Friday, June 7, 2019

सिविल इंजीनियरिंग में करियर

आज देश प्रगति के पथ पर सरपट दौड़ रहा है। बड़े शहरों के अलावा छोटे शहरों में भी विकास की प्रक्रिया तेजी से चल रही है। रियल एस्टेट के कारोबार में आई चमक ने कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों को रोशन किया है। इन्हीं में से एक प्रमुख क्षेत्र ‘सिविल इंजीनियिरग’ भी है। इंजीनियरिंग के क्षेत्र में कदम रखने वाले अधिकांश छात्र सिविल इंजीनियरिंग की तरफ तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। वह रियल एस्टेट के अलावा भी कई सारे कंट्रक्शन कार्य जैसे पुल निर्माण, सड़कों की रूपरेखा, एयरपोर्ट, ड्रम, सीवेज सिस्टम आदि को अपने कौशल द्वारा आगे ले जाने का कार्य कर रहे हैं।

क्या है सिविल इंजीनियरिंग?
जब भी कोई योजना बनती है तो उसके लिए पहले प्लानिंग, डिजाइनिंग व संरचनात्मक कार्यों से लेकर रिसर्च एवं सॉल्यूशन तैयार करने का कार्य किया जाता है। यह कार्य किसी सामान्य व्यक्ति से न कराकर प्रोफेशनल लोगों से ही कराया जाता है, जो सिविल इंजीनियरों की श्रेणी में आते हैं। यह पूरी पद्धति ‘सिविल इंजीनियरिंग’ कहलाती है। इसके अंतर्गत प्रशिक्षित लोगों को किसी प्रोजेक्ट, कंस्ट्रक्शन या मेंटेनेंस के ऊपर कार्य करना होता है। साथ ही इस कार्य के लिए उनकी जिम्मेदारी भी तय होती है। ये स्थानीय अथॉरिटी द्वारा निर्देशित किए जाते हैं। किसी भी प्रोजेक्ट एवं परियोजना की लागत, कार्य-सूची, क्लाइंट्स एवं कांट्रेक्टरों से संपर्क आदि कार्य भी सिविल इंजीनियरों के जिम्मे होता है।

काफी व्यापक है कार्यक्षेत्र
सिविल इंजीनियरिंगका कार्यक्षेत्र काफी फैला हुआ है। इसमें जरूरत इस बात की होती है कि छात्र अपनी सुविधानुसार किस क्षेत्र का चयन करते हैं। इसके अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में हाइड्रॉलिक इंजी..., मेटेरियल इंजी..., स्ट्रक्चरल इंजी.....,  अर्थक्वेक इंजी., अर्बन इंजी..., एनवायर्नमेंटल इंजी..., ट्रांसपोर्टेशन इंजी... और जियो टेक्निकल इंजीनियरिंग आदि आते हैं। देश के साथ-साथ विदेशों में भी कार्य की संरचना बढ़ती जा रही है। प्रमुख कंपनियों के भारत आने से यहां भी संभावनाएं प्रबल हो गई हैं।

सिविल इंजीनियर बनने की योग्यता
सिविल इंजीनियर बनने के लिए पहले छात्र को बीटेक या बीई करना होता है, जो 10+2 (भौतिकी, रसायन शास्त्र व गणित) या समकक्ष परीक्षा में उच्च रैंक प्राप्त करने के बाद ही संभव हो पाता है, जबकि एमएससी या एमटेक जैसे पीजी कोर्स के लिए बैचलर डिग्री होनी आवश्यक है। इन पीजी कोर्स में दाखिला प्रवेश परीक्षा के जरिए हो पाता है। इंट्रिग्रेटेड कोर्स करने के लिए 10+2 होना जरूरी है। बारहवीं के बाद पॉलिटेक्निक के जरिए सिविल इंजीनियरिंग का कोर्स भी कराया जाता है, जो कि डिप्लोमा श्रेणी में आते हैं।

प्रवेश प्रक्रिया का स्वरूप
इसमें दो तरह से प्रवेश परीक्षा आयोजित की जाती है। एक पॉलीटेक्निनक तथा दूसरा जेईई व सीईई। इसमें सफल होने के बाद ही कोर्स में दाखिला मिलता है। कुछ ऐसे भी संस्थान हैं, जो अपने यहां अलग से प्रवेश परीक्षा आयोजित करते हैं। बैचलर डिग्री के लिए आयोजित होने वाली प्रवेश परीक्षा जेईई (ज्वाइंट एंट्रेंस एग्जाम) के जरिए तथा पीजी कोर्स के लिए आयोजित होने वाली परीक्षा सीईई (कम्बाइंड एंट्रेंस एग्जाम) के आधार पर होती है।

ली जाने वाली फीस
सिविल इंजीनियरिंग के कोर्स के लिए वसूली जाने वाली फीस अधिक होती है। बात यदि प्राइवेट संस्थानों की हो तो वे छात्रों से लगभग डेढ़ से दो लाख रुपए प्रतिवर्ष फीस लेते हैं, जबकि आईआईटी स्तर के संस्थानों में एक से डेढ़ लाख प्रतिवर्ष की सीमा होती है। इसमें काफी कुछ संस्थान के इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर करता है, जबकि प्राइवेट संस्थानों का प्रशिक्षण शुल्क विभिन्न स्तरों में होता है।

आवश्यक अभिरुचि
सिविल इंजीनियर की नौकरी काफी जिम्मेदारी भरी एवं सम्मानजनक होती है। बिना रचनात्मक कौशल के इसमें सफलता मिलनी या आगे कदम बढ़ाना मुश्किल है। नित्य नए प्रोजेक्ट एवं चुनौतियों के रूप में काम करना पड़ता है। एक सिविल इंजीनियर को शार्प, एनालिटिकल एवं प्रैक्टिकल माइंड होना चाहिए। इसके साथ-साथ संवाद कौशल का गुण आपको लंबे समय तक इसमें स्थापित किए रखता है, क्योंकि यह एक प्रकार का टीमवर्क है, जिसमें लोगों से मेलजोल भी रखना पड़ता है।

इसके अलावा आप में दबाव में बेहतर करने, समस्या का तत्काल हल निकालने व संगठनात्मक गुण होने चाहिए, जबकि तकनीकी ज्ञान, कम्प्यूटर के प्रमुख सॉफ्टवेयरों की जानकारी, बिल्डिंग एवं उसके सुरक्षा संबंधी अहम उपाय, ड्रॉइंग, लोकल अथॉरिटी व सरकारी संगठनों से बेहतर तालमेल, प्लानिंग का कौशल आदि पाठय़क्रम का एक अहम हिस्सा हैं।

रोजगार से संबंधित क्षेत्र
एक सिविल इंजीनियर को सरकारी विभाग, प्राइवेट और निजी क्षेत्र की इंडस्ट्री, शोध एवं शैक्षिक संस्थान आदि में काम करने का अवसर प्राप्त होता है। अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा इसमें संभावनाएं काफी तेजी से बढ़ी हैं। इसका प्रमुख कारण रियल एस्टेट में आई क्रांति ही है। इसके चलते हर जगह बिल्डिंग, शॉपिंग, मॉल, रेस्तरां आदि का निर्माण किया जा रहा है। यह किसी भी यूनिट को रिपेयर, मेंटेनेंस से लेकर कंस्ट्रक्शन तक का कार्य करते हैं। बीटेक के बाद रोड प्रोजेक्ट, बिल्डिंग वक्र्स, कन्सल्टेंसी फर्म, क्वालिटी टेस्टिंग लेबोरेटरी या हाउसिंग सोसाइटी में अवसर मिलते हैं। केन्द्र अथवा प्रदेश सरकार द्वारा भी काम के अवसर प्रदान किए जाते हैं। इसमें मुख्य रूप से रेलवे, प्राइवेट कंस्ट्रक्शन कंपनी, मिल्रिटी, इंजीनियरिंग सर्विसेज, कंसल्टेंसी सर्विस भी रोजगार से भरे हुए हैं। अनुभव बढ़ने के बाद छात्र चाहें तो अपनी स्वयं की कंसल्टेंसी सर्विस खोल सकते हैं।

इस रूप में कर सकते हैं काम
सिविल इंजीनियरिंग 
कंस्ट्रक्शन प्लांट इंजीनियर
टेक्निशियन 
प्लानिंग इंजीनियर
कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट इंजीनियर 
असिस्टेंट इंजीनियर 
एग्जीक्यूटिव इंजीनियर
सुपरवाइजर
प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर
साइट/प्रोजेक्ट इंजीनियर

सेलरी
इसमें मिलने वाली सेलरी ज्यादातर केन्द्र अथवा राज्य सरकार के विभाग पर निर्भर करती है, जबकि प्राइवेट कंपनियों का हिसाब उससे अलग होता है। बैचलर डिग्री के बाद छात्र को 20-22 हजार रुपए प्रतिमाह तथा दो-तीन साल का अनुभव होने पर 35-40 हजार के करीब मिलने लगते हैं। मास्टर डिग्री करने वाले सिविल इंजीनियरों को 25-30 हजार प्रतिमाह तथा कुछ वर्षों के बाद 45-50 हजार तक हासिल होते हैं। इस फील्ड में जम जाने के बाद आसानी से 50 हजार रुपये तक कमाए जा सकते हैं। विदेशों में तो लाखों रुपए प्रतिमाह तक की कमाई हो जाती है।

एजुकेशन लोन
इस कोर्स को करने के लिए कई राष्ट्रीयकृत बैंक देश में अधिकतम 10 लाख व विदेशों में अध्ययन के लिए 20 लाख तक लोन प्रदान करते हैं। इसमें तीन लाख रुपए तक कोई सिक्योरिटी नहीं ली जाती। इसके ऊपर लोन के हिसाब से सिक्योरिटी देनी 
आवश्यक है।

प्रमुख संस्थान
इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ टेक्नोलॉजी, नई दिल्ली
वेबसाइट- www.iitd.ernet.in
(मुंबई, गुवाहाटी, कानपुर, खडगपुर, चेन्नई, रुड़की में भी इसकी शाखाएं मौजूद हैं)

बिड़ला इंस्टीटय़ूट ऑफ टेक्नोलॉजी (बीआईटीएस), रांची
वेबसाइट- www.bitmesra.ac.in

दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली 
वेबसाइट- www.dce.edu

इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ साइंस, बेंग्लुरू
वेबसाइट- www.iisc.ernet.in

नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ कंस्ट्रक्शन मैनेजमेंट एंड रिसर्च, नई दिल्ली
वेबसाइट-  www.nicmar.ac.in( गुड़गांव, बेंग्लुरू, पुणे, मुंबई, गोवा में भी शाखाएं मौजूद)
   
फायदे एवं नुकसान
बड़े शहरों में अन्य प्रोफेशनल्स की अपेक्षा न्यू कमर को अधिक सेलरी 
कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में बूम आने से प्रोफेशनल्स की भारी मांग
समाज व देश की प्रगति में भागीदार बनने पर अतिरिक्त खुशी
कई बार निर्धारित समय से अधिक काम करने से थकान की स्थिति
चिह्न्ति क्षेत्रों में शिफ्ट के रूप में काम करने की आवश्यकता
जॉब के सिलसिले में अधिक यात्राएं परेशानी का कारण

Sunday, June 2, 2019

अर्थशास्त्र है हर दौर में बेहतर भविष्य की राह

अर्थशास्त्र को एक ऐसे विषय के तौर पर देखा जा सकता है, जिसकी उपयोगिता लगभग हर क्षेत्र में होती है। सरल शब्दों में कहें तो अर्थशास्त्र समाज के सीमित संसाधनों का दक्षतापूर्ण ढंग से उपयोग करने की अनेक प्रणालियों का अध्ययन है। इसी बुनियादी नियम पर हमारी व्यावसायिक व आर्थिक इकाइयों की गतिविधियां टिकी होती हैं। अर्थशास्त्री आर्थिक आंकड़ों का विश्लेषण और विभिन्न नीतिगत विकल्पों का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं। साथ में इनके भावी प्रभाव पर पैनी नजर रखते हैं, ताकि विकास दर पर नियंत्रण रखा जा सके। अर्थशास्त्री इसी दृष्टिकोण से काम करते हैं। इनका कार्यक्षेत्र एक छोटी कंपनी से लेकर देश की अर्थव्यवस्था जैसा बहुआयामी भी हो सकता है।


छात्र में हों ये विशेषताएं
इस विषय की पढ़ाई करने और अर्थशास्त्रमें सफल पेशेवर बनने के लिए आपमें उपलब्ध डाटा का विश्लेषण कर पाने की क्षमता का बेहतर होना जरूरी है। इसी क्रम में *मैथ्स और स्टैटिस्टिक्स की बुनियादी समझ बेहद जरूरी है। आर्थिक विषमताओं/स्थितियों को समझने-बूझने का निरीक्षण कौशल भी इसमें आगे बढ़ने के लिए जरूरी है।


अध्ययन के रास्ते हैं विविध
अर्थशास्त्र 12वीं स्तर पर एक विषय के तौर पर पढ़ाया जाता है,पर इस विषय में करियर बनाने के इच्छुक युवाओं के लिए अर्थशास्त्र से बीए (ऑनर्स) कोर्स से असली शिक्षा की शुरुआत होती है। हालांकि अर्थशास्त्र में ग्रेजुएशन के स्तर पर कई अन्य कोर्सेज भी संचालित किए जाते हैं। इनमें बीए(बिजनेस इकोनॉमिक्स), बीए(डेवलपमेंटल इकोनॉमिक्स) जैसे कोर्स का नाम लिया जा सकता है। देश के कई विश्वविद्यालयों में ये तमाम कोर्स कराये जाते हैं। अर्थशास्त्र से जुड़े विभिन्न कोर्सेज की मांग इसी बात से समझी जा सकती है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न कॉलेजों में इसके ग्रेजुएट स्तर के कोर्स में प्रवेश पाने के लिए 90 फीसदी से अधिक अंक चाहिए होते हैं।


विशेषज्ञता की ओर बढ़ाएं कदम
ग्रेजुएशन में अच्छे अंक प्राप्त करने वाले छात्रों को मास्टर्स स्तर पर अर्थशास्त्र की कई शाखाओं में विशेषज्ञता अर्जित करने के लिए विकल्प दिए जाते हैं। इनमें प्रमुख रूप से एनालिटिकल एंड एप्लाइड इकोनॉमिक्स, बिजनेस इकोनॉमिक्स, कॉर्पोरेशन एंड एप्लाइड इकोनॉमिक्स, इकोनॉमेट्रिक्स, इंडियन इकोनॉमिक्स का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है। इनके अलावा इंडस्ट्रियल इकोनॉमिक्स ,बिजनेस इकोनॉमिक्स, एग्रीकल्चर इकोनॉमिक्स, एन्वायर्नमेंटल इकोनॉमिक्स, बैंकिंग इकोनॉमिक्स व रूरल इकोनॉमिक्स भी उल्लेखनीय हैं। छात्र चुनिंदा विश्वविद्यालयों में उपलब्ध एमबीए (बिजनेस इकोनॉमिक्स) कोर्स का भी लाभ उठा सकते हैं। अर्थशास्त्र में पीजी डिप्लोमा और पीएचडी की राह भी चुन सकते हैं। देश के ज्यादातर सरकारी विश्वविद्यालयों में अर्थशास्त्र से जुड़े कोर्सेज उपलब्ध हैं।


इंडियन इकोनॉमिक सर्विस
कम ही लोग जानते होंगे कि देश में इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस की तरह इंडियन इकोनॉमिक सर्विस भी है। इसमें उपयुक्त प्रत्याशियों के चयन के लिए अखिल भारतीय स्तर पर यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (यूपीएससी) प्रतियोगी परीक्षा आयोजित करती है। इस परीक्षा में अर्थशास्त्र/स्टैटिस्टिक्स विषय में कम से कम मास्टर्स डिग्रीधारक युवा ही शामिल हो सकते हैं। प्रत्याशी की आयु 21 वर्ष से लेकर 30 वर्ष तक होनी चाहिए। इस परीक्षा में लिखित परीक्षा के बाद इंटरव्यू लिया जाता है। लिखित परीक्षा में जनरल इंग्लिश, जनरल नॉलेज व अर्थशास्त्र पर आधारित अन्य पेपर्स होते हैं। यह केंद्र सरकार की ग्रुप ‘ए' सर्विस है। सफल प्रत्याशियों को इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ, दिल्ली में प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके बाद इनकी पहली नियुक्ति सहायक निदेशक के पद पर होती है। कार्यानुभव बढ़ने के साथ पदोन्नति पाते हुए प्रिंसिपल इकोनॉमिक एडवाइजर के पद तक पहुंच सकते हैं। 


विदेश में नौकरी के अवसर 
अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों को विदेशी संस्थानों जैसे इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड, वर्ल्ड बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक के अलावा मल्टी नेशनल कंपनियों में शानदार मौके मिलते हैं। इनकी नियुक्तियां अर्थशास्त्री, नीति-निर्माता, एनालिस्ट, कंसल्टेंट आदि रूपों में होती हैं। विदेशों के सरकारी संस्थानों में भी भारतीय आर्थिक विशेषज्ञों की अच्छी-खासी मांग है। विदेश में बतौर रिसर्च स्कॉलर/प्राध्यापक के पदों पर आकर्षक पैकेज पर नियुक्तियां होती हैं।.


इस विशिष्ट कोर्स का उठाएं लाभ
देश के कुछ चुनिंदा विश्वविद्यालयों में ग्रेजुएशन स्तर पर तीन वर्षीय बैचलर ऑफ बिजनेस इकोनॉमिक्स कोर्स उपलब्ध है। प्राय: परीक्षा के जरिये इस कोर्स की सीमित सीटों पर प्रवेश दिया जाता है। प्रवेश परीक्षा में वर्बल एबिलिटी, क्वांटिटेटिव एबिलिटी, लॉजिकल रीजनिंग, जनरल अवेयरनेस से जुड़े ऑब्जेक्टिव टाइप प्रश्न पूछे जाते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के दस कॉलेजों में यह विशिष्ट कोर्स कराया जाता है। इनमें लगभग 480 सीटों पर प्रवेश दिया जाता है।.


रोजगार के अवसर
निजी क्षेत्र की तमाम औद्योगिक इकाइयों, बैंकिंग सेक्टर, फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन, कॉमर्स, टैक्सेशन, इंटरनेशनल ट्रेड, एक्चुरियल साइंस आदि में इस क्षेत्र के पेशेवरों की मांग बनी रहती है। हर साल सरकारी क्षेत्र में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, नीति आयोग, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पालिसी, नेशनल सैम्पल सर्वे तथा विभिन्न राज्य सरकारों के संबंधित विभागों आदि में बड़ी संख्या में अर्थशा्त्रिरयों की नियुक्तियां की जाती है। अर्थशास्त्र का शिक्षक भी बना जा सकता है।


चुनौतियां
ग्रेजुएशन के बाद ही इस क्षेत्र में रोजगार के विकल्प बनते हैं। लेकिन ज्यादा अवसर उपलब्ध हो पाएं, उसके लिए उच्च अध्ययन की ओर कदम बढ़ाना जरूरी होता है। 


' चूंकि इस क्षेत्र में आर्थिक विश्लेषण के लिए स्टैटिस्टिक्स, कैल्कुलस और ऊंचे दर्जे की गणित का इस्तेमाल होता है, इसलिए छात्रों को अनिवार्य रूप से गणित विषय पसंद होना चाहिए।


अर्थशास्त्र की पढ़ाई को गंभीरता से लें। बीए (ऑनर्स) अर्थशास्त्र के सिलेबस को काफी कठिन माना जाता है।


प्रमुख संस्थान
दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, दिल्ली
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, दिल्ली
यूनिवर्सिटी ऑफ बॉम्बे, मुंबई
बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी, वाराणसी
प्रेसिडेंसी कॉलेज, कोलकाता


Saturday, May 25, 2019

फर्नीचर डिजाइनिंग में बनाएं करियर


एक समय तक फर्नीचर डिजाइनिंग का काम कारपेंटर ही करते थे, लेकिन आज के दौर में यह एक अलग प्रोफेशन बन चुका है। अगर आप की भी इसमें रुचि है और आप क्रिएटिव हैं तो फर्नीचर डिजाइनर बनकर करियर संवार सकते हैं। संबंधित ट्रेनिंग हासिल कर आप किसी कंपनी में जॉब कर सकते हैं या फिर अपना कारोबार भी शुरू कर सकते हैं। इस बारे में विस्तार से जानिए

पर्सनल स्किल्स
फर्नीचर डिजाइनिंग के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए आपमें क्रिएटिव और आर्टिस्टिक सेंस का मजबूत होना अति आवश्यक है, साथ ही कम्युनिकेशन स्किल अच्छी होनी चाहिए। मार्केटिंग स्किल्स और बिजनेस की भी समझ अनिवार्य है। फर्नीचर डिजाइनिंग के क्षेत्र में काम करने के लिए मार्केट में डिजाइनिंग को लेकर क्या कुछ नया किया जा रहा है, उस ओर भी पैनी नजर रखनी होती है क्योंकि फर्नीचर डिजाइनर का काम एक बेजान लकड़ी में डिजाइन के जरिए उसे आकर्षक रूप देना होता है।

बढ़ रही है डिमांड
फर्नीचर डिजाइनिंग व्यवसाय अब केवल कारपेंटर का काम नहीं रह गया है, बल्कि इसमें कुशल डिजाइनरों की मांग व्यापक स्तर पर बढ़ी है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले पांच वर्षों में बाजार में तकरीबन एक लाख फर्नीचर डिजाइनरों की मांग होगी।उल्लेखनीय है कि फर्नीचर डिजाइनिंग में पैसे कमाने के साथ-साथ अपनी कलात्मक क्षमता को अभिव्यक्त करने का मौका और सृजन की संतुष्टि का अहसास भी मिलता है।

एंट्री प्रोसेस
आमतौर पर फर्नीचर डिजाइनिंग कोर्स में प्रवेश के लिए शैक्षणिक योग्यता 10वीं पास है, लेकिन कुछ संस्थानों में नामांकन के लिए आवेदन करते समय उम्मीदवार का किसी भी विषय  से 12वीं पास होना आवश्यक है। कुछ समय पहले तक फर्नीचर डिजाइनिंग के विभिन्न कोर्स सामान्यत: डिजाइनिंग केमुख्य कोर्स केअंतर्गत ही कराए जाते थे लेकिन वर्तमान में कई संस्थाओं में फर्नीचर डिजाइनिंग एक स्वतंत्र स्ट्रीम के रूप में भी पढ़ाया जाने लगा है।

मेन कोर्सेस
ट्रेनिंग कोर्सेस की बात करें तो इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए कई तरह के प्रोफेशनल कोर्स उपलब्ध हैं। कंप्यूटर एडेड डिजाइनिंग के जरिए भी फर्नीचर कला सीखी जा सकती हैै। इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए फर्नीचर डिजाइनिंग में डिप्लोमा, सर्टिफिकेट कोर्स, बैचलर डिग्री कोर्स उपलब्ध हैं। सर्टिफिकेट कोर्स की अवधि एक साल की होती है, जबकि डिप्लोमा कोर्स दो साल की अवधि का होता है। फर्नीचर डिजाइनिंग केकई पाठ्यक्रमों केलिए प्रशिक्षण संस्थानों में प्रवेश अखिल भारतीय स्तर की प्रवेश परीक्षा पास करने के बाद साक्षात्कार में उत्तीर्ण होने के बाद दिया जाता है। इस परीक्षा में आपकी कलात्मक प्रतिभा और सोच को भी परखा जाता है। देश के प्रतिष्ठित नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ डिजाइनिंग, अहमदाबाद में फर्नीचर डिजाइनिंग केपोस्ट ग्रेजुएट कोर्स उपलब्ध हैं। यहां प्रवेश केलिए अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा का आयोजन किया जाता है। इसके अलावा इंटीरियर डिजाइनिंग के तीन वर्षीय डिप्लोमा कोर्स में भी फर्नीचर डिजाइनिंग एक महत्वपूर्ण भाग होता है। इंटीरियर डिजाइनिंग के पाठ्यक्रम में दाखिला लेने के बाद फर्नीचर डिजाइनिंग में अल्पकालिक विशेषज्ञता कोर्स भी किया जा सकता है

जॉब आॅप्शंस
दिनों-दिन बढ़ती मांग और स्वर्णिम भविष्य की कल्पनाओं के कारण फर्नीचर डिजाइनिंग करियर के रूप में आज युवाओं में बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। किसी प्रतिष्ठित संस्थान से फर्नीचर डिजाइनिंग का कोर्स करने के बाद किसी भी डिजाइनर के साथ काम किया जा सकता है। फर्नीचर डिजाइनिंग का कोर्स करने के बाद अपना व्यवसाय भी शुरू किया जा सकता है या इस क्षेत्र में काम कर रही प्रतिष्ठित कंपनियों से जुड़कर काम कर सकते हैं। भारत में फर्नीचर निर्माण के क्षेत्र में कई विदेशी कंपनियाँ भी आ चुकी हैं। रचनात्मकता और नए डिजाइन के लिए कुशलता के साथ-साथ प्रशिक्षण की भी जरूरत होती है इसीलिए क्षेत्र में करियर की असीम संभावनाओं को देखते हुए अनेक संस्थानों ने फर्नीचर डिजाइनिंग के कोर्स शुरू किए हैं।

आप इस क्षेत्र में कई बड़ी कंपनियों के लिए डिजाइनिंग का कार्य कर सकते हैं। कंप्यूटर स्किल्स और कंप्यूटर वर्क की मदद से अपने कार्य को अंजाम दे सकते हैं। अगर आप अपना स्वयं का रोजगार शुरू करना चाहते हैं,तो डिग्री या डिप्लोमा के आधार पर बैंक से लोन मिल जाता है। फर्नीचर की कई बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां समय-समय पर अपने यहां नियुक्तियां निकालती हैं। इसके अलावा कई प्रशिक्षण संस्थान भी इस फील्ड के अनुभवी लोगों को रोजगार केअवसर मुहैया कराते हैं।

इनकम
फर्नीचर डिजाइनिंग के क्षेत्र में अनुभव का महत्व सबसे ज्यादा है। उसी आधार पर बाजार में प्रोफेशनल की मांग बढ़ती है। इस फील्ड में अनुभव के आधार पर ही इनकम का दायरा निर्धारित होता है। आजकल फर्नीचर डिजाइनर्स के लिए स्वतंत्र रूप से कार्य करना काफी महत्वपूर्ण है। इस तरह आप एक साथ कई कंपनियों से जुड़ सकते हैं और उनकेलिए डिजाइनिंग कर सकते हैं। प्रशिक्षुओं से कंप्यूटर स्किल्स और कंप्यूटर वर्क की उम्मीद की जाती है। इंटीरियर  डिजाइनिंग केक्षेत्र में हुए क्रांतिकारी बदलाव ने फर्नीचर डिजाइनिंग को आज अच्छी इनकम वाला व्यवसाय बना दिया है। फर्नीचर डिजाइनर का शुरुआती वेतन दस से बीस हजार रुपए प्रतिमाह तक हो सकता है। इसकेबाद अनुभव के आधार पर वेतन बढ़ता जाता है। अगर आप स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं तो आय लाखों रुपए में हो सकती है।

प्रमुख संस्थान
एनआईडी, अहमदाबाद
गवर्नमेंट पोलीटेक्निक कॉलेज, चंडीगढ़
इंस्टीट्यूट आॅफ फर्नीचर डिजाइनिंग, पटियाला
गवर्नमेंट पॉलीटेक्निक कॉलेज, लखनऊ
इंडियन प्लाइवुड इंडस्ट्रीज रिसर्च इंस्टीट्यूट, बैंगलुरु

Sunday, May 19, 2019

समुद्र का विज्ञान ओशॅनोग्राफी

ओशॅनोग्राफी समुद्र के अनगिनत रहस्यों को समझने, पढ़ने, और शोध करने का बहुआयामी तरीका है। समुद्री पर्यावरण के क्षेत्र में अध्ययन तथा अनुसंधान करने वाले विद्यार्थियों के लिए ओशॅनोग्राफी करियर के रूप में उभरा है। समुद्र में आए दिन तुफानों और आपदा प्रबंधन योजनाओं के बढ़ते महत्व के कारण ओशॅनोग्राफी में विद्यार्थियों की रुची बढ़ती जा रही है। भारत में समुद्र की लम्बाई-चौड़ाई को देखते हुए ओशॅनोग्राफी में बेहतर करियर है।

प्रयोगशाला से लेकर फील्डवर्क तक फैले इस काम का हिस्सा बनने के लिए विज्ञान या इंजीनियरिंग में स्नातक के बाद ओशॅनोग्राफी में मास्टर्स कोर्स जरूरी है।

हाल के वर्षों में ओशॅनोग्राफी एक फायदेमंद करियर के रूप में उभरा है। इसकी एक बड़ी वजह भारत के पास काफी बड़ा समुद्रतट और इसके समुद्रीय पर्यावरण की बड़े पैमाने पर खोज नहीं होना है। यह समुद्रीय पर्यावरण में अध्ययन करने और अनुसंधान करने के इच्छुक विद्यार्थियों के लिए बड़े पैमाने पर अवसर उपलब्ध कराती है। हाल में आए कई समुद्री तूफानों में लाखों लोगों की जान गई। इन तूफानों की संभावना के बारे में जानना अनेक बड़ी विपत्तियों को टाल सकता है। यही वजह है कि आपदा प्रबंधन योजनाओं के महत्व बढऩे के कारण ओशॅनोग्राफी में भी रुचि बढ़ती जा रही है। दूसरी ओर धरातलीय संसाधनों की घटती मात्रा और समुद्रीय संसाधनों की प्रचुरता ने इस ओर ध्यान देने के लिए प्रेरणा का काम किया है, साथ ही सूचना प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिकों व उद्यमियों की जागरूकता के कारण समुद्री विज्ञान बहुत तेजी से विकास कर रहा है। परिणाम के रूप में ओशॅनोग्राफर की मांग पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रही है ताकि आने वाले सालों में तटीय पानी और सीमाओं, मौसम की भविष्यवाणी और समुद्री तत्वों के रखरखाव के लिए अधिक से अधिक पेशेवरों की जरूरत को पूरा किया जा सके।

क्या है ओशॅनोग्राफी

ओशॅनोग्राफी एक बहुआयामी विज्ञान है, जो समुद्र के अनगिनत रहस्यों को समझने की कोशिश करता है। इसका उद्देश्य, समुद्र के बारे में पढऩा और समुद्री संसाधनों को खोजना है। ओशॅनोग्राफी शोध आधारित पेशा है और उन लोगों के लिए उपयुक्त है, जिसमें साहसिक बोध और समुद्र क्षेत्र की अनजानी दुनिया को जानने का जोखिम उठाने की इच्छा के साथ अपने आसपास की दुनिया के प्रति प्राकृतिक जिज्ञासा है। रोमांच के तत्व और मुख्य रूप से आउटडोर में कार्य करना भी ओशॅनोग्राफर के लिए बड़ा आकर्षण साबित हो रहा है।

क्या काम करते हैं ओशॅनोग्राफर

पूरी तरह से समुद्री दुनिया से जुड़े इस काम की प्रकृति विशेष शाखा के अनुरूप निर्धारित होती है और इसके क्षेत्र में प्रयोगशाला से लेकर फील्ड वर्क यानी समुद्र में नमूनों को इकट्ठा करने, तथ्यों का विश्लेषण करने, सर्वे और अध्ययन करने, सामने आने वाली समस्याओं का हल खोजने तक शामिल है।

निजी क्षेत्र में, समुद्री उत्पादों और शोध से जुड़ी कंपनियां सही योग्यता वाले उम्मीदवार की खोज में रहती हैं। भारत में समुद्री तटों की लम्बाई-चौड़ाई को देखते हुए समुद्री उत्पादों पर निर्भर कंपनियों के लिए अपार अवसर हैं। सरकारी और निजी संगठनों द्वारा चलाए जाने वाले शोध प्रोजेक्ट, सी फार्मिंग, ऊर्जा उत्पन्न करने वाली लहरों और ज्वार-भाटा का पता लगाने जैसे कामों में फ्रीलांसर या सलाहकार के रूप में भी काम कर सकते हैं।

यहां से करें कोर्स

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशॅनोग्राफी, गोवा
www.nio.org/ 

केरल युनिवर्सिटी ऑफ फिशरी एंड ओशियन स्टडीज, केरल
www.kufos.ac.in/ 

डिपार्टमेंट ऑफ मेरीन साइंस, युनिवर्सिटी ऑफ कोलकाता 
www.caluniv.ac.in/

Saturday, April 20, 2019

सिस्‍मोलॉजिस्‍ट बनाएं अपना करियर


अगर आपके पास 12वीं में फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स जैसे सब्‍जेक्‍ट हैं तो आप सिस्‍मोलॉजी में अपना करियर बना सकते हैं.

भूकंप से आप शायद ही अनजान होंगे. यह एक प्राकृतिक आपदा है


.लोग भूकंप का नाम सुनकर ही कांप उठते हैं. पर भूकंप कैसे आता है 

और आखिर क्या होती हैं भूकंप की तरंगे जिनसे धरती पर भारी उथल- पुथल मच जाती है? 

ऐसे सवाल आपके मन में अकसर आते होंगे.

 इस प्रकार के जिज्ञासु प्रवृत्ति के लोग सिस्‍मोलॉजी कोर्स कर सकते हैं.

सिस्मोलॉजी सिलेबस
इस कोर्स को इस प्रकार से डिजाइन किया गया है 

कि इसमें जियोग्राफी और फिजिक्स की पढ़ाई एक साथ की जा सके. इसे जियोफिजिक्स भी कहते हैं. इसमें सिस्मोलॉजी के अलावा ऑयल एक्सप्लोरेशन और ग्राउंड वॉटर जैसे विषय की भी जानकारी दी जाती है.

इस क्षेत्र में बैचलर से लेकर पीएचडी तक की पढ़ाई की जा सकती है. अगर रिसर्चर बनने की चाह है तो वह भी अच्‍छा अॉप्‍शन है. जो छात्र जियोफिजिक्स विषय लेकर पढ़ना चाहते हैं उनके लिए संभावनाएं ज्यादा हैं.

एक सिस्मोलॉजिस्ट का काम
भूकंप से होने वाली तबाही के लिए मिट्टी की स्थिति, जियालॉजिकल स्ट्रक्चर और टेक्नोटिक गतिविधियां जिम्मेदार हैं. सिस्मॉलजिस्ट अपनी स्टडी से जानकारी जुटाकर लोगों के लिए ऐसा स्ट्रक्चर तैयार करवाने पर जोर देते हैं जो भूकंप जैसे खतरों से बचा सके. एक सिस्मॉलजिस्ट लोगों से मिलता है और अलग-अलग जगहों पर भूकंप के खतरे का पता लगाकर आगे का काम शुरू करता है.

इस कोर्स में एडमिशन मेरिट के आधार पर होता है. जियॉलजी, जियोफिजिक्स, फिजिक्स या फिर एप्लाइड साइंस में डिग्री लेने के बाद आप सिस्मॉलजी में स्पेशलाइजेशन कर सकते हैं. देश की बहुत सी यूनिवर्सिटी जियोफिजिक्स में एमटेक प्रोग्राम चलाती है

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Monday, April 1, 2019

करियर की कई राहें खोलता है यह कोर्स

अगर स्नातक स्तर पर साइंस की विभिन्न शाखाओं के बीच विचरण करना चाहते हैं, फिजिक्स के साथ-साथ रसायनशास्त्र और गणित जैसे विषयों को भी पढ़ने की तमन्ना है तो बीएससी इन फिजिकल साइंस कोर्स एक बेहतर विकल्प है। जनरल साइंस के रूप में लंबे अरसे तक चलने वाला यह कोर्स आज नाम बदल कर फिजिकल साइंस में तब्दील हो गया है। अब इसे ‘बीएससी जनरल ग्रुप ए’ की जगह बीएससी इन फिजिकल साइंस के नाम से जाना जाता है।
यह कोर्स छात्रों को एमएससी स्तर पर साइंस की विभिन्न शाखाओं में जाने की राह तो दिखाता ही है, उन्हें स्नातक करने के बाद भी करियर की अलग-अलग दिशाओं में जाने का रास्ता अख्तियार कराता है। अगर साइंस ग्रेजुएट बन कर नौकरी करने की इच्छा है तो यह कोर्स ऐसे छात्रों के लिए एक अच्छा विकल्प है।
कोर्स में क्या है
सीधी-सीधी बात कही जाए तो यह साइंस का खिचड़ी कोर्स है, जो बारहवीं तक भौतिकी, गणित, रसायनशास्त्र और कंप्यूटर साइंस जैसे विषय पढ़ने वाले छात्रों को आगे भी विभिन्न विषयों को पढ़ने की छूट देता है। इसमें छात्र भौतिकी और गणित को मुख्य पेपर के रूप में तीनों साल तो पढ़ते ही हैं, इसके अलावा विकल्प के रूप में एक और पेपर को भी तीनों साल पढ़ना होता है। इसमें छात्रों को कई चॉइस दी जाती है। मसलन कोई चाहे तो तीनों साल भौतिकी और गणित के साथ रसायनशास्त्र को मुख्य पेपर के रूप में चुन सकता है।
जो छात्र रसायनशास्त्र नहीं पढ़ना चाहता, उसे इलेक्ट्रॉनिक्स और कंप्यूटर साइंस में से किसी एक को मुख्य पेपर के रूप में चुनने की छूट मिलती है। तीन साल में तीन विषय के अलावा कई और पेपर भी पढ़ने होते हैं। छात्रों को अब टेक्निकल राइटिंग एंड कम्युनिकेशन यानी अंग्रेजी का एक पेपर पहले साल पढ़ना होता है। इसके अलावा कंप्युटेशनल स्किल का एक पेपर और दूसरे साल में इंट्रोडक्शन टू बायोलॉजी और फिर सोलहवें पेपर के रूप में बायोलॉजी पढ़नी होती है। तीन सालों में कुल 24 पेपर पास करने होते हैं।
छात्रों को कंकरेंट कोर्स के तहत भी दो पेपर चुनने होते हैं। अगर किसी ने फिजिकल साइंस में भौतिकी और गणित के अलावा रसायनशास्त्र के 6 पेपर चुने हैं तो उसे कंप्यूटर साइंस से या इलेक्टॉनिक्स से दो कंकरेंट पेपर का चुनाव करना होता है। इसी तरह इलेक्ट्रॉनिक या कंप्यूटर साइस से 6 पेपर चुनने वालों को भी दो कंकरेंट पेपरों का चुनाव करना होता है। दिल्ली विश्वविद्यालय में पहले इस कोर्स को करने के बाद उच्च शिक्षा यानी एमएससी करने में खासी दिक्कत आती थी। उन्हें ऑनर्स कोर्स के मुकाबले काफी नीचे रखा जाता था, लेकिन अब एमएससी में प्रवेश परीक्षा होने के कारण ऐसे छात्रों को भी आगे निकलने का मौका मिलता है। यह कोर्स छात्रों को तीन विषयों को पढ़ने का व्यापक नजरिया प्रदान करता है। इसमें तीन पेपरों पर ज्यादा जोर देने से छात्रों को एमबीए और आइएएस परीक्षा की तैयारी में काफी मदद मिलती है।
शाखाएं इसमें मुख्य रूप से बीएससी इन फिजिकल साइंस तो है ही, इसके अलावा स्पेशलाइज्ड पेपर चुनने पर फिजिकल साइंस विद कंप्यूटर साइंस और फिजिकल साइंस विद इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे विषय भी जुड़ जाते हैं।
दाखिला कैसे 
कॉलेजों में इस कोर्स में दाखिला बारहवीं की मेरिट के आधार पर दाखिला दिया जाता है। साइंस के छात्र के लिए बारहवीं में भौतिकी, गणित और रसायनशास्त्र पढ़ा होना जरूरी है, तभी उसे दाखिला दिया जाता है। 
फैक्ट फाइल
कोर्स कराने वाले संस्थान
दिल्ली विश्वविद्यालय के करीब 25 कॉलेज ऐसे  हैं, जहां अलग-अलग रूपों में फिजिकल साइंस कोर्स चल रहा है। 
कुछ महत्त्वपूर्ण संस्थान: 
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय
आगरा विश्वविद्यालय, आगरा
महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक
पंजाब विश्वविद्यालय
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ
अवसर कहां
स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद छात्रों को आगे की शिक्षा के लिए किसी न किसी क्षेत्र में स्पेशलाइज्ड रास्ता चुनना पड़ता है। यह कोर्स जनरल साइंस है, इसलिए आगे बढ़ने का विकल्प थोड़ा कठिन होता है। लेकिन बहुत सारे छात्र इन बाधाओं को पार कर मौका पाते हैं।
सामान्य तौर पर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होकर बैंक व अन्य निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्रों में नौकरी कर सकते हैं। सरकारी क्षेत्र की ओर देखें तो यूपीएससी की परीक्षा में शामिल होकर आईएएस, आईपीएस बन सकते हैं। बैंकिंग सेक्टर में जा सकते हैं। एमबीए या एमसीए कर सकते हैं। सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में लैब असिस्टेंट के रूप में कार्य कर सकते हैं। स्कूलों में साइंस के शिक्षक बन सकते हैं।
वेतन
शुरुआती तौर पर 20 से 25 हजार रुपये की नौकरी मिल जाती है। एमएससी के बाद कॉलेज शिक्षण और रिसर्च एसोसिएट के रूप में वेतनमान शुरुआती तौर पर 40 से 45 हजार रुपये है।
तुरंत जॉब मिलती है इसमें
फिजिकल साइंस छात्रों के लिए किस रूप में मददगार है?
आमतौर पर यह कोर्स ऐसे छात्रों के लिए है, जो स्नातक करते ही नौकरी की तलाश में रहते हैं। इसे करने के बाद छात्र सीधे रोजगार के बाजार में उतर सकता है। वह लैब में बतौर सहायक काम कर सकता है। दूसरी बात यह कि इसे करने के बाद बीएड में दो विषयों को चुन कर शिक्षक बनने का मौका मिलता है। सामान्य प्रतियोगी परीक्षाओं में भी यह कोर्स मददगार है। एमएससी स्तर पर कई तरह के स्पेशलाइजेशन चुनने का रास्ता दिखाता है।
इसमें किस तरह के विषयों का कॉम्बिनेशन है?
इसमें भौतिकी और गणित, सभी के लिए अनिवार्य होता है। इसके साथ ही छात्र रसायनशास्त्र भी पढ़ते हैं। अगर कोई रसायनशास्त्र नहीं पढ़ना चाहता तो वह कंप्यूटर साइंस ले सकता है। वह इलेक्ट्रॉनिक्स का चुनाव कर सकता है।
यह कोर्स किस तरह के अवसर मुहैया कराता है?
इस कोर्स के छात्रों के लिए स्नातक के बाद सामान्य स्तर की कई तरह की नौकरियों में जाने का रास्ता निकलता है। कोई चाहे तो एमबीए कर सकता है। कोई एमसीए करके नई राह चुन सकता है। स्नातक में पढ़े गए अपने दो विषयों को लेकर सिविल सर्विस की तैयारी कर सकता है। उसे फिजिक्स, रसायनशास्त्र, इलेक्ट्रॉनिक्स, गणित और कंप्यूटर साइंस में से किसी एक में जाने का चुनाव करना होता है। किसी एक में एमएससी करके उच्च शिक्षा के आधार पर मिलने वाली नौकरियों में जा सकता है, चाहे वह साइंटिस्ट का पद हो या रिसर्च एसोसिएट या असिस्टेंट प्रोफेसर का।
इसमें किस तरह के बदलाव आए हैं?
यह कोर्स पहले बीएससी जनरल ग्रुप ए के नाम से जाना जाता था। 2002 के बाद इसे इस तरह का नाम दिया गया। इसमें एप्लायड फिजिकल साइंस विद कंप्यूटर साइंस या इलेक्ट्रॉनिक्स आदि कई कैटेगरी बन गई थीं, जो उलझन पैदा कर रही थीं, लेकिन यह कंफ्यूजन पिछले साल से खत्म कर दिया गया है। अब एप्लायड शब्द हटा दिया गया है। सिर्फ फिजिकल साइंस रह गया है।
फिजिक्स ऑनर्स और फिजिकल साइंस में क्या फर्क है?
फिजिक्स ऑनर्स में तीनों साल भौतिकी से जुड़े पेपर ही पढ़ाए जाते हैं। इसमें तीन विषय मुख्य पेपर के रूप में तीनों साल चलते हैं। यहां स्नातक स्तर की बजाय एमएससी पर स्पेशलाइजेशन चुनना होता है। एमएससी में इस कोर्स के छात्रों की राह ऑनर्स की बजाय थोड़ी कठिन होती है।