी चाहिए।
कहां-कहां से कर सकते हैं कोर्स
साइंस स्ट्रीम से 12वीं करने वाले फॉरेस्ट्री में ग्रेजुएशन कर सकते हैं। इसके लिए विभिन्न यूनिवर्सिटीज द्वारा आयोजित किए जाने वाले एंट्रेंस एग्जाम को क्लियर करना होगा। हालांकि कुछ यूनिवर्सिटीज में सीधे मेरिट और सीटों की उपलब्धता के आधार पर दाखिला मिल जाता है। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आइसीएआर) के ऑल इंडिया एंट्रेंस एग्जाम उत्तीर्ण करने वाले फॉरेस्ट्री स्टूडेंट्स के लिए भी यूनिवर्सिटीज में अलग से कोटा होता है। कोर्स करने के बाद आप फॉरेस्ट मैनेजमेंट, कॉमर्शियल फॉरेस्ट्री, फॉरेस्ट इकोनॉमिक्स, फूड साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी, वाइल्ड लाइफ साइंस, एग्रो फॉरेस्ट्री में दो साल का मास्टर्स या इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट, भोपाल से दो साल का पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन फॉरेस्ट्री मैनेजमेंट कर सकते हैं। यहां दाखिले के लिए ग्रेजुएशन में 50 प्रतिशत अंक होना चाहिए।
गवर्नमेंट-प्राइवेट सेक्टर में मौके
एक फॉरेस्टर अपनी स्पेशलाइजेशन के अनुसार सरकारी संस्थानों, एनजीओ या लैबोरेट्री में काम कर सकता है। आप इंडस्ट्रियल एवं एग्रीकल्चरल कंसल्टेंट के तौर पर भी करियर शुरू कर सकते हैं। इनके अलावा जू, वाइल्ड लाइफ रेंज, पेटा, वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के साथ भी काम करने के मौके हैं। अगर सरकारी सेवा में जाना चाहते हैं, तो संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा आयोजित होने वाले इंडियन फॉरेस्ट सर्विस एग्जाम में शामिल हो सकते हैं। रिटेन एग्जाम क्लियर करने के बाद आपको पर्सनैलिटी टेस्ट, वॉकिंग टेस्ट और स्टैंडर्ड मेडिकल फिटनेस टेस्ट में शामिल होना होगा। इसके अलावा, स्टेट फॉरेस्ट सर्विस भी ज्वाइन कर सकते हैं, जैसे-केरल, कर्नाटक, झारखंड जैसे राज्यों में फॉरेस्ट्री ग्रेजुएट्स के लिए रेंज ऑफिसर बनने का मौका होता है। आप सॉयल कंजर्वेशन डिपार्टमेंट में भी काम कर सकते हैं। फॉरेस्ट्री में मास्टर्स करने वाले एग्रीकल्चरल रिसर्च सर्विस एग्जाम क्लियर कर साइंटिस्ट बन सकते हैं। वहीं, जो लोग पीएचडी करते हैं, वे किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान, एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी आदि में फैकल्टी, लेक्चरर, जूनियर रिसर्च ऑफिसर के रूप में अपनी सेवा दे सकते हैं।
और भी हैं ऑप्शंस
-डेंड्रोलॉजिस्ट्स 
-एथनोलॉजिस्ट्स
-एन्टमोलॉजिस्ट्स 
-सिल्वीकल्चरिस्ट्स
-जू क्यूरेटर्स
प्रमुख इंस्टीट्यूट्स
-डॉ. वाइ.एस.परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टीकल्चर, सोलन
-तमिलनाडु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, कोयंबटूर
-बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, वाराणसी
-बिरसा एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, रांची
-जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर
-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट, भोपाल,

खानपान की इंजीनियरिंग फूड टेक्नोलॉजी

फूड टेक्नोलॉजी आज के युवाओं के लिए एक आकर्षक करियर के रूप में सामने आयी है। आने वाले समय में इस क्षेत्र में रोजगार की व्यापक संभावनाएं हैं।
देश में कई ऐसे क्षेत्र हैं जो दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की कर रहे हैं। रोजगार प्रदान करने के मामले में भी इनका कोई सानी नहीं है। इन्हीं में से एक फूड टेक्नोलॉजी का क्षेत्र भी है। तेजी से बढ़ती जनसंख्या और लोगों की जीवनशैली में बदलाव व खानपान में दिलचस्पी के चलते इस क्षेत्र का तेजी से विस्तार हुआ है।
क्या है फूड टेक्नोलॉजी
फूड टेक्नोलॉजी विज्ञान की ऐसी शाखा है, जिसके अंतर्गत किसी भी फूड प्रोडक्ट के कैमिकल, फिजिकल व माइक्रोबायोलॉजिकल मेकअप का अध्ययन किया जाता है। साथ ही इसमें किसी भी फूड प्रोडक्ट के उत्पादन, भंडारण, परीक्षण, पैकेजिंग तथा वितरण संबंधी कार्य किए जाते हैं। इसके अंतर्गत सभी प्रकार के भोज्य पदार्थों जैसे मीट, फ्रूट, वेजिटेबल, फिश, अनाज, अंडा, दूध आदि को शामिल किया जाता है। फूड टेक्नोलॉजिस्ट का पहला कार्य कच्चे पदार्थों की जांच, भोज्य पदार्थो की क्वालिटी, भोजन का परीक्षण, न्यूट्रीशन वैल्यू जांचने से संबंधित होता है। ये भोजन की प्रॉसेसिंग, संरक्षण एवं उन्हें खराब होने से बचाने के लिए कई तरह की तकनीक इजाद करते हैं।
बारहवीं के बाद रखें कदम
इसके बैचलर कोर्स में प्रवेश केलिए छात्र के पास न्यूनतम डिग्री 10+2 (फिजिक्स, कैमिस्ट्री, मैथ्स अथवा बॉयोलॉजी सहित) होनी चाहिए, तभी बीएससी में एडमिशन मिल पाएगा, जबकि मास्टर एवं डिप्लोमा पाठय़क्रमों में प्रवेश के लिए शैक्षिक योग्यता स्नातक होना है। यदि किसी ने होम साइंस, न्यूट्रीशन, डायटीशियन एवं होटल मैनेजमेंट में ग्रेजुएशन किया है तो फूड टेक्नोलॉजी में उच्च शिक्षा हासिल कर सकता है।
कई तरह के गुण आवश्यकएक फूड टेक्नोलॉजिस्ट के अंदर साइंटिफिक आंकलन की क्षमता, हेल्थ एवं न्यूट्रीशन में अभिरुचि, काम की पूर्णता जैसे गुण होने जरूरी हैं। उन्हें टीम के एक महत्वपूर्ण अंग के रूप में काम करना होता है, इसलिए उनकी कम्युनिकेशन स्किल मजबूत होनी जरूरी है। फूड एवं न्यूट्रीशन के संदर्भ में होने वाले साइंटिफिक एवं टेक्नोलॉजिकल बदलावों के बारे में अपडेट रहना भी जरूरी है।
कोर्स की रूपरेखा
इसमें बैचलर, मास्टर व डिप्लोमा जैसे कई तरह के कोर्स मौजूद हैं। बैचलर डिग्री तीन साल, मास्टर दो साल तथा डिप्लोमा कोर्स एक साल का होता है। कुछ कोर्स निम्न हैं-
बीएससी इन फूड टेक्नोलॉजी
बीएससी इन फूड साइंस
बीएससी इन फूड एंड न्यूट्रीशन
बीएससी इन फूड प्रिजर्वेशन
एमएससी इन फूड साइंस
एमएससी इन फूड टेक्नोलॉजी
डिप्लोमा कोर्सेज इन फूड एनालिसिस एंड फूड साइंस
सिलेबस फूड टेक्नोलॉजी कोर्स के अंतर्गत विभिन्न बिंदुओं जैसे माइक्रोबायोलॉजी, खाद्य संरक्षण तकनीक, जेनेटिक्स, फूड पैकेजिंग आदि को शामिल किया जाता है। हालांकि पिछले कुछ सालों से इसके सिलेबस में व्यापक बदलाव देखने को मिले हैं। इंडस्ट्री की मांग के मुताबिक समय-समय पर बदलाव किया जाता है, ताकि छात्र नई-नई जानकारी से अवगत होते रहें। थ्योरी के साथ-साथ प्रेक्टिकल की जानकारी विविध रूपों में छात्रों को दी जा रही है।
कई जगह मिलेंगे अवसर
सफलतापूर्वक कोर्स पूरा करने के बाद कई जगह रोजगार के अवसर मिलते हैं। मुख्य रूप से फूड प्रोसेसिंग कंपनियों, फूड रिसर्च लेबोरेटरी, होटल, रेस्तरां, एजुकेशनल इंस्टीट्यूट के अलावा कई सरकारी व प्राइवेट सेक्टर में फूड टेक्नोलॉजिस्ट, फूड इंस्पेक्टर व हेल्थ इंस्पेक्टर के रूप में अपनी सेवा दे सकते हैं। यदि कोई फ्रीलांस कंसल्टेंट या किसी स्कूल/कॉलेज में रिसर्चर, लेक्चरर, एडवाइजर या हेल्थ डॉक्टर के रूप में कार्य करने का इच्छुक है तो उसे भी निराशा नहीं मिलती। विदेशों में भी काफी अवसर मौजूद हैं।
स्कॉलरशिप 
इस क्षेत्र में छात्रों को देश व विदेश में पढ़ने के लिए कई तरह की स्कॉलरशिप दी जाती हैं। एनएएआरएम आईसीएआर सीनियर रिसर्च फैलोशिप, रामालिंगास्वामी फैलोशिप इस क्षेत्र की दो बड़ी स्कॉलरशिप हैं। इसके अलावा एग्री बायोटेक फाउंडेशन, एबीएफ पीएचडी फैलोशिप, एसके पाटिल लोन स्कॉलरशिप व जेएन
टाटा इनडोमेंट स्कॉलरशिप आदि छात्रों की राह आसान बनाती हैं।
अनुभव के साथ बढ़ती है सेलरीफूड टेक्नोलॉजिस्ट को शुरुआती दौर में कम से कम 20,000 से 30,000 रुपए प्रतिमाह मिलते हैं। दो-तीन साल के अनुभव के बाद सेलरी में भी बढ़ोतरी होती है। कई ऐसे फूड टेक्नोलॉजिस्ट हैं, जिनका सालाना पैकेज लाखों में हैं। विदेश में प्रोफेशनल्स को आकर्षक सेलरी मिलती है, जबकि फ्रीलांस कंसल्टेंट या एडवाइजर के रूप में काम करने पर योग्यता के अनुसार कीमत मिलती है। प्रोफेशनल्स चाहें तो अपना काम भी शुरू कर सकते हैं।
एजुकेशनल लोन
छात्रों को प्रमुख राष्ट्रीयकृत, प्राइवेट अथवा विदेशी बैंकों द्वारा एजुकेशन लोन प्रदान किया जाता है। छात्र को जिस संस्थान में एडमिशन लेना होता है, वहां से जारी एडमिशन लेटर, हॉस्टल खर्च, ट्यूशन फीस एवं अन्य खर्चों का ब्योरा बैंक को देना होता है। साथ ही अभिभावक का आय संबंधी प्रमाण पत्र बतौर गारंटर जमा कराना अनिवार्य है। हर बैंक की अपने नियम व शर्तें हैं।
एक्सपर्ट व्यू
तेजी से बढ़ रहा है स्कोप
खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित हो जाने के बाद इस इंडस्ट्री में कई तरह के बदलाव आएंगे। मसलन, असंगठित क्षेत्र की कंपनियों को संगठित क्षेत्र के दायरे में लाने, कंपनियों को क्वालिटी पर विशेष ध्यान देने व प्रोसेसिंग को और मजबूत बनाने संबंधित कार्य प्रमुखता से होंगे। ऐसी संभावना बन रही है कि डिप्लोमा करने वाले छात्रों को भी आसानी से जॉब मिल सकेगी। पिछले कुछ सालों में सरकारी क्षेत्रों के साथ-साथ टीचिंग में भी स्कोप बढम है। इंडस्ट्री में क्वालिफाइड प्रोफेशनल्स की डिमांड भी बढ़ी है।
डॉ. एके सिंह, सीनियर साइंटिस्ट, एनडीआरआई, करनाल, हरियाणा
फैक्ट फाइल
कहती है इंडस्ट्री

भारत में फूड इंडस्ट्री का काफी विस्तृत बाजार है। इसकी स्थापना 1942 में हुई थी। जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ इस इंडस्ट्री का दायरा भी बढ़ता जा रहा है। भारत के कृषि प्रधान देश होने का बड़ा फायदा इस इंडस्ट्री को भी मिलता है।
फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) की रिपोर्ट के अनुसार 2010 में जहां फूड इंडस्ट्री का बाजार 8,14,500 करोड़ था वहीं 2015 तक इसके 11,60,000 करोड़ (30 प्रतिशत ग्रोथ की दर से) तक पहुंचने की उम्मीद है।
यह भी संभावना जताई जा रही है कि 2020 तक इसमें 23 प्रतिशत ग्रोथ के साथ इसका इसका बाजार 14,30,000 करोड़ तक पहुंच जाएगा।
देश में फलों-सब्जियों की प्रोसेसिंग और बेकरी प्रोडक्ट का बड़ा स्पेक्ट्रम मौजूद है। एक आंकड़ों की मानें तो भारत विश्व में फलों के उत्पादन में 9 प्रतिशत, सब्जियों में 9.3 प्रतिशत योगदान देता है।
प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान
नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीटय़ूट, करनाल, हरियाणा
वेबसाइट
: www.ndri.res.in
यूनिवर्सिटी ऑफ दिल्ली, दिल्ली
वेबसाइट
: www.du.ac.in
गोविन्द बल्लभ पंत यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी, पंतनगर
वेबसाइट:
 www.gbpuat.ac.in
सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीटय़ूट, मैसूर
वेबसाइट:
 www.cftri.com
सीएसके कृषि विश्वविद्यालय, हिमाचल प्रदेश
वेबसाइट:
 www.hillagric.ac.in
एसएनडीटी वुमन यूनिवर्सिटी, मुंबई
वेबसाइट
: www.sndt.ac.in
गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर
वेबसाइट
: www.gndu.ac.in

Monday, August 3, 2015

व्यंग्य चित्रकारी में बना सकते हैं करियर

नई दिल्ली। व्यंग्य चित्रकार (व्यंग्य चित्रकार) की नजर बड़ी पैनी होती है। गम्भीर विषयों को रोचग ढंग से चित्रण की गहन जानकारी होती है, ताकि पाठक पर अभीष्ट प्रभाव पड़ सके। विनोदप्रियता, विवेक, समाज में विद्यमान असंगतियों को मापने की योग्यता, राजनीतिज्ञों की मूर्खता, सामाजिक, आर्थिक व्याकुलता आदि होना जरूरी है, ताकि विषय को सर्वाधिक प्रभावशाली एवं चुटीले ढंग से व्यक्त किया जा सके। इस प्रकार व्यंग चित्रकार सशक्त पत्रकार होता है।

वह कारगर ढंग से सम्प्रेषण के लिए इस दृश्यात्मक/प्रत्यक्ष माध्यम का इस्तेमाल करता है। दूसरे शब्दों में, कार्टूनिंग की कला प्रत्यक्ष माध्यम के जरिए विनोदपूर्ण ढंग से व्यंग्य कसना या व्यंग्य लेख लिखने की प्रतिभा है, इसका विकास किया जा सकता है।

सृजनात्मक कार्य करने के लिए सामाजिक-आर्थिक तथा राजनीतिक वातावरण की गहन समझ होना जरूरी है। व्यक्ति ललित या व्यावसायिक कला की पृष्ठभूमि या सरल शब्दों में कहें तो प्रतिभा से ही कला में पारंगत हो सकता है, बशर्ते उसमें कार्टून या प्रत्यक्ष तस्वीर के माध्यम से सूक्ष्म या महत्वपूर्ण संदेश देने की योग्यता हो।

आज श्रव्य-दृश्य मीडिया के प्रसार के कारण कम्प्यूटर और नेटवर्क पर आधारित अनुप्रयोगों की वजह से कॉमिक स्ट्रिप्स तैयार की जा सकती है। टेलीविजन, रुपहले परदे पर प्रिंट मीडिया के लिए कार्टून फिल्में बनाई जा सकती हैं।

अमूल मक्खन तथा एयर इंडिया महाराजा जैसे कुछ उल्लेखनीय विज्ञापनों में इस मीडिया का कारगर ढंग से इस्तेमाल हुआ है। यह अभियान लोकप्रिय होने के साथ-साथ संदेश पहुंचाने में भी सफल हुए।

आप कल्पना कर सकते हैं कि यदि किसी समाचार-पत्र में कार्टून नहीं होता तो खून-खराबा, प्राकृतिक आपदओं, दुर्घटनाओं कर संबंधी छापों आदि से भरी निराशाजनक खबरों के कारण समाचार-पत्र कितना उबाऊ होता।

सम्पादकीय लेख, कार्टून तथा राजनीतिज्ञों के व्यंग्य-चित्रों में निर्भीक होकर व्यंग्य शैली में सामाजिक बुराइयों और कमियों को उभारा जाता है या टिप्पणी की जाती है। कॉमिक कलाकार में विनोदप्रियता का गुण होता है। हल्के-फुल्के रोचक ढंग से खबरें प्रस्तुत की जाती हैं।

टीवी एवं फिल्मों में दिखाए जाने वाले सजीव कार्टून ‘मोशन व्यंग चित्रकार’ द्वारा तैयार किए जाते हैं। ये व्यंग्य चित्रकार रहस्यों को प्रकट करते हैं, परियों की कहानियां चित्रित करते हैं, बच्चों की कहानियां तैयार करते हैं। बच्चे इस रचना जगत के वशीभूत हो जाते हैं। मोशन पिक्चर्स, विज्ञापन तथा टीवी और कुछ सीमा तक नेटवर्क पर ये कार्टून लोकप्रिय हैं।

इसमें सृजनात्मक शक्ति को सर्वोत्तम ढंग से अभिव्यक्त किया जाता है, क्योंकि कलाकार इस सशक्त माध्यम का अपने ढंग से प्रयोग करता है। प्रयोग की विधि के अनुसार यह रूप लोकप्रिय होता है, फिर चाहे जन-साधारण तक बढ़ती आबादी पर नियंत्रण पाने का संदेश हो अथवा बच्चों को यह नैतिक शिक्षा देनी हो कि वे कर्तव्यनिष्ठ हों, कर्मठ हों या ईमानदार बनें या ऐसी रचना का लक्ष्य मात्र मनोरंजन करना हो।

स्कूल स्तर से पूर्व स्तर या स्कूली बच्चों को देशभक्ति आदि जैसे मूल्य सिखाने के लिए कार्टून को शिक्षा के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि इससे रचनाशील मस्तिष्क पर स्थाई प्रभाव पड़ता है। कार्टून के माध्यम से एड्स नियंत्रण, सुरक्षित स्वास्थ्य प्रक्रियाओं आदि से संबंधित संदेश लोगों तक पहुंचाए जाते हैं।

योग्यता:

10+2 परीक्षा के बाद कार्टूनिंग को कैरियर के रूप में चुना जा सकता है, हालांकि बारहवीं कक्षा तक पढ़ाई करना आदर्श रहता है। इसके बाद ही यह पाठ्यक्रम किया जाए। मल्टी मीडिया पाठ्यक्रम से तकनीकी पहलुओं को समझने में सहायता मिलती है। तब व्यक्ति विभिन्न सॉफ्टवेयर पैकेज का इस्तेमाल करने का आदी हो जाता है।

तथापि कॉमिक रूपों के आरेखन की कला के लिए किसी औपचारिक प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती है, बशर्ते व्यक्ति में चित्र बनाने, मूल रूप में चित्रण, हास्य शैली में सामाजिक, राजनीतिक संकट एवं विपत्तियों को व्यक्त करने की प्रतिभा हो, जिससे जनता में रुचि जाग्रत हो तथा उसकी कल्पना-शक्ति प्रस्फुटित हो। ऐसा ही व्यक्ति सफल व्यंग चित्रकार बन सकता है।

रोजगार की सम्भावनाएं:

व्यंग्य चित्रकार और एनीमेटर (सजीव चित्रकार) के लिए पब्लिशिंग संस्थानों में नौकरियां उपलब्ध रहती हैं। इसके अलावा पत्रिकाओं, विज्ञापन एजेंसियों, श्रव्य-दृश्य मीडिया और समाचार-पत्रों में भी काफी सम्भावनाएं विद्यमान हैं। यदि व्यक्ति के पास प्रतिभा एवं कल्पना-शक्ति है तो उसका भविष्य उज्जवल है। लेकिन ऐसे कार्यों के लिए बड़े शहरों में ही ज्यादा मांग है। बाधा यही है कि सम्पादकीय कार्य में काफी स्वतंत्रता की जरूरत है लेकिन सौंपे गए कार्य को कर्मचारियों में बांटकर करवाना पड़ता है।

कम्प्यूटर सहायता प्राप्त डिजाइन (सीएडी) प्रौद्योगिकी का श्रव्य-दृश्य प्रस्तुतीकरण में व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किया जाता है। इस संबंध में कड़ी स्पर्धा है, लेकिन उच्च कोटि के कार्य से व्यक्ति को अपनी पसंद का कार्य मिलने में सहायता मिलती है।

भारत में व्यंग्य चित्रकार का कार्यक्षेत्र अभी प्रारम्भिक अवस्था में है। इसकी तुलना चार दर्शक पूर्व ‘पंच’ एवं ‘न्यूयॉर्कर’ से की जा सकती है। प्रारम्भ में व्यंग्य चित्रकार को पैर जमाने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है लेकिन एक बार शुरुआत हो जाने पर पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ती।

संस्थान:

भारत में आर.के. लक्ष्मण, सुधीर तैलंग, रंगा, राजिंद्र पुरी, राशि काल्दा जैसे कुछ नाम उल्लेखनीय है। ये पाठ्यक्रम निम्नलिखित संस्थानों में चलाए जा रहे हैं-

1. शंकर अकादमी ऑफ आर्ट, बहादुर शाह जफर मार्ग, नई दिल्ली।
2. ए.पी.जे. इंस्टीच्यूट ऑफ डिजाइन, 54, तुगलकाबाद इंस्टीट्यूशनल एरिया, एम. बी. रोड, नई दिल्ली-110 062।
3. द दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट, तिलक मार्ग, नई दिल्ली 110 001।
4. सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट, डॉ. डी. एन. रोड, मुम्बई-400 001।
5. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन, पालदी, अहमदाबाद।
6. जाइका स्टूडियो, एसेल वर्ल्ड, गोराई आईलैंड, बोरीचाली (पश्चिम), मुम्बई-400 091।
7. द केरल कार्टून अकादमी, चित्तूर रोड, ऑफ कोची, केरल।

Saturday, August 1, 2015

बायोइन्फॉर्मेटिक्स में कैरियर

20 वीं शताब्दी के शुरुआत में जहां एक बार में एक ही जीन तथा प्रोटीन के बारे में अध्ययन सम्भव था , वहीं अब एक ही बार में जीन की पूरी संरचना को जानना सम्भव है। पहले जहां एक-एक केमिकल और ड्रग्स का अध्ययन अलग-अलग करना पड़ता था , वहीं अब करीब पांच लाख केमिकल कम्पाउंडों के बारे में एक या दो सप्ताह में ही जाना जा सकता है। जाहिर है , इतने बड़े पैमाने पर किए गए अध्ययन से मिलने वाले आंकड़ों को व्यवस्थित रूप से रखना और दूसरे लोगों की जानकारी के लिए सुविधाजनक बनाना जरूरी है। वह शख्स , जो इसे सम्भव बनाता है , वह है - बायोइन्फॉर्मेटिक्स विशेषज्ञ। एक बायोइन्फॉर्मेटिक्स सूक्ष्म जीव विज्ञानी और कम्प्यूटर प्रोग्रामर का एकीकृत रूप है। 
बायोइन्फॉर्मेटिक्स एक उभरता हुआ क्षेत्र है और इसका उपयोग मुख्य रूप से ड्रग डिजाइन , जीन थेरेपी ,डायग्नोस्टिक , क्रॉप इम्प्रूवमेंट , बॉयोकेमिकल प्रोसेस जैसे जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में होता है । जैव प्रौद्योगिकी में आंकड़ों के विश्लेषण के लिए सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें खास तौर पर प्रोटीन मॉलीक्यूल्स और जीनोम के लिए व्यापक इलेक्ट्रॉनिक्स डाटा बेस का निर्माण तथा बायोमॉलीक्यूल और बायोलॉजिक सिस्टम का त्रिआयामी चित्रण होता है । 
भारत में ऑन लाइन या ऑफ लाइन तरीकों से , जैवकीय आंकड़ों के बेहतर इस्तेमाल के लिए एक नेशनल बायोइन्फॉर्मेटिक्स नेटवर्क (एनबीएन) का विकास किया गया है , जिसमें एक प्रधान केंद्र , दस डिस्ट्रीब्यूटेड इन्फॉर्मेशन सेंटर (डीआईसी) तथा 44 उप सेंटर शामिल हैं। 
शिक्षण तथा प्रशिक्षण 
बायोइन्फॉर्मेटिक्स एक ऐसी विद्या है , जिसका अब भी दुनिया भर में विस्तार हो रहा है। भारत में विज्ञान या चिकित्सा विज्ञान , इंजीनियरिंग कृषि , फॉर्मेसी तथा इससे सम्बंधित स्नातकों के लिए एक वर्षीय एडवांस पोस्ट डिप्लोमा कोर्स का चयन सबसे उपयुक्त है। कुछ विश्वविद्यालयों द्वारा चलाए जा रहे औपचारिक पाठ्यक्रमों के अलावा कई अनौपचारिक प्रशिक्षण भी चलाए जा रहे हैं । लेकिन कोर्स करने के लिए बायोलॉजी के साथ-साथ कंप्यूटर की अच्छी जानकारी होना भी बेहद जरूरी है। जीव विज्ञान की पृष्ठभूमि और कंप्यूटर की बेहतर समझ रखने वाले छात्रों के लिए बायोइन्फॉर्मेटिक्स एक अच्छा विकल्प हो सकता है। 
कुछ औपचारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम 

पुणे विश्वविद्यालय के बायोइन्फॉर्मेटिक सेंटर की स्थापना 1987 में की गई थी। यहां बायोइन्फॉर्मेटिक्स में एक वर्ष का एडवांस डिप्लोमा कोर्स कराया जाता है। 
योग्यता : किसी भी विज्ञान विषय- एमबीएससी , एमएससी (कृषि) , एमफॉर्मा , एमडी , एमई , एमसीए या बीई ,एमबीबीएस अथवा बीटेक में 60 प्रतिशत अंकों के साथ पोस्ट ग्रेजुएट करने वाले छात्र दाखिले के लिए आवेदन कर सकते हैं। आरक्षित वर्ग के छात्रों के लिए छूट दी गई है। 55 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाले आरक्षित वर्ग के छात्र दाखिले के लिए आवेदन कर सकते हैं। दाखिले के लिए आवेदन करने वाले छात्रों का चयन प्रवेश परीक्षा के आधार पर किया जाता है। विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा का आयोजन हर साल जून महीने में करता है। प्रश्नपत्र दो भागों (सेक्शन ए और बी) में बंटा होता है , जिसमें बहुविकल्पीय और व्याख्यात्मक दोनों तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। प्रवेश परीक्षा का निर्धारित समय दो घंटे का होता है। 
परीक्षा पत्र के सेक्शन ए में बहुविकल्पीय प्रश्नपत्र होते हैं , जिसमें बारहवीं तक के पाठ्यक्रम के आधार पर प्रश्न पूछे जाते हैं। प्रश्नपत्र में तर्कबुद्धि परीक्षा , रीजनिंग और अंग्रेजी विषय से सम्बंधित प्रश्न होते हैं। सेक्शन ए के सभी प्रश्न अनिवार्य होते हैं। 
सेक्शन बी में व्याख्यात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं , जिसमें भौतिक , रसायन , सूक्ष्म जीव विज्ञान , जैव , भौतिकी , गणित तथा सांख्यिकी के प्रश्न शामिल होते हैं। सेक्शन बी में पूछे गए करीब 75 प्रश्नों में से 90 प्रश्नों का उत्तर करीब 100-150 शब्दों में देना होता है। 
बायोइन्फार्मेटिक्स सेंटर , 
पुणे विश्वविद्यालय , पुणे - 411007 
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय 
यहां बायो इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर (बीआईसी) 1989 में स्थापित किया गया था। बीआईसी जेनेटिक इंजीनियरिंग , जैव भौतिकी , जैव प्रौद्योगिकी तथा बायोकम्प्यूटिंग जैसे विभिन्न क्षेत्रों में शोध तथा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 
योग्यता: जीव विज्ञान की किसी भी शाखा जैसे बायो केमस्ट्री , बायो फिजिक्स , माइक्रोबायोलॉजी , मॉलीक्यूलर बायोलॉजी , बायो टेकनेलॉजी , लाइफ साइंसेज , बॉटनी , जूलॉजी , एमबीबीएस में द्वितीय श्रेणी (कम से कम 55प्रतिशत अंक तथा समानांतर ग्रेड) में स्नातक और दसवीं कक्षा तक गणित का अनिवार्य विषय के रूप में अध्ययन होना जरूरी है। प्रवेश परीक्षा मई में आयोजित की जाती है। इस परीक्षा में कम्प्यूटर जीनोमिक्स , मॉलीक्यूलर ,मॉडलिंग , स्टेटिस्टीकल मेथड्स , कम्पयूटेशन टेकनीक आदि विषयों से सम्बंधित प्रश्न पूछे जाते हैं। बीआईसी में प्रवेश परीक्षा की सूचना फरवरी में दी जाती है। 
बायोइन्फॉर्मेटिक्स सेंटर स्कूल ऑफ बायोटेकनेलॉजी 
मदुरई कामराज यूनिवर्सिटी पलकलई नगर , मदुरई- 625021 
पाठ्यक्रम: बायोइन्फॉर्मेटिक्स में एक वषीर्य एडवांस डिप्लोमा कोर्स 
योग्यता: भौतिक , रसायन , गणित , बायोटेकनेलॉजी , माइक्रोबायोलॉजी , फॉमेर्कोलॉजी , कम्प्यूटर साइंस आदि में स्नातकोत्तर (एमए) या किसी भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से एमटेक या एमबीबीएस डिग्रीधारी आवेदन कर सकते हैं। इंडस्ट्री स्पॉन्सर्ड उम्मीदवार भी दाखिला ले सकते हैं। चयनित उम्मीदवार को हजार रुपये छात्रवृत्ति दी जाती है। उम्मीदवारों का चयन प्रवेश परीक्षा और साक्षात्कार के आधार पर किया जाता है। 
प्रस्तुति: सरोज सिंह

Thursday, July 30, 2015

फिजियोथेरेपी: पैसा भी, सेवा भी

आज के युग में लोग बीमारी का इलाज करने के लिए दवाइयों का प्रयोग कम से कम करना चाहते हैं, जिसके चलते फिजियोथेरेपिस्ट की माँग में इजाफा हुआ है। फिजियोथेरेपी फिजिकल थेरेपी का दूसरा नाम है। यह एक तेजी से उभरता क्षेत्र है जिसमें बीमारियों का उपचार दवाइयों को छोड़ व्यायाम करके किया जाता है। यह चिकित्सा संबंधित क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। 

फिजियोथेरेपी वह विज्ञान है जिसमें शरीर के अंगों को दवाइयों के बिना ही ठीक ढंग से कार्य कराया जाता है। एक फिजियोथेरेपिस्ट का मुख्य काम शारीरिक कामों का आकलन, मेंटिनेंस और रिस्टोरेशन करना है। फिजियोथेरेपिस्ट वाटर थेरेपी, मसाज आदि अनेक प्रक्रियाओं के द्वारा रोगी का उपचार करता है। 

विज्ञान क्षेत्र के छात्र इस क्षेत्र में बना सकते हैं। फिजियोथेरेपिस्ट बनने के लिए मुख्य रूप से दो कोर्सेस बीपीटी, बैचलर ऑफ फिजियोथेरेपी और एमपीटी, मास्टर ऑफ फिजियोथेरेपी होते हैं। इस कोर्स के आखिरी छह महीने में छात्र को किसी हॉस्पिटल से इंटर्नशिप करवाई जाती है। 

एक प्रेक्टिसिंग फिजियोथेरेपिस्ट या किसी अस्पताल और क्लिनिक में काम करने के लिए कम से कम बीएससी डिग्री होनी आवश्यक है। 12वीं पास छात्र इस क्षेत्र से जुड़ा कोर्स कर सकते हैं बशर्ते उनके भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीवविज्ञान और अंग्रेजी में कम से 50 प्रतिशत अंक हो। इंस्टिट्यूट में एडमिशन के लिए प्रवेश परीक्षा होती है। 

इस कोर्स के अंतर्गत छात्रों को मानव शरीर की संरचना के बारे में समझाया जाता है। इस कोर्स का प्रमुख हिस्सा इंटर्नशिप है जहाँ छात्र किसी प्रोफेशनल की देखरेख में हॉस्पिटल में काम करते हैं। फिजियोथेरेपिस्ट का क्षेत्र बहुत बड़ा है अतः आप किसी एक क्षेत्र में स्पेशलाइजेशन भी कर सकते हैं।

कैलाश अस्पताल की फिजियोथेरेपिस्ट पल्लवी कहती हैं कि एक फिजियोथेरेपिस्ट को बातचीत करने की कला में माहिर होना आवश्यक है क्योंकि उसका काम लोगों से ही जुड़ा है। इसके अतिरिक्त एक अच्छे फिजियोथेरेपिस्ट को धैर्यशील, लंबे समय तक काम करना, अच्छी याददाश्त तथा लोगों को समझने की कला आनी चाहिए। फिजियाथेरेपिस्ट का काम एक सिस्टमेटिक ढंग से काम करने की माँग करता है। 

पल्लवी बताती हैं कि कोई भी व्यक्ति पहली बार में ही ऑपरेशन करवाना नहीं चाहता, जिसके चलते फिजियोथैरेपी एक अहम्‌ भूमिका अदा करता है। एक फिजियोथेरेपिस्ट म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन तथा मेडिकल इंस्टिट्यूट में काम कर सकता है।
कहाँ से करें कोर्स

नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ रिहेबिलिटेशन ट्रेनिंग एंड रिसर्च, उड़ीसा
नेशनल इंस्टिट्यूट फॉर द आर्थियोपेडिकली हैंडीकैन्ट, कलकत्ता
इंस्टिट्यूट ऑफ फिजिकली हैंडीकैंट, नई दिल्ली
पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल रिसर्च, चंडीगढ़
सांचती कॉलेज ऑफ फिजियोथैरेपी, पुणे
रविनैय्यर कॉलेज ऑफ फिजियोथैरेपी, वर्द्धा
वीपीएसम कॉलेज ऑफ फिजियोथैरेपी, नागपुर
एसएसबी कॉलेज ऑफ फिजियोथैरेपी, अहमदाबाद
के. एम. पटेल इंस्टिट्यूट ऑफ फिजियोथैरेपी, गोकुल नगर
डॉ. डीवाई पटेल कॉलेज ऑफ फिजियोथैरेपी, पु

Wednesday, July 29, 2015

इवेंट मैनेजर

यदि  किसी की पार्टियों को रोशन करने में रूचि है, और वह इसमें करियर भी बनाना चाहता है, तो इवेंट मैनेजर एक अच्च्छा विकल्प है। ग्रेजुएशन के बाद एक साल का कोर्स करके इवेंट मैनेजर बना जा सकता है। पहले इवेंट मैनेजर की मांग केवल कॉर्पोरेट क्षेत्र के आयोजनों में ही होती थी, लेकिन अब छोटे शहरों में भी मैरिज, बर्थ डे, वेडिंग रिसेप्शन, एनिवर्सरीज, प्राइवेट पार्टीज की बढ़ती संख्या को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस फील्ड में बेहतर करियर है।

कार्य
इवेंट मैनेजमेंट से जुड़े लोग किसी व्यवसायिक या सामाजिक समारोह को एक खास वर्ग के दर्शकों के लिए आयोजित करते हैं। इसके अंतर्गत मुख्य रूप से फैशन शो, संगीत समारोह, विवाह समारोह, थीम पार्टी, प्रदर्शनी, कॉर्पोरेट सेमिनार, प्रोडक्ट लॉन्चिंग, प्रीमियर आदि कार्यक्रम आते हैं। एक इवेंट मैनेजर समारोहों का प्रबंधन करता है और क्लाइंट या कंपनी के बजट के अनुरूप सुविधाएं प्रबंध करने का जिम्मा लेता है। इवेंट मैनेजमेंट कंपनी किसी पार्टी या समारोह की प्लानिंग से लेकर उसे इम्प्लीमेंट करने तक का काम करती है। होटल या बैंक्वेट हॉल बुक करने, साज-सज्जा, एंटरटेनमेंट, ब्रेकफास्ट /लन्च/डिनर के लिए खास तरह के मेन्यू तैयार करवाने, अतिथियों का स्वागत, भांति-भांति से सत्कार आदि की व्यवस्था इवेंट मैनेजमेंट ग्रुप में शामिल लोगों को करनी होती है।

कोर्स व योग्यता
इवेंट मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए कई तरह के कोर्स चलाए जा रहे हैं। इनमें डिप्लोमा इन इवेंट मैनेजमेंट (डीईएम) एक वर्ष की अवधि का कोर्स है, जिसमें एडमिशन के लिए कम से कम किसी भी स्ट्रीम में स्नातक होना जरूरी है। पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन इवेंट मैनेजमेंट (पीजीडीईएम) भी एक वर्ष का कोर्स है और इसके लिए भी कंडीडेट का स्नातक होना जरूरी है। इसके अलावा, 6-6 माह के सर्टिफिकेट और डिप्लोमा कोर्स भी चलाए जा रहे हैं, जिनमें प्रवेश के लिए न्यूनतम योग्यता बारहवीं है। अधिकतर संस्थानों में ये सभी कोर्स पार्ट टाइम में करने की भी सुविधा है, जिसे किसी जॉब या अन्य कोर्स की पढ़ाई के साथ-साथ भी किया जा सकता है। अब इस क्षेत्र में एमबीए की डिग्री भी दी जाने लगी है, जो इवेंट मैनेजमेंट के लिए सबसे असरदार डिग्री है। फिलहाल ये कोर्स हर जगह सुलभ नहीं हैं। ऐसे में किसी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में ट्रेनिंग लेकर काम सीखा जा सकता है और अनुभव हासिल करने के बाद रेगुलर जॉब या अपनी खुद की इवेंट मैनेजमेंट कंपनी संचालित की जा सकती है।

व्यक्तिगत गुण
इवेंट मैनेजमेंट में किस्मत संवारने के लिए किसी विशेष योग्यता की जरूरत नहीं है। सिर्फ कुशल प्रबंधन क्षमता एवं नेटवर्किग स्किल्स कामयाब बना सकता है। ऐसे स्नातक छात्र, जिनमें जनसंपर्क और संयोजन का हुनर हो, वह आसानी से इस व्यवसाय से जुड़ सकते हैं।

अवसर
वर्तमान समय में 300 से अधिक इवेंट मैनेजमेंट कंपनियां भारत में काम कर रही हैं। अनुमान है कि इस समय देश में इसका कारोबार 60-70 प्रतिशत वार्षिक की दर से बढ़ रहा है।

कमाई
फ्रेशर्स आसानी से कम से कम 10,000 रुपये प्रति माह कमा सकते हैं। और यदि किसी बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई, तो 15,000 रुपये या इससे ज्यादा भी मिल सकते हैं। अनुभव प्राप्त करने के बाद इवेंट मैनेजर के पद पर पहुंच सकते हैं, तब एक महीने में ही एक लाख रुपये कमाया जा सकता है। और यदि कंपनी खोल ली जाय, तो अच्छी कमाई के साथ अपना भविष्य तो बना ही सकते हैं साथ ही दूसरों का भी भविष्य बुलंद कर सकते हैं। सच तो यह है कि यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें वेतन और कमाई की कोई सीमा नहीं है।

संस्थान
 1. एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ इवेंट मैनेजमेंट, नई दिल्ली
 2. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इवेंट मैनेजमेंट, मुंबई
 3. इवेंट मैनेजमेंट डेवलॅपमेंट इंस्टीट्यूट, मुंबई
 4. नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर मीडिया स्टडीज, अहमदाबाद
 5. इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी, नई दिल्ली
 6. कॉलेज ऑफ इवेंट एंड मैनेजमेंट, पुणे
 7. इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इवेंट मैनेजमेंट, मुंबई
 8. नेशनल एकेडमी ऑफ इवेंट मैनेजमेंट एंड डेवलॅपमेंट, जयपुर
 9. इंटरनेशनल सेंटर फॉर इवेंट मार्केटिंग एंड मार्केटिंग, नई दिल्ली
 10. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इवेंट मैनेजमेंट, मुंबई

Tuesday, July 28, 2015

फार्मेसी सेक्टर में सुनहरा भविष्य

दवाओं के वितरण से लेकर मार्केटिंग, पैकेजिंग, मैनेजमेंट, सभी फार्मास्युटिकल के अहम हिस्से हैं। क्लिनिकल रिसर्च आउटसोर्सिग यानी ‘ओआरजी’ रिसर्च फर्म के मुताबिक भारतीय फार्मा उद्योग 12-13 फीसदी की दर से वृद्घि कर रहा है। इस बात को मैकिंजे की रिपोर्ट भी पुख्ता करती है। मैकिंजे की रिपोर्ट के मुताबिक 2020 तक इस उद्योग में तीन गुणा बढ़ोत्तरी होगी। ये तो रिपोर्ट है। वैसे फिलवक्त भारत का फार्मास्युटिकल उद्योग 24 हजार करोड़ रुपये से अधिक का है, जिसमें निर्यात भी शामिल है। वर्ष 2005 में देश की फार्मा इंडस्ट्री का कुल प्रोडक्शन करीब 9 बिलियन डॉलर था, जो वर्ष 2010 तक 25 बिलियन तक पहुंच गया। इसकी वाजिब वजह भी है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान हमारे देश में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ी है। आज स्वास्थ्य सुविधाओं का तेजी से विस्तार हो रहा है। इतना ही नहीं, फार्मा इंडस्ट्री में भारत का रुतबा अब सिर्फ रिसर्च एंड डेवलपमेंट तक ही सीमित नहीं रह गया है। मैन्युफैक्चरिंग, क्लिनिकल ट्रायल, जेनेटिक ड्रग रिसर्च के क्षेत्र में भी खूब होने लगा है। इतना ही नहीं फार्मास्युटिकल क्षेत्र आज दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते उद्योग में शुमार होने लगा है।
शैक्षणिक योग्यता
सौ से अधिक संस्थानों में डिग्री और 200 से अधिक संस्थानों में डिप्लोमा कोर्स चलाए जा रहे हैं। फार्मा के क्षेत्र में अगर करियर बनाना है तो इसके लिए न्यूनतम योग्यता है 12वीं और न्यूनतम अंक हैं 50 प्रतिशत। यानी विज्ञान विषय (जीव विज्ञान) के साथ 12वीं पास कर चुके हैं तो आप फार्मा के क्षेत्र में करियर बना सकते हैं। दो साल के डीफार्मा या चार साल के बीफार्मा कोर्स में दाखिला ले सकते हैं।
कोर्स
बीफार्मा, डीफार्मा, एमबीए इन फार्मा, बीबीए इन फार्मा, पीजी डिप्लोमा इन फार्मास्युटिकल एंड हेल्थ केयर मार्केटिंग, डिप्लोमा इन फार्मा मार्केटिंग, एडवांस डिप्लोमा इन फार्मा मार्केटिंग एवं पीजी डिप्लोमा इन फार्मा मार्केटिंग जैसे कोर्स भी चल रहे हैं। फार्मा रिसर्च में स्पेशलाइजेशन के लिए एनआईपीईआर यानी नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ फार्मा एजुकेशन एंड रिसर्च जैसे संस्थानों में प्रवेश ले सकते हैं।
समय सीमा
यूं तो किसी भी फैकल्टी के छात्र इस कोर्स के लिए योग्य हैं, लेकिन विज्ञान संकाय बीएससी, बीफार्मा और डीफार्मा वालों को अधिक प्राथमिकता मिलती है। वैसे फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री में सिर्फ बीफार्मा और डीफार्मा सरीखी डिग्री धारकों को ही जगह नहीं मिलती है, बल्कि कैमिस्ट्री, जूलोजी और बॉटनी पढ़े युवाओं को भी खूब रोजगार मिल रहे हैं। ये अवसर अनुसंधान, शोध और फार्मा प्रोडक्शन से जुड़े हैं। कुछ विश्वविद्यालयों में फार्मा मैनेजमेंट में दो वर्षीय एमबीए पाठयक्रमों की शुरुआत की गई है, जिसमें प्रवेश के लिए स्नातक होना जरूरी है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया में मार्केटिंग में विशेषज्ञता के साथ एमफार्मा कोर्स उपलब्ध है। कुछ जगहों पर बीबीए (फार्मा मैनेजमेंट) कोर्स भी चलाया जा रहा है। यह तीन वर्षीय स्नातक कोर्स है, जिसमें छात्र 12वीं के बाद प्रवेश ले सकते हैं। डीफार्मा और बीफार्मा कोर्स में दवा के क्षेत्र से जुड़ी उन सभी बातों की थ्योरिटिकल और प्रायोगिक जानकारी दी जाती है, जिनका प्रयोग आमतौर पर इस उद्योग के लिए जरूरी होता है। इसके साथ फार्माकोलॉजी, इंडस्ट्रियल कैमिस्ट्री, हॉस्पिटल एंड क्लिनिकल फार्मेसी, फार्मास्युटिकल, हेल्थ एजुकेशन, बायोटेक्नोलॉजी आदि विषयों की जानकारी दी जाती है।
रिसर्च एंड डेवलपमेंट
फार्मास्युटिकल्स के क्षेत्र में हिन्दुस्तान की तेजी देखते ही बनती है। यहां नई-नई दवाइयों की खोज व विकास संबंधी कार्य किया जा रहा है। रिसर्च एंड डेवलपमेंट की बात करें तो जेनेटिक उत्पादों के विकास, एनालिटिकल आरएंडडी, एपीआई (एक्टिव फार्मास्युटिकल इन्ग्रेडिएंट्स) या बल्क ड्रग आरएंडडी क्षेत्र शामिल हैं।
ड्रग मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर
ड्रग मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर फार्मा इंडस्ट्री की खास शाखा है, जो छात्रों को आगे बढ़ने के बेहतर अवसर मुहैया कराती है। आप चाहें तो इस क्षेत्र में मॉलिक्युलर बायोलॉजिस्ट, फार्माकोलॉजिस्ट, टॉक्सिकोलॉजिस्ट या मेडिकल इन्वेस्टिगेटर बन कर अपना भविष्य संवार सकते हैं। मॉलिक्युलर बायोलॉजिस्ट जीन संरचना के अध्ययन और मेडिकल व ड्रग रिसर्च संबंधी मामलों में प्रोटीन के इस्तेमाल का अध्ययन करता है, जबकि फार्माकोलॉजिस्ट का काम इंसान के अंगों व उत्तकों पर दवाइयों व अन्य पदार्थो के प्रभाव का अध्ययन करना होता है।
फार्मासिस्ट
फार्मासिस्ट पर दवाइयों और चिकित्सा संबंधी अन्य सहायक सामग्रियों के भंडारण और वितरण का जिम्मा होता है, जबकि रिटेल सेक्टर में फार्मासिस्ट को एक बिजनेस मैनेजर की तरह काम करते हुए दवा संबंधी कारोबार चलाने में समर्थ होना चाहिए।
ब्रांडिंग एंड सेल्स
फार्मास्युटिकल सेक्टर में मार्केटिंग की काफी अहम भूमिका है। फार्मेसी की पृष्ठभूमि से जुड़ा कोई प्रोफेशनल, एमबीए डिग्रीधारी, यहां तक कि साइंस की डिग्री प्राप्त करने वाला भी सेल्स एंड मार्केटिंग में करियर बना
सकता है।
क्लिनिकल रिसर्च
कोई नई दवा ईजाद करने से पहले यह भी ध्यान रखा जाता है कि वह दवा लोगों के लिए कितनी सुरक्षित और असरदार हो सकती है। इसके लिए टीम गठित होती है और फिर क्लिनिकल ट्रायल होता है। खास बात यह कि सस्ते में प्रोफेशनल्स मिल जाते हैं। इसकी वजह से क्लिनिकल के कारोबार में भी तेजी आई है। इतना ही नहीं, इसकी शौहरत अब पूरे विश्व में पहुंच चुकी है। यही कारण है कि कई नामी विदेशी कंपनियां क्लिनिकल रिसर्च के लिए भारत आ रही हैं। दवाइयों की स्क्रीनिंग संबंधी काम में नई दवाओं या फॉर्मुलेशन का पशु मॉडलों पर परीक्षण करना या क्लिनिकल रिसर्च करना शामिल है, जो इंसानी परीक्षण के लिए जरूरी है।
क्वालिटी कंट्रोल
नई-नई दवाओं के संबंध में अनुसंधान व विकास के अलावा यह सुनिश्चित करने की भी जरूरत होती है कि इन दवाइयों के जो नतीजे बताए जा रहे हैं, वे सुरक्षित, स्थायी और आशा के अनुरूप हैं। यह काम क्वालिटी कंट्रोल के तहत आता है।
फैक्ट फाइल
प्रमुख संस्थान
दिल्ली इंस्टीट्यूट ऑफ फर्मास्युटिकल साइंस एंड रिसर्च, नई दिल्ली
वेबसाइट
: www.dipsar.in
जामिया हमदर्द, नई दिल्ली
वेबसाइट
: www.jamiahamdard.edu/pharma.asp
इनवोटेक फार्मा बिजनेस स्कूल, दिल्ली
वेबसाइट
: www.ipbs.in
नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ फार्मास्यूटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, मोहाली
वेबसाइट:
 www.niper.ac.in
जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस साइंटिफिक रिसर्च, बेंगलुरू
वेबसाइट
: www.jncasr.ac.in
करियर ऑप्शन/संभावनाएं
भारत में इस समय 30हजार से भी अधिक रजिस्टर्ड फार्मास्युटिकल कंपनियां हैं। नए-नए उत्पादों के आने के कारण यह क्षेत्र आज सर्वाधिक संभावनाओं से भरा है। कार्य प्रकृति के आधार पर इसे तीन क्षेत्रों में बांटा गया है। पहला उत्पादन संबंधी कार्य, दूसरा प्रशासनिक कार्य और तीसरा सेल्स व मार्केटिंग। इसमें दक्ष युवा देसी-विदेशी कंपनियों में मार्केटिंग एग्जिक्युटिव, प्रोडक्ट एग्जिक्युटिव, बिजनेस एग्जिक्युटिव, ब्रांड एग्जिक्युटिव, प्रोडक्शन कैमिस्ट, क्वालिटी कंट्रोलर, क्वालिटी इंश्योरेंस ऑफिसर जैसे पदों पर नौकरी हासिल कर सकते हैं।
वेतन
प्रशिक्षित लोगों की मांग देखते हुए इस क्षेत्र में सैलरी भी काफी तेजी से बढ़ रही है। रिसर्च और एंट्री लेवल पर सैलरी डेढ़ लाख रुपये वार्षिक मिलती है। मार्केटिंग क्षेत्र में एक फ्रेशर को 3 से 3.5 लाख रुपये वार्षिक मिल जाते हैं। वैसे इस फील्ड में शुरुआती मासिक वेतन 8 से 15 हजार रुपये तक है। छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद इस प्रकार की नौकरियों में भी काफी पैसा मिलता रहा है। जो अपनी फार्मास्युटिकल यूनिट शुरू करना चाहते हैं, उन्हें भी डिग्री के आधार पर लाइसेंस मिल जाता है।
आने वाले समय में फार्मासिस्टों की काफी मांग होगी
एक्सपर्ट व्यू/ सौरभ गुप्ता
डिप्टी डायरेक्टर
इन्वोटेक फार्मा बिजनेस स्कूल
भारत में फार्मेसी का भविष्य बहुत अच्छा है। बहुत-सी बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत आ रही हैं। अगर आपके पास सही शिक्षा और योग्यता है, जिसकी कंपनी में मांग है तो रोजगार कोई समस्या नहीं है। ड्रग रेग्युलेटरी, ड्रग डिस्कवरी, क्लिनिकल फार्मेसी एवं नैनो तकनीकी क्षेत्रों में आने वाले वर्षो में लोगों की खासी जरूरत होगी। जिस तरह आईटी एवं बीपीओ में एक समय रोजगार में बूम आया, अगला बूम फार्मेसी के क्षेत्र में होगा।
फार्मास्युटिकल के क्षेत्र में रोज नए-नए नियम बनाए जा रहे हैं। नई-नई तकनीक विकसित की जा रही है। लैब्स, सॉफ्टवेयर का विस्तार किया जा रहा है। फार्मास्युटिकल रेग्युलेटरी अफेयर के बारे में जानकारी दी जा रही है। इसे कोर्स में भी शामिल किया गया है। सरकार और सरकारी एजेंसियां भी फार्मेसी के क्षेत्र में बेहतर काम कर रही हैं।
फार्मास्युटिकल साइंस में उच्च अध्ययन करने की चाह रखने वालों के लिए विदेशों में स्कॉलरशिप तथा रोजगार के मौके हो सकते हैं। इसके अलावा अध्यापन और शोध संस्थानों में भी गुंजाइश कुछ कम नहीं है। खास बात यह कि फार्मेसी में सिर्फ बीफार्मा या डीफार्मा वालों के लिए ही द्वार नहीं खुले हैं। अगर आपके पास दो साल का फार्मेसी के क्षेत्र में तजरुबा है तो आप इस फील्ड में अपनी किस्मत आजमा सकते हैं, उच्च से उच्च पदों पर जा सकते हैं।