Friday, October 9, 2015

सोनोग्राफी में करियर

सोनोग्राफी रेडियोलॉजी की एक ब्रांच है। इसका उपयोग शरीर के विभिन्न अंगों मसलन छाती, दिल, पेट आदि में जांच करने के लिए प्रयोग में लाई जाती है। गर्भस्थ शिशु की सभी प्रक्रियाओं की जानकारी सोनोग्राफी के माध्यम से जान सकते हैं। यदि किसी में शरीर के भीतर चल रही प्रक्रियाओं को जानने की इच्छा है और इसमें  करियर भी बनाना चाहता  है, तो सोनोग्राफी उपयुक्त विकल्प है। प्रत्येक हॉस्पिटल में इससे संबंधित कार्य होने की वजह से इनकी काफी मांग है। ब्यूरो ऑफ लेबर स्टेटिक्स के अनुसार, इस क्षेत्र में 2016 तक 19 प्रतिशत ग्रोथ की संभावना है। वर्तमान में ट्रेंड प्रोफेशनल की काफी कमी है। इस प्रकार यदि भविष्य के लिहाज से देखा जाए, तो इस क्षेत्र में करियर काफी ब्राइट है।

योग्यता
सोनोग्राफी से संबंधित कोर्स में एडमिशन के लिए भौतिक, रसायन और जीव विज्ञान में 50 प्रतिशत अंकों के साथ बारहवीं पास होना जरूरी है। यदि इन तीनों विषयों को मिलाकर पचास प्रतिशत अंक हैं, तो आप इस कोर्स को कर सकते हैं।

व्यक्तिगत गुण
एक सोनोग्राफर को अस्पताल की विभिन्न जगहों मसलन ऑपरेशन थियेटर, इंटेसिव केयर यूनिट में डॉक्टरों व नर्सों के साथ काम करना होता है। इस कारण धैर्य होना बहुत जरूरी है। सोनोग्राफर इमरजेंसी केसों में एक अहम् भूमिका निभाते हैं।
साथ ही एक सोनोग्राफर में काम के प्रति लगन, शांत स्वभाव एवं आत्मविश्वास का होना जरूरी है। उसके पास अपनी बात रोगी को अच्छे ढंग से समझाने की क्षमता का होना भी जरूरी है।

संभावनाएं
विशेषज्ञों के अनुसार, एजुकेशन के बाद हेल्थकेयर ऐसा सेक्टर है, जिसमें नौकरी की संभावनाएं हमेशा बनी रहती है। सोनोग्राफी से संबंधित पढ़ाई करने के पश्चात सरकारी व निजी अस्पतालों, क्लीनिकों, नर्सिंग होम, हेल्थकेयर सेंटरों, टेक्निकल कॉलेज आदि में जॉब की संभावनाएं हैं। यदि इछ्छा हो तो हेल्थकेयर के अतिरिक्त रिसर्च व टीचिंग में भी करियर बना सकते हैं।
कमाई 
यदि सोनोग्राफी से संबंधित कोर्स करने के बाद नौकरी करते हैं, तो बतौर सोनोग्राफर शुरुआत में दस से पंद्रह हजार रुपये प्रतिमाह कमा सकते हैं। अनुभव के बाद सैलरी बढ़ती जाती है।

संस्थान
 1. ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सांइस, नई दिल्ली
 2. अपोलो इंस्टीट्यूट ऑफ हॉस्पिटल मैनेजमेंट ऐंड एलाइड सांइस, चेन्नई
 3. बीजे मेडिकल कॉलेज, गुजरात
 4. बीआरडी मेडिकल कॉलेज, उत्तरप्रदेश
 5. चेन्नई मेडिकल कॉलेज, चेन्नई
 6. क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, तमिलनाडु
 7. जयपुर गोल्डन हॉस्पिटल, नई दिल्ली
 8. जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली
 9. गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, पंजाब
 10. पटना मेडिकल कॉलेज ऐंड हॉस्पिटल, पटना
 11. यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल सांइस एंड जीटीबी हॉस्पिटल, नई दिल्ली
 12. मेडिकल कॉलेज ऐंड हॉस्पिटल, कोलकाता

Thursday, October 8, 2015

पृथ्वी की सेहत को जांचने का विज्ञान

अर्थसाइंस एक तरह से जियोलॉजी की ही अगली कड़ी है। इस कोर्स को बाजार की आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर ही तैयार किया गया है, इसलिए इसमें जॉब के विभिन्न स्तरों पर अनेक संभावनाएं हैं। पृथ्वी के उद्गम, विकास और इसके अंदर और बाहर चलने वाली हलचलों को जानना खासा रोचक है। क्या अन्य ग्रहों पर कोई जीवन है? चन्द्रमा, मंगल, बृहस्पति और अन्य ग्रहों पर क्या संसाधन उपलब्ध हैं? इनमें क्या बदलाव आ रहे हैं? सिकुड़ते ग्लेशियरों का महासागरों और जलवायु पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? इस तरह की तमाम बातें और अनसुलझी पहेलियों के बारे में डाटा एकत्र करने का काम भूवैज्ञानिक करते हैं, उसका विश्लेषण करते हैं और एक निष्कर्ष पर पहुंचने का प्रयास करते हैं। आज जब पूरे विश्व की धरती को लेकर तरह-तरह की खबरें आ रही हैं, इसे समझने और उसकी तह तक जाने के लिए ऐसे विशेषज्ञों की अच्छी-खासी जरूरत पड़ रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय ने इस क्षेत्र में कुशल वैज्ञानिक और विशेषज्ञों की मांग को ध्यान में रखते हुए अर्थसाइंस का पांच वर्षीय इंटीग्रेटेड कोर्स शुरू किया है। खास बात यह कि एमएससी इन अर्थसाइंस नाम से प्रचारित इस कोर्स में प्रवेश का दरवाजा बारहवीं कक्षा के बाद ही खोला गया है। पांच साल के इस कोर्स को पूरा करने के बाद सीधे करियर अपनाने या चुनने का मौका मिलता है।

क्या है कोर्स में?


इस कोर्स में पहले तीन साल स्नातक स्तर की पढ़ाई होती है। इसके बाद सीधे एमएससी में दाखिला मिलता है। कुल 10 सेमेस्टर हैं। इसमें अर्थसाइंस के विविध पहलुओं जैसे भूभौतिकी, जल विज्ञान, समुद्र विज्ञान, वातावरणीय विज्ञान, ग्रहीय विज्ञान, मौसम विज्ञान, पर्यावरणीय विज्ञान और मृदा विज्ञान को व्यापक तौर पर पढ़ने व समझने का मौका मिलता है। महाद्वीपों के खिसकने, पर्वतों के बनने, ज्वालामुखी फटने के क्या कारण हैं, वैश्विक पर्यावरण किस तरह परिवर्तित हो रहा है, पृथ्वी प्रणाली कैसे काम करती है, हमें औद्योगिक कूड़े का निपटान कैसे और कहां करना चाहिए, भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए समाज की ऊर्जा और पानी की बढ़ती मांग को कैसे पूरा किया जा सकता है, जिस तरह विश्व की जनसंख्या बढ़ रही है, क्या हम उसके लिए पर्याप्त खाद्य तैयार कर सकते हैं तथा किस प्रकार खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा प्राप्त कर सकते हैं, ये सब चीजें अर्थसाइंस के अध्ययन क्षेत्र में है।

भूवैज्ञानिक समस्याओं को सुलझाने और संसाधन प्रबंधन, पर्यावरणीय सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा मानव कल्याण के लिए सरकारी नीतियों को तैयार करने में प्रयुक्त अनिवार्य सूचना या डाटाबेस उपलब्ध कराते हैं। कोर्स के दौरान खनन, तेल व प्राकृतिक गैस, भूजल, कोयला, जियो तकनीक, जीआईएस व रिमोट सेंसिंग, पर्यावरण अध्ययन, ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन जैसे कई क्षेत्रों को जानने और समझने का अवसर दिया जाता है। इनसे जुड़े क्षेत्रों में से एक क्षेत्र में छात्रों को आगे चल कर स्पेशलाइजेशन चुनना होता है। यह काम एमएससी स्तर पर होता है। एमएससी में चार पेपर थ्योरी के हैं। इसके अलावा कई पेपर वैकल्पिक हैं, जिसमें से छात्र किसी एक को चुन कर अपना करियर बना सकता है। कोर्स के दौरान छात्रों को दो तरह की ट्रेनिंग भी दी जाती है। पहले स्तर पर हर साल छात्रों को फील्ड ट्रिप पर भेजा जाता है। एमएससी स्तर पर समर ट्रेनिंग और समर इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग के अलावा डिजर्टेशन का काम पूरा करना होता है। यहां फील्ड वर्क के बहुत विकल्प हैं।

शाखाएं


अर्थसाइंस की कई शाखाएं हैं। इनमें पर्यावरण अध्ययन, माइनिंग, जियोटेक्नोलॉजी, डिजास्टर मैनेजमेंट, एटमॉसफेरिक साइंस, जियोहैजर्डस, क्लाइमेट चेंज, ओशनोग्राफी, रिमोट सेंसिंग, एप्लायड हाइड्रोजियोलॉजी, काटरेग्राफी और जियोग्राफिक इंफॉर्मेशन सिस्टम आदि प्रमुख हैं।

अवसर हैं कहां


कोर्स के छात्र के लिए राज्य और केन्द्र सरकार में जियोलॉजिस्ट बनने के कई अवसर हैं। एमएससी पास छात्रों के लिए जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा समय-समय पर जियोलॉजिस्ट की भर्ती के लिए परीक्षा आयोजित की जाती है। सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड भी इस कोर्स के छात्रों को काम करने का अवसर मुहैया कराता है। इसमें हाइड्रोजियोलॉजिस्ट के रूप में उसी स्केल पर नियुक्ति होती है, जिस स्केल पर जियोलॉजिस्ट की। इनके अलावा पीएचडी करने के बाद साइंटिस्ट पद पर भर्ती होती है। ये सभी पद ग्रेड ए स्तर के अधिकारी के हैं। रिसर्च संस्थाओं के अलावा आजकल निजी कंपनियों में एग्जिक्यूटिव के रूप में भी क्लास वन पद पर इसके विशेषज्ञ रखे जा रहे हैं। ओएनजीसी, वेदांता, हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड, ईएसएसआर, केर्न इंडिया जैसी कई कंपनियां हैं, जहां इनकी मांग है। पीएचडी करने वालों के लिए रिसर्च एसोसिएट और अध्यापन के भी मौके हैं। इसके अलावा इनकी मांग देश में जहां पेयजल के लिए काम हो रहा है या फिर सीमेंट, माइनिंग आदि के कामों में इस कोर्स के छात्रों की मांग है।

दाखिला कैसे


इसमें बारहवीं की मेरिट के आधार पर दाखिला दिया जाता है। साइंस के छात्र के लिए बारहवीं में भौतिकी, गणित और रसायनशास्त्र पढ़ा होना जरूरी है, तभी उसे दाखिला दिया जाता है। हंसराज कॉलेज इस कोर्स की कट ऑफ लिस्ट निकाल कर मेरिट के हिसाब से दाखिला देता है। आईआईटी प्रवेश परीक्षा पास करने वाले को कट ऑफ में 5 फीसदी की छूट दी जाती है। ओबीसी वर्ग के लिए कट ऑफ में दस फीसदी तक रियायत है। 

फैक्ट फाइल


कोर्स कराने वाले संस्थान


इस कोर्स की पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग में होती है। हालांकि दाखिला हंसराज कॉलेज में हो रहा है। वहां छात्रों को मुख्य पेपर के लिए नहीं, बल्कि उसके साथ पढ़ाए जाने वाले स्पेशलाइजेशन पेपरों के लिए जाना होता है। मुख्य कोर्स की पढ़ाई और क्लास जियोलॉजी विभाग में होती है। कुल 25 सीटें हैं। विश्वविद्यालय में इसके अलावा जियोलॉजी ऑनर्स का कोर्स रामलाल आनंद कॉलेज में चलाया जा रहा है, लेकिन अर्थसाइंस का सिलेबस इससे थोड़ा भिन्न है। यह कोर्स इसके अलावा देश में आईआईटी खड़गपुर और रुड़की में चलाया जा रहा है। 

• दिल्ली विश्वविद्यालय, हंसराज कॉलेज
• आईआईटी, खड़गपुर और रुड़की
• पांडिचेरी यूनिवसिटी, पुड्डुचेरी
• इंडियन स्कूल ऑफ माइंस, धनबाद

Wednesday, October 7, 2015

वानिकी में रोजगार के अवसर

वानिकी एक ऐसा रोचक अध्ययन क्षेत्र है जो उन सब सिद्धांतों तथा व्यवहारों से मिलकर बना है जिनमें वनों के सृजन, संरक्षण तथा वैज्ञानिक प्रबंधन और उनके संसाधनों का उपयोग शामिल है। भारत में वैज्ञानिक वानिकी की शुरुआत सबसे पहले 1864 में वन प्रबंधन के लिए वानिकी व्यावसायिकों को प्रशिक्षित करने के वास्ते हुई थी। देश में विश्वविद्यालय स्तर पर वानिकी शिक्षा वर्ष 1985 में उस समय आरंभ हुई जब राज्य कृषि विश्वविद्यालयों-वाईएसपी यूएचएफ, सोलन तथा पीडीकेवी, अकोला में चार वर्ष के डिग्री कार्यक्रम के रूप में बीएससी वानिकी पाठ्यक्रम शुरु किया गया। बाद में यह कार्यक्रम 1986 में जीबीपीयूएटी, पन्त नगर तथा टीएनएयू, कोयम्बत्तूर में तथा इसके बाद 1987 में ओयूएटी, भुवनेश्वर तथा जेएनकेवीवी, जबलपुर में शुरु किया गया। अब यह कार्यक्रम बहुत से राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में संचालित किया जा रहा है। इसके अलावा कुछ कृषि विश्वविद्यालयों में वानिकी से संबंधित विशेष विषय में विशेषज्ञता के साथ वानिकी/कृषि-वानिकी में मास्टर और डॉक्टरल डिग्री पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं। हाल के दिनों में कुछ परंपरागत विश्वविद्यालयों ने भी वानिकी शिक्षा की शुरुआत की है। ताजा अनुमानों से यह सिद्ध होता है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वानिकी क्षेत्र का उल्लेखनीय योगदान और महत्व है। विपरीत वन्य स्थिति से निपटने के लिए कुशल मानवशक्ति की आवश्यकता होती है ताकि शोध कार्यों और निर्देशक सिद्धांतों के आधार पर उपर्युक्त कार्य योजनाएं तैयार की जा सकें। इस प्रकार नीति और अनुप्रयोग की दृष्टि से वानिकी/कृषि वानिकी प्रबंधन से जुड़े पाठ्यक्रमों का बहुत महत्व है। वर्ष 2007 में भारत में कृषि (वानिकी सहित) शिक्षा पर बनाई गई भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की चौथी डीन कमेटी की सिफ़ारिशों पर स्नातकपूर्व-स्तर पर वानिकी कार्यक्रम हेतु समय की मांग के अनुरूप पाठ्यक्रम और निर्देशन व्यवस्था में संशोधन किए गए हैं। सामान्यतः वानिकी शिक्षा, अनुसंधान, प्रशिक्षण और विस्तार पर्यावरण और वन मंत्रालय, भारत सरकार के पर्यवेक्षणाधीन है। पर्यावरण और वन मंत्रालय के अधीन सर्वोच्च संस्था के रूप में कार्यरत भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसी एफआरई) वानिकी अनुसंधान, प्रशिक्षण, विस्तार और शिक्षा में सक्रियता के साथ जुड़ा हुआ है। मंत्रालय के अधीन विभिन्न आठ वन संस्थान कार्यरत हैं। ये हैं ईसीएफआरई, देहरादून,इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी, हेदरादून, जो सर्वोच्च वन प्रशासक (आईएफएस) तैयार करती है, वन शिक्षा निदेशालय, जिसके अधीन चार राज्य वन सेवा महाविद्यालय (राज्य स्तर के) हैं, भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून, भारतीय प्लाइवुड उद्योग अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान, बंगलौर तथा वन और पर्यावरण मंत्रालय से संबद्ध जीबी पंत हिमालयन पर्यावरण और विकास संस्थान। स्नातकपूर्व कार्यक्रम स्तर पर वानिकी शिक्षा वर्तमान में वानिकी में स्नातकपूर्व, स्नातकोत्तर और डॉक्टरल कार्यक्रम विभिन्न राज्य कृषि विश्वविद्यालयों तथा कुछ अन्य परंपरागत विश्वविद्यालयों/संस्थानों में संचालित किए जाते हैं। ज्यादातर राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में चार वर्षीय व्यावसायिक डिग्री कार्यक्रम बीएससी वानिकी संचालित किए जा रहे हैं तथा शेष संस्थान भी यह कार्यक्रम बहुत जल्दी ही शुरू करने की योजना बना रहे हैं। वानिकी स्नातक तकनीकी रूप से योग्य, कुशल तथा पर्यावरण और जीवन की सुरक्षा से जुड़े वानिकी क्षेत्र की उभरती चुनौतियों तथा मुद्दों से निपटने के लिए तैयार होते हैं। वानिकी स्नातकों को तैयार करने का मूल उद्देश्य वानिकी क्षेत्र के विकास तथा इसकी उद्यमशीलता हेतु वर्तमान स्थितियों तथा अपेक्षाओं के अनुरूप मानव शक्ति तैयार करना तथा दूसरी तरफ वानिकी स्नातकों को पर्यावरण सुरक्षा, वानिकी उत्पादों के मूल्य संवर्द्धन और वानिकी किसानों को वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी बनाने के वास्ते सुयोग्य प्रबंधक माना जाता है। बीएससी वानिकी के छात्रों को वानिकी के सभी क्षेत्रों से संबंधित विभागवार पाठ्यक्रमों का अध्ययन कराया जाता है तथा वे सही अर्थों में वनपाल बनकर उभरते हैं। हाल में भारत में कृषि शिक्षा पर चौथी डीन कमेटी, आईसीएआर, 2007 ने निम्न प्रकार वानिकी स्नातकों के लिए विभाग-वार पाठ्यक्रमों की अनुशंसा की है :-

वन-वृक्ष विज्ञान एवं कृषि-वानिकी विभाग-


ये पाठ्यक्रम हैं : वन-वृक्ष विज्ञानके सिद्धांत एवं व्यवहार; भारतीय वृक्षों संबंधी वन-वृक्ष विज्ञान; कृषि वानिकी प्रणाली एवं प्रबंधन; बागान वानिकी; वन-वृक्ष विज्ञान प्रणाली; नर्सरी प्रबंधन; विश्व वानिकी प्रणाली; पशुधन प्रबंधन; वन मापन; पर्यावरणीय विज्ञान; बागवानी के मूल तत्व। 

वन जीवविज्ञान एवं वृक्ष सुधार विभाग-


वन पारिस्थितिकी विज्ञान, जैव-विविधता एवं संरक्षण; वृक्ष-विज्ञान; वृक्ष सुधार के सिद्धांत; वृक्ष बीज प्रौद्योगिकी; वन्य जीव के मूल तत्व; वन पैथोलॉजी; वन्य जीव प्रबंधन; वन कीट-विज्ञान और कृषि विज्ञान। वन्य उत्पाद एवं उपयोग विभाग : काठ संरचना; लॉगिंग एवं अर्गनोमिक्स; काठ उत्पाद एवं उपयोग; काठ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; एथनोबॉटनी; गैर-टिम्बर उत्पादों का उपयोग; औषधीय और सुगन्धित पौधे। प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन विभाग : जल विज्ञान, मृदा एवं जल संरक्षण; मृदा सर्वेक्षण, दूर-संवेदन तथा परती भूमि विकास के सिद्धांत; भू-विज्ञान एवं मृदा विज्ञान के मूल तत्व; रेंजलैंड मैंनेजमेंट; वन प्रबंधन; नीति एवं विधायन; एग्रोमीटिरोलॉजी; वन व्यवसाय प्रबंधन; वन उत्पादों का विपणन और व्यापार; वन्य अर्थशास्त्र के सिद्धांत; परियोजना नियोजन एवं मूल्यांकन, वन मिट्टी की कैमिस्ट्री और ऊपजाऊपन; वन्य इंजीनियरिंग।

मौलिक विज्ञान और मानविकी : पादप


जैव रसायन विज्ञान और जैव-प्रौद्योगिकी; कोशिका विज्ञान और आनुवंशिकी के सिद्धांत; उद्यमशीलता विकास और संचार कौशल; तत्वीय सांख्यिकी और कम्प्यूटर अनुप्रयोग; पादप शरीर विज्ञान; वृक्ष शरीर विज्ञान; शुरुआती वन अर्थशास्त्र; वन ट्रिबोलॉजी एवं मानव विज्ञान; विस्तार शिक्षा के मूल तत्व; बुनियादी व्याकरण और उच्चारित अंग्रेजी; शारीरिक शिक्षा तथा कुछ अपूर्ण पाठ्यक्रम जैसे कि शुरुआती वनस्पति विज्ञान (गणित वर्ग); बी.एससी. वानिकी कार्यक्रम में मौलिक गणित (जीव विज्ञान वर्ग) भी पढ़ाया जाता है। इसके अतिरिक्त ग्रामीण वानिकी में बी.एससी. वानिकी छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान से रूबरू कराने के उद्देश्य से टप्प्वें और टप्प्प्वें सेमेस्टर में २० सप्ताह की अवधि का कार्य अनुभव कार्यक्रम भी संचालित किया जाता है। इस कार्यक्रम में वानिकी स्नातकों के लिए सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण-ग्राम संबद्धता, वानिकी कार्यों, औद्योगिक प्लेसमेंट, रिपोर्ट-लेखन हेतु राज्य वन विभाग के साथ संबद्धता और प्रस्तुतिकरण आदि प्रमुख उपलब्धियां होती हैं।

स्नातकोत्तर कार्यक्रम :


कई राज्य कृषि विश्वविद्यालय तथा कुछेक परंपरागत विश्वविद्यालयों/संस्थानों द्वारा वन-वृक्ष विज्ञान, वन उत्पाद, अर्थशास्त्र एवं प्रबंधन, काष्ठ विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी, वृक्ष आनुवंशिकी और प्रजनन में विशेषज्ञता के साथ वानिकी में दो वर्षीय व्यावसायिक मास्टर डिग्री (एमएससी वानिकी) तथा कृषि वानिकी में एम.एससी. उिग्री प्रदान की जाती है। भारतीय वन प्रबंध संस्थान (आईआई एफएम) भोपाल भारत में एकमात्र संस्थान है जो वन-प्रबंधन में मास्टर डिग्री प्रदान करता है। वानिकी में स्नातकोत्तर छात्र अपने विषय के विशेषज्ञ होते हैं तथा वे विशेषीकृत पाठ्यक्रमों के साथ अनुसंधन कार्य करते हैं। उन्हें सौंपा गया अनुसंधान कार्य वे सुयोग्य गाइड के पर्यवेक्षण में सम्पन्न करते हैं तथा अन्ततः शोध-पत्र/शोध प्रकाशन के रूप में अपने कार्यों को संकलित करते हैं। विशेषज्ञता क्षेत्र और पाठ्यक्रम, जिनका वे अध्ययन करते हैं सामान्यतः स्नातकपूर्व पाठ्यक्रमों का उन्नत रूपान्तरण पी.एचडी. होता है।

डॉक्टरल कार्यक्रम :


चार राज्य कृषि विश्वविद्यालयों दो डीम्ड विश्वविद्यालयों तथा तीन परंपरागत विश्वविद्यालयों द्वारा वानिकी/कृषि वानिकी में पी.एचडी. के रूप में न्यूनतम तीन वर्षीय डॉक्टरल कार्यक्रम भी संचालित किए जाते हैं। पी.एचडी. स्तर पर किया जाने वाला शोध कार्य वानिकी और संबद्ध क्षेत्रों के विशेषीकृत विषयों के बारे में होता है। 

राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों/विश्वविद्यालयों में वानिकी कार्यक्रमों में प्रवेश/चयन प्रक्रिया : बी.एससी. वानिकी (चार वर्षीय डिग्री) में प्रवेश/चयन प्रक्रिया के लिए पीसीबी/पीसीएम/पीसीएमबी/कृषि समूह के छात्र १०(+)२ के बाद आवेदन कर सकते हैं। इसमें प्रवेश विश्वविद्यालय/संस्थान द्वारा आयोजित प्रवेश-परीक्षा के आधार पर प्रदान किया जाता है। कुछ विश्वविद्यालयों में प्रवेश उम्मीदवारों की मैरिट तथा सीटों की उपलब्धता के आधार पर प्रदान किया जाता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले राज्य के बाहरी उम्मीदवारों के लिए विशेष कोटे की व्यवस्था होती है। यह परीक्षा वानिकी में बैचलर डिग्री तथा अन्य कृषि विज्ञानों में बैचलर डिग्री हेतु राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में कुल सीटों की संख्या का 15% भरने के लिए आयोजित की जाती है। बी.एससी. वानिकी पूरी करने के उपरांत उम्मीदवार वानिकी में मास्टर डिग्री संचालित करने वाले राज्य कृषि विश्वविद्यालयों या अन्य संस्थानों/विश्वविद्यालयों में एम. एससी. वानिकी/कृषि-वानिकी के लिए आवेदन कर सकते हैं। मास्टर डिग्री में चयन या तो प्रवेश-परीक्षा में सफल होने पर अथवा विश्वविद्यालय/संस्थान की मैरिट के आधार पर होता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा वानिकी सहित कृषि एवं संबद्ध विज्ञानों के क्षेत्र में आईसीएआर की कनिष्ठ अनुसंधान अध्येतावृत्ति (जेआरएफ) तथा सभी राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में मास्टर डिग्री कार्यक्रमों की 25% सीटों में प्रवेश हेतु एक अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा का आयोजन किया जाता है। इसी प्रकार पी.एचडी. वानिकी कार्यक्रम में राज्य कृषि विश्वविद्यालयों या अन्य विश्वविद्यालयों/संस्थानों में प्रवेश सीधे संस्थान/ विश्वविद्यालयों के नियमों के अनुरूप या प्रवेश-परीक्षा उत्तीर्ण करने के आधार पर प्राप्त किया जा सकता है। वानिकी में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) भी लेक्चररशिप के लिए एक महत्वपूर्ण प्रमाण-पत्र है जिसे कृषि वैज्ञानिक भर्ती बोर्ड, भा.कृ.अ.प., पूसा, नई दिल्ली द्वारा हर वर्ष आयोजित परीक्षा के जरिए उत्तीर्ण किया जा सकता है।

Tuesday, October 6, 2015

खूब घूमिए ढेर सारा कमाइए

वह छात्र जिसे धरती के बारे में जानने की ललक हो, जमीनी सतह की खोजबीन करना उसे अच्छा लगता हो और तरह-तरह की मिट्टियों व चट्टानों को तलाशकर उनकी खूबियों में रुचि लेता हो तो उसके लिए भूगोल विषय को लेकर करिअर की राह पर आगे बढऩा अपनी रुचियों के साथ न्याय करना होगा।

भूगोल के अंतर्गत धरती से जुड़े सभी भौतिक तत्वों और संरचनाओं का अध्ययन किया जाता है। पूरी दुनिया में भूगोल पर पिछली कई सदियों से शोध होते आ रहे हैं और आने वाले समय में भी भूगोल धरती को जानने समझने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम बना रहेगा। साहस और खोज से भरे इस क्षेत्र में करिअर बनाने का अर्थ है ऐसी जानकारियों से दो चार होना जो सामान्य लोगों को चौंका सकती हैं। इस क्षेत्र में आगे बढऩे के लिए साहस होना जरूरी है; क्योंकि इससे संबंधित सभी कार्य किसी इमारत या कमरे के भीतर बैठकर नहीं हो सकते। भूगोल को जानने-समझने के लिए बाहरी दुनिया को तलाशना होगा। भूगोल को प्रोफेशन के रूप में अपनाने वाले इसे रुचियों से भरा क्षेत्र मानते हैं।

तीन शताब्दियों पुराना हो चुका यह विषय अभी भी ज्यादातर लोगों को भ्रमित करता है। लोग इसे विज्ञान की एक शाखा मानते हैं; लेकिन सच्चाई तो यह है कि भूगोल अपने आप में संपूर्ण विषय है। इसकी खुद की इतनी शाखाएं हैं जिनके बारे में जानने के लिए पूरी आयु भी कम पड़ सकती है। जानकारों के अनुसार भूगोल को लेकर लोगों में भ्रम की स्थिति इसलिए है क्योंकि अभी भी यह विषय गिनती के ही कॉलेजों में पढ़ाया जाता है। आठवीं कक्षा तक तो छात्र इस विषय से थोड़े बहुत परिचित रहते हैं लेकिन इसके बाद विषयों से अलग-अलग शाखाओं में बंट जाने के कारण भूगोल सिर्फ विज्ञान के एक चैप्टर का हिस्सा बन जाता है।

भूगोल (जियोग्राफी) की मुख्य शाखाओं में इंजीनियरिंग जियोग्राफी, हिस्टोरिकल जियोग्राफी, हाइड्रो जियोग्राफी व पेट्रो जियोग्राफी मुख्य हैं। भूगोल की इन सभी शाखाओं में करिअर बनाने का अर्थ है धरती के गर्भ में व सतह पर छिपे रहस्यों को उजागर करना। इंजीनियरिंग जियोग्राफी के अंतर्गत वह सभी इंजीनियरिंग ऑपरेशन दिखाए जाते हैं जो धरती को परखने के लिए जरूरी हैं। हिस्टोरिकल जियोग्राफी में धरती के इतिहास को समझाया जाता है साथ ही धरती की सतह में होने वाले बदलाव और इसके निर्माण के इतिहास की भी जानकारी दी जाती है। हाइड्रो जियोग्राफी में ग्राउंड वॉटर से संबंधित अध्ययन कराया जाता है। पेट्रो जियोग्राफी में चट्टानों के निर्माण से जुड़ी जानकारी दी जाती है। इन सभी जानकारियों के आधार पर धरती को समझने का प्रयास करते हुए इस क्षेत्र में करिअर बनाना रोजगार के साथ नाम व शोहरत भी दिलाता है।

एक समय तक जियोलॉजिस्ट की मांग सिर्फ सरकारी विभागों में ही रहती थी। प्राइवेट सेक्टर का इससे कोई लेना-देना नहीं था। लेकिन धीरे-धीरे माइनिंग सेक्टर व वातावरण से जुड़े शोधकार्यों में प्राइवेट सेक्टर का प्रवेश होने के कारण अब जियोलॉजिस्ट की मांग काफी ज्यादा है। जियोलॉजिस्ट की डिमांड इस समय सप्लाई से कहीं ज्यादा है। जिसका मतलब है श्योर और सुरक्षित करिअर। बतौर जियोलॉजिस्ट आप माइनिंग, ऑयल एक्स्प्लोरेशन, सेरेमिक्स, सीमेंट, कंस्ट्रक्शन, इको टूरिज्म, इन्वायरमेंटल मॉनिटरिंग, लैंड सर्वेग, ग्राउंड वॉटर एक्स्प्लोरेशन, वॉटरशेड मैनेजमेंट आदि कार्यों में करिअर बना सकते हैं। इस समय ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं हैं जहां धरती से जुड़ा कार्य न हो रहा हो। ग्लोबल वार्मिंग के प्रकोप ने धरती को सुरक्षित करने के कई तरीके ईजाद कर दिये हैं। इन सभी तरीकों में जियोलॉजिस्ट की विशेष भूमिका रहती है।

जियोलॉजिस्ट के करिअर में ज्यादातर फील्डवर्क ही होता है। इनमें मैपिंग से जुड़े असाइनमेंट शामिल रहते हैं। कभी-कभी सरकारी व गैर सरकारी संस्थाएं भारत का जियोलॉजिकल सर्वे कराती हैं। इस सर्वे में जियोलॉजिस्ट की पूरी टीम लगाई जाती है। साल में 6 से 8 महीने तक यह टीम पूरे देश का भ्रमण करती है और हर राज्य का अलग-अलग भौगोलिक नक्शा तैयार करती है। फील्ड जॉब से जुड़े कामों में प्राकृतिक तेल की खोज और इसे धरती के गर्भ से निकालने के लिए प्लेटफॉर्म तैयार करने की जिम्मेदारी भी जियोलॉजिस्ट की ही होती है।

इस क्षेत्र में करिअर बनाने के लिए छात्रों की फिजिकल फिटनेस अच्छी होनी चाहिए। जो छात्र इस क्षेत्र में करिअर बनाने के इच्छुक हैं उन्हें दिमागी रूप से इस बात के लिए तैयार रहना चािहए कि उन्हें ज्यादातर समय घर से बाहर ही बिताना है। इन सभी के साथ भौतिक, रसायन व गणित विषय की जानकारी भी इस क्षेत्र में लाभदायक हो सकती है। हालांकि इस क्षेत्र में भूगोल विषय से डिग्री या डिप्लोमा कोर्स करने वालों को वरीयता दी जाती है। लेकिन फिर भी यदि विज्ञान के इन विषयों की थोड़ी बहुत समझ है तो यह सोने पर सुहागा जैसा होता है। योग्यता : फुल टाइम रिसर्च से जुडऩे के लिए एमएससी की डिग्री होनी चाहिए। स्नातक में भूगोल विषय होना एमएससी के लिए लाभदायक होता है। इस विषय से पीएचडी करने वाले सीधे नामी शोध संस्थानों का हिस्सा बनते हैं। पीजी डिग्री के बाद रोजगार मिलने पर जियोलॉजिस्ट की शुरुआती आय 40-50 हजार रुपये महीने हो सकती है। इंडस्ट्री में स्थापित होने के बाद आय की कोई सीमा नहीं है। इस क्षेत्र में करिअर बनाने की विशेष योग्यता, विषय में रुचि होना है। भूगोल को सिर्फ विषय के रूप में न लेकर इसकी जमीन से जुड़कर इसे जानें और फिर यह विषय आपको इतना रोचक लगने लगेगा कि इसके अलावा किसी अन्य विषय के बारे में आपको विचार आने बंद हो जाएंगे।

प्रमुख संस्थान
• वाडिया इंस्टीच्यूट ऑफ हिमालया जियोलॉजी
• नेशनल जियो फिजिकल रिसर्च इंस्टीच्यूट, हैदराबाद
• फिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी, अहमदाबाद
• नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ ओशोनोग्राफी, गोआ
• आईआईटी खडग़पुर
• आईआईटी रुड़की
• आईआईटी बॉम्बे
• दिल्ली यूनिवर्सिटी
• मुंबई यूनिवर्सिटी
• एमएस यूनिवर्सिटी, बड़ौदाह्न

Monday, October 5, 2015

कुदरत बचाओ, कैरियर बनाओ

पर्यावरण सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। कुदरत को बचाने की इस मुहिम के परिणामस्वरूप ग्रीन जॉब्स का एक बड़ा मार्केट खड़ा हो रहा है, जहां पे-पैकेज भी अच्छा है। क्या हैं ग्रीन जॉब्स और कैसे पा सकते हैं आप यहां एंट्री, बता रही हैं, शाश्वती। 

एक जमाना था जब छात्रों की प्राथमिकता की सूची में सबसे अंत में आता था पर्यावरण विज्ञान यानी इनवायर्नमेंटल साइंस। लेकिन अब इस सूची में यह ऊपर की ओर कदम बढ़ा रहा है। जलवायु परिवर्तन और उससे होने वाले खतरों के विषय में लगातार बढ़ रही जागरूकता और पार्यावरण को बचाने के लिए विश्व के विभिन्न हिस्सों में चल रहे आंदोलनों के कारण अब छात्रों के बीच विषय के रूप में पर्यावरण विज्ञान की लोकप्रियता बढऩे लगी है। पर्यावरण विज्ञान के प्रति छात्रों की बढ़ रही रुचि का एक कारण यह भी है कि अब पर्यावरण से जुड़े फील्ड में नौकरी की संभावना भी काफी तेजी से बढ़ रही है। पर्यावरण के क्षेत्र से जुड़ी इन नौकरियों को ग्रीन जॉब्स का नाम दिया गया है। ग्रीन जॉब्स के क्षेत्र में प्रशिक्षित लोगों की मांग कितनी तेजी से बढ़ रही है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सितंबर, 2009 में दिल्ली में देश के पहले ग्रीन जॉब्स फेयर का आयोजन किया गया था। इस नौकरी मेले में देश-विदेश की 25 से ज्यादा कंपनियों ने भाग लिया था।

क्या है ग्रीन जॉब्स


पर, आखिर ग्रीन जॉब्स हैं क्या और ग्रीन जॉब्स की श्रेणी में कौन-सी नौकरियों को रखा गया है? पर्यावरण सुरक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली मुंबई स्थिति एनजीओ 'दी क्लाइमेट प्रोजेक्ट इंडिया’ के डायरेक्टर गौरव गुप्ता के अनुसार, 'ग्रीन जॉब्स, कार्य की ऐसी विधियां हैं, जहां पर्यावरण की सुरक्षा का ध्यान में रखते हुए वस्तुओं का उत्पादन और उसका उपयोग किया जाता है। बिजली की बचत और सौर तथा पवन ऊर्जा आदि अधिक-से अधिक इस्तेमाल करने वाली बिल्डिंग का निर्माण करने वाला आर्किटेक्ट, वॉटर रीसाइकल सिस्टम लगाने वाला प्लंबर, विभिन्न कंपनियों में पर्यावरण के संरक्षण से संबंधित शोध कार्य और सलाह देने वाले लोग, ऊर्जा की खपत कम करने की दिशा में काम करने वाले विशेषज्ञ, पारिस्थितिकी तंत्र व जैव विविधता को कायम करने के गुर सिखाने वाले विशेषज्ञ, प्रदूषण की मात्रा और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के तरीके बताने वाले एक्सपर्ट आदि के काम ग्रीन जॉब्स की श्रेणी में आते हैं।’

विशेषज्ञों की मानें तो आने वाले वक्त में हर नौकरी में यह क्षमता होगी कि वह ग्रीन जॉब में तब्दील हो सके। इस सेक्टर में धीरे-धीरे विस्तार हो रहा है और साथ ही साथ नौकरी की संभावनाएं भी बढ़ रही हैं। यह सेक्टर प्रशिक्षित लोगों की मांग करता है और बदले में अच्छी सैलरी देता है। कई विशेषज्ञों की यह भी राय है कि जिस तरह सूचना और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में एक जमाने में भारी उछाल आया था, वैसा ही आने वाले वक्त में ग्रीन जॉब्स के क्षेत्र में होगा।

भारत तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है। हमारे यहां नए भवनों का निर्माण हो रहा है और ऊर्जा की मांग भी बढ़ रही है। आनेवाले समय में पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में नियम-कायदे और भी स्पष्टï व कड़े होंगे और पर्यावरण सुरक्षा के साथ-साथ विकास के फॉर्मूले को हर जगह मान्यता मिलेगी। अन्य क्षेत्रों के अलावा कृषि के क्षेत्र में भी भारतीय और विदेशी कंपनियां भारत में रिसर्च और डेवलपमेंट सेंटर की स्थापना कर रही हैं। कृषि उत्पादन बढ़ाने और पारिस्थितिकी तंत्र को कम-से-कम नुकसान पहुंचाने की दिशा में लगातार शोध कार्य और निवेश हो रहे हैं। हर साल सिर्फ इन मांगों को पूरा करने के लिए 5000 प्रशिक्षित लोगों की जरूरत होगी। आनेवाले समय में देश के सभी छह लाख गांवों को पानी और कचरा प्रबंधक की जरूरत होगी और इस जरूरत को पूरा करने के लिए 1.2 करोड़ प्रशिक्षित लोगों की जरूरत होगी। आप अगर ग्रीन जॉब्स कर रहे हैं, तो इसका मतलब यह है कि आप नौकरी के साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

कैसे करें शुरुआत


सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश के आधार पर यूजीसी ने ग्रेजुएशन के स्तर पर इनवायर्नमेंटल स्टडीज को अनिवार्य बना दिया है। स्कूल और टेक्निकल पाठ्यक्रमों के स्तर पर यह जिम्मेदारी क्रमश: एनसीईआरटी और एआईसीटीई को सौंपी गई है। पर्यावरण विज्ञान बेसिक साइंस और सोशल साइंस दोनों का मिश्रित रूप है। रिसोर्स मैनेजमेंट और रिसोर्स टेक्नोलॉजी भी पर्यावरण विज्ञान का एक महत्वपूर्ण अंग है। पर्यावरण से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में अपना कैरियर बनाने के लिए पढ़ाई बारहवीं के बाद शुरू की जा सकती है, पर इस स्तर पर संस्थानों की संख्या कम है। ग्रीन जॉब्स के क्षेत्र में बेहतर कैरियर बनाने के लिए पर्यावरण विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त करना आपके भविष्य के लिए अच्छा होगा। पर्यावरण से संबंधित नीतियों के निर्माण दिलचस्पी रखने वाले साधारण ग्रेजुएट के लिए भी यहां मौके हैं। जीव विज्ञान के साथ बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले छात्र ग्रेजुएशन के स्तर पर इनवायर्नमेंटल साइंस की पढ़ाई कर सकते हैं। फिजिकल साइंस, लाइफ साइंस, इंजीनियङ्क्षरग या मेडिकल साइंस आदि विज्ञान विषयों से ग्रेजुएशन करने के बाद इनवायर्नमेंटल साइंस में पोस्ट ग्रेजुएशन करना बेहतर होगा। इनवायर्नमेंटल साइंस में बीटेक का कोर्स भी कई संस्थानों में उपलब्ध है।

सेंटर फॉर साइंस ऐंड इनवायर्नमेंट, दिल्ली में पर्यावरण विज्ञान से जुड़े विषयों में इंटर्नशिप और सर्टिफिकेट कोर्स करवाया जाता है। देश में पर्यावरण विज्ञान को समर्पित दिल्ली स्थित एकमात्र संस्थान दी एनर्जी ऐंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट यानी टेरी में इनवायर्नमेंटल साइंस से संबंधित विषयों में पोस्ट-ग्रेजुएट और डॉक्टेरल स्तर के पाठ्यक्रमों की पढ़ाई होती है। टेरी पर्यावरण विज्ञान के क्षेत्र में स्कॉलरशिप भी देती है। इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स, धनबाद में इनवायर्नमेंटल इंजीनियङ्क्षरग में बी-टेक की पढ़ाई होती है। यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम ऐंड एनर्जी स्टडीज, देहरादून में इनवायर्नमेंटल इंजीनियरिंग में बीई का कोर्स उपलब्ध है। इग्नू में इनवायर्नमेंटल स्टडीज में छह माह का सर्टीफिकेट कोर्स उपलब्ध है। इसके अलावा कई सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ट्रेनिंग दे रही हैं। इनमें अल्मोड़ा स्थित गोविंद बल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान, देहरादून स्थित इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च ऐंड एजूकेशन, इलाहाबाद स्थित सेंटर फॉर सोशियल फॉरेस्ट्री ऐंड इको-रीहैबिलिटेशन, बैंगलूरु स्थित सेंटर फॉर इनवायर्नमेंटल एजूकेशन और चेन्नई स्थित सीपीआई इनवायर्नमेंटल एजूकेशन प्रमुख हैं।

इनवायर्नमेंटल साइंस में पोस्ट-ग्रेजुएशन के बाद विकल्पों की भरमार है। सरकारी और गैर-सरकारी क्षेत्र में इनवायर्नमेंटल बायोलॉजिस्ट, इनवायर्नमेंटल ऑफिसर, इनवायर्नमेंटल मैनेजर, इनवायर्नमेंटल साइंटिस्ट, इनवायर्नमेंटल कंसल्टेंट, इनवायर्नमेंटल एक्सटेंशन ऑफिसर, इनवायर्नमेंटल लॉ ऑफिसर आदि पद उपलब्ध हैं। वर्तमान समय में प्रशिक्षित इनवायर्नमेंटलिस्ट की देश-विदेश में काफी मांग है। हर राज्य में पॉल्यूशन कंट्रोल और इनवायर्नमेंटल प्रोटेक्शन बोर्ड होता है। इनवायर्नमेंटल साइंस में कोई भी पोस्ट ग्रेजुएट इनवायर्नमेंटल ऑफिसर और सीनियर इनवायर्नमेंटल ऑफिसर के पद के लिए आवेदन कर सकता है। प्राइवेट सेक्टर में भी शुगर मिल, खाद की फैक्ट्री, चावल मिल, आटा मिल, ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री और सिमेंट फैक्ट्री आदि में आपके लिए ग्रीन जॉब्स के मौके हैं। पर्यावरण विज्ञान के क्षेत्र में छात्रों को प्रशिक्षित करने के लिए स्कूल और कॉलेज के स्तर पर शिक्षकों की भी जरूरत होगी।

कहां होती है पढ़ाई :


-स्कूल ऑफ इनवायर्नमेंटल साइंस, जेएनयू, नई दिल्ली
-दी एनर्जी ऐंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (टेरी), नई दिल्ली
-सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस, बैंगलूरु
-डिपार्टमेंट ऑफ इनवायर्नमेंटल साइंसेज, श्रीनगर, गढ़वाल
-डिपार्टमेंट ऑफ इनवायर्नमेंटल बायोलॉजी, यूनिवर्सिटी ऑफ दिल्ली
-स्कूल ऑफ इनवायर्नमेंटल साइंसेज, रायबरेली रोड, लखनऊ
-डिपार्टमेंट ऑफ इनवायर्नमेंटल साइंसेज, जंभेश्वर यूनिवर्सिटी, हिसार
-इग्नू, नई दिल्ली

-संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा करवाए गए एक सर्वे के अनुसार 2025 तक भारत में जैव ईंधन निर्माण के क्षेत्र में 900,000 नौकरियों के अवसर पैदा होंगे।
-इसमें से 300,000 नौकरियां स्टोव निर्माण के क्षेत्र में उत्पन्न होंगी।
-लगभग 600,000 से ज्यादा लोगों को ईंधन आपूर्ति और इससे जुड़े अन्य क्षेत्रों में नौकरियां मिलेंगी।
-पर्यावरण और उससे जुड़े प्रोडक्ट और सेवाओं का वैश्विक बाजार 2020 तक वर्तमान के 1,370 अरब डॉलर से बढ़कर 2,740 अरब डॉलर का हो जाएगा।


हर सेक्टर में होगा ग्रीन जॉब्स का निर्माण


पर्यावरण के प्रति लोगों की बढ़ रही जागरूकता और उसे अब तक पहुंचाए गए नुकसान के प्रभाव को महसूस करने के बाद यह तय है कि आने वाले वक्त में विश्व के सभी देशों की सरकारें और उद्योग-जगत अपनी नीतियों और कार्यशैली को पर्यावरण के अनुकूल रखने की कोशिश करेंगे। सरकार और उद्योगों की नीति में धीरे-धीरे आ रहे इन बदलावों का परिणाम यह होगा कि अमूमन हर सेक्टर में ग्रीन जॉब्स का निर्माण होगा। ग्रीन जॉब्स की अवधारणा सिर्फ सौर ऊर्जा या पवन ऊर्जा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह डेवलपमेंटल सेक्टर, कंसल्टेंसी से लेकर सीमेंट कंपनी आदि से भी जुड़ी हुई है। मतलब, ग्रीन जॉब्स को सिर्फ पर्यावरण से जोड़कर देखने की जगह उसे समग्र रूप से और अन्य विषयों से जोड़कर भी देखने की जरूरत है। आने वाले वक्त में कोई भी सेक्टर ऐसा नहीं होगा, जहां ग्रीन जॉब्स के अवसर न हों। ग्रीन जॉब्स के क्षेत्र में विज्ञान विषयों के छात्रों को ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है, पर कला विषयों से स्नातक छात्र भी इनवायर्नमेंटल सांइस से जुड़े विषयों की पढ़ाई कर रहे हैं। यहां कैरियर बनाने के लिए मैथ्स की थोड़ी-बहुत जानकारी भी जरूरी है। ग्रीन जॉब्स के क्षेत्र में बेहतरीन काम के साथ सैलरी भी अच्छी है। टेरी से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्रों को औसतन चार से साढ़े चार लाख सालाना आय वाली नौकरियां मिल जाती हैं।
(डॉ. राजीव सेठ रजिस्ट्रार, टेरी यूनिवर्सिटी) 

ग्रीन जॉब्स के प्रति जागरूकता बढ़ानी होगी


इनवायर्नमेंटल साइंस और इससे जुड़ी नौकरियों के प्रति भारत में जागरूकता का स्तर अभी काफी कम है। पहली समस्या तो यह है कि छात्र जब किसी कोर्स का चुनाव करते हैं, तो उस दौरान वे किसी सेक्टर विशेष पर अपना ध्यान नहीं केंद्रित करते। दूसरी समस्या यह है कि भारत में इनवायर्नमेंटल साइंस की विशेषतौर पर पढ़ाई कराने वाले संस्थान और इस विषय को पढऩे वाले छात्र, दोनों की संख्या कम है। आनेवाले वक्त में पर्यावरण के क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों की मांग में बड़ी संख्या में इजाफा होगा। ये नौकरियां नीति निर्माण, ठोस कचरा प्रबंधन, इलेक्ट्रॉनिक कचरा प्रबंधन, इकोटूरिज्म, इनवायर्नमेंटल एजूकेशन, इनवायर्नमेंटल जर्नलिज्म, इनवायर्नमेंटल सुरक्षा और शोध आदि क्षेत्रों में विभिन्न स्तरों पर उपलब्ध होंगी। निर्माण उद्योग में भी पर्यावरण से जुड़े विशेषज्ञों की डिमांड बढ़ेगी। ग्रीन बिल्डिंग्स बनाने का चलन तो तेज होने लगा है और यहां भी पर्यावरण से जुड़े एक्सपर्ट की मांग है। कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज यानी सीआईआई ने पिछले आठ सालों में ग्रीन जॉब्स की विचारधारा पर आधारित छह से सात हजार नौकरियों का निर्माण किया है। ग्रीन ऑर्किटेक्चर, कॉरपोरेट कंपनियों को सलाह देने आदि से जुड़े कई पदों का निर्माण पिछले कुछ सालों में हुआ है। आयन एक्सचेंज इंडिया पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं के समाधान की दिशा में पिछले चार दशक से काम करने वाली भारत की सबसे बड़ी कंपनी है। यहां कचरा प्रबंधन, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण आदि क्षेत्रों का काम होता है। ग्रीन जॉब्स की आपकी खोज इन संस्थानों में पूरी हो सकती है

Saturday, October 3, 2015

खाद्य प्रसंस्करण इंजिनियरी एवं प्रौद्योगिकी में करियर

खाद्य प्रसंस्करण खाद्य विज्ञान की एक शाखा है और यह ऐसी पद्धतियों तथा तकनीकों का मिला जुला रूप है जिसके द्वारा कच्ची सामग्रियों (raw ingredients) को मनुष्यों तथा पशुओं के उपयोग के लिए भोजन में परिवर्तित किया जाता है। खाद्य प्रसंस्करण खाद्य को परिरक्षित करता है, उसके सुस्वाद में वृद्धि करता है और खाद्य-उत्पाद में टॉक्सिन्स को कम करता है। आधुनिक खाद्य प्रसंस्करण तकनीकों ने आज के सुपर-मार्केट्स के विकास की संभावनाओं को बल दिया है विकसित तथा विकासशील देशों के समाजों में उभर रहे उपभोक्तावाद ने स्प्रे ड्राइंग, जसू कन्सन्ट्रटेस, फ्रीज ड्राइगं जैसी तकनीकों वाले खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के विकास तथा कृत्रिम मिठाइयों कलरेंट्स एवं प्रिजर्वेटिव्स प्रारंभ करने में योगदान दिया है। बीसवीं सदी के अंत में मध्यम वर्गीय परिवारों माताओं और विशेष रूप से कार्यशील महिलाओं के लिए ड्राइडइन्स्टेंट सूप्स, रिकंस्टीट्यूटेड फ्रूटस, जूस तथा सेल्फ कुकिगं मील्स जैसे उत्पादों का विकास किया गया।

आज भारत में खाद्य प्रसंस्करण उद्यागे उपभोक्ता-खाद्य उद्यागे के रूप में गति पकड़ रहा है। एक रिपार्टे के अनुसार देशों में प्रसंसाधित एवं डिब्बाबदं खाद्य के लगभग 300 मिलियन उच्च वगीर्य तथा मध्यम वर्गीय उपभोक्ता हैं और अन्य 200 मिलियन उपभोक्ताओं के इनमें शामिल होने की संभावना है। पूरे देश में 500 खाद्य स्थल स्थापित करने की योजना है। इससे खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के विकास को और बल मिलेगा व इस कार्य के प्रति अभिरुचि रखने वालो के लिए रोजगार के व्यापक अवसर सृजित होंगे खाद्य सामगिय्रों को उद्यागे एवं सरकार की विनिर्दिष्टियों के अनुसार संसाधित, परिरक्षित एवं डिब्बाबदं किया जाता है और रखा जाता है। आज खाद्य प्रसंस्करण उद्यागे का भारत के उद्योगों में पांचवा स्थान है ।

भारतीय खाद्य निगम, जो खाद्यान्न तथा अन्य खाद्य मदों के क्रय, भंडारण, परिवहन एवं वितरण का कार्य करता है, व्यक्तियों की एक बडी़ संख्या को रोजगार देता है। निजी उद्यम ब्रडे , फलों का जूस खाद्य तेल एवं सॉफ्ट ड्रिकं कन्सन्ट्रटे बेचते हैं ।

खाद्य प्रसंस्करण कंपनियां और खाद्य अनुसंधान प्रयोगशालाएं, खाद्य थोक विक्रेता, अस्पताल, खानपान संस्थापनाएं, रिटेलर, रेस्तरां आदि गृह विज्ञान में डिग्री रखने वालों और खाद्य प्राद्योगिकी, आहार या खाद्य सेवा प्रबंधन में विशेषज्ञता धारी उम्मीदवारों को रोजगार के अवसर देते हैं। बैक्टीरियालोजिस्ट, टोक्सिकालोजिस्ट तथा पैकेजिंग प्रौद्योगिकी, कार्बनिक रसायन विज्ञान, जैव रसायन विज्ञान एवं विश्लेषिक रसायन विज्ञान में प्रशिक्षित व्यक्ति खाद्य प्रौद्योगिकी प्रयोगशालाओं या गुणवत्ता नियत्रंण विभागों में रोजगार के अवसर तलाश सकते हैं। इस उद्योग में बेकरी, मीट, कुक्कटु पालन, ट्रीमर्स तथा फिश कटर्स, स्लॉटरर्स, मीट पेकर्स, फूड बैच मेकर्स, फूड मेकिंग मशीन ऑपरेटर्स तथा टेंडर्स, खाद्य एवं तम्बाकू रोस्टिंग, बेकिंग एवं ड्राइंग मशीन ऑपरेटर्स एवं टेंडर्स आदि रोजगार शामिल हैं ।

स्व-रोजगार के अवसर:


जो अपना निजी कार्य चलाना चाहते हैं, उनके लिए डिलीवरी नेटवर्क के रूप में स्व-रोजगार के अवसर भी विद्यमान हैं ।

विभिन्न खाद्य उत्पादों के विनिर्माण या उत्पादन, परिरक्षण एवं पैकेजिंग, प्रसंस्करण तथा डिब्बाबंदी के लिए इस उद्योग में खाद्य प्रौद्योगिकिविदों, तकनीशियनों, जैव प्रौद्योगिकीविदों तथा इंजीनियरों की आवश्यकता होती है। खाद्य प्रसंस्करण के लिए कच्चा माल तैयार करने की आवश्यकता होती है, जिसमें कच्चे माल का चयन या सफाई और उसके बाद उसका वास्तविक प्रसंस्करण करना शामिल है। प्रसंस्करण का कार्य कच्चे माल को काट कर, ब्लेंच करके, पीस कर या मिला कर अथवा पका कर किया जाता है। खाद्य उत्पादों को स्वास्थ्यवर्धक तथा गुणवत्ता पूर्ण बनाए रखने के लिए उनमें परिरक्षण सामग्री को मिलाया जाना और डिब्बाबंद करना आवश्यक होता है ।

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में कार्य के लिए निम्नलिखित व्यक्तियों की आवश्यकता होती है:- 

खाद्य प्रौध्योगिकीविद् :


• यह निर्धारित करने के लिए कि क्या कोई विशेष प्रक्रिया एक निर्दिष्ट रूप में निष्पादित की जा रही है या नहीं ।
• खाद्य परिरक्षण, संरक्षण एवं प्रसंस्करण के लिए नए तरीके विकसित करने तथा पुराने तरीकों में सुधार लाने के लिए ।
• संसाधित किए जाने वाले खाद्य उत्पादों में संदूषण, मिलावट की जांच करने और उनके पोषण-मूल्यों पर नियंत्रण रखने के लिए ।
• बाजार में भेजे जाने वाले खाद्य-उत्पादों के लिए सयंत्र तथा खाद्य में उपयोग में लाई जाने वाली कच्ची सामग्रियों की गुणवत्ता निर्धारित करने के लिए ।
• भडांरण स्थितियों तथा स्वास्थ्य विज्ञान पर निगरानी रखने के लिए ।

कॉर्बनिक रसायन विज्ञानी: उन पद्धतियों पर परामर्श देते हैं जिनके द्वारा कच्ची सामग्रियों को संसाधित खाद्य में परिवर्तित किया जाता है ।

जैव रसायन विज्ञानी: स्वाद, संरचना, भंडारण एवं गुणवत्ता में सुधार लाने संबंधी सुझाव देते हैं ।

विश्लेषिक रसायन विज्ञानी: खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए उनका विश्लेषण करते हैं ।

गृह अर्थशास्त्री: आहार विज्ञान तथा पोषण विशेषज्ञ होते हैं और कंटनेर्स के विनिर्देशों के अनुसार वे खाद्य तथा नुस्खों की जाचं करते हैं ।

इंजीनियर: प्रसंस्करण प्रणालियों के नियोजन, डिजाइन, सुधार एवं रखरखाव के लिए रासायनिक, यांत्रिक, औद्योगिक, वैद्युत कृषि एवं सिविल इंजीनियरों की भी आवश्यकता होती है ।

अनुसंधान वैज्ञानिक: डिब्बाबदं खाद्य के गुण स्वाद, पोषक मूल्यों तथा सामान्य रूप से उसकी स्वीकार्यता में सुधार लाने के लिए प्रयागे करते हैं ।

प्रबंधक एवं लेखाकार: प्रसंस्करण कार्य के पर्यवेक्षण कार्य के अतिरिक्त प्रशासन एवं वित्त-प्रबंधन का कार्य करते हैं ।

खाद्य प्रसंस्करण संयंत्र में वरिष्ठ खाद्य प्रौद्योगिकीविद् एवं प्रधान अभियंताः


ये ग्राहकों की आवश्यकताओं को पूरा करने और कंपनी के लाभपूर्ण तथा कुशल विपणन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए उत्पादन की संकल्पना से लेकर उन्हें अंतिम रूप देने की दृष्टि से नए तथा नवप्रवर्तित उत्पादों के विकास के लिए जिम्मेदार होते हैं ।

उत्पादन प्रबंधक:


कन्फेक्शनरी : तैयार किए जाने वाले उत्पाद के बारे में संकल्पना व अनुभव होना चाहिए और मशीनों के बारे में कुछ तकनीकी ज्ञान होना चाहिए ।

सहायक महाप्रबंधक/वरिष्ठ प्रबंधक-खाद्य प्रसंस्करण: फल एवं सब्जी प्रसंस्करण एकक स्थापित करने के लिए उच्च इंजीनियरी तकनीकों को प्रयोग में लाते हैं और ऐसे विषय क्षेत्र के अंतर्गत उसका विश्लेषण करते हैं जिसमें न्यूनतम पर्यवेक्षण के साथ विकास, डिजाइन, नवप्रवर्तन तथा प्रवीणता आवश्यक होती है ।

खाध्य उद्योग में अपेक्षित व्यक्तिगत गुण: श्रमशीलता, सतर्कता, संगठनात्मक क्षमताएं, विशेष रूप से स्वच्छता एवं स्वास्थ्य के बारे में बुद्धिमानी एवं परिश्रम तथा व्यावसायिक पाठ्यक्रम देश के विभिन्न भागों में कई ऐसे खाद्य एवं आहार विस्तार केंद्र हैं जो फलों एवं सब्जियों के गृह आधारित परिरक्षण, बेकरी एवं कन्फेक्शनरी मदें राइस-मिलिगं, तिलहन प्रसंस्करण तथा ऐसे ही अन्य अल्प-कालीन पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण देते हैं ।

भारत में कुछ विश्वविद्यालय खाद्य प्रौद्योगिकी एवं खाद्य विज्ञान में डिग्री पाठ्यक्रम चलाते हैं। कुछ ऐसे संस्थान भी हैं जो खाद्य प्रसंस्करण के विशेषज्ञता पूर्ण पहलुओं में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम चलाते हैं। 10+2 स्तर पर भौतिकी, रसायन विज्ञान, गणित (पी.सी.एम.) या भौतिकी, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान (पी.सी.बी) के उम्मीदवारों को खाद्य प्रौद्योगिकी, खाद्य विज्ञान तथा गृह विज्ञान में अधिस्नातक पाठ्यक्रमों के लिए प्रवेश दिया जाता है। खाद्य प्रौद्योगिकिविदों के पास स्नातक/ स्नातकोत्तर डिग्रियां होती हैं। ये डिग्रियां भारत में स्थित विभिन्न संस्थानों द्वारा चलाई जाती हैं। भारतीय विश्वविद्यालयों में खाद्य एवं आहार, गृह विज्ञान, खाद्य प्रौद्योगिकी तथा जैव प्रौद्योगिकी में भी एम.एस.सी. एवं पी.एच.डी पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं। खाद्य प्रौद्योगिकी पाठ्यक्रमों में उपलब्ध विभिन्न कार्यक्रमों में बी.टेक., बी.एस.सी., एम.टेक, एम.एससी. और पीएच.डी शामिल हैं। खाद्य प्रौद्योगिकी में बी.टेक., बी.एससी. के लिए पात्रता मानदण्ड में विज्ञान के साथ 10+2 या समकक्ष शामिल है। यह चार/तीन-वर्षीय पूर्णकालिक पाठ्यक्रम हैं। खाद्य प्रौद्योगिकी में एम.एससी करने के इच्छुक उम्मीदवारों के पास रसायन विज्ञान के साथ विज्ञान में स्नातक डिग्री होनी चाहिए। यह एम.एससी. पाठ्यक्रम दो वर्षीय पूर्णकालिक पाठ्यक्रम है। एम.एससी. पूरी करने के बाद, उम्मीदवार खाद्य प्रसंस्करण इंजीनियरी तथा प्रौद्योगिकी में पी.एचडी कार्यक्रम कर सकता है। बी.टेक डिग्री वाले उम्मीदवार खाद्य प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी में एम.टेक. पाठ्यक्रम भी कर सकते हैं, जिसकी अवधि दो वर्ष होती है। खाद्य प्रौद्योगिकीविदों की चुनौतियों में, व्यक्तियों द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली खाद्य मदों की किस्मों में वृद्धि करना और उनकी गुणवत्ता तथा पोषक मूल्यों में सुधार लाना और साथ ही साथ कुशल निर्माण के माध्यम से इन्हें वहन योग्य स्थिति में बनाए रखना भी शामिल है ।

खाध्य प्रसंस्करण इंजीनियरी एवं प्रौद्योगिकी पाठ्यक्रम चलाने वाले संस्थान


कारुण्य विश्वविद्यालय, कोयम्बत्तूर- 641114 खाद्य प्रसंस्करण इंजीनियरी में बी.टेक. एवं एम.टेक कराता है ।
एम.एस. विश्वविद्यालय, वड़ोदरा, गुजरात ।
केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान, मैसूर ।
कृषि विश्वविद्यालय, हिमाचल प्रदेश ।
फल प्रौद्योगिकी संस्थान, लखनऊ ।
राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, बंगलौर ।
राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल ।
इग्नू (आई.जी.एन.ओ.यू) खाद्य तथा आहार में प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम चलाता है ।
एस.आर.एम. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान-प्रौद्योगिकी स्नातक (बी.टेक ) ।
खाद्य एवं प्रसंस्करण इंजीनियरी ।
अन्ना-विश्वविद्यालय, चेन्नै -प्रौद्योगिकी स्नातक (बी.टेक) खाद्य प्रौद्योगिकी ।
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली-110007।
गुजरात कृषि विश्वविद्यालय, सरदार कृषि नगर-385506।
कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, धारवाड- 580005।
मैसूर विश्वविद्यालय, मैसूर-570005।
महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, प्रियदर्शिनी हिल्स डाकघर, कोट्टयम-686560।
चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय, जिला- सतना-485331।
डॉ. बाबा साहेब आम्बेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद-431004। 
बंबई विश्वविद्यालय, फार्टे, मुबंई-400032।
एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, 1, नाथीबाई ठाकरसे रोड, मुंबई-400020।
लक्ष्मी नारायण प्रौद्योगिकी संस्थान, महात्मा गांधी मार्ग, नागपुर-440010।
मणिपुर विश्वविद्यालय, इम्फाल-795003।
गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर- 143005।
मद्रास विश्वविद्यालय, मद्रास-600005।
अविनाशीलिगं म महिला गृह विज्ञान एवं उच्चतर शिक्षा संस्थान, काये म्बत्तूर-641043।
जी.बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, खाद्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, पंतनगर-263145।
हारकोर्ट बटलर प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर-208002।
कलकत्ता विश्वविद्यालय, कोलकाता- 700073, पश्चिम बंगाल।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खडगपुर, कृषि इंजीनियरी विभाग, खडगपुर-721302।

Friday, October 2, 2015

सिद्ध चिकित्सा में रोजगार के अवसर

सिद्ध शब्द का अर्थ है उपलब्धि। सिद्धकर्ता के रूप प्रसिद्ध संत-समुदाय ने विभिन्न युगों के दौरान सिद्ध चिकित्सा प्रणाली का विकास किया है। ‘सिद्धकर्ता शब्द’ की व्युत्पत्ति सिद्धि से हुइ है, जिसका अर्थ है ‘शाश्वत परमानंद सिद्धकर्ताओं ने जड़ी-बूटी औषधि में सर्वोच्च ज्ञान प्राप्त किया और आध्यात्मिकता का भी ज्ञान फैलाया है। संक्षेप में सिद्ध औषधि का अर्थ है ‘ऐसी औषधि जो सदा अचूक है।

उद्भव एवं विकास


सिद्ध औषधि प्रणाली लगभग दस हजार वर्ष पुरानी है। सिद्ध प्रणली भारत में सबसे पुरानी चिकित्सा प्रणाली है। इस चिकित्सा प्रणाली के विकास में अनेक सिद्धकर्ताओं में योगदान दिया है, जिनमें से 18 प्रख्यात सिद्धकर्ता है। इनमें अगस्तियार सबसे प्रमुख माने जाते हैं और सिद्ध औषधि में उनके द्वारा किया गया कार्य श्रेष्ठ माना जाता है। अगस्तियार को वही स्थान प्राप्त है जो औषधि के पितामह माने जाने वाले ग्रीक फिजिशियन हिप्पोक्रेट्स को प्राप्त था। तमिलनाडु में पलानी पर्वत औषधीय पौधों में प्रचुर है और यह सिद्धकर्ताओं की स्थली रहा है। सिद्ध औषधि साहित्य प्राचीन तमिल में उपलब्ध है और यह मुख्य रूप से भारत के दक्षिणी भाग में प्रचलित हैं।

मूल संकल्पना तथा सिद्धांत


सिद्धकर्ताओं की मूल संकल्पना भोजन ही औषधि है और औषधि ही भोजन भारतीय औषधि प्रणाली का आधार है। सिद्ध औषधि के अनुसार सात तत्व अर्थात प्लाविका, रक्त, मांसपेशी, वसा, अस्थि, स्नायु तथा शुक्र मानव शरीर के शारीरिक, शारीरिक क्रिया एवं मनोवैज्ञानिक कार्यों के आधार हैं। ये सातों तत्व तीन तत्वों अर्थात वायु, अग्नि या ऊर्जा तथा जल द्वारा सक्रिय होते हैं। माना जाता है कि सामान्यतः ये तीनों तत्व हमारे शरीर में एक विशेष अनुपात में होते हैं। जब हमारे शरीर में इन तीनों तत्वों का संतुलन बिगड़ता है तब विभिन्न रोग होते हैं। हमारे शरीर में इन तत्वों को प्रभावित करने वाले कारक हैं:- पथ्य या आहार, शारीरिक गतिविधियां पर्यावरण तथ्य एवं तनाव। 

अन्य भारतीय औषधि प्रणालियों की तुलना में सिद्ध औषधि में धातुओं तथा खनिजों का प्रयोग प्रमुख हैं। शरीर में रोगों का पता लगाने के लिए नाड़ी पठन, शरीर को छूकर, आवाज, रंग, नेत्र, जिह्वा, पेशाब एवं शौच की जांच करना निदान के मुख्य आधार हैं। सिद्ध औषधि मर्मस्थानों के लिए भी उपयोग में लाई जाती है।

सिद्ध चिकित्सा चिकित्सा अवधि के दौरान रोगियों को ‘‘क्या करें और क्या न करें’’ का पालन करने की भी शिक्षा देती है। सिद्ध चिकित्सा उपचार का ध्येय शरीर में तीन तत्वों का संतुलन बनाए रखकर सात तत्वों को सामान्य स्थिति में रखना है ताकि शरीर एवं मस्तिष्क स्वस्थ रह सकें। 

औपचारिक चिकित्सा शिक्षा


सिद्ध चिकित्साकर्ता बनने के लिए एक औपचारिक चिकित्सा शिक्षा अनिवार्य है। ऐसे कई सिद्ध चिकित्सा महाविद्यालय हैं जो निम्नलिखित अधिस्नातक डिग्री देते हैं, जैसे-सिद्ध औषधि एवं शल्य चिकित्सा स्नातक (बी.एस. एम.एस.) यह 5-1/2 वर्षीय पाठ्यक्रम है, जिसमें छह महीने या एक वर्ष की इंटर्नशिप अवधि भी शामिल है। इस पाठ्यक्रम को पूरा करने के बाद कोई भी व्यक्ति सिद्ध औषधि में स्नातकोत्तर डिग्री अर्थात एम.डी. (सिद्ध) कर सकता है, जो 3 वर्षीय पाठ्यक्रम है। बी.एस.एम.एस. पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने के लिए न्यूनतम पात्रता भौतिकी, रसायन विज्ञान, जीव-विज्ञान, या वनस्पति विज्ञान, तथा प्राणिविज्ञान विषयों के साथ हायर सेकेण्डरी पाठ्यक्रम (10+2) है। इस पाठ्यक्रम के लिए प्रवेश/चयन सामान्यतः एक सामान्य प्रवेश परीक्षा के आधार पर किया जाता है। सिद्ध चिकित्सा में अधिस्नातक और/या स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम चलाने वाले राजकीय तथा निजी चिकित्सा महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों तथा संस्थाओं की सूची नीचे दी गई हैं:- 

1. राजकीय सिद्ध चिकित्सा महाविद्यालय, अरुम्पक्कम, चेन्नई -600106 (बी.एस.एम.एस तथा एम.डी.सिद्ध, दोनों पाठ्यक्रम चलाता है) 
2. राजकीय सिद्ध चिकित्सा महाविद्यालय, पलायम कोट्टई 627002, तमिलनाडु (बी.एस.एम.एस एवं एम.डी सिद्ध) 
3. राष्ट्रीय सिद्ध संस्थान, तम्बरम सेनेटोरियम, चेन्नई -600047 (एम.डी.सिद्ध) 
4. तमिलनाडु डॉ.एम.जी.आर. चिकित्सा विश्वविद्यालय, 69, अन्ना सलै, ग्विन्डी, चेन्नई-600032 (एम.डी. सिद्ध) 
5. राजकीय सिद्ध चिकित्सा महाविद्यालय, पलानी-624601, डिंडगिल जिला, तमिलनाडु (बी.एस.एम.एस.) 
6. श्री साईराम सिद्ध चिकित्सा महाविद्यालय, साई लियोनगर पूंथन्डलम, पश्चिम तंबरम, चैन्नई-600044 (बी.एस. एम.एस.) 
7. आर.वी.एस.सिद्ध चिकित्सा महाविद्यालय तथा अस्पताल, कुमारम, कोट्टम, कन्नमपलायम, कोयम्बत्तूर-641402, तमिलनाडु (बी.एस.एम.एस.) 
8. ए.टी.एस.वी.एस. सिद्ध चिकित्सा महाविद्यालय, मुंचीरई, पुडुक्कइड-डाक, कन्याकुमारी जिला, तमिलनाडु-पिन-629171 (बी.एस.एम.एस) 
9. वेलु मैलु सिद्ध चिकित्सा महाविद्यालय, नं.-48, ग्रैंड वेस्ट ट्रंक रोड, श्रीपेरुम्बुदूर-602105, कांचीपुरम जिला, तमिलनाडु (बी.एस.एम.एस.) 
10. सिवराज सिद्ध चिकित्सा महाविद्यालय, सिद्धार कोविल रोड, थुंवाथुलीपट्टी, सलेम-636307, तमिलनाडु (बी. एस.एम.एस) 
11. सांथिगिरि सिद्ध चिकित्सा महाविद्यालय, सांथिगिरि डाकघर, पोथेन्कोड, तिरुवनंतपुरम-695584, केरल (बी.एस. एम.एस) 

(सूची केवल उदाहरण है) 

सिद्ध चिकित्सा प्रणाली कई तरह से अद्वितीय है, जो कई खतरनाक रोगों को ठीक कर सकती है। इसके श्रेष्ठ संभावित उपयोग के लिए इसे आम जनता में लोकप्रिय किए जाने की आवश्यकता है। मानवता को दर्दनाक रोगों से मुक्ति दिलाने के लिए अधिकाधिक सिद्ध डॉक्टरों की आवश्यकता है। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए आज अधिक से अधिक सिद्ध चिकित्सा कॉलेजों/विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थाओं की आवश्यकता है। इसलिए सुझाव है कि भारत के बड़े शहरों या नहीं तो कम से कम महानगरों में अधिकाधिक ऐसी शैक्षिक तथा अनुसंधान संस्थाएं खोली जाएं जो सिद्ध औषधि दे सकें और जो समाज को व्यापक स्तर पर रोगमुक्त रखने में योगदान देंगी।

कार्य-अवसर


सिद्ध चिकित्सा एक वैकल्पिक औषधि प्रणाली होने तथा आधुनिक औषधि की तुलना में न्यूनतम अन्य विपरीत प्रभाव (साइड इफेक्ट्स) वाली होने के कारण आज भारत तथा विदेश-दोनों में व्यापक लोकप्रियता प्राप्त कर रही है। कोई भी व्यक्ति इसे अध्यापन या अनुसंधान के क्षेत्रा में कॅरिअर के रूप में चुन सकता है। सिद्ध चिकित्सा में कॅरिअर के रूप में चुन सकता है। सिद्ध चिकित्सा में कॅरिअर चुनने वालों के लिए रोज़गार के व्यापक अवसर उपलब्ध हैं। अपनी योग्यता तथा अनुभव के आधार पर कोई भी व्यक्ति देश के विभिन्न स्थानों में स्थित विभिन्न सरकारी तथा निजी अस्पतालों, क्लीनिक्स, नर्सिंग होम्स, स्वास्थ्य विभागों, चिकित्सा महाविद्यालयों, औषधि अनुसंधान संस्थानों, भेषज उद्योगों में रोजगार प्राप्त कर सकते हैं। कोई भी व्यक्ति सिद्ध क्लीनिक खोज कर सिद्ध-फिजिशियन के रूप प्राइवेट प्रेक्टिस भी कर सकता है।