Sunday, March 13, 2016

पेट्रोलियम इंजीनियरिंग: मौके ही मौके

जिस तेजी से देश विकास की ओर बढ़ रहा है, उसी तेजी से औद्योगिक और निजी कारणों से ऊर्जा जरूरतें भी बढ़ रही हैं। गैस और कच्चे तेल के रूप में आयात किए जाने वाले पेट्रोलियम उत्पाद रिफाइनरियों में परिष्कृत होने के बाद हम तक पहुंचते हैं। देश में एक स्थान से दूसरे स्थान तक तेल और गैस को पहुंचाने के लिए कई पाइपलाइन परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। पेट्रोलियम उद्योग तकनीकी और कारोबारी विकास के क्रम में लगातार मजबूत हो रहा है। विदेशों में भी भारतीय कंपनियां तेल की खोज और उत्पादन में अपने हाथ आजमा रही हैं। इससे उनका कार्य क्षेत्र भी विस्तृत हो रहा है। इस विस्तार में इंजीनियरिंग पेशेवरों विशेषकर पेट्रोलियम इंजीनियरों के लिए काफी मौके हैं।
क्या है पेट्रोलियम इंजीनियरिंगपेट्रोलियम उत्पादों, मसलन कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) और प्राकृतिक गैस (नेचुरल गैस) का उत्पादन और उन्हें इस्तेमाल योग्य बनाने का कार्य पेट्रोलियम इंजीनियरिंग की मदद से किया जाता है। इसके माध्यम से यह भी पता लगाया जाता है कि किसी पेट्रोलियम भंडार के स्त्रोत में उत्पादन योग्य पेट्रो पदार्थ की मात्रा कितनी है। यह अनुमान लगाने के लिए पेट्रोलियम इंजीनियर को धरती की गहराइयों में उच्च दाब के बीच मौजूद तेल, गैस और पानी के भौतिक गुणों का अध्ययन करना होता है।
प्रमुख कोर्सबीई/ बीटेक पेट्रोलियम इंजीनियरिंग
बीटेक अप्लाइड पेट्रोलियम इंजीनियरिंग
बीटेक पेट्रोकैमिकल इंजीनियरिंग
बीटेक पेट्रोलियम रिफाइनिंग एंड पेट्रोकैमिकल्स इंजीनियरिंग
बीटेक पेट्रोलियम रिफाइनिंग इंजीनियरिंग
बीटेक पेट्रोलियम रिजरवॉयर एंड प्रोडक्शन इंजीनियरिंग
एमई/ एमटेक पेट्रोलियम इंजीनियरिंग
एमटेक पेट्रोलियम एक्सप्लोरेशन
एमटेक पेट्रोलियम रिफाइनरी इंजीनियरिंग
एमटेक पेट्रोलियम रिफाइनिंग एंड पेट्रोकैमिकल इंजीनियरिंग
योग्यता
बैचलर कोर्स
बारहवीं में विज्ञान विषयों (फिजिक्स, कैमिस्ट्री और मैथ्स जरूरी) की पढ़ाई करने वाले छात्र पेट्रोलियम इंजीनियरिंग के बैचलर कोर्स में दाखिला ले सकते हैं। इसके लिए अखिल भारतीय स्तर की प्रवेश परीक्षा में शामिल होना होगा। आईआईटी (जेईई) और आईआईटी (एडवांस्ड) की परीक्षा में प्राप्त स्कोर से इस कोर्स में दाखिला मिलेगा।
मास्टर्स कोर्सपेट्रोलियम इंजीनियरिंग या उससे संबंधित विषयों में इंजीनियरिंग की बैचलर डिग्री हासिल करने के बाद मास्टर्स कोर्स में प्रवेश लिया जा सकता है। कैमिस्ट्री में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद भी इस कोर्स में प्रवेश लिया जा सकता है। इस कोर्स में दाखिले प्रवेश परीक्षा के आधार पर ही होते हैं।
संभावनातेल क्षेत्र की खोज और उत्पादन कार्य में पेट्रोलियम इंजीनियर के लिए नए अवसर उभर रहे हैं। देश की पेट्रोलियम कंपनियां इसके लिए अपना निवेश बढ़ा रही हैं। देश के तटीय इलाकों में तेल और गैस के नए क्षेत्रों के होने की संभावना मौजूद है। तेल आयात में बढ़ोत्तरी के साथ शोधन क्षमता में वृद्धि करने का दबाव भी लगातार बढ़ रहा है। देश की कई तेल कंपनियां अपनी रिफाइनरियों की क्षमता बढ़ाने पर काम रही हैं। ऐसे में तेल उद्योग का यह क्षेत्र पेट्रोलियम इंजीनियरों के लिए आने वाले समय में काफी मांग सृजित करेगा।
इन पदों पर मिलेगा कामरिजरवॉयर इंजीनियर
टेक्निकल सपोर्ट इंजीनियर
पेट्रोलियम टेक्नोलॉजिस्ट एंड ड्रिलिंग इंजीनियर
प्रोसेस इंजीनियर

वेतनकोर्स करने के बाद पहली नौकरी में वेतन का स्तर कंपनी की बाजार स्थिति और कारोबार पर निर्भर करता है। बैचलर डिग्री के बाद औसत वेतन 30 हजार रुपये मासिक होता है। मास्टर्स कोर्स करने या कुछ वर्षो का अनुभव हासिल करने के बाद आसानी से 50 से 60 हजार रुपये के बीच वेतन मिलने लगता है।
प्रमुख संस्थान
राजीव गांधी इंस्टीटय़ूट ऑफ पेट्रोलियम टेक्नोलॉजी, रायबरेली, उत्तर प्रदेश
http://www.rgipt.ac.in/
इंडियन स्कूल ऑफ माइंस, धनबाद, झारखंडhttp://www.ismdhanbad.ac.in/
यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज, देहरादून, उत्तराखंडhttp://www.upes.ac.in/
डॉ. हरिसिंह गौर यूनिवर्सिटी, सागर, मध्य प्रदेशhttp://www.dhsgsu.ac.in/
बीआर अंबेडकर टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटीhttp://dbatuonline.com
भारतीदसन इंस्टीटय़ूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, तमिलनाडुhttp://www.bdu.ac.in/

Saturday, March 12, 2016

जेनेटिक्स: जीवन में करियर

जेनेटिक्स करियर की संभावनाओं से भरपूर एक बेहतरीन विषय है। इसकी पढ़ाई देश-विदेश में रोजगार के मौके प्रदान करती है। इसकी पढ़ाई और करियर के बारे में बता रही हैं नमिता सिंह-
आनुवंशिकता (जेनेटिक्स) जन्मजात शक्ति है, जो प्राणी के रूप-रंग, आकृति, यौन, बुद्धि तथा विभिन्न शारीरिक व मानसिक क्षमताओं का निर्धारण करती है। आनुवंशिकता को समझने के लिए आवश्यक है कि पहले वंशानुक्रम को भली-भांति समझा जाए। मुख्यत: वंशानुक्रम उन सभी कारकों को सम्मिलित करता है, जो व्यक्ति में जीवन आरम्भ करने के समय से ही उपस्थित होते हैं यानी वंशानुक्रम विभिन्न शारीरिक व मानसिक गुणों का वह समूह है, जो जन्मजात होते हैं। इस विषय के जानकारों की मानें तो आनुवंशिकता के बिना जीव की उत्पत्ति की कल्पना भी नहीं की जा सकती। आनुवंशिक क्षमताओं के विकास के लिए उपयुक्त और सुंदर वातावरण काफी सहायक होते हैं। आनुवंशिकता हमें क्षमताएं देती है और वातावरण उन क्षमताओं का विकास करता है।
क्या है जेनेटिक्स
जेनेटिक्स विज्ञान की ही एक शाखा है, जिसमें वंशानुक्रम एवं डीएनए में बदलाव का अध्ययन किया जाता है। इस काम में बायोलॉजिकल साइंस का ज्ञान काफी लाभ पहुंचाता है। जेनेटिसिस्ट व बायोलॉजिकल साइंटिस्ट का काम काफी मिलता-जुलता है। ये जीन्स और शरीर में होने वाली आनुवंशिक विविधताओं का अध्ययन करते हैं। आने वाले कुछ दशकों में जेनेटिक्स के चलते कई अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिलेंगे। यूएस ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स (बीएलएस) की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान समय में जेनेटिसिस्ट व बायोलॉजिकल साइंटिस्ट की जॉब संख्या में करीब 19 फीसदी की वृद्धि हुई है। यह वृद्धि 2022 तक बनी रहने की उम्मीद है।
क्या काम है प्रोफेशनल्स का
जेनेटिक प्रोफेशनल्स का कार्य क्षेत्र काफी फैला हुआ है। इसमें जीव-जन्तु, पौधे व अन्य मानवीय पहलुओं का विस्तार से अध्ययन किया जाता है। जीन्स व डीएनए को सही क्रम में व्यवस्थित करने, पीढियों में बदलाव को परखने, पौधों की उन्नत किस्म के हाइब्रिड का विकास, पौधों की बीमारियों को जीन्स द्वारा दूर भगाने सरीखा कार्य किया जाता है। जीवों में इनका काम वंशानुगत चले आ रहे दुष्प्रभावों को जड़ से खत्म करना है। बतौर जेनेटिसिस्ट आप फिजिशियन के साथ मिल कर या सीधे तौर पर मरीजों या वंशानुक्रम बीमारियों से ग्रसित लोगों का उपचार कर सकते हैं।
जेनेटिक्स के कार्य क्षेत्र
जेनेटिक्स के अंतर्गत निम्न क्षेत्रों को शामिल किया जाता है-
जेनेटिक साइंस- इस भाग के अंतर्गत जेनेटिक साइंटिस्ट पौधों, जीव-जन्तुओं व ह्यूमन टिशू के सैंपल में जीन्स की पहचान करते हैं। यह कार्य शोध से भरा होता है।
बायो जेनेटिक्स- यह डॉक्ट्रल लेवल की विधा है। इसमें जीन्स की संरचना, कार्य व बनावट के अलावा आनुवंशिकी के सिद्धांत एवं विविधता का अध्ययन किया जाता है।
मॉलिकुलर जेनेटिक्स- इसे बायो केमिकल जेनेटिक्स कहा जाता है। सामान्यत: इसके अंतर्गत सेल के अंदर प्रोटीन्स या डीएनए मॉलिक्यूल्स का अध्ययन किया जाता है।
कैटोजेनेटिक्स- यह जेनेटिक्स के क्षेत्र का काफी प्रचलित विषय है। इसमें सेल की संरचना और क्रोमोजोम्स का विस्तार से अध्ययन किया जाता है।
जेनेटिक इंजीनियरिंग- इस भाग में जीन की संरचना, परिचालन, पुन: व्यवस्थित करने, उसके संकेतों तथा जेनेटिक्स डिसऑर्डर का अध्ययन किया जाता है।
पॉपुलेशन जेनेटिक्स- इस शाखा के अंतर्गत जीव-जन्तुओं में प्रजनन व उत्परिवर्तन की प्रक्रियाएं शामिल हैं। इसमें गंभीर रोगों से बचाव विधि का भी अध्ययन किया जाता है।
जेनेटिक काउंसलर्स- जेनेटिक काउंसलर का काम किसी परिवार की मेडिकल हिस्ट्री का अध्ययन करते हुए डिसऑर्डर व अन्य वंशानुगत बीमारियों को दूर करना है।
कब ले सकते हैं दाखिला
इस क्षेत्र में बैचलर से लेकर पीएचडी तक के कोर्स मौजूद हैं। छात्र अपनी योग्यता व सुविधानुसार किसी एक का चयन कर सकते हैं। बैचलर कोर्स में दाखिला बारहवीं (विज्ञान वर्ग) के पश्चात मिलता है, जबकि मास्टर कोर्स में प्रवेश बीएससी व संबंधित स्ट्रीम में बैचलर के बाद होता है।
मास्टर कोर्स के पश्चात डॉक्ट्रल, एमफिल व पीएचडी तक की राह आसान हो जाती है। इनके सभी कोर्सो में प्रैक्टिकल की अधिकता रहती है। कई मेडिकल कॉलेज बारहवीं के पश्चात ह्यूमन बायोलॉजी का कोर्स कराते हैं। यह काफी मनोरंजक विषय है।
आवश्यक स्किल्स
इसमें कोई भी प्रोफेशनल तभी लंबी रेस का घोडम बन सकता है, जब उसे विषय की अच्छी समझ हो। उसे रिसर्च अथवा वंशानुक्रम खोजों के सिलसिले में कई बार गहराई में जाना पड़ता है, इसलिए उसे अपने अंदर धर्य का गुण अपनाना पड़ता है। इसके अलावा उसके पास मैथमेटिक्स और एनालिटिकल नॉलेज का होना जरूरी है।
कार्य का स्वरूप
जेनेटिक्स साइंटिस्ट का कार्य प्रयोगशाला से संबंधित होता है। इनका ज्यादातर समय माइक्रोस्कोप, कम्प्यूटर एवं अन्य उपकरणों के साथ बीतता है, क्योंकि उन्हें विभिन्न तरह के प्रयोग करने के बाद किसी निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ता है। ऐसा भी होता है कि वर्षों मेहनत करने के बावजूद कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाता। उन्हें प्रोजेक्ट व रिपोर्ट तैयार करने में भी अधिक समय खर्च करना पड़ता है। इनकी कार्यशैली ऐसी है कि उन्हें साइंटिस्ट की टीम के साथ या प्रयोगशाला में सहायता करनी पड़ती है।
रोजगार की संभावनाएं
पिछले कुछ वर्षों में जेनेटिक प्रोफेशनल्स की मांग तेजी से बढ़ी है। इसमें देश व विदेश दोनों जगह समान रूप से अवसर मौजूद हैं। सबसे ज्यादा मौका मेडिकल व फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री में मिलता है। एग्रीकल्चर सेक्टर भी रोजगार प्रदाता के रूप में सामने आया है। सरकारी व प्राइवेट क्षेत्रों के रिसर्च एवं डेवलपमेंट विभाग में पहले से ज्यादा अवसर सामने आए हैं। टीचिंग का विकल्प हमेशा ही उपयोगी रहा है।
मिलने वाली सेलरी
इसमें सेलरी पैकेज काफी कुछ संस्थान एवं कार्य अनुभव पर निर्भर करता है। शुरुआती चरण में कोई संस्थान ज्वाइन करने पर प्रोफेशनल्स को 15-20 हजार रुपए प्रतिमाह मिलते हैं। जैसे-जैसे अनुभव बढ़ता है, उनकी सेलरी में भी इजाफा होता जाता है। आमतौर पर चार-पांच साल के अनुभव के पश्चात प्रोफेशनल्स को 40-50 हजार रुपए प्रतिमाह मिलते हैं। टीचिंग व रिसर्च के क्षेत्र में प्रोफेशनल्स को मोटी रकम मिलती है। आज कई ऐसे प्रोफेशनल्स हैं, जिनका सालाना पैकेज लाखों में है। विदेश में जॉब मिलने पर सेलरी काफी आकर्षक होती है।
एक्सपर्ट्स व्यू
लैब में अधिक समय व्यतीत करना होगा
वर्तमान समय में वैक्सिनेशन, टेस्ट टय़ूब बेबी, क्लोनिंग आदि का चलन चरम पर है। यह सब जेनेटिक्स की ही देन है। देश-विदेश में क्लोनिंग पर काफी प्रयोग किए जा रहे हैं। अभी यह प्रयोग जानवरों पर ही किए जा रहे हैं। इसके अलावा किसी भी रोग के पैटर्न, थैलीसीमिया, एनीमिया, कलर ब्लाइंडनेस आदि पर भी तेजी से काम चल रहा है।
कोर्स के दौरान छात्रों को बायोलॉजिकल फंक्शन, मैथमेटिक्स व फिजिक्स के बारे में जानकारी बढ़ानी पड़ती है। फिजिक्स के जरिए उन्हें प्रयोगशाला में माइक्रोस्कोप व उसके प्रयोग के बारे में बताया जाता है। छात्रों को यह सलाह दी जाती है कि वे प्रयोगशाला में ज्यादा से ज्यादा समय खर्च करें। जेनेटिक्स के क्षेत्र में होने वाले प्रयोगों में अमेरिका और न्यूजीलैंड में ज्यादा प्रयोग किए जा रहे हैं, जबकि भारत उनकी अपेक्षा काफी पीछे है। विदेशों में काम की अधिकता है, लेकिन यह कहना गलत न होगा कि यहां पर प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। उन्हें सही मौका और प्लेटफॉर्म मिलने की जरूरत है। इस समय यहां पर रिसर्च, फूड प्रोसेसिंग, ऑप्टिकल फाइबर, केमिकल इंडस्ट्री में तेजी से अवसर सामने आए हैं।
- निलांजन बोस
वेल्फेयर ऑफिसर
इंस्टीटय़ूट ऑफ जेनेटिक इंजी., कोलकाता

प्रमुख संस्थान
इंस्टीटय़ृट ऑफ जेनेटिक इंजीनियरिंग, कोलकाता वेबसाइट-
www.ige-india.co
इंस्टीटय़ृट ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स, गुजरात
वेबसाइट-
www.geneticcentre.org
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
वेबसाइट-
  www.jnu.ac.in
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर
वेबसाइट-
www.iitkgp.ac.in
इंस्टीटय़ृट ऑफ जेनेटिक्स एंड हॉस्पिटल फॉर जेनेटिक डिजीज, हैदराबाद
वेबसाइट-
www.instituteofgenetics.org

Thursday, March 10, 2016

एग्रीकल्चरल साइंटिस्ट के रूप में करियर

भारत कृषि प्रधान देश है। विज्ञान और तकनीकी विकास तथा इसमें बढ़ती आर्थिक गतिविधियों ने भारतीय कृषि की तस्वीर को काफी हद तक बदल दिया है। वर्तमान में एग्रीकल्चर में रोजगार के अवसर में तेजी से वृद्धि हो रही है। एग्रीकल्चर की बढ़ती गतिविधि में वैश्वीकरण, व्यावसायिक उदारीकरण, फ्यूचर मार्केटिंग आदि का भी योगदान है। इसमें पैदा हो रहे रोजगार में एग्रीकल्चरल साइंटिस्ट की जॉब महत्वपूर्ण है।
योग्यताएग्रीकल्चर साइंटिस्ट बनने के लिए फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथमेटिक्स या बायोलॉजी सब्जेक्ट या एग्रीकल्चर सब्जेक्ट के साथ बारहवीं पास होना जरूरी है। यदि इंजीनियरिंग के क्षेत्र में जाना है, तो बैचलर इन इंजीनियरिंग या टेक्नोलॉजी अथवा कम से कम एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करना जरूरी है। प्रोफेशनल कोर्स में प्रवेश लेने के लिए संबंधित विषय में स्पेशलाइजेशन के साथ-साथ एग्रीकल्चरल साइंस या इंजीनियरिंग में स्नातक होना चाहिए। गैर कृषि क्षेत्र में भी कुछ विशेष कोर्स में प्रवेश लिया जा सकता है। इसके लिए साइंस के ही किसी अन्य विषय से स्नातक होना और सोशल साइंस की भी अच्छी समझ जरूरी है।
अवसर
कोर्स पूरा होने के बाद एकेडमिक क्षेत्रों से लेकर कॉर्पोरेट हाउसेज आदि तमाम क्षेत्रों में जॉब तलाशा जा सकता है। वे बैंक, जो एडवांस क्रेडिट, लोन और कृषि आधारित प्रोजेक्ट डील करते हैं, वहां भी एग्रीकल्चरल साइंस से जुडे कैंडिडेट्स की नियुक्ति होती है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और अन्य राष्ट्रीयकृत बैंकों में भी पोस्ट ग्रेजुएट कैंडिडेट्स के लिए फील्ड ऑफिसर, रूरल डेवलपमेंट ऑफिसर्स, एग्रीकल्चरल और प्रोबेशनरी ऑफिसर्स पद की वैकेंसीज निकलती रहती हैं।
संघ लोकसेवा आयोग द्वारा हर साल आयोजित किये जाने वाले इंडियन फोरेस्ट सर्विस परीक्षा में भी शामिल हुआ जा सकता है। कृषि वैज्ञानिकों की नियुक्ति के लिहाज से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद सबसे बडी नियोक्ता है। यहां एग्रीकल्चरल साइंटिस्ट रिक्रूटमेंट बोर्ड (एसीआरबी) के माध्यम से नियुक्ति होती है। टीचिंग क्षेत्र में जाने के लिए नेट परीक्षा पास कर लेक्चरर या असिस्टेंट प्रोफेसर बना जा सकता है।
कार्पोरेट जगत में भी एग्रीकल्चरल साइंस ग्रेजुएट्स की बड़े पैमाने पर डिमांड होती है। यहां एग्रीकल्चरल को-ऑपरेटिव्स, कृषि उपकरणों की निर्माण संस्थाओं, खाद और सिंचाई से जुड़ी कंपनियों, फार्मिंग कंपनियों, शुगर इंडस्ट्री आदि में जॉब के बेहतर मौके उपलब्ध होते हैं।
एडमिशन
एग्रीकल्चरल साइंस या इंजीनियरिंग के कोर्सेज में दाखिले के लिए प्राय: प्रवेश परीक्षा आयोजित की जाती है। कुछ राज्य इंजीनियरिंग, मेडिकल और एग्रीकल्चर कोर्सेज में प्रवेश के लिए कॉमन एंट्रेस टेस्ट कंडक्ट करते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद अखिल भारतीय स्तर पर प्रवेश परीक्षा आयोजित करती है। यह परीक्षा प्रत्येक वर्ष अप्रैल माह में होती है।
इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट भी एक संयुक्त प्रवेश परीक्षा आयोजित करती है। विभिन्न राज्यों के एग्रीकल्चरल कॉलेजों, सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, इम्फाल, मणिपुर और कुछ डीम्ड विश्वविद्यालयों में मास्टर डिग्री और जूनियर रिसर्च फेलोशिप के लिए यह परीक्षा आयोजित की जाती है।
कोर्सएग्रीकल्चरल साईंस में वेटेरिनरी साइंस, एनिमल हसबैंड्री (एनिमल प्रोडक्ट टेक्नोलॉजी), फिशरीज, हॉर्टीकल्चर, सेरिकल्चर, फोरेस्ट्री आदि मुख्य शाखाएं हैं। इसके सहयोगी शाखाओं में एग्रोफिजिक्स, प्लांट फर्टिलाइजेशन, एक्वाकल्चर, जेनेटिक इंजीनियरिंग, एनवायरनमेंटल साइंस, फूड साइंस, इरीगेशन और वाटर मैनेजमेंट, सोएल साइंस, एग्रोलॉजी आदि हैं। इसके अलावा, अब होम साइंस को भी एग्रीकल्चरल एजुकेशन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
देश के ज्यादातर एग्रीकल्चरल कॉलेजों में बीएससी इन एग्रीकल्चर या बीएससी ऑनर्स इन एग्रीकल्चर, पीजी कोर्स और पीएचडी, तीनों स्तरों पर कोर्स ऑफर किए जाते हैं। कुछ यूनिवर्सिटी में केवल पोस्ट ग्रेजुएट और पीएचडी में ही एडमिशन लिया जा सकता है। पीजी कोर्स और पीएचडी में खास क्षेत्र में स्पेशलाइजेशन कर सकते हैं। खास बात यह है कि कुछ विश्वविद्यालयों में गैर कृषि स्नातक छात्रों को भी कुछ स्पेशलाइज्ड क्षेत्रों में प्रवेश मिल सकता है।
यहां एग्रीकल्चरल फिजिक्स, बायोटेक्नोलॉजी, प्लांट पेथोलॉजी, प्लांट ब्रीडिंग व जेनेटिक्स जैसे स्पेशलाइज्ड एरिया से जुड़े कोर्सेज में एडमिशन ले सकते हैं। एग्रीकल्चर से जुड़े क्षेत्रों में मैनेजमेंट का  कोर्स भी किया जा सकता है।
संस्थान
1. इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली
2. इंदिरा गांधी एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, रायपुर
3. जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर
4. गोविंदवल्लभ पंत यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर ऐंड टेक्नोलॉजी, पंतनगर
5. पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, लुधियाना
6. राजस्थान एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, बीकानेर
7. राजेंद्र एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, पूसा, समस्तीपुर
8. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, खडगपुर, पश्चिम बंगाल
9. चौधरी चरण सिंह एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, हरियाणा
10. इलाहाबाद एग्रीकल्चर इंस्टिट्यूट
11. बिरसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, रांची, झारखण्ड
12. उड़ीसा यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी, भुबनेश्वर
13. शेरे कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चर, जम्मू
14. नरेन्द्र देव यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी, कुमारगंज, फैजाबाद

Friday, March 4, 2016

ब्रह्मांड की गहराइयों में करियर

यदि ब्रह्मांड के रहस्यों को उजागर करने में आपकी दिलचस्पी है तो आपके लिए यह एक रोमांचक तथा मजेदार करियर है। इस क्षेत्र में करियर निर्माण इस बात पर निर्भर करता है कि आप एस्ट्रोनमी के किस क्षेत्र में कार्य करने के इच्छुक हैं।
खगोल विज्ञान क्या है?
यह ब्रह्मांड का वह विज्ञान है, जिसमें सूर्य, ग्रहों, सितारों, पिण्डों, नक्षत्रों, आकाशगंगाओं तथा उपग्रहों की गति, प्रति, नियम, संगठन, इतिहास तथा भविष्य में संभावित विकासों का अध्ययन किया जाता है। जो युवा इंस्टूमेंटेशन या एक्सपेरिमेंटल एस्ट्रोनमी करने में दिलचस्पी रखते हैं उन्हें इसके लिए इंजीनियरिंग शाखा का चयन करना होगा। इंस्टूमेंटल एस्ट्रोनमी विभिन्न तरंग धैर्य पर ऐसे एस्ट्रोनमिकल इंस्टूमेंटेशन के डिजाइन और निर्माण में सुविज्ञता प्रदान करती है, जो भूतल अथवा अंतरिक्ष स्थित वेधशालाओं में प्रयुक्त किए जाते हैं।
कोर्स की रूपरेखा
खगोल विज्ञान को कई शाखाओं में बांटा गया है, जिनमें एस्ट्रोफिजिक्स, एस्ट्रोमेटेओरोलॉजी, एस्ट्रोबायोलॉजी, एस्ट्रोजियोलॉजी, एस्ट्रोमेट्री तथा कॉस्मोलॉजी प्रमुख हैं। ये सभी शाखाएं मिल कर ब्रह्मांड के रहस्यों को उजागर करने में मदद करती हैं।
प्रोफेशनल स्तर पर ज्योतिष को ऑब्जर्वेशनल एस्ट्रोनमी तथा थ्योरिटिकल एस्ट्रोफिजिक्स के रूप में विभाजित किया गया है। इसमें जहां ऑब्जर्वेशनल एस्ट्रोनमी का संबंध टेलीस्कोप, दूरबीन, कैमरों तथा नग्न आंखों से खगोलीय पिण्डों को देखने तथा उपकरण बनाने और उनके अनुरक्षण के लिए आंकड़े एकत्र करने से है, वहीं थ्योरिटिकल एस्ट्रोफिजिक्स का संबंध आंकड़ों के विश्लेषण, कम्प्यूटर पर्यवेक्षणों का निष्कर्ष निकालने तथा ऑब्जर्वेशनल परिणामों की व्याख्या करने से है।
योग्यता
सबसे पहले पीसीएम विषय के साथ 10+2 परीक्षा उत्तीर्ण करना चाहिए। ऐसे कम ही विश्वविद्यालय हैं, जो एस्ट्रोनमी में अंडरग्रेजुएट कार्यक्रम ऑफर करते हैं। इसके बाद फिजिक्स अथवा एस्ट्रोनमी में मास्टर्स डिग्री प्राप्त की जा सकती है। सफलतापूर्वक एमएससी करने के बाद एस्ट्रोनमी में स्पेशलाइजेशन के लिए विद्यार्थी पीएचडी भी कर सकते है, जिसे करने के बाद ज्योतिष विज्ञानी, अंतरिक्ष यात्री, एस्ट्रोफिजिसिस्ट या अंतरिक्ष विज्ञान में वैज्ञानिक अथवा अनुसंधान अधिकारी बनने की राह प्रशस्त हो जाती है। रिसर्च के लिए अनिवार्य पीएचडी करने के लिए छात्रों को ज्वॉइंट एंटरेंस स्क्रीनिंग टेस्ट (जेस्ट)देना आवश्यक है। इंस्टूमेंटेशन या एक्सपेरिमेंटल एस्ट्रोनमी में करियर बनाने के लिए इलेक्िटकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्क्टिकल कम्युनिकेशंस में बीई अथवा बीटेक करने के बाद इस क्षेत्र में बतौर रिसर्च स्कॉलर प्रवेश किया जा सकता है।
अवसरों की कमी नहीं
शुरुआत में वे बतौर रिसर्चर काम करते हैं और पीएचडी होल्डर अपना करियर पोस्ट डॉंक्टरल रिसर्च से आरंभ करते हैं। अपनी विशेषज्ञता के आधार पर वे ऑब्जर्वेशनल एस्ट्रॉनोमर्स, स्टेलर एस्ट्रोनामर्स तथा सोलर एस्ट्रोनामर्स के रूप में अपना करियर निर्माण कर सकते हैं। इस क्षेत्र में डॉक्टोरल डिग्री तथा पीएचडी वाले छात्र बेसिक रिसर्च तथा डेवलपमेंट में कार्य करने के अवसर पाते हैं। पीएचडी करने वाले कॉलेज अथवा यूनिवर्सिटी लेवल पर शिक्षण कार्य कर सकते हैं।
स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त छात्र निर्माण क्षेत्र से लेकर एप्लाइड रिसर्च और डेवलपमेंट जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में करियर बना सकते हैं। इस क्षेत्र में बैचलर डिग्री वाले छात्र टेक्निकल, रिसर्च असिस्टेंट के रूप में करियर की शुरुआत कर सकते हैं। उनके लिए सरकारी विभागों, रक्षा संस्थानों तथा अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थानों में आसानी से प्रतिष्ठापूर्ण पद मिल जाता है, जहां रिसर्च स्कॉलर से करियर आरंभ करके वे निदेशक तक बन सकते हैं। इन दिनों कॉमर्शियल तथा नॉन- कॉमर्शियल रिसर्च डेवलपमेंट तथा टेस्टिंग लेबोरेटरियों, ऑब्जरवेटरियों, प्लेनेटोरियमों, साइंस पार्को आदि में अच्छी संभावनाएं हैं। इस क्षेत्र में डिग्री, डिप्लोमा, डॉक्टोरेट उपाधि वाले छात्र इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन-इसरो, विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर, स्पेस फिजिक्स लेबोरेटरीज, स्पेस एप्लिकेशंस सेंटर्स आदि के साथ-साथ लाभ निरपेक्ष संस्थानों यथा एसोसिएशन ऑफ बैंगलोर अमेच्योर एस्ट्रोनमर्स में कार्य कर सकते हैं। चूंकि इस क्षेत्र से संबंधित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार तथा कॉन्फ्रेंसेस दुनियाभर में लगातार चलते ही रहते हैं, इसलिए यह क्षेत्र देश ही नहीं, विदेशों में भी अच्छे अवसर उपलब्ध कराता है। इस क्षेत्र में वेतन कार्य के पहलुओं, संस्थान तथा इस क्षेत्र में प्राप्त अनुभव के आधार पर निर्धारित किया जाता है।
संस्थान
हरिश्चंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट, इलाहाबाद
इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स, बेंगलुरू
इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ जियोमेग्नेटिज्म, मुंबई
इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर ऑफ एस्ट्रोनमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स, पुणे
उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद
फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी, अहमदाबाद
ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, दिल्ली

Thursday, March 3, 2016

एनेस्थेसियोलॉजी में करियर

आपने गौर किया होगा कि ऑपरेशन से पहले मरीज इस बात को लेकर चिंता में रहते हैं कि ऑपरेशन के दौरान उसे दर्द तो नहीं होगा? कई बार तो मरीज डॉक्टर से हाथ जोड़ते हुए मिल जाएंंंगे कि उसे बेहोश कर दिया जाए, ताकि ऑपरेशन के दौरान होने वाले दर्द का अहसास न हो, लेकिन वह यह नहीं जानता कि उसे कैसे बेहोश किया जाएगा और कौन करेगा? मेडिकल साइंस में इस काम को एनेस्थेसियोलॉजिस्ट अंजाम देते हैं। देश में हॉस्पिटल की संख्या बढऩे के साथ-साथ एनेस्थेसियोलॉजिस्ट की डिमांड तेजी से बढऩे लगी है। अगर आपकी रुचि मेडिकल साइंस में है, तो इस फील्ड में शानदार स्कोप है।

क्वालिफिकेशन
अगर आप एनेस्थेसियोलॉजिस्ट बनना चाहते हैं, तो इसके लिए जरूरी है कि आपका बैकगाउंड फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी या फिर मैथ्य हो। दूसरे फिजिशियन की तरह ही एनेस्थेसियोलॉजी के लिए भी ट्रेनिंग की जरूरत होती है। 12वीं के बाद किसी एमबीबीएस कॉलेज में एडमिशन लेने और कोर्स पूरा करने के बाद आप बाद एनेस्थेसियोलॉजी में एमडी कर सकते हैं, जो आमतौर पर 2 वर्ष का कोर्स होता है। एनेस्थेसियोलॉजिस्ट के लिए एनेस्थेसियोलॉजी के अलावा, कार्डियोलॉजी, क्रिटिकल केयर मेडिसिन, इंटरनल मेडिसिन, फार्माकोलॉजी और सर्जरी के बारे में भी स्टडी करनी चाहिए।  एनेस्थेसियोलॉजिस्ट न्यूरो सर्जरी, कार्डिक ऐंड थोरेसिस सर्जरी, मैक्सीलोफेसियल सर्जरी आदि में स्पेशलाइजेशन कर सकते हैं। एनेस्थेसियोलॉजिस्ट के लिए जरूरी है कि वे सेमीमार और एजुकेशनल कोर्स के माध्यम से अपने आप को अपडेट रखें।

पर्सनल स्किल
एनेस्थेसियोलॉजिस्ट के लिए बहुत जरूरी है कि वह मरीज के प्रति केयरफुल, शांत, मोटिवेशनल और लंबे समय तक काम करने की क्षमता हो। साथ ही, इमरजेंसी के हालात में धैर्यपूर्वक निर्णय लेने की काबिलियत भी जरूरी है। इसके अलावा, कम्प्यूटर और टेक्नोलॉजी सेवी भी होना जरूरी है।

क्या करते हैं एनेस्थेसियोलॉजिस्ट? 
एनेस्थेसियोलॉजिस्ट का काम ऑपरेशन के दौरान एनेस्थेसिया देना होता है, ताकि उस दौरान मरीज को दर्द महसूस न हो। दूसरे मेडिकल स्पेशलिस्ट के मुकाबले एनेस्थेसियोलॉजी का काम एक टीम वर्क  होता है। एनेस्थेसियोलॉजी का टीम डॉक्टर से साथ मिलकर काम करता है। साथ ही, सर्जरी से पहले, सर्जरी के दौरान और सर्जरी के बाद मरीज के शरीर का तापमान, हर्ट रेट, ब्रिथिंग आदि की मॉनिटरिंग भी करते हैं। एनेस्थेसियोलॉजिस्ट ऑपरेशन रूम में मरीज को ऑपरेशन के दौरान शांत रखने की कोशिश करते हैं। हालांकि वे ऑपरेटिंग रूम के बाहर भी काम करते हैं। वे इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) में गंभीर और  पुरानी बीमारी से परेशान मरीजों को दर्द के निजात दिलाने में मदद करते हैं। पुरानी बीमारी से जूझ रहे मरीज की इलाज में भी एनेस्थेसियोलॉजिस्ट की भूमिका अहम होती है। जहां ऑपरेशन की जरूरत होती है, वहां दर्द से निजात दिलाने के लिए एनेस्थेसियोलॉजिस्ट की डिमांड होती है।
ऑपरेशन सही सलामत हो इसके लिए एक कुशल एनेस्थेसियोलॉजिस्ट का होना आवश्यक है। इनका काम ऑपरेशन से पहले शुरू होता है और बाद तक जारी रहता है। दरअसल, एनेस्थेसियोलॉजिस्ट का काम  केवल ऑपरेशन के दौरान बेहोश करना ही नहीं होता है, बल्कि इस बात का भी ध्यान रखना होता है कि ऑपरेशन के दौरान और उसके बाद मरीज को किसी भी प्रकार की दर्द या तकलीफ न हो। साथ ही शरीर के सारे अंग ठीक तरीके से काम करे। आईसीयू, आईआरसीयू, पेन क्लीनिंग, एक्सीडेंट रेस्क्यू, डिजास्टर मैनेजमेंट में भी एनेस्थेसियोलॉजिस्ट की अहम भूमिका होती है। साथ ही, सर्जिकल टीम में एनेस्थेसियोलॉजिस्ट महत्वपूर्ण सदस्य होते हैं।

वर्क प्रोफाइल

एनेस्थेसियोलॉजिस्ट असिस्टेंट: इस तरह के प्रोफेशनल्स एनेस्थेसियोलॉजिस्ट के सुपरविजन में काम करते हैं। शुरू-शुरू में ये मरीज को एनेस्थेसिया देने में एनेस्थेसियोलॉजिस्ट की मदद करते हैं। हालांकि यह पोस्ट डिमांड और जगह पर भी निर्भर करती है। फिलहाल भारत में एनेस्थेसियोलॉजिस्ट असिस्टेंट का कोई पोस्ट नहीं है।
सर्टिफाइट रजिस्टर्ड नर्स एनेस्थेटिक : सर्टिफाइट रजिस्टर्ड नर्स भी एनेस्थेसियोलॉजिस्ट के सुपरविजन में काम करती है। इनका काम देवा देने में एनेस्थेसियोलॉजिस्ट की मदद करना होता है।
एनेस्थेसिया टेक्नीशियन : इनका काम एनेस्थेसिया के उपकरण का रख-रखाव करना होता है।

कहां है स्कोप
देश में हॉस्पिटल की संख्या बढऩे से साथ-साथ एनेस्थेसियोलॉजिस्ट की डिमांड शहरी क्षेत्र के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी बढऩे लगी है।  इनकी डिमांड क्लिनिक, हॉस्पिटल्स, हेल्थ क्लिनिक आदि में होती है। अधिकतर एनेस्थेसियोलॉजिस्ट हॉस्पिटल के ऑपरेशन थियेएट, सर्जरी सेंटर, मेडिकल ऑफिस, डेंटल क्लिनिक आदि जगहों पर काम करते हैं। कई बार इनका काम इमरजेंसी रूम में भी होता है, जहां वे हर्ट अटैक्स, शॉक्स, ड्रग ओवरडोज के अलावा गंभीर बीमारियों में मरीज को संभालते हैं। इसके अलावा, इनके लिए अर्जेंट  केयर सेंटर, अकेडमिक मेडिकल सेंटर और मिलिट्री में भी जॉब ऑप्शंस होता है। मेडिकल कॉलेज में लेक्चरर  के तौर पर भी करियर की शुरुआत करने का मौका होता है।


सैलरी पैकेज
इस फील्ड में सैलरी वर्क एक्सपीरियंस और वर्क प्लेस भी डिपेंड करती है। आमतौर पर एनेस्थेसियोलॉजिस्ट की सैलरी 20-30 हजार रुपये प्रतिमाह होती है। हालांकि यह मेडिकल ऑर्गेनाइजेशन पर भी निर्भर है। सरकारी हॉस्पिटल की तुलना में कॉरपोरेट हॉस्पिटल में सैलरी अधिक होती है। अगर इस फील्ड में ख्याति प्राप्त कर लेते हैं, तो प्रति घंटे के हिसाब से भी कमाई कर सकते हैं।

इंस्टीट्यूट वॉच
-वेदेही इंस्टीट्यूट ऑफ डेंटल साइंस ऐंड रिसर्च सेंटर, बेंगलुरु
-वद्र्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज और सफदरजंग हॉस्पिटल, नई दिल्ली
-एसवीएस मेडिकल कॉलेज, महबूबनगर, आंध्र प्रदेश
-एनआरआई अकेडमी ऑफ साइंस, गनतुर, आंध्र प्रदेश
- एमवीजे मेडिकल कॉलेज ऐंड रिसर्च हॉस्पिटल, बेंगलुरु
- इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, पटना, बिहार
-अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, कोच्चि, केरला
-आरजी कार मेडिकल कॉलेज ऐंड हॉस्पिटल, कोलकाता, वेस्ट बंगाल
- एन.एच.एल म्यूनिसिप्ल मेडिकल कॉलेज, अहमदाबाद, गुजरात
- श्रीराम चंद्र भांज मेडिकल कॉलेज ऐंड हॉस्पिटल, कटक, ओडिशा

पब्लिशिंग इंडस्ट्री में करियर

किताब सभी लोग पढ़ते हैं और ये सबकी जिंदगी का एक जरूरी हिस्सा हैं। परन्तु इसमें एक अच्छा एवं सम्मानजनक करियर भी हो सकता है, ऐसा बहुत ही कम लोग सोचते हैं। जबकि सच यह है कि बुक पब्लिशिंग उद्योग में करियर की अपार संभावनाएं हैं। ग्लोबलाइजेशन और आईटी क्रांति ने भारत में पब्लिशिंग इंडस्ट्री में एक नई जान फूंक दी है। भारत में कम लागत में मिल रही श्रेष्ठ सर्विस और बेहतर टैलॅन्ट के कारण विश्व की जानी-मानी पब्लिशिंग कंपनियां अपना क्षेत्रीय ऑफिस भारत में खोल रही हैं। इससे और दुनिया के नामी प्रकाशकों द्वारा की जा रही आउटसोर्सिंग के कारण भारत के पब्लिशिंग उद्योग को काफी फायदा हुआ है। एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय पब्लिशिंग इंडस्ट्री दस प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रही है। मॉल कल्चर ने भी पब्लिशिंग इंडस्ट्री के ग्रोथ में योगदान दिया है। पेंटालुन्स, रिलायंस, क्रॉसवर्ड, लैंडमार्क, ओडिसी आदि कई छोटे-बडे चेन स्टोर्स हैं, जो कि आज धीरे-धीरे देश भर में फैल रहे हैं। दरअसल, इनकी वजह से क्षेत्रीय भाषाओं के बुक्स को भी तेजी से बढ़ावा मिल रहा है। इसके अलावा, शिक्षण-संस्थानों का बड़े पैमाने पर खुलना, स्टूडेंट्स की संख्या में हो रही लगातार वृद्धि, भारतीय लेखकों की किताबों को अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिलना जैसे तमाम ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से पब्लिशिंग इंडस्ट्री वर्तमान में अभूतपूर्व मुकाम पर पहुंच चुकी है। जो क्रिएटिव हैं, किताबों में दिलचस्पी रखते हैं, वे पब्लिशिंग उद्योग में एडिटर, असिस्टेंट एडिटर, सब्जेक्ट मैटर एक्सपर्ट, मार्केटिंग ऐंड सेल्स और प्रोमोशन मैनेजर जैसी आकर्षक जॉब हासिल कर सकते हैं।
योग्यता
पब्लिशिंग से जुड़े ज्यादातर कोर्सेज पीजी लेवॅल के होते हैं, इसलिए कैंडीडेट का ग्रेजुएट होना जरूरी है। वर्तमान में  पब्लिशिंग इंडस्ट्री एक नए दौर से गुजर रही है। इसलिए आईटी और कम्प्यूटरीकरण के इस युग में इस इंडस्ट्री में केवल वे लोग ही ज्यादा बेहतर कर सकते हैं, जो न केवल टैलॅन्टेड हों, बल्कि स्किल्ड भी हों। 
व्यक्तिगत गुण
पब्लिशिंग इंडस्ट्री में सफल स्थान बनाने के लिए किताबों से लगाव,  बढ़िया कम्युनिकेशन स्किल्स, विश्लेषण करने की क्षमता, सांस्कृतिक सजगता व प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल्स, बेहतर बिजनेस-सेंस व टीमवर्क एबिलिटी तथा नई-नई प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी की जानकारी आदि जैसे गुणों का व्यक्ति में होना जरूरी है।
अवसर
तेजी से विकसित हो रही पब्लिशिंग इंडस्ट्री में न केवल एडिटोरियल डिपार्टमेंट, बल्कि अन्य विभागों में भी जॉब की बेहतरीन संभावनाएं हैं। पब्लिशिंग इंडस्ट्री में निम्न रूप में संभावनाओं की तलाश की जा सकती है:
• संपादन:  पब्लिशिंग हाउस में एडिटोरियल डिपार्टमेंट सबसे महत्वपूर्ण होता है। यहीं बुक की स्क्रिप्टिंग से लेकर फाइनल प्रिंटिंग से जुड़े तमाम छोटे-बड़े निर्णय लिए जाते हैं। यदि किसी के पास अलग-अलग विषयों की समझ है, भाषा पर अच्छी पकड़ है और परिपक्व निर्णय लेने की क्षमता भी है, तो संपादन का कार्य उसके लिए बेस्ट साबित हो सकता है।
• अनुवादक:  आज तमाम छोटे-बड़े पब्लिशिंग हाउस हैं, जहां अनुवादक की जरूरत पड़ती है। लेकिन इसके लिए भाषा पर अच्छी पकड़ और विभिन्न विषयों की व्यापक समझ का होना जरूरी है।
• इलस्ट्रेटर्स:  ऐसे कैंडिडेट्स, जो कलात्मक पृष्ठभूमि से हैं या जो बुक के कला-पक्ष के प्रति ज्यादा झुकाव रखते हैं, वे पब्लिशिंग इंडस्ट्री में इलस्ट्रेटर्स के रूप में काम कर सकते हैं।
• प्रूफ-रीडर्स:  ये एडिटोरियल डिपार्टमेंट से ही जुड़े होते हैं। इनका काम कंटेंट में पाई जाने वाली अशुद्धियों को दूर करना होता है।
• वितरण और मार्केटिंग:  बुक के विक्रय और वितरण से जुड़ी तमाम कार्यों की जिम्मेदारी इसी डिपार्टमेंट के जिम्मे होती है। इसके अलावा, सब्जेक्ट मैटर एक्सपर्ट्स के रूप में, प्रिंटिंग, प्रोडक्शन डिपार्टमेंट आदि में भी जॉब के बेहतरीन अवसर हैं।
कमाईपब्लिशिंग इंडस्ट्री में सम्मानजनक तरीके से अच्छी कमाई की जा सकती है। संस्थान, पद और व्यक्ति के अनुभवों के हिसाब से वेतन का निर्धारण होता है।
कोर्स
प्रोफेशनल्स की जरूरतों को देखते हुए देश के जाने-माने शिक्षण-संस्थानों में इससे संबंधित कोर्स चलाए जा रहे हैं। जैसे-कलकत्ता विश्वविद्यालय पब्लिशर्स ऐंड बुकसेलर्स गिल्ड ऑफ कोलकाता के साथ मिल कर पीजी डिप्लोमा इन बुक पब्लिशिंग स्टडीज, पुणे यूनिवर्सिटी अखिल भारतीय मराठी पब्लिशर्स असोसिएशन के साथ मिल कर बुक पब्लिशिंग का सर्टिफिकेट कोर्स का संचालन कर रही है। इसके अलावा, नेशनल बुक ट्रस्ट न केवल दिल्ली में, बल्कि देश के दूसरे भागों में भी बुक पब्लिशिंग से जुडे रेगुलर कोर्स का संचालन कर रही है। इग्नू ने एफआईपी के साथ मिल कर जुलाई-2009 से बुक पब्लिशिंग में पीजी डिप्लोमा का कोर्स शुरू किया है। कुछ मh त्वपूर्ण कोर्स निम्नलिखित हैं:
 o डिप्लोमा कोर्स इन प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी ऐंड मैनेजमेंट (दो वर्षीय)
 o पीजी डिप्लोमा कोर्स इन प्रिंटिंग ऐंड पब्लिशिंग (एक वर्षीय)
 o पीजी डिप्लोमा कोर्स इन बुक पब्लिशिंग (तीन माह)
 o पोस्ट ग्रेजुएट सर्टिफिकेट कोर्स इन कॉपी एडिटिंग ऐंड प्रूफ रीडिंग
 o सर्टिफिकेट कोर्स इन क्रिएटिव राइटिंग
 o सर्टिफिकेट कोर्स इन बाइंडिंग ऐंड फिनिशिंग
 o ट्रेनिंग कोर्स इन पब्लिशिंग (एक माह)
संस्थान
 1. दिल्ली यूनिवर्सिटी
 2. नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली
 3. इंस्टीट्यूट ऑफ बुक पब्लिशिंग, दिल्ली
 4. यूनिवर्सिटी ऑफ कोलकाता
 5. अन्नामलाई यूनिवर्सिटी, तमिलनाडु
 6. महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी, कोट्टायम, तमिलनाडु

Wednesday, March 2, 2016

दंत चिकित्‍सा में कैरियर 
 हमारे देश में अधिकतर लोग दांतों की बीमारियों से ग्रस्त हैं। लोगों को अपने दांतों और मसूढ़ों को स्वस्थ रखने के लिए जिस अनुपात में चिकित्सकों की जरूरत है, वे हैं नहीं। आज भी दंत चिकित्सक बड़े शहरों और नगरों में ही मुख्य तौर पर उपलब्ध हैं। ऐसे में यदि डेंटिस्ट बनकर अपना कैरियर संवारा जाए, तो यह लाभ का सौदा हो सकता है…
सुंदर और स्वस्थ दिखने की प्रतिस्पर्धा में लोग आज सुंदर चेहरे के साथ-साथ चमकदार दांत भी चाहते हैं। मेडिकल क्षेत्र में रुचि लेने वाले युवाओं के लिए आज यह बेहतरीन कैरियर विकल्प है। हमारे देश में अधिकतर लोग दांतों की बीमारियों से ग्रस्त हैं। लोगों को अपने दांतों और मसूढ़ों को स्वस्थ रखने के लिए जिस अनुपात में चिकित्सकों की जरूरत है, वे हैं नहीं। आज भी दंत चिकित्सक बड़े शहरों और नगरों में ही मुख्य तौर पर उपलब्ध हैं। ऐसे में यदि डेंटिस्ट बनकर अपना कैरियर संवारा जाए, तो यह लाभ का सौदा हो सकता है ।
चयन प्रक्रिया
प्रवेश के लिए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की ओर से आयोजित नीट यानी नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट पास करना होता है। टेस्ट में ऑब्जेक्टिव टाइप के 180 प्रश्न होते हैं। ये प्रश्न बायोलॉजी, जूलोजी, फिजिक्स और केमिस्ट्री से होते हैं। इस परीक्षा में सफल होने के बाद ही उम्मीदवार को डेंटल कालेज में चार वर्षीय ऑल बैचलर ऑफ  डेंटल सर्जरी (बीडीएस) में दाखिले का मौका मिलता है। यह कोर्स और प्रवेश परीक्षा डेंटल काउंसिल ऑफ  इंडिया से मान्यता प्राप्त है। इसके अलावा राज्य स्तर पर भी परीक्षाओं के माध्यम से बीडीएस में प्रवेश पाया जा सकता है। डिग्री हासिल करने के बाद पांचवें साल में एक साल की इंटर्नशिप होती है। यह कोर्स का अनिवार्य हिस्सा है।
फीस
सरकारी डेंटल कॉलेजों में बीडीएस कोर्स करने की फीस करीब एक लाख रुपए है, लेकिन परेशानी की बात यह है कि देश में डेंटल कालेजों की संख्या काफी कम है। निजी कालेजों में चार साल की फीस 10 लाख रुपए से ऊपर है। बीडीएस कोर्स की फीस भी सरकारी में काफी कम है लेकिन निजी कालेजों में विभिन्न स्पेशलाइज्ड विभाग की अलग-अलग है। यह 25 लाख रुपए से ऊपर जाती है। गरीब वर्ग के जो छात्र मैरिट में आते हैं, उनके लिए सरकारी मेडिकल कालेजों में स्कॉलरशिप की व्यवस्था है।
वेतनमान
दांतों के डाक्टर का शुरुआती वेतनमान सरकारी अस्पताल में 50 हजार रुपए से ज्यादा है। जैस-जैसे अनुभव में इजाफा होता जाता है, वेतन में बढ़ोतरी होती जाती है। सीनियर डाक्टर के रूप में वेतनमान डेढ़ लाख से ऊपर है। इसी तरह निजी कालेजों में कमाई क्लीनिक चलने पर निर्भर करती है। यह लाख रुपए से दस लाख रुपए तक हो सकती है। इसमें खासी मेहनत और पहचान की जरूरत पड़ती है।
प्रमुख शिक्षण संस्थान
मेडिकल कालेज मौलाना आजाद डेंटल कालेज, नई दिल्ली
फैकल्टी ऑफ   डेंटिस्ट्री जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली
ईएसआईसी डेंटल कालेज इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, दिल्ली
आर्मी कालेज ऑफ डेंटल साइंस
सिकंदराबाद गवर्नमेंट डेंटल कालेज,
अहमदाबाद डेंटल कालेज
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय
डा. आर अहमद डेंटल कालेज,कोलकाता
शैक्षणिक योग्यता
डेंटिस्ट बनने के लिए फिजिक्स, केमेस्ट्री और बायोलॉजी विषय के साथ कम से कम 50 फीसदी अंकों के साथ 12वीं उत्तीर्ण होना जरूरी है।
स्पेशलाइजेशन
बीडीएस कोर्स करने के बाद स्पेशलाइजेशन और गहन चिकित्सा का ज्ञान हासिल करने के लिए एमडीएस में भी प्रवेश जरूरी है। मास्टर ऑफ  डेंटल सर्जरी में भी दाखिला प्रवेश परीक्षा के जरिए ही मिलता है। एमडीएस में स्पेशलाइजेशन विभिन्न तरह के हैं। इनमें इंडोडांटिक्स, ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल पैथोलॉजी, ओरल सर्जरी, ऑर्थोडोनटिक्स, पेडोडोंटिक्स, पेरिडोंटिक्स एवं प्रोस्थोडोंटिक्स जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इनमें से किसी एक क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करनी होती है। दंत चिकित्सा में विशेषज्ञ बनने के लिए इससे जुड़े प्रै्रैक्टिस प्रोग्राम और देश-दुनिया में हो रहे नए प्रयोग, अनुसंधान और इलाजों की भी जानकारी रखनी होती है। डिग्री हासिल करने के बाद कई तरह के सर्टिफिकेट और डिप्लोमा कोर्स भी किया जा सकता है, जिससे दंत चिकित्सा के बारे में जानकारी अपडेट की जा सके।
अवसर कहां-कहां
वर्तमान में देश में डेंटल सर्जन की सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्रों में काफी मांग है। आज पूरे देश में निजी अस्पतालों का जाल बिछ चुका है। इनमें बेहतर पैकेज और सुविधा के साथ दंत चिकित्सकों को नियुक्त किया जा रहा है। इसी तरहए निजी नर्सिंग होम और सरकार की बड़ी डिस्पेंसरियों में भी दंत चिकित्सक नियुक्त किए जा रहे हैं। सरकारी अस्पतालों, मेडिकल कालेजों के अलावा रेलवे और रक्षा क्षेत्रों द्वारा संचालित अस्पतालों में डेंटिस्ट की नियुक्तियां होती हैं। टूथ पेस्ट बनाने और मसूढ़ों की देखरेख करने वाली कंपनियां अपने यहां ऐसे लोगों को बतौर विशेषज्ञ नियुक्त कर रही हैं। इसके अलावा स्वरोजगार के तौर पर निजी क्लीनिक भी खोल सकते हैं। दंत चिकित्सा में उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद अध्यापन कार्य से भी जुड़ सकते हैं। दंत चिकित्सा को लेकर यहां रिसर्च भी कर सकते हैं।
भारत में दंत चिकित्सा
भारत में प्रथम दंत चिकित्सालय सन् 1920 ई. में कलकत्ता (अब कोलकाता) में खोला गया। 1926 ई. में दूसरा चिकत्सालय कराची में खुला। नैयर दंत चिकित्सा विद्यालय 1933 ई. में खुला। सन् 1936 में लाहौर के डे मांटमोरेंसी कालेज ऑफ डेंटिस्ट्री में बीडीएस उपाधि के लिए नियमित शिक्षा आरंभ हुई। सन् 1945 में एमडीएस उपाधि के लिए पढ़ाई प्रारंभ की गई। सन् 1949 में उत्तर प्रदेश में एक दंत चिकित्सा विद्यालय लखनऊ में खोला गया और किंग जॉर्ज मेडिकल कालेज से संबद्ध कर दिया गया।
सेना में दंत चिकित्सा
आर्मी डेंटल कोर, आर्मी मेडिकल कोर की सहयोगी शाखा है। मेडिकल कोर के प्रधान को कर्नल की पदवी मिली रहती है और वह दंत सेवाओं का उपनिदेशक भी कहलाता है। नाविक और वायुसेनाओं में पृथक दंत विभाग होते हैं। दंत चिकित्सा की विविध शाखाओं के लिए पांच विशेषज्ञ होते हैं। दंत यांत्रिक और दंत रक्षकों के प्रशिक्षण के लिए आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल कालेज, पूना में पढ़ाई होती है। भर्ती पहले अल्पकाल के कमीशन के लिए होती है। इनमें से कुछ चुने हुए अभ्यर्थियों को स्थायी कमीशन दिया जाता है