Monday, November 16, 2015

एक्चुरिअॅल साइंस में करियर

जो लोग गणना करने में कुशल हैं तथा उन्हें आंकड़ों से खेलना पसंद है और वे पारंपरिक कोर्स से हटकर कुछ अलग करना चाहते हैं, तो एक्चुरिअॅल साइंस में करियर उनके लिए बेहतर ऑप्शन हो सकता है। एक्चुरिअल साइंस के अर्न्तगत बीमा के जोखिम और प्रीमियम की गणना कर भविष्य की सही स्थिति का वित्तीय रूप से आकलन किया जाता है। संभवतया इसकी जरूरत सबसे पहले जीवन बीमा निगम में महसूस की गई थी, परन्तु बाद में धीरे-धीरे बैंक, स्टॉक एक्सचेंज, निजी और सरकारी एजेंसियों में भी इसकी उपयोगिता बढ़ती चली गई।
कार्य
एक्चुअरि प्रोफेशनल्स मृत्यु, बीमारी, दुर्घटना, विकलांगता आदि के दौरान वित्तीय जोखिम का आकलन करते हैं। इसके लिए मैथमेटिक्स और स्टैटिस्टिक्स का सहारा लिया जाता है।
योग्यता
एक्चुरिअॅल साइंस से संबंधित कोर्स में स्नातक डिग्री के लिए मैथ्स या स्टैटिस्टिक्स में 85 प्रतिशत अंकों के साथ बारहवीं पास होना आवश्यक है, जबकि पीजी डिप्लोमा, मास्टर्स डिग्री और सर्टिफिकेट कोर्स के लिए मैथ्स/स्टैटिस्टिक्स/ इकोनॉमेट्रिक्स विषय से स्नातक की डिग्री जरूरी है।
अवसरएक एक्चुअॅरि प्रोफेशनल्स की डिमांड सरकारी और प्राइवेट इंश्योरेंस कंपनियों में ही नहीं, बल्कि टैरिफ एडवाइजरी कमिटी, इंश्योरेंस रेगुलेटरी ऐंड डेवलॅपमेंट अथॉरिटी(आईआरडीए), सोशल सिक्योरिटी स्कीम, फाइनेंशियल एनालिसिस फर्म में भी है। एक्चुरिअॅल साइंस में नौकरी की संभावनाओं का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि नामी कंपनियां गणित और सांख्यिकी विषयों में स्नातक पेशेवरों को एक्चुरिअॅल प्रॉसेस आउटसोर्सिग (एपीओ)जैसी आला दर्जे की नौकरियां देने का प्रस्ताव भी दे रही हैं। ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देश भी इस फील्ड से जुड़े कुशल लोगों की कमी होने के कारण भारत में अपने कार्य को आउटसोर्स कर रही हैं। बीपीओ कंपनी में भी जोखिम का विश्लेषण करने के लिए बड़े पैमाने पर एक्चुअॅरि प्रोफेशनल्स की बहाली की जा ही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, आगामी तीन वर्षो में लगभग 30 हजार से अधिक ट्रेंड प्रोफेशनल्स की इस क्षेत्र में जरूरत होगी।
कोर्स
बीए, इंश्योरेंस (तीन वर्ष)
बीएससी, एक्चुरिअॅल साइंस (तीन वर्ष)
पीजी डिप्लोमा इन सर्टिफाइड रिस्क ऐंड इंश्योरेंस मैनेजमेंट (दो/तीन वर्ष)
सर्टिफिकेट कोर्स इन इंटरमिडियरिज (intermediaries) (इंश्योरेंस विषय) (तीन माह)
कोर्स ऑफ इंश्योरेंस एजेंट (100-150 घंटे)
कोर्स ऑफ इंश्योरेंस मैनेजर (दो वर्ष)
पीजी डिप्लोमा इन इंश्योरेंस साइंस (एक वर्ष)
पीजी डिप्लोमा इन इंश्योरेंस ऐंड फाइनेंशियल सर्विस (15 माह)
मास्टर इन इंश्योरेंस बिजनेस (दो वर्ष)
एमएससी इन एक्चुरिअॅल साइंस (दो वर्ष)
फाउंडेशन इन फाइनेंशियल प्लानिंग
संस्थान
1. डिपार्टमेंट ऑफ ह्यूमनिटीज ऐंड सोशल साइंस, आईआईटी, मुंबई
2. बिशप हार्बर कॉलेज, तिरुचिरापल्ली 
3. इंस्टीट्यूट ऑफ सर्टिफाइड रिस्क ऐंड इंश्योरेंस मैनेजर्स, हैदराबाद
4. कॉलेज ऑफ वोकेशनल स्टडीज, दिल्ली यूनिवर्सिटी
5. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
6. बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी, नई दिल्ली
7. यूनिवर्सिटी ऑफ पुणे
8. यूनिवर्सिटी ऑफ कल्याणी
9. एमिटी स्कूल ऑफ इंश्योरेंस ऐंड एक्चुरिअॅल साइंस, नोएडा
10. अन्नामलाई यूनिवर्सिटी

Sunday, November 15, 2015

करियर/ऑपरेशन थियेटर टेक्नीशियन/फजल

मेडिकल स्ट्रीम में डॉक्टरी की पढ़ाई करना हर स्टूडेंट का सपना होता है लेकिन अक्सर परीक्षा में कम अंक आने की वजह से या फिर आर्थिक तंगी के कारण छात्र चाह कर भी मेडिकल लाइन में नहीं जा पाते। ऐसे स्टूडेंट्स के लिए ऑपरेशन थियेटर टेक्नीशियन का कोर्स मेडिकल क्षेत्र में करियर बनाने के लिए एक अच्छा ऑप्शन हो सकता है। यूं तो यह कोर्स पैरामेडिकल के तहत आता है लेकिन इसकी डिमांड आज हर बड़े व छोटे अस्पताल में है। ऑपरेशन टेक्नीशियन की इसी मांग को देखते हुए विद्यार्थियों में ये नए करियर विकल्प के रूप में उभरकर सामने आ रहा है। आज इससे संबंधित कोर्स कई मेडिकल कॉलेज और इंस्टीट्यूट में उपलब्ध हैं।
ऑपरेशन टेक्नीशियन का काम
ऑपरेशन थियेटर टेक्नीशियन के काम में ऑपरेशन टूल्स से लेकर ऑपरेशन थियेटर की हाइजीनिक सफाई तक का विशेष ध्यान रखना शामिल है। ऑपरेशन थियेटर टेक्नीशियन धैर्यपूर्वक डॉक्टरों की मदद करता है। वह इस बात का पूरा ध्यान रखता है कि ऑपरेशन थियेटर पूर्ण रूप से बेक्टीरिया तथा वायरस से मुक्त  हो।  वह ऑपरेशन थियेटर तैयार करने से लेकर सेक्शन मशीन, ऑक्सीजन सिलेंडर आदि भी चेक करता है। इसके अलावा मरीज को ओपीडी वार्ड से ऑपरेशन थियेटर तक लाने-ले जाने का काम, सर्जरी से पहले ऑपरेशन से संबंधित सभी टूल्स और इक्विपमेंट्स को चेक करना और उसे प्रबंधित करना, सर्जरी के दौरान सर्जन और नर्स की तकनीकी तौर पर सहायता करना, मरीज को ऑपरेशन के दौरान बेहोशी का इंजेक्शन यानी  एन्सथिसीया देना, ऑपरेशन थियेटर की साफ-सफाई, सर्जिकल टूल्स का रखरखाव वगैरह वगैरह।
कौन कौन से हैं कोर्स
डीपीएमआई की प्रिंसिपल डॉक्टर अरुणा सिंह के मुताबिक, ऑपरेशन थियेटर  टेक्नीशियन के तीन वर्षीय कोर्स के अंतर्गत एनॉटोमी, फिजियोलॉजी, बायो केमिस्ट्री, क्लीनिकल बायो केमिस्ट्री, माइक्रो बायोलॉजी, पैरास्ट्रोलॉजी, सेरालॉजी,विरोलॉजी, क्लीनिकल पैथोलॉजी, हैमेटोलॉजी और ब्लड बैंकिंग मैनेजमेंट, हिस्टो पैथोलॉजी, ऑपरेशन थियेटर मैनेजमेंट एंड एथिक्स, ऑपरेशन थियेटर प्लानिंग एंड ऑर्गेनाइजिंग, कम्युनिकेशन, पर्सनल डेवलपमेंट एंड रिलेशन आदि का गहनता से अध्ययन कराया जाता है। कुछ अस्पतालों में चयन के बाद प्रशिक्षण के दौरान ही छात्रों को संस्थान की ओर से ही कुछ धनराशि प्रदान की जाने लगती है। सरकारी अस्पतालों व देश में तेजी से बढ़ते निजी अस्पतालों में ऑपरेशन थियेटर टेक्नीशियन के लिए रोजगार के खूब अवसर हैं।
योग्यता
इस कोर्स के लिए विद्यार्थियों का 12वीं विज्ञान विषयों से पास होना अनिवार्य है और इसके साथ-साथ पीसीएम, पीसीबी और कैमिस्ट्री,बॉटनी और जूलॉजी  (सीबीजेड) जैसे विषयों में 40 प्रतिशत अंक होना अनिवार्य है। कोर्स की अवधि 2 वर्ष है और 3 माह की इंटर्नशिप है। इस कोर्स में एडमिशन के लिए आपकी उम्र कम से कम 17 साल और अधिकतम 40 साल है।
स्किल्स
ऑपरेशन टेक्नीशियन की कम्युनिकेशन स्किल्स अच्छी होनी चाहिए। अपने काम के प्रति सजग और अंडर प्रेशर सिचुएशन में काम का भार संभालने की क्षमता होनी चाहिए। ऑपरेशन टेक्नीशियन का हर काम आर्गनाइज तरीके से होना चाहिए। शारीरिक रूप से स्वस्थ होना अनिवार्य है।
कहां-कहां हैं मौके
डीपीएमआई की प्रिंसिपल डॉक्टर अरुणा सिंह के मुताबिक किसी भी बड़े व छोटे सरकारी के साथ साथ निजी अस्पतालों, लैब्स, आईकेयर सेंटर, मेडिकल लेबोरेट्री वगैरह में बेशुमार जॉब्स हैं। यानि जहां भी अस्पताल है वहां ऑपरेशन थियेटर है तो जाहिर ऑपरेशन थियेटर टेक्निशियन की जरूरत है।
वेतन
ऑपरेशन टेक्नीशियन के लिए छोटे से लेकर बड़े हॉस्पिटलों में रोजगार के अवसर हैं। इनका शुरुआती वेतन 12 हजार से 15 हजार है। तजुर्बे के साथ साथ वेतन में इजाफा होता चला जाता है। इसमें स्वरोजगार की भी संभावनाएं हैं।
प्रमुख संस्थान
  1. दिल्ली पेरामेडिकल एंड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली,वेबसाइट : www.dpmiindia.com
  2. शिवालिक इंस्टीट्यूट ऑफ पारामेडिकल टेक्नोलॉजी, चंडीगढ़,वेबसाइट : www.shivalikinstitute.org
  3. पारा मेडिकल कॉलेज, दुर्गापुर, पश्चिम बंगाल वेबसाइट: www.paramedicalcollege
  4. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पारामेडिकल साइंसेज, लखनऊ,वेबसाइट : www.iipsinstitute.com
  5. डिपार्टमेंट ऑफ पैथालॉजी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़,वेबसाइट www.amu.ac.in

Sunday, November 8, 2015

खनन इंजीनियरिंग में है सुनहरा भविष्य


हमारी धरती के भीतर मौजूद प्रचुर खनिज संपदा हमारे जीवन का आधार है। परंतु खनिज संपदा का अनुचित एवं अवैज्ञानिक दोहन पर्यावरणीय असंतुलन की स्थितियाँ पैदा कर सकता है इसीलिए मानवीय उपयोग के लिए इस प्राकृतिक संपदा को निकालने का काम प्रशिक्षित एवं दक्ष लोगों के नेतृत्व एवं मार्गदर्शन में किया जाता है जिन्हें खनन इंजीनियर तथा इस विधा को खनन (माइनिंग) इंजीनियरिंग कहते हैं।

गौरतलब है कि हमारे देश में खनिज संपदा का प्रचुर भंडार है। बिहार,झारखंड, उड़ीसा,मध्यप्रदेश व पश्चिम बंगाल आदि राज्यों से भारी मात्रा में खनिज पदार्थ प्राप्त् होते हैं। देश की अर्थव्यवस्था में खनिज संपदा का महत्वपूर्ण स्थान है। अत: देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए शिक्षित- प्रशिक्षित खनन इंजीनियरों की माँग दिन-प्रतिदिन ब़ढती ही जा रही है। खनन इंजीनियरिंग के तहत खनिज, पेट्रोलियम तथा अन्य भूगर्भीय पदार्थ शामिल होते हैं। देश में खनन कार्यों में आई भारी तेजी के कारण यह क्षेत्र इंजीनियरिंग की एक प्रमुख शाखा बन चुका है। खनन इंजीनियरिंग के अंतर्गत धरती के भीतर खनिज पदार्थों की मौजूदगी का पता लगाना तथा सुरक्षित तरीके से उनकी खुदाई कर धरती से बाहर निकालना शामिल है।

खनन इंजीनियरिंग के क्षेत्र में कॅरियर बनाने के लिए विशेष प्रशिक्षण एवं कौशल की जरूरत होती है। जिन युवाओं की खनन इंजीनियरिंग के क्षेत्र में गहन रुचि हो केवल उन्हें ही इस क्षेत्र में कदम आगे ब़ढ़ना चाहिए क्योंकि इस क्षेत्र में काफी चुनौतियाँ हैं। खनन इंजीनियरिंग के कार्यक्षेत्र में प्रमुख रूप से उत्खनन, कच्चे खनिज पदार्थों का शुद्धिकरण आदि आते हैं। खनन इंजीनियर न केवल खनिजों से धातु और मिश्रधातु का उत्पादन करते हैं, बल्कि इस प्रक्रिया के दौरान वातावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को भी कम करने का प्रयास करते हैं। सामान्य रूप से खनन प्रक्रिया एक सुनियोजित भू-प्रायोगिक सर्वेक्षण के बाद ही प्रारंभ की जाती है। जिससे यह पता चल जाता है कि पृथ्वी के अंदर कितनी मात्रा में खनिज पदार्थ मौजूद हैं। एक तरीका यह भी है कि सर्वेक्षण के अंतर्गत चिहिन्त क्षेत्र के किसी भी भू -भाग से पत्थरों को निकालकर उनका त्रिस्तरीय अध्ययन कर प्रतिशत का आकलन किया जाता है ।

खनन इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने के लिए उम्मीदवार को बारहवीं की परीक्षा भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र एवं गणित विषय से उत्तीर्ण होना आवश्यक है । प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात ही बी.टे.के.,बी.ई. (माइनिंग),बी.एससी.(माइनिंग इंजीनियरिंग) में प्रवेश दिया जाता है। खनन इंजीनियरिंग के विभिन्न स्नातक पाठ्यक्रमों की अवधि तीन से पाँच वर्ष निर्धारित है । इसके बाद छात्र स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम अर्थात एम.टेक. या एम.ई. जो दो वर्ष का होता है , में प्रवेश केलिए अधिकृत हो जाते हैं।

खनन इंजीनियरिंग का पाठ्यक्रम संचालित करने वाले संस्थानों में प्रवेश परीक्षा के आधार पर ही प्रवेश दिया जाता है । इसके लिए विभिन्न संस्थान अखिल भारतीय स्तर पर लिखित परीक्षा का आयोजन करते लिखित परीक्षा मुख्यत: बारहवीं स्तर के फिजिक्स, कैमिस्ट्री, मैथ्स व इंग्लिश आदि विषयों पर आधारित होती है। भारत में डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त् इंडियन स्कूल ऑफ माइंस, धनबाद में कई तरह के कोर्स जैसे माइनिंग इंजीनियरिंग, पेट्रोलियम इंजीनियरिंग, मिनरल इंजीनियरिंग और मशीनरी माइनिंग आदि पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं। इस संस्थान में प्रवेश के लिए प्रत्येक वर्ष जनवरी-फरवरी में आवेदन पत्र आमंत्रित किए जाते हैं ।

रोजगार की दृष्टि से खनन इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अनुभवी व्यक्तियों की सदैव माँग बनी रहती है। सरकारी अथवा प्राइवेट दोनों ही सेँटरों में रोजगार के पर्याप्त् और उजले अवसर विद्यमान हैं। इस क्षेत्र में शिक्षण अथवा शोध की दिशा में भी कदम ब़ढ़या जा सकता है । देश की अनेक प्रतिष्ठित कंपनियों जैसे टाटा आयरन एंड स्टील, रिलायंस पेट्रोलियम, इंडियन ऑयल, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया, यूरेनियम कॉपोरेशन ऑफ इंडिया, सरकारी खनन निगम आदि में रोजगार के चमकीले अवसर उपलब्ध हैं। प्रमुख सार्वजनिक उपक्रमों जैसे हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड, नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन, इंडियन ब्यूरो ऑफ माइंस लिमिटेड में खनन इंजीनियरों की भारी माँग है । इसके अलावा माइनिंग रिसर्च सेंटर, धनबाद, इंडियन एक्सप्लोसिव लिमिटेड, इंडियन डेटोनेटर्स लिमिटेड आदि में भी रोजगार के प्रचुर अवसर हैं। खनन इंजीनियरी का कोर्स करने के उपरांत विदेशों में भी रोजगार के उज्ज्वल अवसर हैं। खनन क्षेत्र में खनन इंजीनियरों के वेतनमान बहुत आकर्षक होते हैं। अनुभव के साथ-साथ वेतन में भी लगातार वृद्धि होती जाती है। यदि आपको चुनौतियाँ पसंद हैं और यदि आप खतरा उठाने का माद्दा रखते हैं तो आपके लिए खनन क्षेत्र में रोजगार एवं कॅरियर की ढ़ेरों संभावनाएँ
खनन इंजीनियरिंग का कोर्स कराने वाले प्रमुख संस्थान है-
  • इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स, धनबाद, झारखंड।
  • इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी।
  • बिहार इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, सिंदरी, बिहार ।
  • कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी एंड इंजीनियरिंग, उदयपुर, राजस्थान।
  • विवसवर्या रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज, नागपुर, महाराष्ट्र।
  • गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज, रायपुर, छत्तीसगढ़।

Friday, November 6, 2015

केमिकल इंजीनियरिंग: संभावनाओं से भरपूर करियर

केमिकल इंजीनियरिंग एक बेहतरीन करियर क्षेत्र है। इस फील्ड में रोजगार के अवसरों की कमी नहीं है। इसमें करियर के अवसरों के बारे में जानकारी दे रहे हैं संजीव कुमार सिंह
केमिकल पदार्थों की बढ़ती मात्रा एवं भागीदारी के चलते इसमें रोजगार की संभावना तेजी से बढ़ रही है। इसमें कार्य करने वाले प्रोफेशनल्स ‘केमिकल इंजीनियर’ व यह पूरी प्रक्रिया ‘केमिकल इंजीनियरिंग’ कहलाती है। सामान्यत: केमिकल इंजीनियरिंग को इंजीनियरिंग की एक शाखा के रूप में जाना-समझा जाता है, जिसके अंतर्गत कच्चे पदार्थों एवं केमिकल्स को किसी प्रयोग की चीज में बदला जाता है, जबकि मॉडर्न केमिकल  इंजीनियरिंग कच्चे पदार्थों को बदलने के साथ-साथ तकनीक (नैनोटेक्नोलॉजी और बायोमेडिकल इंजीनियरिंग) पर भी बल देती है। इस विधा के अंतर्गत रासायनिक उत्पादों के निर्माण में आने वाली समस्याओं का हल ढूंढा जाता है। इसके अलावा उत्पादन प्रक्रिया में होने वाले डिजाइन प्रोसेस का कार्य डिजाइन इंजीनियर देखते हैं। अत: इसमें एक ही साथ कई अलग-अलग क्षेत्रों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि यह पाठ्यक्रम केमिस्ट्री व  इंजीनियरिंग का मिला-जुला रूप है। इसमें कच्चे पदार्थों या केमिकल्स को विभिन्न प्रक्रियाओं के तहत आवश्यक पदार्थों में तब्दील किया जाता है। इसमें नए मेटेरियल एवं तकनीकों की खोज भी की जाती है। इंजीनियरिंग की ही शाखा होने के कारण इसका कार्यस्वरूप काफी कुछ केमिस्ट्री एवं फिजिक्स से मिलता-जुलता है।
कुछ अलग सी है दुनिया
केमिकल इंजीनियर का कार्य केवल डिजाइन एवं मेंटेनेंस तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि कई परिस्थितियों में उन्हें कॉस्ट कटिंग एवं प्रोडक्शन सरीखे कार्यों को भी अंजाम देना पड़ता है। एक तरह से देखा जाए तो यह क्षेत्र हमेशा हुनर की तलाश में रहता है। नए आने वाले लोगों को पहले अनुभवी इंजीनियरों के साथ किसी तत्कालीन उपयोगिता वाले कार्य या परियोजना पर काम करने का मौका दिया जाता है।
प्रवेश परीक्षा
इसमें प्रवेश लेने के लिए आईआईटी जेईई या अन्य प्रवेश परीक्षाओं में बैठना अनिवार्य है। इसमें कुछ परीक्षा ऑल इंडिया अथवा कुछ स्टेट लेवल पर आयोजित की जाती हैं। इनमें उत्तीर्ण होने के पश्चात ही प्रमुख कोर्सों में प्रवेश मिल पाता है। इसमें मुख्यत: बीई या बीटेक में मुख्य रूप से इंडस्ट्रियल केमिस्ट्री, पॉलीमर टेक्नोलॉजी, पॉलीमर प्रोसेसिंग, पॉलीमर टेस्टिंग, पॉलीमर सिंथेसिस तथा एम ई स्तर के पाठ्यक्रम में मुख्य रूप से प्लांट डिजाइन, पेट्रोलियम रिफाइन, फर्टिलाइजर टेक्नोलॉजी, पेट्रोकेमिकल्स, सिंथेटिक फाइबर्स, प्रोसेसिंग ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स आदि की जानकारी दी जाती है।
वैज्ञानिक अभिरुचि से प्रगति
विज्ञान में रुचि एवं सिद्धांतों की जानकारी रखने वाले छात्रों के लिए यह एक विशिष्ट क्षेत्र है। चूंकि यह क्षेत्र अनुसंधान कार्य से जुड़ा है। अत: इसमें करियर बनाने वाले छात्रों को परिश्रमी, धैर्यवान, साहसी व लंबे समय तक अकेले कार्य करने की क्षमता रखनी होगी। साथ ही विश्लेषक, कम्युनिकेशन की दृष्टि से मजबूत, तकनीकी रुचि रखने वाला, कम्यूटर पर अच्छी पकड़ तथा आर्ट की कला में माहिर होना भी आवश्यक है। ऐसे व्यक्ति, जिनमें संख्या आकलन और विश्लेषक की क्षमता के साथ-साथ वैज्ञानिक झुकाव हो तो वे आसानी से इस व्यवस्था की तरफ मुड़ सकते हैं।
पाठय़क्रम संबंधी जानकारी
केमिकल इंजीनियरिंग का पाठय़क्रम केमिकल टेक्नोलॉजी से भिन्न होता है। इसमें आर्गेनिक व इनआर्गेनिक केमिकल्स को शामिल किया जाता है। इसके अंतर्गत बड़ी कंपनियों में डिजाइन एवं मैन्युफैक्चरिंग से संबंधित कार्य किए जाते हैं। रेगुलर कोर्सेज के अलावा दूरस्थ शिक्षा के जरिए भी कई तरह के कोर्स संचालित किए जाते हैं। एक केमिकल इंजीनियर का कार्य केमिकल प्लांट्स को डिजाइन, ऑपरेट एवं उसके प्रोडक्शन से जुड़े कार्यों को अंजाम देना होता है।
कुछ प्रमुख कोर्स
डिप्लोमा इन केमिकल इंजीनियरिंग
बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग इन केमिकल इंजीनियरिंग
बैचलर ऑफ साइंस इन केमिकल इंजीनियिरग
बैचलर ऑफ टेक्नोलॉजी इन केमिकल इंजीनियरिंग
मास्टर ऑफ इंजीनियरिंग इन केमिकल इंजीनियरिंग
मास्टर ऑफ साइंस इन केमिकल इंजीनियिरग
मास्टर ऑफ टेक्नोलॉजी इन केमिकल इंजीनियरिंग
इंट्रिग्रेटेड एमटेक इन केमिकल इंजीनियरिंग
पोस्ट डिप्लोमा इन पेट्रो केमिकल टेक्नोलॉजी
व्यापक है इसका कार्यक्षेत्र
कोर्स करने के बाद सबसे ज्यादा नियुक्तियां केमिकल, प्रोसेसिंग, मैन्युफैक्चरिंग, प्रिंटिंग, फूड व मिल्क इंडस्ट्री में होती हैं। इसके अलावा प्रोफेशनल्स मिनरल इंडस्ट्री, पेट्रोकेमिकल प्लांट्स, फार्मास्यूटिकल, सिंथेटिक फाइबर्स, पेट्रोलियम रिफाइनिंग प्लांट्स, डाई, पेंट, वार्निश, औषधि निर्माण, पेट्रोलियम टेक्सटाइल एवं डेयरी प्लास्टिक उद्योग आदि क्षेत्रों में रोजगार पा सकते हैं। रासायनिक उद्योग की दृष्टि से भी यह क्षेत्र काफी उत्तम है। शोध में रुचि रखने वाले रिसर्च इंजीनियरिंग का विभाग संभालते हैं। कुछ लोग विपणन व प्रबंधन का काम देखते हैं। प्राइवेट एवं सरकारी संस्थानों में केमिकल इंजीनियरिंग से संबंधित रोजगार की भरमार है। एक केमिकल इंजीनियर को प्रयोगशाला जैसे सरकारी प्रयोगशाला, उद्योग शोध संघ, निजी परामर्श केंद्र, विश्वविद्यालय शोध दल में भी तरह-तरह के कार्य एवं अनुसंधान करने पड़ते हैं। इसके अतिरिक्त वे अन्य कई मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्रीज में विश्लेषण, निर्माण संबंधी कार्य देखते हैं।
इस रूप में मिलेगा काम
सुपरवाइजर या मैनेजर
टेक्निकल स्पेशलिस्ट
प्रोजेक्ट मैनेजर
प्रोजेक्ट इंजीनियर
केमिकल इंजीनियर
केमिकल डेवलपमेंट इंजीनियर
क्वालिटी कंट्रोलर’ लेबोरेटरी असिस्टेंट
सेलरी
कार्य, अनुभव, योग्यता एवं पद को देखते हुए प्राइवेट सेक्टर में अधिक पारिश्रमिक दिया जाता है। फ्रेशर्स को प्रारंभ में 15000 से लेकर 25000 रुपए प्रतिमाह तथा अन्य सुविधाएं मिलती हैं, जबकि एक डिप्लोमा धारक को सरकारी संस्थानों द्वारा 14000 से 15000 रुपए प्रतिमाह प्राप्त होते हैं।
कॉलेज के लेक्चरर को प्रारंभिक वेतन 50,000 से 60,000 रुपए प्रतिमाह प्रदान किया जाता है। एक इंजीनियर को सरकारी संस्थानों द्वारा 30,000-40,000 एवं सरकारी आवास तथा अन्य सुविधाएं मिलती हैं।
विज्ञान का ज्ञान आवश्यक
केमिकल इंजीनियर बनने के लिए बीई या बीटेक (स्नातक स्तर) तथा परा स्नातक स्तर पर एमई होना आवश्यक है। ऐसे में जो छात्र आगे चल कर केमिकल इंजीनियर बनना चाहते हैं, उन्हें बारहवीं में विज्ञान विषय लेना होगा। अधिकांश संस्थान ऐसे हैं, जो दसवीं के पश्चात डिप्लोमा या पॉलिटेक्निक से संबंधित कोर्स करवाते हैं। बीई तथा बीटेक चार वर्ष का तथा एमई दो वर्ष का होता है। यदि बारहवीं के पश्चात सीधे एमई में दाखिला लेते हैं तो वह पांच वर्ष का हो जाता है। इसी तरह से केमिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा कोर्स तीन वर्ष का होता है।
एक्सपर्ट व्यू
प्रो.एएसके सिन्हा

चैलेंज व स्कोप दोनों हैं अनलिमिटेड
आमतौर पर लोगों का मानना है कि केमिकल इंजीनियरिंग का पूरा आधार केमिस्ट्री पर होता है तथा सिलेबस में भी यह सब्जेक्ट ज्यादा हावी होता है, जबकि यह सत्य नहीं है। केमिस्ट्री के अलावा इसमें अन्य कई चीजों को शामिल किया जाता है। आज बायोमास, हाइड्रोजन, सोलर एनर्जी, आरओ प्लांट आदि सभी के पीछे केमिकल इंजीनियरों की मेहनत छिपी होती है। प्रदूषण दूर करने में भी इसका योगदान सराहनीय होता है। फर्टिलाइजर, यूरिया, अमोनिया व दवाओं आदि को केमिकल इंजीनियरों की मदद से ही तैयार किया जाता है। इस आधार पर कहना गलत न होगा कि केमिकल इंजीनियरिंगजीवन के हर क्षेत्र से जुड़ी है। जो भी एनर्जी के सोर्स हैं,वे सब केमिकल हैं, इसलिए इसका दायरा व स्कोप काफी बडम है। इसमें प्रोफेशनल्स को कदम-कदम पर तमाम तरह की चुनौतियां भी उठानी पडम्ती हैं। एनर्जी क्राइसेस, मेन्युफेक्चरिंग सेक्टर के ऑटोमेशन आदि का सामना केमिकल इंजीनियरों को करना पड़ता है। इस फील्ड में लड़कियों की संख्या पहले की अपेक्षा बढ़ी है। कुछ वर्ष पहले तक क्लास में 1-2 प्रतिशत लड़कियां होती थीं, लेकिन अब उनकी संख्या बढ़कर 10-12 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
प्रो. एएसके सिन्हा, हेड केमिकल  इंजीनियरिंगडिपार्टमेंट, आईआईटी, बीएचयू, वाराणसी
फैक्ट फाइल
प्रमुख संस्थान
देश में कई ऐसे संस्थान हैं, जो केमिकल इंजीनियरिंग एवं केमिकल टेक्नोलॉजी के पाठय़क्रम मुहैया कराते हैं। प्रमुख संस्थान निम्न हैं-
इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ टेक्नोलॉजी, नई दिल्ली
वेबसाइट-
www.iitd.ernet.in
(मुंबई, गुवाहाटी, कानपुर, खड़गपुर, चेन्नई, रुड़की आदि में भी शाखाएं मौजूद)
बिड़ला इंस्टीटय़ूट ऑफ टेक्नोलॉजी (बीआईटीएस), रांची
वेबसाइट-
www.bitmesra.ac.in
दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, नई दिल्ली
वेबसाइट-
www.dce.edu
इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, इलाहाबाद
वेबसाइट
- www.iiita.ac.in
इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ टेक्नोलॉजी (बीएचयू), वाराणसी
वेबसाइट
- www.iitbhu.ac.in
जाकिर हुसैन कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, अलीगढ़
वेबसाइट-
  www.amu.ac.in

Wednesday, November 4, 2015

सोशल मीडिया में बनाए अपना करियर

सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से इन दिनों कई फील्ड में सोशल मीडिया मैनेजर की डिमांड बढ़ रही है। अगर आप भी सोशल मीडिया में महारत रखते हैं, तो जानिए कैसे बन सकते हैं वर्चुअल वल्र्ड के ब्रांड मास्टर…
क्या आपको फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस, यू-ट्यूब जैसे सोशल प्लैटफॉम्र्स पर काम करना या ब्लॉग लिखना पसंद है? सोशल साइट्स पर घंटों बिता सकते हैं? तो आप अखबारों या वेबसाइट्स पर अक्सर इस तरह की खबरें भी पढ़ते होंगे कि अमुक कंपनी ने फेसबुक और ट्विटर के जरिये लोगों को हायर किया। इसके बाद आपके मन में भी खयाल आता होगा कि क्या अपनी इस हॉबी को प्रोफेशन का रूप देना संभव है? जवाब है, हां। आज अधिकांश ब्रांड्स ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रखी है, क्योंकि यह कंपनी की ऑन-लाइन मार्केटिंग और कम्युनिकेशन स्ट्रेटेजी का एक हिस्सा होती है। ऐसे में उन डायनामिक युवाओं या सोशल मीडिया मैनेजर्स की डिमांड बढ़ गई है, जो वर्चुअल वल्र्ड में उनकी जोरदार ब्रांडिंग कर सकें, लोगों से सही कम्युनिकेशन स्थापित कर सकें।
समझें सोशल मीडिया मैनेजमेंट : सोशल मीडिया में दो तरफ से कम्युनिकेशन होता है। कंपनी अपनी ब्रांडिंग करती है, तो यूजर्स ब्रांड्स को लेकर राय जाहिर करते हैं। ऐसे में इस कम्युनिकेशन को कंट्रोल में रखना जरूरी होता है। यही काम सोशल मीडिया मैनेजर करता है। वह कस्टमर्स और क्लाइंट्स से इंटरैक्ट करता है। वह ब्रांडिंग के लिए सही चैनल्स की तलाश कर उसकी स्ट्रेटेजी तैयार करता है। यह सोशल मीडिया मैनेजर की जिम्मेदारी होती है कि पीआर, एडवरटाइजमेंट, मैर्केटिंग सोशल नेटवर्किंग के जरिये ऑर्गेनाइजेशन की जो सूचनाएं बाहर जाती हैं, उनमें समानता हो। उस पर कंपनी को नुकसानदायक पब्लिसिटी से बचाने और अपने प्रतिस्पर्धियों पर नजर रखने की भी अहम जवाबदेही होती है।
क्वालिफिकेशन : कम्युनिकेशन बैकग्राउंड यानी मास कम्युनिकेशन या इंग्लिश लिटरेचर का कोर्स करने वाले सोशल मीडिया मैनेजर के रूप में काम कर सकते हैं। कम्युनिकेशन पर पकड़ रखने वाले इंजीनियरिंग, आट्र्स, कॉमर्स या इकोनॉमिक्स ग्रेजुएट भी इस फील्ड में एंट्री ले सकते हैं। इसके साथ ही मार्केटिंग और ब्रांड कम्युनिकेशन का कोर्स करने वाले भी सोशल मीडिया मैनेजर की भूमिका निभा सकते हैं। इसके लिए उनके पास इंटरनेट की अच्छी समझ, दमदार राइटिंग और कम्युनिकेशन स्किल होनी चाहिए। एक आइडियल कैंडिडेट को माइक्रोसॉफ्ट प्रोडक्ट्स को हैंडल करना आना चाहिए। इसमें सामाजिक होना, नई चीजें सीखते रहना भी बेहद जरूरी है। इसके अलावा, जो लोग सीमित समय-सीमा में मल्टीपल काम कर सकते हैं, वे हमेशा रेस में आगे होते हैं। इसलिए आपके पास अपॉच्र्युनिटीज और फेल्योर्स को पहचानने के अलावा त्वरित फैसला लेने की क्षमता होनी चाहिए। आप सही समय पर जितना खुलकर अपना पक्ष रखेंगे, सही बातें कहेंगे, आउट ऑफ बॉक्स आइडियाज पर काम करेंगे, उसी से उससे आपकी पहचान बनेगी। आप सफलता की सीढि़यां चढ़ते जाएंगे।
मार्केट में संभावनाएं : आप मार्केटिंग, एडवरटाइजिंग, डिजिटल या स्पेशलिस्ट सोशल मीडिया एजेंसीज के साथ इंटरैक्टिव मार्केटिंग स्पेशलिस्ट, सोशल मीडिया मार्केटिंग मैनेजर, इमर्जिंग मीडिया ऐंड कंटेंट मैनेजर, सोशल नेटवर्किंग ऐंड कम्युनिटीज मैनेजर, सोशल मीडिया एडिक्ट्स जैसे प्रोफाइल्स पर काम कर सकते हैं। इन दिनों ज्यादातर एजेंसीज ने इन हाउस टीम बना रखी है, जो उनके सोशल मीडिया प्रेजेंस को मैनेज करती हैं। इसमें ग्रो करना आप पर निर्भर करता है। समय और अनुभव के साथ आप किसी डिजिटल एजेंसी के हेड, एंटरप्रेन्योर, कंसल्टेंट, कम्युनिटी मैनेजर आदि बन सकते हैं।
सैलरी : सोशल मीडिया मैनेजर की शुरुआती सैलरी 20 से 25 हजार रुपये हो सकती है। अनुभव के साथ यह पैकेज बढ़ता जाता है और वह सालाना साढ़े चार से सात लाख रुपये या इससे भी अधिक हो सकता है।

Monday, November 2, 2015

एनजीओ सेवा कीजिए मेवा लीजिए

एनजीओ- नॉन गवर्नमेंटल ऑर्गनाइजेशन यानी गैर सरकारी संगठन। एनजीओ किसी मिशन के तहत चलाए जाते हैं। सामाजिक समस्याओं को हल करना और विभिन्न क्षेत्रों में विकास की गतिविधियों को बल देना एक एनजीओ का मुख्य उद्देश्य होता है। कार्यक्षेत्र के रूप में कृषि, पर्यावरण, शिक्षा, संस्कृति, मानवाधिकार, स्वास्थ्य, महिला समस्या, बाल-विकास आदि में से कोई भी चुना जा सकता है। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहां आप नाम और दाम, दोनों कमा सकते हैं।
वह जमाना गया, जब इस क्षेत्र में आमतौर पर वे ही लोग आते थे, जो खुद के संसाधनों या सिर्फ दान वगैरह के बूते समाजसेवा करना चाहते थे। अब एनजीओ रोजगार के बढ़िया साधन बन चुके हैं। कई बार कई दूसरी नौकरियों से भी अच्छे वेतनमान पर काम यहां मिल सकता है। किसी अंतरराष्ट्रीय पहचान वाले एनजीओ में बात बन जाए तो फिर बात ही क्या है। समाज सेवा का सुकून तो इसमें है ही।
इस क्षेत्र की विशिष्टता यही है कि रोजगार का साधन होने के बावजूद समाजहित की भावना इसमें सर्वोपरि होनी चाहिए। यह उन लोगों के लिए अच्छा क्षेत्र है, जो सामाजिक समस्याओं के प्रति संवेदनशील हों, समाज हित के विभिन्न पहलुओं पर गहरी निष्ठा, लगन और रुचि के साथ काम करना चाहते हों और सिर्फ पैसा कमाना ही जिनका मकसद न हो।
बहुत बड़ा है एनजीओ संसार
एनजीओ के प्रति आकर्षण का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि मौजूदा समय में हमारे देश में सक्रिय सूचीबद्घ एनजीओ की संख्या एक रिपोर्ट के मुताबिक 33लाख के आसपास है। यानी हर 365 भारतीयों पर एक एनजीओ। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा एनजीओ हैं, करीब 4.8 लाख। इसके बाद दूसरे नंबर पर आंध्रप्रदेश है। यहां 4.6 लाख एनजीओ हैं। उत्तर प्रदेश में 4.3 लाख, केरल में 3.3 लाख, कर्नाटक में 1.9 लाख, गुजरात व पश्चिम बंगाल में 1.7-1.7 लाख, तमिलनाडु में 1.4 लाख, उड़ीसा में 1.3 लाख तथा राजस्थान में एक लाख एनजीओ सक्रिय हैं। इसी तरह अन्य राज्यों में भी बड़ी तादाद में गैर सरकारी संगठन काम कर रहे हैं। दुनिया भर में सबसे ज्यादा सक्रिय एनजीओ हमारे ही देश में हैं।
धन की बात करें तो दान, सहयोग और विभिन्न फंडिंग एजेंसियों के जरिये एनजीओ क्षेत्र में अरबों रुपया आता है। अनुमान है कि हमारे देश में हर साल सारे एनजीओ मिल कर 40 हजार से लेकर 80 हजार करोड़ रुपये तक जुटा ही लेते हैं। सबसे ज्यादा पैसा सरकार देती है। ग्यारहवीं योजना में सामाजिक क्षेत्र के लिए 18 हजार करोड़ रुपये का बजट रखा गया था। दूसरा स्थान विदेशी दानदाताओं का है। सिर्फ सन् 2005 से 2008 के दौरान ही विदेशी दानदाताओं से यहां के गैर सरकारी संगठनों को 28876 करोड़ रुपये (करीब 6 अरब डॉलर) मिले। इसके अलावा कॉरपोरेट सेक्टर से भी सामाजिक दायित्व के तहत काफी धन गैर सरकारी संगठनों को प्राप्त होता है।
कैसे करें पढ़ाई
एनजीओ क्षेत्र की व्यापकता को देखते हुए आसानी से समझा जा सकता है कि अब एनजीओ प्रबंधन कितना महत्त्वपूर्ण काम बन चुका है। देश में कई संस्थान और विश्वविद्यालय हैं, जो बाकायदा एनजीओ प्रबंधन से जुड़े पाठ्यक्रम चला रहे हैं। 50 प्रतिशत अंकों के साथ स्नातक हों तो एनजीओ प्रबंधन के पोस्ट ग्रेजुएट पाठ्यक्रम में दाखिला ले सकते हैं। अनुभवी एनजीओ प्रोफेशनल, सामाजिक कार्यकर्ता और स्वयंसेवी भी अलग-अलग तरह के कोर्स कर सकते हैं। इन पाठ्यक्रमों में जिन विषयों के बारे में खासतौर से बताया जाता है, वे हैं—सामुदायिक विकास, सामाजिक उद्यमशीलता, वैश्विक मुद्दों की समझ, पर्यावरण शिक्षा, सूचना प्रबंधन, प्रशासनिक और वित्तीय प्रबंधन, नेतृत्वशीलता आदि। यों एनजीओ चलाने के लिए किसी खास शैक्षिक योग्यता की अनिवार्यता नहीं है, परंतु जब कार्यकुशलता, व्यवस्थित प्रबंधन की बात आती है, खासतौर से रोजगार की संभावनाओं के संदर्भ में, तो एनजीओ प्रबंधन से जुड़े ये कोर्स विशेष उपयोगी हो जाते हैं।
समाज कल्याण में मास्टर डिग्री (एमएसडब्ल्यू), समाजविज्ञान या ग्रामीण प्रबंध में कोई भी मास्टर डिग्री एनजीओ क्षेत्र में आगे बढ़ने की दृष्टि से उपयोगी है। समाज कल्याण में बीए, एमए या बीएसडब्ल्यू भी किए जा सकते हैं। जो युवा अध्ययन जारी रखना चाहते हैं वे एमफिल या पीएचडी भी कर सकते हैं। भारतीय समाज कल्याण एवं व्यवसाय प्रबंधन संस्थान (कोलकाता), टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (मुंबई), दिल्ली विश्वविद्यालय, राजस्थान विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय आदि डिप्लोमा और डिग्री के कई पाठय़क्रम संचालित कर रहे हैं। जो छात्र एनजीओ क्षेत्र में जाना चाहते हैं, उन्हें चाहिए कि बारहवीं के बाद समाजविज्ञान विषय क्षेत्र से कोई एक विषय चुन कर पढ़ाई करें।
मौके कहां-कहां
एनजीओ प्रबंधन के कोर्सों के बाद ऑपरेशनल और एडवोकेसी, दोनों तरह के एनजीओ में काम के अच्छे अवसर हैं। ऑपरेशन एनजीओ में काम करना उनके लिए बेहतर है, जिनमें वित्त प्रबंधन, मीडिया प्रबंधन वगैरह की खास काबिलियत हो। एनजीओ एडवोकेसी का काम भी इससे कुछ अलग नहीं है, पर जो लोग सामाजिक कामों के लिए लोगों को प्रेरित करने का काम बढ़िया ढंग से संभाल सकते हैं, उनके लिए यह अच्छी जगह है। कुव्वत हो तो इस क्षेत्र में काम की तमाम संभावनाएं हैं।
एनजीओ मैनेजर, कम्युनिटी सर्विस प्रोवाइडर, एनजीओ प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर, एनजीओ ह्यूमन रिसोर्स और फाइनेंस मैनेजर जैसे कई रूपों में आप काम पा सकते हैं। मिनिस्ट्री ऑफ यूथ अफेयर, फिक्की, एसओएस विलेज, एफएआरएम, अमर ज्योति चैरिटेबल ट्रस्ट, प्रयास वगैरह में अच्छे वेतनमान पर काम मिल सकता है। मौजूदा समय में एड्स अवेयरनेस प्रोजेक्ट, ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम, चाइल्ड एब्यूज प्रिवेंशन कमेटी स्ट्रीट चिल्ड्रन एजुकेशन, ड्रग रिहेबिलिटेशन सेंटर, सेक्स वर्कर फोरम आदि में भी काम के काफी अवसर हैं।
रोजगार की संभावना को इस बात से समझिए कि दुनिया भर में लगभग दो करोड़ ऐसे एनजीओ पेशेवर हैं, जिन्हें बाकायदा वेतन दिया जाता है। इस के अलावा उल्लेखनीय काम के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत भी किया जा सकता है।
टाटा इंस्टीटय़ूट ऑफ सोशल साइंसेज से पढ़े हुए मैनेजमेंट प्रोफेशनल राहुल सिंह एनजीओ के क्षेत्र में युवाओं के लिए काफी बड़ी संभावनाएं देखते हैं। वे कहते हैं कि वर्तमान में जब बड़ी-बड़ी कंपनियां भी अपना सामाजिक दायित्व महसूस करने लगी हैं तो ग्रासरूट एनजीओ के लिए उनका आर्थिक सहयोग भी बढ़ रहा है। उनका मानना है कि विकास के नए तौर-तरीकों के चलते हमारे मूल्यों में जिस तरह से गिरावट आ रही है, ऐसे में एनजीओ की भूमिका काफी बढ़ गई है। जाहिर है नौजवानों के लिए इस क्षेत्र में संभावनाएं बढ़ेंगी। वे कहते हैं कि बिहार जैसे राज्य में कंपनियों का जाना अब शुरू हो रहा है तो यहां जमीनी तौर पर काम कर रहे एनजीओ के लिए काफी मौके होंगे। ‘नवधान्य’ की कर्ताधर्ता डॉ. वंदना शिवा छोटे आकार वाले जमीनी तौर पर काम कर रहे गैर सरकारी संगठनों में युवाओं के लिए अच्छे अवसर देखती हैं।
वेतन मिल सकता है बढ़िया
एनजीओ में काम करने वालों को मौजूदा समय में वेतन के अच्छे मौके हैं। यहां वेतन का निर्धारण इस आधार पर होता है कि कार्य का क्षेत्र कैसा है, किस प्रकार का है और उसका स्तर क्या है। फिर भी अंतरराष्ट्रीय किस्म के गैर सरकारी संगठन बढ़िया वेतन दे सकते हैं। ये संगठन विश्व भ्रमण के खूब मौके उपलब्ध कराते हैं। फिलहाल काबिलियत के हिसाब से 10-15 हजार से लेकर एक लाख से ऊपर तक का वेतन एनजीओ क्षेत्र में मिल सकता है। वेतन के अलावा विभिन्न मुद्दों पर किसी एनजीओ से प्रोजेक्ट वर्क के तौर पर रिसर्च, पुस्तक लेखन, फील्ड वर्क संबंधी कुछ काम लेकर भी धन कमाने के यहां काफी अवसर हैं।
बांध लीजिए गांठ
याद रखिए, यदि गैर सरकारी संगठनों के क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना है तो आप में सामूहिकता के माहौल में काम करने का अनुभव जरूर होना चाहिए। लोगों से संवाद करने, उन्हें प्रेरित करने का माद्दा तो होना ही चाहिए। स्थानीय भाषा के साथ अंग्रेजी जैसी अंतरराष्ट्रीय संवाद की भाषा का ज्ञान आपके काम को आसान बना सकता है। यानी आप काम में कुशल हों तो इस क्षेत्र में आपका भविष्य उज्ज्वल है।
एनजीओ प्रबंधन के कोर्स कहां-कहां
एनजीओ प्रबंधन का कोर्स कराने वाले प्रमुख संस्थान-
1. टाटा इंस्टीटय़ूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुंबई
2. दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
3. एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ एनजीओ मैनेजमेंट, नोएडा, उत्तर प्रदेश
4. मदुरै कामराज विश्वविद्यालय, मदुरै, तमिलनाडु
5 अन्नामलाई विश्वविद्यालय, अन्नामलाई नगर, तमिलनाडु
6. लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
7. सेंटर ऑफ सोशल इनीशिएटिव एंड मैनेजमेंट, हैदराबाद
8. भारतीय उद्यमिता विकास संस्थान, गांधीनगर, गुजरात
9. जेवियर इंस्टीटय़ूट ऑफ सोशल साइंसेज, रांची
10. ग्रामीण प्रबंधन संस्थान, आणंद
अपना एनजीओ ऐसे बनाएं
एक समूह बना कर आप अपना एनजीओ बना सकते हैं। एनजीओ का निबंधन दरअसल हमारे देश में कई कानूनों के तहत होता है, जैसे कि इंडियन ट्रस्ट एक्ट (1982), पब्लिक ट्रस्ट एक्ट (1950), इंडियन कंपनीज एक्ट (1956-धारा- 25), रिलीजियस एंडोमेंट एक्ट  (1863), चेरीटेबल एंड रिलीजियस ट्रस्ट एक्ट (1920), मुस्लिम वक्फ एक्ट (1923), वक्फ एक्ट (1954), पब्लिक वक्फ—एक्सटेंशन ऑफ लिमिटेशन एक्ट (1959) आदि।
वैसे हमारे देश में एनजीओ बनाना ज्यादा कठिन नहीं है। बिना लाभ-हानि के काम करने वाले एनजीओ कंपनी एक्ट धारा-25 के तहत ट्रस्ट, संस्था, सोसायटी या प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के रूप में पंजीकृत कराए जा सकते हैं।
खूब हैं विदेश जाने के मौके
यह ऐसा क्षेत्र है, जहां विदेशों में भी काम के काफी अवसर हैं। यूनिसेफ, यूनाइटेड नेशन, यूनेस्को, ओसीडी, विश्वबैंक, नाटो, विश्व स्वास्थ्य संगठन, एमनेस्टी इंटरनेशनल, रेडक्रॉस, ग्रीनपीस, कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट, एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन, यूनाइटेड नेशन एजुकेशनल साइंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गनाइजेशन जैसी नामी संस्थाओं के अलावा दूसरी अन्य वैश्विक स्तर पर काम कर रही संस्थाओं के साथ जुड़ कर भी काम किया जा सकता है। यदि आप अपने ही देश में काम कर रहे हों तो भी विदेशों में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में शामिल होने के बुलावे के तौर पर विदेश यात्रा का अवसर मिल सकता है। जो एनजीओ प्रबंधन की पढ़ाई विदेश में करके अपना करियर संवारना चाहते हैं, उनके लिए कुछ नामी विदेशी संस्थान हैं—टेंपल युनिवर्सिटी (जापान), कैस बिजनेस स्कूल (लंदन), एनजीओ मैनेजमेंट स्कूल (बेसिंस, लंदन)।

Sunday, November 1, 2015

स्पेस में भी अनलिमिटेड चांस

सुनीता विलियम्स और कल्पना चावला, इन्हें आज भला कौन नहीं जानता, लेकिन इस नाम और शोहरत के पीछे है स्पेस के प्रति इनका लगाव और स्पेस साइंस का अनलिमिटेड स्कोप। अगर आप साइंस स्टूडेंट हैं और 12वीं के बाद इंजीनियरिंग के क्षेत्र में जाना चाहते हैं तो स्पेस साइंस के क्षेत्र में उम्दा करियर का आगाज कर सकते हैं। आज भारत खुद इस फील्ड में जानामाना नाम है।

स्कोप
विभिन्न विषयों के जानकार स्पेस साइंस के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर सकते हैं, जैसे- एस्ट्रोफिजिक्स, गैलैक्टिक साइंस, स्टेलर साइंस, रिमोट सेंसिंग, हाइड्रोलॉजी, कार्टोग्राफी, नॉन अर्थ प्लैनेट्री साइंस, बायॉलॉजी ऑफ अदर प्लेनैट्स, एस्ट्रोनॉटिक्स, स्पेस कोलोनाइजेशन, क्लाइमेटोलॉजी आदि। आगे चलकर स्पेस साइंस में स्कोप का बढ़ना तय है, देखा जाए तो इस फील्ड में डिमांड सप्लाई के बीच गैप है। इस फील्ड में स्पेस साइंटिस्ट के अलावा मेट्रोलॉजिकल सर्विस, एनवायरनमेंटल मॉनिटरिंग, एस्ट्रोनॉमिकल डाटा स्टडी आदि के साथ भी जुड़ा जा सकता है।

योग्यता
अब तो आप 12वीं के बाद इसरो द्वारा आयोजित इंजीनियरिंग एग्जाम पास कर सीधे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की सोच सकते हैं। इस फील्ड में काम करने के लिए विभिन्न विषयों के जानकारों की जरूरत होती है, जैसे- मैकेनिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कम्यूनिकेशन और कंप्यूटर इंजीनियरिंग। अगर आप ऑलरेडी बी. टेक या एमएससी हैं, तब भी आगे स्पेस साइंस से जुड़े सब्जेक्ट्स में स्पेशलाइजेशन कर इस फील्ड में आ सकते हैं। मटीरियल साइंस, केमिस्ट्री, बायोलॉजी, मेडिसिन, साइकोलॉजी आदि के स्टूडेंट्स के लिए भी इस फील्ड में स्कोप है। इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग का अनुभव रखने वालों को भी रोजगार के मौके मिलते हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स और मैकेनिकल आदि सब्जेक्ट्स में सटिर्फिकेट कोर्स करने वालों के लिए भी अवसर होते हैं।

सैलरी
नैशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर, विक्रम सारा भाई स्पेस सेंटर, सतीश धवन स्पेस सेंटर आदि के अलावा विभिन्न सरकारी संस्थानों में साइंटिस्टों की जरूरत होती है। इन्हें सभी तमाम सुविधाओं के साथ अच्छा-खासा वेतन भी दिया जाता है। किसी खास प्रॉजेक्ट पर काम करने वाली टीम में फ्रेशर को एक रिसर्चर के तौर पर शामिल किया जा सकता है। इसरों द्वारा समय समय पर विभिन्न क्षेत्र के साइंटिस्ट/इंजीनियर के लिए भतीर् चलती रहती है। भारत से बाहर नासा में भी भारतीय काफी संख्या में हैं और अच्छा नाम कर रहे हैं।

इंस्टीट्यूट्स
भारत में अब कई यूनिवसिर्टियों और इंस्टीट्यूट्स में स्पेस साइंस और इससे जुड़े सब्जेक्ट्स जैसे, रिमोट सेंसिंग, कार्टोग्राफी, हाइड्रोलॉजी, मिनरल एक्सप्लोरेशन एंड प्रोसेसिंग, एटमोसफरिक साइंस, क्लाइमेटोलॉजी वगैरह की पढ़ाई उपलब्ध है। हालांकि इस फील्ड में ग्रैजुएशन, पीजी और रिसर्च प्रोग्राम्स के लिए साल 2007 में 'इंस्टिट्यूट ऑफ स्पेस साइंस एंड टेक्नॉलजी' की स्थापना की गई। इस इंस्टिट्यूट में एवियोनिक्स और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में बी.टेक. के अलावा पांच वर्षीय इंटिग्रेटिड मास्टर्स इन एप्लाइड साइंस प्रोग्राम भी चलाया जाता है। इसरो भी स्पेस साइंस से जुड़े कई कोर्स कराता है। इसके अलावा पुणे यूनिवर्सिटी से स्पेस साइंस में एमएससी की डिग्री ली जा सकती है। गुजरात और आंध्र यूनिवर्सिटी में स्पेस साइंस में पीजी डिप्लोमा कोर्स भी है। विदेश में भी ऐडमिशन लिया जा सकता है।

इंस्टिट्यूट्स

- इंस्टिट्यूट ऑफ स्पेस साइंस एंड टेक्नॉलजी, तिरुवनंतपुरम।

- एमएससी स्पेस साइंस - पुणे यूनिवर्सिटी

- पीजी डिप्लोमा स्पेस साइंस- गुजरात और आंध्र यूनिवर्सिटी

- एम. टेक रिमोट सेंसिंग - अन्ना यूनिवर्सिटी

- एम. टेक रिमोट सेंसिंग - आईआईटी मुंबई

- एम. टेक रिमोट सेंसिंग - रूड़की यूनिवर्सिटी

- एमएससी कार्टोग्राफी - मद्रास यूनिवर्सिटी

- एम. एससी एटमोसफेरिक साइंस - कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी

- एम. एससी क्लाइमेटोलॉजी - पुणे यूनिवर्सिटी

- एम. टेक हाइड्रोलॉजी - आंध्र यूनिवर्सिटी

- डिप्लोमा इन हाइड्रोलॉजी - रुड़की यूनिवर्सिटी

- कैलिफोर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी, अमेरिका

- यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोरैडो, अमेरिका

- अमेरिकन इंस्टिट्यूट ऑफ एयरोनॉटिक्स एंड एस्ट्रोनॉटिक्स, यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना

- स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी, अमेरिका