Wednesday, August 19, 2015

भूगोल तैयार करे करियर का नक्शा

भूगोल विषय की पढ़ाई करियर के बेहतरीन मौके उपलब्ध कराती है। इस विषय के अध्ययन और इसमें करियर की संभावनाओं के बारे में बता रही है नमिता सिंह
भूगोल को पृथ्वी का विज्ञान कहा जाता है। इसके अंतर्गत धरती एवं उसके आसपास पाए जाने वाले तत्वों का अध्ययन किया जाता है। सही मायने में देखा जाए तो ज्योग्राफर की भूमिका एक साइंटिस्ट की भांति होती है। पृथ्वी की संरचना तथा उसके अंदर होने वाली हलचलों, नदी-घाटी परियोजना आदि पर कार्य करने की जिम्मेदारी भी ज्योग्राफर की होती है। एक ज्योग्राफर को कई विभागों से तालमेल बिठा कर काम करना होता है। भूगोल की भी कई शाखाएं (फिजिकल ज्योग्राफी, ह्यूमन ज्योग्राफी, एंवॉयर्नमेंटल ज्योग्राफी) होती है। फिजिकल ज्योग्राफी में जहां पृथ्वी, नदी, खाली स्थानों, जलवायु आदि का अध्ययन किया जाता है, वहीं ह्यूमन ज्योग्राफी में मानव सहित राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है। इसी तरह एंवॉयर्नमेंटल ज्योग्राफी में प्रोफेशनल्स पर्यावरण और उसका मानव जीवन पर प्रभाव, मौसम और जलवायु आदि का गहनता से अध्ययन करते हैं।
बारहवीं के बाद रखें कदम
इसमें बैचलर से लेकर पीएचडी लेवल तक के कोर्स मौजूद हैं। छात्र बारहवीं के बाद अपनी किस्मत आजमा सकते हैं। बीए/बीएससी में दाखिला बारहवीं के बाद और एमएससी में दाखिला स्नातक के बाद मिलता है। इसके बाद पीएचडी की राह आसान हो जाती है। पीजी डिप्लोमा भी स्नातक के बाद किया जा सकता है। इसमें कई सर्टिफिकेट कोर्स भी हैं, जिन्हें स्नातक के बाद  किया जा सकता है। इसमें रेगुलर व पत्राचार, दोनों तरह के कोर्स मौजूद हैं।
प्रमुख कोर्स एवं अवधि
बीए/बीएससी (ज्योग्राफी) -3 वर्ष
एमएससी (ज्योग्राफी) -2 वर्ष
एमएससी (ज्योइंफॉर्मेटिक्स) -2 वर्ष
पीएचडी (ज्योग्राफी) -2 वर्ष
पीएचडी (ज्योमैग्नेटिज्म) -2 वर्ष
पीजी सर्टिफिकेट कोर्स इन ज्योइंफॉर्मेटिक्स
एंड रिमोट सेंसिंग  -छह माह
पीजी डिप्लोमा इन ज्योग्राफिकल काटरेग्राफी -एक वर्ष
आवश्यक स्किल्स
इसमें कोर्स के अलावा कई तरह के गुण प्रोफेशनल्स को कदम-कदम पर मदद पहुंचाते हैं। मसलन, कम्प्यूटर का ज्ञान, लॉजिकल व एनालिटिकल थिंकिंग, अच्छी कम्युनिकेशन स्किल, शारीरिक रूप से फिट, आंकड़ों व समस्याओं को सुलझाने का कौशल, आकलन का गुण आदि हमेशा काम आते हैं।
रोजगार की संभावनाएं
सफलतापूर्वक कोर्स करने के बाद इस क्षेत्र में रोजगार की कोई कमी सामने नहीं आती। सेटेलाइट टेक्नोलॉजी और ज्योग्राफिकल इंफॉर्मेशन सिस्टम (जीआईएस) के प्रयोग में बढ़ोतरी के चलते संबंधित कोर्स और प्रोफेशनल्स की डिमांड भी बढ़ी है। इसमें सरकारी व प्राइवेट, दोनों क्षेत्रों में काम की प्रचुरता है। इसके अलावा एनजीओ, ज्योग्राफिकल सर्वे ऑफ इंडिया, मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट, रिसर्च इंस्टीटय़ूट, स्कूल-कॉलेज, मैप पब्लिशर व ट्रेवल एजेंसियां अपने यहां योग्य लोगों को जॉब देती हैं। प्रोफेशनल्स चाहें तो फ्रीलांसर व कंसल्टेंट के अलावा विदेश जाकर अपनी क्षमता आजमा सकते हैं।
इस रूप में मिलेगा अवसर
कार्टोग्राफर- इनका काम नक्शा, चार्ट, ग्लोब और मॉडल तैयार करना होता है। ज्यादातर कार्टोग्राफर न्यूज मीडिया, बुक पब्लिशिंग हाउस, सरकारी एजेंसियों में काम पाते हैं।
सर्वेयर- इस रूप में प्रोफेशनल्स गणितीय गणनाओं और फील्ड वर्क के आधार पर पृथ्वी की सतह का नक्शा लेते हैं। इनकी नियुक्ति सर्वे ऑफ इंडिया, स्टेट सर्वे डिपार्टमेंट या अन्य प्राइवेट संस्थानों में होती है।
ड्राफ्टर- इनका काम इंजीनियर व आर्किटेक्चर के साथ-साथ आगे बढ़ता है, खासकर प्लानिंग, हाउसिंग एवं डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के दौरान स्थान एवं उसकी उपयोगिता तय करने में।
गवर्नमेंट एम्प्लॉयर- केंद्रीय एजेंसियां ज्यादातर ज्योग्राफर को मैपिंग, इंटेलीजेंस वर्क, रिमोट सेंसिंग के रूप में रोजगार देती हैं, जबकि राज्य स्तरीय व स्थानीय एजेंसियां प्रोफेशनल्स को प्लानिंग एवं डेवलपमेंट कमीशन में काम देती हैं।
अर्बन/रीजनल प्लानर- शहरी क्षेत्रों की भूमि पर बसावट व नई कॉलोनियां विकसित करने के अलावा ग्रामीण इलाकों में गैस प्लांट लगाने या अन्य सर्वे से संबंधित काम इन्हीं के जिम्मे होता है। वे प्रॉपर्टी मालिक, डेवलपर के साथ मिलकर काम करते हैं।
जीआईएस स्पेशलिस्ट- स्थानीय सरकार, देश की प्रमुख एजेंसियों व अन्य सरकारी एजेंसियों सहित प्राइवेट एजेंसियों को जीआईएस स्पेशलिस्ट की जरूरत पड़ती है।
क्लाइमैटोलॉजिस्ट- नेशनल वेदर सर्विस, न्यूज मीडिया, वेदर चैनल व अन्य मौसम से संबंधित एजेंसियों को क्लाइमैटोलॉजिस्ट की जरूरत पड़ती है। मटीरियोलॉजी व क्लाइमैटोलॉजी का गहरा ज्ञान रखने वाले प्रोफेशनल्स इसमें काफी सफल रहते हैं।
ट्रांसपोर्टेशन मैनेजर- शिपिंग व स्थानीय ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी, लॉजिस्टिक व ट्रांसपोर्टेशन कंपनियों को इनकी जरूरत पड़ती है। इसके लिए भूगोल का बैकग्राउंड होना जरूरी है।
एन्वायर्नमेंटल मैनेजर- वातावरण का प्रभाव, वायुमंडल को स्वच्छ बनाने, रिपोर्ट देने और मौसम विभाग से जुड़ी जानकारियों के लिए कंपनियां इन्हें अपने यहां काम देती हैं। आने वाले समय में इसमें रोजगार की व्यापक संभावनाएं नजर आ रही हैं।
साइंस राइटर- विषय का अच्छा ज्ञान रखने और लिखने के शौकीन लोगों को न्यूजपेपर, मैगजीन, टीवी चैनल में कदम-कदम पर अवसर मौजूद हैं। चाहें तो फ्रीलांसर राइटर के रूप में भी काम कर सकते हैं।
रिसर्चर/टीचिंग- कई सरकारी व प्राइवेट एजेंसियां व संस्थान हैं, जो भौगोलिक व मौसम संबंधित सर्वे करवाते रहते हैं। इसमें रिसर्चर की मांग होती है। इसके अलावा स्कूल-कॉलेजों में टीचिंग के रूप में अवसर मौजूद हैं।
मिलने वाली सेलरी
भूगोल में विभिन्न क्षेत्रों में देश-विदेश में काम मिलता है। काम, अनुभव व संस्थान के हिसाब से उन्हें आकर्षक सेलरी भी दी जाती है। सरकारी एजेंसियों की तुलना में प्राइवेट संस्थान प्रोफेशनल्स को ज्यादा मोटा वेतन देते हैं। इसमें प्रोफेशनल्स को शुरुआती चरण में 15-20 हजार रुपए प्रतिमाह की सेलरी मिलती है जबकि दो-तीन साल के अनुभव के बाद यही सेलरी बढ़ कर 30-35 हजार हो जाती है। जबकि उच्च पदों पर बैठे प्रोफेशनल्स को 1,20,000 रुपए प्रतिमाह का पैकेज मिल रहा है। कंसल्टेंट और फ्रीलांसर के रूप में काम करने पर उनकी विद्वता के हिसाब से भुगतान होता है।
एक्सपर्ट व्यू
मानचित्र को भलीभांति समझें छात्र
भूगोल सभी विषयों की जननी कहलाता है। इसका सीधा संबंध मानव जीवन से है। सही मायने में देखा जाए तो पंचतत्व ही भूगोल है। इसके जरिए कई तरह के मौलिक ज्ञान का समावेश होता है। पिछले दो दशक से भूगोल के क्षेत्र में नई क्रांति आई है। जीपीएस, जीआईएस, रिमोट सेंसिंग, सेटेलाइट आदि कई क्षेत्रों में तकनीकी दखल के चलते भूगोल का महत्व और भी बढ़ गया है। ग्लोबल वार्मिंग, क्लाइमेट चेंज और जैव विविधता के अध्ययन में भूगोल ने खासा योगदान दिया है। आपको हर साल बड़ी संख्या में ऐसे छात्र मिलेंगे, जिन्होंने सिविल सेवा की परीक्षा में भूगोल के जरिए सफलता हासिल की है। सड़क निर्माण, सरकारी व प्राइवेट विभागों के अलावा आर्मी में भूगोल का ज्ञान काम आता है। आज देखा जाए तो ग्लोबल वार्मिंग को लेकर हर देश चिंतित है। पीएचडी व स्कॉलरशिप के रूप में हर देश अपने यहां मोटी रकम खर्च कर रहा है तथा बाहरी छात्रों को मौका दे रहा है। भारत के साथ एक सुखद बात यह है कि यहां के जानकारों की रिमोट सेंसिंग व जीआईएस पर अच्छी पकड़ है, जिससे अधिक संख्या में छात्रों को विदेश में मौका मिल रहा है। छात्रों को यह बात गांठ बांध लेनी होगी कि भूगोल पर तभी अच्छी पकड़ बन सकती है, जब वे मानचित्र का गहराई से अध्ययन करें।
डॉं. बिन्ध्य वासिनी पाण्डेय, एसोसिएट प्रोफेसर भूगोल विभाग, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स
प्रमुख संस्थान
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़
वेबसाइट
- www.amu.ac.in
बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी, वाराणसी
वेबसाइट-
  www.bhu.ac.in
एमिटी यूनिवर्सिटी, नोएडा
वेबसाइट-
  www.amity.edu
बिरला इंस्टीटय़ूट ऑफ टेक्नोलॉजी, रांची
वेबसाइट
- www.bitmesra.ac.in
इंस्टीटय़ूट ऑफ ज्यो-इंफॉर्मेटिक्स एंड रिमोट सेंसिंग,कोलकाता
वेबसाइट-
www.igrs-gis.com
जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली
वेबसाइट
- www.jmi.ac.in
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
वेबसाइट
- www.du.ac.in
फायदे एवं नुकसान

स्पीच पैथोलॉजी व ऑडियोलॉजी की बढ़ती डिमांड

स्पीच पैथोलॉजिस्ट एवं ऑडियोलॉजिस्ट बोलने या सुनने की समस्या से ग्रस्त बच्चों या बड़ों में समस्या के स्तर की पहचान कर उसकी रोकथाम व उसे सामान्य बनाने का प्रयास करते हैं। ऑडियोलॉजिस्ट हर उम्र के व्यक्तियों की जाँच कर श्रवण शक्ति में कमी, ऑडिटरी, बैलेंस, सेंसर वेन्यूरल समस्याओं का आकलन करते हैं। ये कंप्यूटर, ऑडियोमीटर, और दूसरे उपकरणों की मरीज को सही उपचार देने की कोशिश करते हैं।

स्पीच लैंग्वेज पैथोलॉजिस्ट्स को स्पीच डिसऑर्डर, स्पीच रिद्म, बोलने में मुश्किल या बोलते हुए लफ्जों को छोड़ देने की समस्या पर ध्यान देना होता है। इनके काम में समस्या को समझना, उपचार निवारण शामिल है।

ये मरीज और उसके परिवार के सदस्यों को इस तरह की स्थिति से सामंजस्य बैठाना सिखाते हैं। इन मरीजों को डील करना विशेषज्ञों के अलावा परिवार के लोगों को भी आना चाहिए जिससे मरीज को सही माहौल मिले और वह बेहतर अवस्था की तरफ विकास करे।

स्पीच-लैंग्वेज पैथोलॉजी एवं ऑडियोलॉजी दो जुदा क्षेत्र हैं लेकिन एक दूसरेमें इतने गुंथे हुए हैं कि एक में दक्ष होने के लिए आपको दूसरे की जानकारी होनी आवश्यक है। ये दोनों ही स्पीच, भाषा और श्रवण शक्ति से जुड़े हैं। इनका लक्ष्य उपरोक्त समस्याओं से पीड़ित व्यक्ति को अलग-अलग तरह के सामाजिक हालात में अपनी बात कहने, समझने या समझा पाने के काबिल बनाना है।

स्पीच पैथोलॉजी एवं ऑडियोलॉजी स्वास्थ्य से जुड़ा करियर है जिसमें काम करने वाले पेशेवरों को खास प्रशिक्षण और शिक्षा प्रदान की जाती है ताकि ये लोग स्वास्थ्य क्षेत्र में सेवा तथा उपचार दे सकें। इस क्षेत्र में कार्यरत लोगों को स्पीच पैथोलॉजिस्ट कहते हैं। इस कार्य में संवेदनशीलता की आवश्यकता है।

पेशेवरों को पीड़ित व्यक्ति की समस्या समझकर उसकी मदद करनी होती है। संभव है कि किसी मरीज का सुधार धीमा हो, ऐसे में आपको धैर्य की आदत डालनी होती है। उसकी प्रोग्रेस का रिकॉर्ड रखना और उसका समय-समय पर अवलोकन करना भी आपको आना चाहिए। इन मरीजों को अपने विशेषज्ञ, परिजन व रिश्तेदारों सभी से सहानुभूति व मदद की दरकार होती है अतः इस क्षेत्र से जुड़े पेशेवरों को इसका खास ध्यान रखना चाहिए।

ऑडियोलॉजिक उपचार में मरीज का परीक्षण, ईयर कैनाल की सफाई, सुनने के उपकरण लगाना, हटाना, कॉकलियर इंप्लांट आदि शामिल हैं। इसका पूरा रिकॉर्ड ऑडियोलॉजिस्ट रखते हैं। ज्यादातर बच्चे, बूढ़े या बोलने-सुनने में कमजोर लोगों को ही विशेष उपचार की आवश्यकता होती है।
जॉब राडार
ऑडियोलॉजिस्ट गवर्नमेंट और प्राइवेट हॉस्पिटल्स, चाइल्ड डेपलपमेंट सेंटर्स, प्री स्कूल, काउंसिलिंग सेंटर्स, फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर्स, एनजीओ के अलावा ऑडियोलॉजी एंड स्पीच थेरेपी से रिलेटेड कोर्स करने के बाद खुद का क्लीनिक भी खोल सकते हैं। ऑडियोलॉजिस्ट की सैलरी 15 हजार से शुरू होती है, जो एक्सपीरियंस के साथ बढती जाती है। अगर इसके स्पेशलिस्ट के रूप में आपको विदेश में काम करने का चांस मिल जाता है, तो सैलरी इंडिया की तुलना में कई गुना तक बढ जाती है।
मेन इंस्टीट्यूट्स
-ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, नई दिल्ली
-आईपी यूनिवíसटी, दिल्ली
-अली यावरजंग नेशनल इंस्टीट्यूट फार द हियरिंग हैंडिकैप्ड, बांद्रा, मुंबई
-ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ स्पीच एंड हियरिंग, मैसूर यूनिवíसटी, बैंगलुरु
-पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ
-जे एम इंस्टीट्यूट ऑफ स्पीच एंड हियरिंग, इंद्रपुरी, केशरीनगर, पटना
-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एजुकेशन, पटना
-इंस्टीट्यूट ऑफ स्पीच एंड हियरिंग, बैंगलुरु
-उस्मानिया यूनिवíसटी, हैदराबाद

Monday, August 17, 2015

विदेशी भाषा में करियर

लोग भले ही डॉक्टर, इंजीनियर या मैनेजमेंट के क्षेत्र में करियर को प्राथमिकता देते हों, पर विदेशी भाषा में करियर भी किसी से कमतर नहीं है। कैसे, बता रही हैं प्रियंका कुमारी
कुछ समय पहले एक कार कंपनी ने अनुवादक और दुभाषिये के रूप में काम करने के लिए विभिन्न विदेशी भाषाओं जैसे स्पैनिश, जर्मन, फ्रेंच और चाइनीज के जानकार युवाओं की तलाश में विज्ञापन निकाला। युवाओं के लिए यहां अच्छा पैकेज और काम करने का बेहतर अवसर मुहैया कराया जा रहा था। कार कंपनियां ही नहीं, राष्ट्र्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय कंपनियां, ट्रेवल कंपनियां, पांच सितारा होटल और आईटी इंडस्ट्री भी विदेशी भाषा के अच्छे जानकारों की खोज में है। बाजार जिस हिसाब से ऐसे युवाओं की खोज में है, उतनी संख्या में लोग उपलब्ध नहीं हैं।

बात सिर्फ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की कंपनियों और संस्थानों की ही नहीं है, शिक्षण संस्थानों की भी है। एमबीए और बीबीए की पढ़ाई कराने वाले संस्थान और निजी स्कूलों में इन दिनों कोई एक विदेशी भाषा सिखाने का प्रचलन जोरों पर है। इनमें फ्रेंच, स्पैनिश, इटेलियन, जर्मन, रशियन, चाइनीज, जैपनीज और कोरियन भाषाएं प्रमुख हैं। इनमें शिक्षकों की अच्छी-खासी मांग है। देश के करीब 70 विश्वविद्यालय ऐसे हैं, जहां विदेशी भाषा की पढ़ाई होती है और इससे जुड़े कोर्स कराए जाते हैं। सूचना तकनीक या आईटी के केन्द्र बेंग्लुरू, हैदराबाद और गुड़गांव जैसे शहरों में विदेशी भाषा के जानकार युवाओं को काम के कई अवसर मिल रहे हैं। छात्रों को कहीं अनुवादक तो कहीं दुभाषिये के रूप में काम दिया जा रहा है। भारत स्थित दूतावासों में भी विदेशी भाषा के विशेषज्ञों की जरूरत पड़ रही है।
देश में पर्यटन उद्योग का तेजी से विस्तार हो रहा है। हर साल लाखों की संख्या में आने वाले विदेशी सैलानियों के लिए टूरिस्ट गाइड या टूर ऑपरेटरों की जरूरत पड़ रही है। गाइड के लिए विदेशी भाषा की जानकारी होना एक योग्यता बन गई है। मेडिकल टूरिज्म के तहत खाड़ी देशों के निवासी हर साल यहां निजी अस्पतालों में अपना इलाज कराने आ रहे हैं। इन्हें उचित तरीके से मार्गदर्शन के लिए विदेशी भाषा के विशेषज्ञों की खोज हो रही है। वैश्वीकरण के दौर में अनुवाद और पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी ऐसे लोगों को निजी व्यवसाय के रूप में काम करने का मौका दे रहा है। विदेशी भाषा के जानकार विदेशी मीडिया में भारत से ही रिपोर्टिंग का काम संभाल रहे हैं। कॉल सेंटर हो या विदेशी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विदेशी भाषा के जानकार व्यक्ति को अपने ही देश में काम मिल रहा है। 
क्षमता व योग्यता संबंधित विदेशी भाषा पर पकड़ होनी चाहिए। बेहतर संवाद क्षमता इस क्षेत्र में कामयाबी के कई रास्ते दिखाती है। अगर आप अनुवादक बनना चाहते हैं तो विदेशी भाषा के साथ-साथ अंग्रेजी या हिन्दी पर भी पकड़ होनी चाहिए। जिस विदेशी भाषा को सीख रहे हैं, उसका व्याकरण, वाक्य संरचना और उससे जुड़ी संस्कृति व इतिहास की भी जानकारी होनी चाहिए। व्यक्तित्व भी आकर्षक होना चाहिए। पर्यटन के क्षेत्र में जाना है या आतिथ्य सत्कार या विदेशी प्रतिनिधियों के साथ भ्रमण पर जाना है तो आपका मिलनसार होना भी जरूरी है।  इसके अतिरिक्त छात्र के पास स्नातक या परास्नातक डिग्री या फिर संबंधित विदेशी भाषा में सर्टिफिकेट, डिप्लोमा या डिग्री होनी भी जरूरी है।

वेतनमान
अनुवादक बनने पर शुरुआती वेतनमान 30-40 हजार रुपये है। यह आगे चल कर वरिष्ठता और अनुभव के क्रम से बढ़ता जाता है। दुभाषिये का वेतनमान 40 से 50 हजार रुपये प्रतिमाह है। निजी एजेंसियों में भी नौकरी करने पर शुरुआती वेतनमान 40 हजार से 50 हजार रुपये है। दुभाषिये का वेतनमान 50 हजार रुपये से लेकर एक लाख रुपये और इससे भी ऊपर जाता है। विदेशी कंपनियों के साथ काम करने पर लोगों को प्रतिमाह लाखों रुपये मिलते हैं। निजी व्यवसाय के रूप में साहित्य या अन्य अध्ययन सामग्री का अनुवाद करने पर प्रतिमाह  घर बैठे लाख से दो लाख रुपये कमाए जा सकते हैं। विदेशी भाषा शिक्षक का स्कूल में 30 हजार और कॉलेज में शुरुआती वेतनमान 40 हजार रुपये है।
एक्सपर्ट व्यू
प्रो. विभा मौर्य
जर्मनिक एंड रोमंस स्टडीज, दिविवि
देश में निजी स्कूल और विश्वविद्यालय तेजी से बढ़ रहे हैं। इन स्कूलों में छात्रों को एक पेपर के रूप में विदेशी भाषा का ज्ञान दिया जा रहा है। मैनेजमेंट संस्थान भी मैनेजरों को एक विदेशी भाषा सिखा रहे हैं। देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने व्यवसाय का विस्तार किया है। इनके प्रतिनिधियों से बातचीत और दूसरी भाषाओं के बीच संपर्क के काम के लिए विदेशी भाषा के जानकारों को रखा जा रहा है। करियर के लिहाज से स्पेनिश, चाइनीज, कोरियन, जैपनीज, जर्मन और फ्रेंच भाषाओं के जानकारों को कई अवसर मिल रहे हैं। रशियन, अरेबिक और इटेलियन भाषा भी करियर के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
मेरा मानना है कि इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए डिग्री के साथ-साथ संवाद की बेहतर क्षमता का होना जरूरी है। इसके लिए पहले छात्रों के लिए भाषा और संस्कृति का ज्ञान आवश्यक है। जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कंपनियों के व्यवसाय का विस्तार होगा, विदेशी भाषा के जानकारों की मांग बढ़ेगी। आज तकनीकी और  फार्मास्यूटिकल कंपनियां हों या कार कंपनियां, सभी जगह विदेशी भाषा के विशेषज्ञों की जरूरत पड़ रही है।
प्रमुख संस्थान
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली
पांडिचेरी विश्वविद्यालय, पांडिचेरी
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, दिल्ली
अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद
अलीगढ़ विश्वविद्यालय, अलीगढ़ 
कोर्स- संस्कृत, उर्दू, अरबी, परशियन भाषा में डिप्लोमा और डिग्री 

एलियांस फ्रेंचाइस, नई दिल्ली
कोर्स- फ्रेंच भाषा और फ्रेंच कल्चर में डिप्लोमा और डिग्र

बाबा साहेब अंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद
कोर्स- डिप्लोमा इन चाइनी

पंजाब विश्वविद्यालय, पटियाला 
कोर्स- डिप्लोमा एंड सर्टिफिकेट इन चाइनी

उत्कल विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर
कोर्स- डिप्लोमा इन चाइनी

जापानीस कल्चर एंड इंफार्मेशन सेंटर
एम्बेसी ऑफ जापान, नई दिल्ली
कोर्स- डिप्लोमा इन जापानी

दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली 
सर्टिफिकेट इन चाइनीस एंड जापानीस स्टडी

विश्वविद्यालय/कॉलेज
संचालित पाठ्यक्रम
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय पंचटीला, वर्धा (महाराष्ट्र)
एम.ए., एम.फिल, पीएचडी (भाषा प्रौद्योगिकी
हिंदी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय हैदराबाद-46
हिंदी भाषा में एम.ए., एम.फिल और पीएचडी. कार्यात्मक हिंदी, हिंदी अनुवाद में स्नाकोत्तर डिप्लोमा।
उच्चतर शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, विश्वविद्यालय स्कंध, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, टी.नगर, चेन्नई-17 (तमिलनाडु)
हिंदी साहित्य और भाषा में एम.ए., एम.फिल और पीएचडी, हिंदी अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा, हिंदी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
हिंदी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर प्रमाण पत्र
पुणे विश्वविद्यालय, पुणे (महाराष्ट्र)
कार्यात्मक हिंदी में एम.ए.
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी-05 (उ.प्र.)
कार्यात्मक हिंदी में एम.ए. (पत्रकारिता)
अविनाशलिंगम डीम्ड यूनिवर्सिटी फॉर वूमैन, कोयम्बटूर (तमिलनाडु)
कार्यात्मक हिंदी में एम.ए.
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल (म.प्र.)
हिंदी पत्रकारिता में एम.ए.
आंध्र विश्वविद्यालय, विशाकापत्तनम (आ.प्र.)
हिंदी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा अनुवाद (हिंदी) में स्नातकोत्तर डिप्लोमा।
चौ चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ (उ.प्र.)
कार्यात्मक हिंदी में एम.ए.
दूरस्थ शिक्षण संस्थान, केरल विश्वविद्यालय, त्रिवेंद्रम-695581 (केरल)
कार्यात्मक हिंदी में स्नातकोत्तर डिप्लोमा
दूरस्थ शिक्षा, बंगलौर यूनिवर्सिटी, सेंट्रल कॉलेज कैम्पस, अम्बेडकर विथि, बंगलौर (कर्नाटक)
अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा हिन्दी)
एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय, मुंबई
अनुवाद (हिंदी) में स्नातकोत्तर डिप्लोमा।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ (उ.प्र.)
अनुवाद (हिंदी) में स्नातकोत्तर डिप्लोमा
इग्नू, नई दिल्ली
अनुवाद (हिंदी) में स्नातकोत्तर डिप्लोमा हिंदी में सृजनात्मक लेखन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा।

Friday, August 14, 2015

टीचिंग: पढें पढ़ाएं करियर बनाएं


शिक्षा और शिक्षक का संबंध बहुत गहरा है। किसी भी विद्यार्थी के भविष्य की रूपरेखा तैयार करने की जिम्मेदारी शिक्षक के ऊपर होती है। यहीं से बात शुरू होती है टीचिंग अथवा अध्यापन की। टीचिंग के प्रोफेशन को प्रारम्भ से ही सम्मानजनक पेशे के रूप में देखा जाता है। आज शिक्षकों का दायित्व कई लिहाज से पहले से अलग नजर आता है। बदलते सामाजिक, आर्थिक समीकरणों और व्यापक होती सोच के बीच शिक्षकों की भूमिका भी व्यापक हुई है।
आंकड़ों की नजर में बाजार
भारत में शिक्षा का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। इंडियन एजुकेशन इनवेस्टमेंट रिपोर्ट 2013 के अनुसार साल दर साल यह बाजार 15 फीसदी की दर से ग्रोथ कर रहा है। भारत में प्री-स्कूल का बाजार 4,500 करोड़ के आसपास है, जबकि 2015-16 के करीब इसके 13,300 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। वोकेशनल ट्रेनिंग का बाजार भी 12-17 फीसदी की दर से आगे बढ़ रहा है। डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रमोशन (डीआईपीपी) के अप्रैल 2000-मार्च 2013 तक के आंकडमें के अनुसार देश में शिक्षा क्षेत्र करीब 3,332.97 करोड़ एफडीआई को अपनी ओर आकर्षित कर चुका है। शिक्षा के बाजार के सरपट दौड़ने का एक प्रमुख कारण यह भी है। कई ऐसी प्राइवेट व मल्टीनेशनल कंपनियां हैं, जो प्री-स्कूल, प्राइवेट कोचिंग, टय़ूटरिंग, टीचर ट्रेनिंग, ई-लर्निंग व आईटी ट्रेनिंग में इनवेस्टमेंट कर रही हैं। यहां के नामी-गिरामी संस्थान भी विदेशी विवि. अथवा संस्थानों से हाथ मिला कर काम कर रहे हैं। इससे देश में नई तकनीक, विदेशी निवेश व उच्च कोटि के शैक्षणिक स्तर का सूत्रपात हो रहा है।
कई तरह के पाठय़क्रम मौजूद
टीचिंग के क्षेत्र में कई ऐसे पाठय़क्रम हैं, जिनके पश्चात शिक्षक बनने का सपना पूरा हो पाता है। ये पाठय़क्रम स्नातक व परास्नातक, दोनों ही स्तरों पर संचालित किए जाते हैं। कुछ निम्न हैं-
बीएड (बैचलर ऑफ एजुकेशन)
दो वर्षीय इस पाठय़क्रम में प्रवेश स्नातक (50 प्रतिशत) व प्रवेश परीक्षा के आधार पर मिलता है। उप्र में राज्यस्तरीय संयुक्त प्रवेश परीक्षा के अलावा कई संस्थान जैसे इग्नू, काशी विद्यापीठ आदि भी स्वतंत्र रूप से बीएड का पाठय़क्रम संचालित कराते हैं और इसके लिए प्रवेश परीक्षा आयोजित करते हैं। ये परीक्षाएं हर साल आयोजित की जाती हैं। इसके पाठय़क्रमों में शिक्षा मनोविज्ञान, दर्शन शास्त्र, भारतीय शिक्षा का इतिहास, शिक्षण साधन व पर्यावरण आदि को शामिल किया जाता है। कोर्स के पश्चात् 15-30 दिन की ट्रेनिंग भी दी जाती है। सफलतापूर्वक कोर्स करने के पश्चात प्राथमिक, उच्च प्राथमिक व परिषदीय विद्यालयों में अध्यापन का मौका मिलता है।
बीटीसी (बेसिक ट्रेनिंग सर्टिफिकेट)
बीटीसी दो वर्षीय डिप्लोमा पाठय़क्रम होता है। यह प्राथमिक व उच्च प्राथमिक तक के बच्चों के अध्यापन के लिए होता है। इस पाठय़क्रम में तभी प्रवेश मिल पाता है, जब प्रवेश परीक्षा में सफलता हासिल की जाए। इसके लिए जिले स्तर पर काउंसिलिंग कराई जाती है। उसी के आधार पर प्रवेश दे दिया जाता है। इसके लिए छात्र का स्नातक 50 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण होना अनिवार्य है। इसमें छात्र की आयु 18-30 वर्ष के बीच होनी चाहिए। इस पाठय़क्रम में केवल उप्र के अभ्यर्थी भाग ले सकते हैं। इसमें कला व विज्ञान वर्ग को अलग-अलग वर्ग में रखा गया है।
डीपीएड (डिप्लोमा इन फिजिकल एजुकेशन)
विगत कुछ वर्षों से देश में शारीरिक व खेल प्रशिक्षकों की मांग को देखते हुए ‘फिजिकल एजुकेशन’ को एक पाठय़क्रम का रूप दे दिया गया है। इन्हीं में से एक डीपीएड भी है। यह दो वर्षीय पाठय़क्रम है। इसमें प्रवेश 10+2 में 50 प्रतिशत अंकों के आधार पर मिलता है। इसमें परीक्षा सेमेस्टर में न होकर एनुअल सिस्टम के रूप में होती है। इसके पाठय़क्रमों के अंतर्गत छात्रों को शारीरिक संरचना, समस्या एवं निवारण आदि का ज्ञान कराया जाता है। साथ ही उन्हें इनडोर, आउटडोर, योग आदि की प्रैक्िटस कराई जाती है। इसके बिना शारीरिक शिक्षा को पूरा नहीं माना जाता। पाठय़क्रम की समाप्ति पर विभिन्न स्कूलों में गेम टीचर के रूप में नियुक्ित मिलती है।
बीपीएड (बैचलर इन फिजिकल एजुकेशन)
इसका पाठय़क्रम भी काफी कुछ डीपीएड से मिलता-जुलता है। फिजिकल एजुकेशन में किस्मत आजमाने के लिए बैचलर इन फिजिकल एजुकेशन कोर्स किया जा सकता है। कोर्स दो तरह से होते हैं। पहला, स्नातक छात्र, जिन्होंने स्नातक में फिजिकल एजुकेशन एक विषय के रूप में लिया हो, वे एक वर्षीय बीपीएड कोर्स कर सकते हैं। दूसरा बारहवीं के छात्र, जिन्होंने बारहवीं में फिजिकल एजुकेशन को एक विषय के रूप में लिया हो, वे तीन वर्षीय स्नातक कोर्स कर सकते हैं। इसके बलबूते सरकारी अथवा प्राइवेट स्कूलों में ट्रेनिंग टीचर की नौकरी आसानी से मिल जाती है। इस पाठय़क्रम में दाखिले के लिए छात्र को कई चरणों से होकर गुजरना पड़ता है, जिसमें प्रमुख रूप से लिखित परीक्षा, फिजिकल फिटनेस टैस्ट, खेल क्षमता परीक्षा और अंत में इंटरव्यू का सामना करना पड़ता है।
एनटीटी (नर्सरी टीचर ट्रेनिंग)
यह पाठय़क्रम दो वर्षीय होता है। इसमें प्रवेश का स्वरूप अलग-अलग होता है। कुछ संस्थान बारहवीं के अंकों के आधार पर तो कुछ प्रवेश परीक्षा के आधार पर प्रवेश देते हैं। इसकी प्रवेश परीक्षा में करंट अफेयर्स, जनरल स्टडी, हिन्दी, टीचिंग एप्टीटय़ूड, अंग्रेजी, रीजिनग आदि से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं। वैसे तो यह पद्धति सभी राज्यों के लिए है, लेकिन दिल्ली जैसे महानगरों में यह तेजी से प्रचलन में है। अन्य राज्यों में भी इसका विस्तार हो रहा है। कोर्स के पश्चात नगर निगम अथवा प्रमुख नर्सरी स्कूलों में प्रवेश मिल सकता है।
ये परीक्षाएं बनेंगी आधार
प्रमुख पाठय़क्रमों में सफल होने के अलावा आजकल कई ऐसी अहर्ता परीक्षाएं आयोजित की जा रही हैं, जिन्हें भी पास करना अनिवार्य है। तभी आवेदन के हकदार हो सकेंगे। सीटीईटी (सेंट्रल टीचर एलिजिबिलिटी टैस्ट) केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय, तिब्बती स्कूलों व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के अधीन आने वाले विद्यालयों में टीचर बनने के लिए सीबीएसई द्वारा आयोजित केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा (सीटीईटी) में उत्तीर्ण हों। यह परीक्षा क्वालिफाइंग नेचर की होती है। इसमें उम्मीदवार को 60 प्रतिशत अंक लाना अनिवार्य है। इसमें वही छात्र बैठ सकते हैं, जिन्होंने स्नातक की परीक्षा 50 फीसदी अंकों के साथ पास कर ली हो। इसके अलावा बीएड की भी डिग्री होनी जरूरी है। सीटीईटी केवल केंद्रीय विद्यालयों अथवा सीबीएसई से संबंधित स्कूलों के लिए है। राज्यों में यह सर्टिफिकेट मान्य नहीं होगा। साथ ही परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मिलने वाला सर्टिफिकेट भी सात साल के लिए वैध होगा।
टीईटी (टीचर एलिजिबिलिटी टैस्ट)
उत्तर प्रदेश सहित कई प्रमुख राज्यों में अब टीचर बनने के लिए बीएड के साथ-साथ टीचर एलिजिबिलिटी टैस्ट (टीईटी) पास करना जरूरी है। हाईकोर्ट के हालिया आदेश में भी यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो गई है। परीक्षा पास करने के बाद छात्रों को एक सर्टिफिकेट प्रदान कि या जाएगा। यह सर्टिफिकेट पांच साल के लिए मान्य होगा। इसमें छात्र एक परीक्षा या दोनों परीक्षाओं में सम्मिलित हो सकते हैं। इसमें बैठने के लिए स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण होने के अलावा बीएड पास होना जरूरी है। ऐसे भी छात्र परीक्षा में बैठ सकते हैं, जिन्होंने बीएड की परीक्षा दे दी हो, लेकिन उसका रिजल्ट अभी न आया हो।
टीजीटी व पीजीटी
ये परीक्षाएं राज्य स्तर पर आयोजित की जाती हैं। उप्र व दिल्ली में इनके प्रति छात्र अधिक आकर्षित होते हैं। टीजीटी के लिए जहां संबंधित विषय में स्नातक और बीएड अनिवार्य है, वहीं पीजीटी के लिए संबंधित विषय में परास्नातक और बीएड आवश्यक है। इसमें स्ट्रीम की कोई बाध्यता नहीं है। टीजीटी में छठी से लेकर दसवीं तक के बच्चों को पढ़ाया जाता है, जबकि पीजीटी में सेकेंडरी व सीनियर सेकेंडरी कक्षाओं के बच्चों को।
यूजीसी नेट (राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा)
देश में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कई अनूठे प्रयोग किए गए हैं। इन्हीं में से एक राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) एग्जाम भी है। साल भर में दो बार होने वाली इस परीक्षा का आयोजन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा किया जाता है। इसमें सफल होने के बाद जूनियर रिसर्च फैलोशिप (जेआरएफ) अथवा भारत के किसी विश्वविद्यालय अथवा संबद्ध महाविद्यालय में लेक्चरर बनने का सपना पूरा हो सकता है। इसके अंतर्गत कुल तीन पेपर होते हैं, जिन्हें दो सत्रों में सम्पन्न कराया जाता है। तीनों पेपरों का माध्यम हिन्दी व अंग्रेजी, दोनों हैं। उम्मीदवार अपनी इच्छानुसार कोई भी माध्यम चुन सकते हैं। पहला पेपर जनरल नेचर, दूसरा पेपर चुने गए विषय तथा तीसरा पेपर भी चुने गए विषय से ही संबंधित होता है। सभी पेपरों के प्रश्न बहुविकल्पीय होते हैं। प्रत्येक प्रश्न के लिए दो अंक दिए जाते हैं, जबकि दूसरे व तीसरे पेपर के सभी प्रश्न अनिवार्य होते हैं।
रोजगार के अवसर
इस क्षेत्र में जॉब की अधिकता के साथ प्रतिस्पर्धा भी खूब है। कोर्स एवं अहर्ता परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयों सहित सेकेंडरी व सीनियर सेकेंडरी स्कूलों में सहायक अध्यापक, लेक्चरर, प्रवक्ता, शिक्षा मित्र व अनुदेशक बना जा सकता है। प्राइवेट संस्थान अथवा कोचिंग सेंटर भी योग्य लोगों को टीचिंग का मौका देते हैं। पीएचडी के बाद शोध का अवसर मिलता है।
वेतनमान
शुरुआती दौर में एक शिक्षक के रूप में 25-30 हजार प्रतिमाह की सेलरी आसानी से मिल जाती है। अनुभव बढम्ने के साथ सेलरी में भी इजाफा होता है। समय-समय पर प्रमोशन भी मिलता है। 4-5 साल के अनुभव के बाद सेलरी 40-50 हजार के करीब मिलती है। उच्च शिक्षण संस्थानों में सेलरी काफी आकर्षक होती है।
फैक्ट फाइल
प्रमुख संस्थान

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू), नई दिल्ली
वेबसाइट
www.ignou.ac.in
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
वेबसाइट
- www.du.ac.in
जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली
वेबसाइट-
www.jmi.ac.in
बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी (बीएचयू), वाराणसी
वेबसाइट
- www.bhu.ac.in

Thursday, August 13, 2015

ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग रफ्तार का करियर

अर्थव्यवस्था की रफ्तार का पता इससे भी चलता है कि कौन-कौन से वाहन किस संख्या में सड़कों पर फिलवक्त दौड़ रहे हैं। इस सेक्टर को चलाने व आगे ले जाने वाले लोगों में ऑटोमोबाइल इंजीनियर्स भी हैं, जो डिजाइन, कम्फर्ट, इकॉनोमी, पावरफुल इंजन के साथ न केवल इस इंडस्ट्री को चलाते हैं, बल्कि अपने करियर को भी एक अनोखी रफ्तार देते हैं। इसी से जुड़ा है ऑटो कम्पोनेंट का तेजी से बढ़ता दायरा और यही वजह है कि ऑटोमोबाइल इंजीनियरों की मांग में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। एक तेज रफ्तार करियर के रूप में इसे चुना जा सकता है।
ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग यानी ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग या व्हीकल इंजीनियरिंग आज का सबसे चुनौती-भरा करियर है, जिसमें संभावनाओं की सीमा नहीं है। इंजीनियरिंग की यह शाखा कार, ट्रक, मोटरसाइकिल, स्कूटर जैसे वाहनों के डिजाइन, विकास, निर्माण, परीक्षण और मरम्मत व सर्विस से जुड़ी होती है। ऑटोमोबाइल के निर्माण व डिजाइनिंग के सम्यक मेल के लिए ऑटोमोबाइल इंजीनियर्स इंजीनियरिंग की विभिन्न शाखाओं जैसे मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक, सॉफ्टवेयर तथा सेफ्टी इंजीनियरिंग की मदद से काम को अंजाम देते हैं।
एक बेहतरीन ऑटोमोबाइल इंजीनियर बनने के लिए विशेष प्रशिक्षण की जरूरत होती है और साथ ही एक खास किस्म का जुनून चाहिए, जो दृढ़ता, मेहनत व लगन के साथ अपने काम को पूरा करने में किसी दबाव व परेशानी को सामने न आने दे।
ऑटोमोबाइल इंजीनियर किसी भी वाहन की कॉन्सेप्ट स्टेज से लेकर प्रोडक्शन स्टेज तक शामिल होते हैं। यानी कागज से लेकर सड़क तक वाहन के आने तक उन्हें यह देखना होता है कि पूरा कॉन्सेप्ट हूबहू असलियत में उतरे। इस इंजीनियरिंग की कई उप-शाखाएं भी हैं जैसे इंजन, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंट्रोल सिस्टम, फ्ल्यूड मैकेनिज्म, थर्मोडायनेमिक्स, एयरोडायनेमिक्स, सप्लाई चेन मैनेजमेंट इत्यादि।
ऑटोमोबाइल इंजीनियर को मुख्यत: तीन धाराओं में विभाजित किया जाता है-प्रोडक्ट या डिजाइन इंजीनियर, डेवलपमेंट इंजीनियर और मैन्युफैक्चरिंग इंजीनियर। प्रोडक्ट या डिजाइन इंजीनियर वह होता है, जो ऑटोमोबाइल्स के कम्पोनेंट और सिस्टम की डिजाइनिंग व टैस्टिंग करता है। वह हर पुर्जे को डिजाइन व टैस्ट करता है, ताकि वह निर्धारित जरूरतों को पूरा कर सके। मेन्युफैक्चरिंग इंजीनियर ऑटोमोबाइल्स के सभी पार्ट्स को जोड़ने का काम करता है। उसे उपकरणों, ऑटोमेशन उपकरणों और सेफ्टी प्रोसीजर्स को डिजाइन  करना होता है, जबकि मैन्युफैक्चरिंग इंजीनियर ऑटोमोबाइल के सभी हिस्सों को जोड़ कर पूरा वाहन तैयार करता है।
नोएडा स्थित ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग डिविजन चला रहे रूपक सखूजा के मुताबिक ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में करियर तभी बना सकते हैं, जब इसमें आपकी रुचि होगी। वैसे प्रोडक्शन से लेकर, डिजाइनिंग, असेम्बलिंग और मैकेनिकल, कई तरह के जॉब हैं। रिसर्च एंड डेवलपमेंट का बहुत बड़ा दायरा है ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में।
पाठय़क्रम
गणित, भौतिकी, रसायन शास्त्र, जैव प्रौद्योगिकी और कम्प्यूटर साइंस में रुचि व अच्छी पकड़ रखने वाले छात्र ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में शानदार करियर बनाने की सोच सकते हैं। इनमें कई पाठय़क्रम कराए जाते हैं, जैसे-
बीई ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग
बीटेक ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग
सर्टिफिकेट प्रोग्राम इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग
डिप्लोमा इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग
एमटेक इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग
पीजी डिप्लोमा इन ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग
शैक्षिक योग्यता
ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में बीई या बीटेक करने के लिए 12वीं या समकक्ष योग्यता होनी चाहिए, जिसमें गणित, भौतिकी, रसायन शास्त्र, जैव प्रौद्योगिकी और कम्प्यूटर साइंस जैसे विषय हों। ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में स्नातक होने के बाद एमई या एमटेक किया जा सकता है। उसके बाद यदि और विशेषज्ञता हासिल करनी है तो पीएचडी की जा सकती है। दसवीं बाद डिप्लोमा किया जा सकता है।
कैसे होता है चयन
बीई या बीटेक पाठय़क्रमों में दाखिला 12वीं के अंकों व प्रवेश परीक्षाओं (आईआईटीजेईई, एआईईईई, बिटसैट इत्यादि) की मेरिट के आधार पर होता है, जो अखिल भारतीय व राज्य स्तर पर आयोजित की जाती है। एमई या एमटेक के लिए गेट यानी ग्रेजुएट एप्टीटय़ूड टैस्ट इन इंजीनियरिंग के माध्यम से दाखिला मिलता है। जिन्होंने डिप्लोमा कर रखा है, वे एआईएमई परीक्षा देकर डिग्री धारकों के समकक्ष हो सकते हैं। कुछ संस्थान अपनी परीक्षा लेते हैं।
बीई या बीटेक कोर्स 4 साल का होता है, जबकि एमई या एमटेक और पीजी डिप्लोमा 2 साल का होता है। ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग के डिप्लोमा कोर्स 3 साल के होते हैं।
व्यक्तिगत गुण
विषय की जानकारी होने के साथ-साथ कम्युनिकेशन स्किल, कंप्यूटर स्किल, एनालिटिकल व प्रोब्लम सॉल्विंग स्किल होनी चाहिए। किसी भी चीज की बारीकी को पकड़ना आना चाहिए। शारीरिक रूप से स्वस्थ होना भी बहुत जरूरी है, क्योंकि काम के घंटे लम्बे हो सकते हैं।
करियर विकल्प
बताने की जरूरत नहीं है कि ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री किस तेजी से बढ़ रही है। लिहाजा न सिर्फ निर्माण में, बल्कि मेंटेनेंस व सर्विस में भी लोगों की जरूरतें बढ़ रही हैं। ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग की जितनी शाखाएं हैं, उनमें अवसर हैं। जिसे डिजाइन पसंद है, वह उसे चुन सकता है और जिसे मैन्युफैक्चरिंग भाती है, वह उसमें जा सकता है। वाहन बनाने वाली कंपनियों से लेकर सर्विस स्टेशन, स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन, प्राइवेट ट्रांसपोर्ट कंपनियों, इंश्योरेंस कंपनियों जैसी जगहों पर अवसरों की भरमार है। जरूरत है तो कुशल और समर्पित लोगों की, जिन्होंने ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रखी हो। सबकी योग्यता के हिसाब से कोई न कोई काम उपलब्ध है। कंप्यूटर के आ जाने से डिजाइन में क्रांति आ गई है। जो लोग इसमें महारत रखते हैं, वे इसे चुन सकते हैं। इसके अलावा अपना गैरेज, वर्कशॉप या सर्विस सेंटर खोला जा सकता है। जिसके पास मास्टर डिग्री है और ग्रेजुएट स्तर पर पांच साल तक पढ़ाने का अनुभव है, वह लेक्चरर बन सकता है। पीएचडी वाले रिसर्च में जा सकते हैं।
आमदनी का स्रोत
यह उम्मीदवार की योग्यता, अनुभव और उस कंपनी के स्टेटस पर निर्भर करता है कि किसी को क्या वेतन मिलता है। शुरुआत में किसी भी नए ऑटोमोबाइल इंजीनियर को 15,000 से 20,000 रुपए वेतन मिल सकता है। आईआईटी या अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़ने वालों के लिए वेतन की कोई सीमा नहीं है। इसके अलावा जैसे-जैसे अनुभव बढ़ता जाता है, वेतन में भी बढ़ोतरी होती रहती है, जो लाखों रुपये प्रतिमाह तक हो सकती है।
प्रमुख संस्थान
दिल्ली कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट, पलवल, हरियाणा
वेबसाइट
www.dctm.org.in
मणिपाल इंस्टीटय़ूट ऑफ टेक्नोलॉजी, मणिपाल, कर्नाटक
वेबसाइट-
 www.manipal.edu
गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज, मोडासा, साबरकांठा, गुजरात
वेबसाइट
www.gecmodasa.org
कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड रूरल टेक्नालॉजी, मेरठ उत्तरप्रदेश
वेबसाइट-
 www.cert.ac.in
हिन्दुस्तान कॉलेज ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, मथुरा उत्तरप्रदेश
वेबसाइट
www.hcst.edu.in

Wednesday, August 12, 2015

कमा लो बूंद-बूंद पानी

कमा लो बूंद-बूंद पानी
प्रकृति को बचाने की मुहिम के परिणामस्वरूप ग्रीन जॉब्स का एक बड़ा मार्केट खड़ा हो रहा है, जहां पे-पैकेज भी अच्छा है। इसमें भी वॉटर कंजर्वेशन का फील्ड इंटेलिजेंट यूथ में काफी पसंद किया जा रहा है....
बिजली की बचत, सोलर व विंड एनर्जी?का मैक्सिमम यूटिलाइजेशन करने वाली इमारतें बनाने वाले आर्किटेक्ट, वॉटर रीसाइकल सिस्टम लगाने वाला प्लंबर, कंपनियों में जल संरक्षण से संबंधित रिसर्च वर्क और सलाह देने वाले, ऊर्जा की खपत कम करने की दिशा में काम करने वाले एक्सपर्ट, पारिस्थितिकी तंत्र व जैव विविधता को कायम रखने के गुर सिखाने वाले एक्सपर्ट, प्रदूषण की मात्रा और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के तरीके बताने वाले एक्सपर्ट...अपने आस-पास नजर दौड़ाइए तो ऐसे अनगिनत प्रोफेशनल्स दिख जाएंगे, जो किसी न किसी रूप में ग्रीन कैम्पेन से जुड़े हुए हैं।?
वॉटर कंर्जवेशन पर जोर
नदियों की सफाई, वर्षाजल का भंडारण, मकानों के निर्माण के साथ ही वाटर हार्वेस्टिंग की प्रणाली की स्थापना, नदियों की बाढ़ से आने वाले पानी को सूखाग्रस्त इलाकों के लिए संग्रहित करना, सीवेज जल का प्रबंधन कर खेती आदि के कार्यकलापों में इस्तेमाल आदि पर आधारित योजनाओं का क्रियान्वयन सभी देशों में किया जा रहा है। जल प्रबंधन एवं संरक्षण पर आधारित कोर्सेज अब औपचारिक तौर पर तमाम देशों में अस्तित्व में आ गए हैं। पहले परंपरागत विधियों एवं प्रणालियों से जल बर्बादी को रोकने तक ही समस्त उपाय सीमित थे। आज देश में स्कूल स्तर से लेकर यूनिवर्सिटीज में एमई और एमटेक तक के कोर्सेज चलाए जा रहे हैं। वॉटर साइंस, वॉटर कंजर्वेशन वॉटर मैनेजमेंट, वॉटर हार्वेस्टिंग, वॉटर ट्रीटमेंट, वॉटर रिसोर्स मैनेजमेंट कई स्ट्रीम्स हैं जिन्हें चुनकर आप इस फील्ड में करियर बना सकते हैं।
वॉॅटर साइंस
हवा और जमीन पर उपलब्ध पानी और उससे जुड़े प्रॉसेस का साइंस वाटर साइंस कहलाता है। इससे जुड़े प्रोफेशनल वॉटर साइंटिस्ट कहलाते हैं।
वॉटर साइंस का स्कोप
केमिकल वॉटर साइंस : वॉटर की केमिकल क्वालिटीज की स्टडी।
इकोलॉजी : लिविंग क्रिएचर्स और वॉॅटर-साइंस साइकल के बीच इंटरकनेक्टेड प्रॉसेस की स्टडी।
हाइड्रो-जियोलॉजी : ग्राउंड वॉटर के डिस्ट्रिब्यूशन तथा मूवमेंट की स्टडी।
हाइड्रो-इन्फॉरमेटिक्स : वॉटर साइंस और वॉटर रिसोर्सेज के एप्लीकेशंस में आइटी के यूज की स्टडी।
हाइड्रो-मीटियोरोलॉजी : वॉटर एड एनर्जी के ट्रांसफर की स्टडी। पानी के आइसोटोपिक सिग्नेचर्स की स्टडी।
सरफेस वॉटर साइंस : जमीन की ऊपरी सतह के पास होने वाली हलचलों की स्टडी।
वॉटर साइंटिस्ट का काम
-हाइड्रोमीट्रिक और वाटर क्वालिटी का मेजरमेंट
-नदियों, झीलों और भूमिगत जल के जल स्तरों, नदियों के प्रवाह, वर्षा और जलवायु परिवर्तन को दर्ज करने वाले नेटवर्क का रख-रखाव।
-पानी के नमूने लेना और उनकी केमिकल एनालिसिस करना।
-आइस तथा ग्लेशियरों का अध्ययन।
-वॉॅटर क्वालिटी सहित नदी में जल प्रवाह की मॉडलिंग।
-मिट्टी और पानी के प्रभाव के साथ-साथ सभी स्तरों पर पानी की जांच करना।
-जोखिम की स्टडी सहित सूखे और बाढ़ की स्टडी।
किससे जुड़कर काम करते हैं
सरकार : पर्यावरण से संबंधित नीतियों को तैयार करना, एग्जीक्यूट करना और मैनेज करना।
अंतरराष्ट्रीय संगठन : टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और आपदा राहत।
एडवाइजरी : सिविल इंजीनियरिंग, पर्यावरणीय प्रबंधन और मूल्यांकन में सेवाएं उपलब्ध कराना।
एकेडमिक ऐंड रिसर्च : नई एनालिटिक टेक्निक्स के जरिए टीचिंग ऐंड रिसर्च वर्क करना।
यूटिलिटी कम्पनियां और पब्लिक अथॉरिटीज : वॉटर सप्लाई और सीवरेज की सर्विसेज देना।
एलिजिबिलिटी
-वॉटर साइंस से रिलेटेड सब्जेक्ट में बैचलर डिग्री, मास्टर डिग्री को वरीयता।
-जियोलॉजी, जियो-फिजिक्स, सिविल इंजीनियरिंग, फॉरेस्ट्री ऐंड एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग सब्जेक्ट्स इनमें शामिल हैं।
स्किल्स
-सहनशीलता, डिटरमिनेशन, ब्रॉडर ऑस्पेक्ट और गुड एनालिटिकल स्किल की जरूरत होती है।
-टीम में काम करने की स्किल
-इन्वेस्टिगेशन की प्रवृत्ति
वॉटर मैनेजमेंट
बढ़ते शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण आज पूरी दुनिया पानी की किल्लत से जूझ रही है। इसे देखते हुए वाटर मैनेजमेंट और कंजर्वेशन से जुड़े प्रोफेशनल्स की डिमांड बढ़ रही है। आजकल हाउसिंग कॉम्प्लेक्सेज से लेकर उद्योगों आदि में ऐसे प्रोफेशनल्स की जरूरत होती है, जो वॉटर हार्वेेस्टिंग से लेकर जल संचयन आदि की तकनीकों को जानते हों।
कोर्स
वॉटर हार्वेस्टिंग ऐंड मैनेजमेंट नाम से यह कोर्स करीब 6 महीने का है। इसके तहत सिखाया जाता है कि बारिश के पानी को किस तरह से मापा जाए, वॉटर टेबल की क्या इंपॉर्र्टेंस है और उसे किस तरह से रिचार्ज किया जाए।
एलिजिबिलिटी
इसमें एडमिशन की मिनिमम एलिजिबिलिटी 10वीं पास है। अगर आपने इग्नू से बैचलर प्रिपरेट्री प्रोग्राम (बीपीपी) किया हुआ है, तो आप सीधे इस कोर्स में एडमिशन ले सकते हैं।
एक्वाकल्चर
एक्वाकल्चर में समुद्र, नदियों और ताजे पानी के कंजर्वेशन, उनके मौलिक रूप और इकोलॉजी की सेफ्टी के बारे में स्टडी की जाती है। इन दिनों घटते जल स्रोतों, कम होते पेयजल संसाधनों के चलते इस फील्ड में विशेषज्ञों की मांग बढ़ी है।
कोर्स ऐंड एलिजिबिलिटी
इस फील्ड में बीएससी और एमएससी इन एक्वा साइंस जैसे कोर्स प्रमुख हैं। इनमें एडमिशन के लिए बायोलॉजी सब्जेक्ट के साथ 10+2 पास होना अनिवार्य है। इसके अलावा, वाटर कंजर्वेशन और उसकीइकोलॉजी के बारे में गहरा रुझान जरूरी है।
एनवॉयर्नमेंट इंजीनियरिंग
एनवॉयर्नमेंट कंजर्वेशन के फील्ड में बढ़ती टेक्नोलॉजी के एक्सपेरिमेंट्स से आज एनवॉयर्नमेंट इंजीनियर्स की मांग बढ़ी है। अलग-अलग सेक्टर्स के कई इंजीनियर्स आज एनवॉयर्नमेंट इंजीनियरिंग में अपना योगदान दे रहे हैं। इनमें एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग, बायोलॉजिस्ट केमिकल इंजीनियरिंग, जियोलॉजिस्ट, हाइड्रो-जियोलॉजिस्ट, वॉटर ट्रीटमेंट मैनेजर आदि कारगर भूमिका निभाते हैं।
इंस्टीट्यूट वॉच
-आइआइटी, रुड़की
(भूजल जल-विज्ञान और वाटरशेड मैनेजमेंट)
-इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, दिल्ली
-अन्ना विश्वविद्यालय (वाटर मैनेजमेंट)
-एम.एस. बड़ौदा विश्वविद्यालय
(वाटर रिसोर्सेज इंजीनियरिंग)
-आंध्र विश्वविद्यालय, विशाखापत्तनम
-अन्नामलाई विश्वविद्यालय (हाइड्रो-जियोलॉजी)
-दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी, दिल्ली
-गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज, रायपुर (वाटर रिसोर्सेज डेवलपमेंट ऐंड इरिगेशन इंजीनियरिंग)
-आइआइटी, मद्रास (फ्लड साइंस ऐंड वाटर रिसोर्सेज इंजीनियरिंग)
-जवाहरलाल नेहरू टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी, हैदराबाद
-राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की

Tuesday, August 11, 2015

आर्किटेक्चर में गढ़ें अपना करियर

ऊंची-ऊंची गगनचुंबी इमारतों, मल्टीप्लेक्सों, कलात्मक एवं भव्य मंदिरों, मालों आदि को देखकर सचमुच आश्चर्य होता है कि आखिर इस निर्माण कार्य को किस प्रकार से अंजाम दिया गया होगा। दरअसल यह कमाल है एक आर्किटेक्ट का, जिसकी योजनाओं और रणनीति पर अमल कर इस तरह के निर्माण कार्य संपन्न किए जाते हैं। 

इस हुनर को आर्किटेक्चर के नाम से जाना जाता है या यूं कहें कि आर्किटेक्चर रचनात्मक कौशल का प्रयोग कर डिजाइनिंग तथा भवन निर्माण की कला का नाम है। सामाजिक, तकनीकी और पर्यावरणीय स्थितियों को ध्यान में रखते हुए इमारतों के निर्माण तथा कला-विज्ञान का मिला-जुला रूप ही आर्किटेक्चर कहलाता है।

गौरतलब है कि भवन निर्माण के संबंध में लोगों की व्यावहारिक तथा अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आर्किटेक्ट की सेवाएं लेने का चलन आज का नहीं अपितु सदियों पुराना है। एक आर्किटेक्ट केवल भवनों का खाका ही तैयार नहीं करता है, बल्कि कीमत का निर्धारण कर भवन निर्माण में अपने उम्दा कौशल का प्रदर्शन भी करता है। 

यह वास्तु व शिल्प का मिला-जुला रूप होता है। मूल अर्थों में आर्किटेक्ट का काम किसी आइडिया को मूर्त रूप देना और कंक्रीट के रूप में जमीन पर उतारना है। एक आर्किटेक्ट को विविध कार्य करने पड़ते हैं। उसे निर्माण स्थल का विस्तृत खाका तैयार करना होता है। वास्तविक जीवंत तस्वीर बनाने के लिए अधिक जटिल परियोजनाओं के रेखांकन और थ्री-डी मॉडल भी तैयार करने पड़ते हैं। 

लाइट फिटिंग, वेन्टीलेशन की व्यवस्था और कभी-कभी भूतल निर्माण, चयनित निर्माण सामग्री, साज-सामान तथा आंतरिक सजावट की योजना के चित्र अलग से तैयार करने पड़ते हैं।

आर्किटेक्ट को यह भी खास ध्यान रखना पड़ता है कि उसकी योजना में अग्निशमन नियमों, भवन निर्माण संबंधी कानूनों और अन्य आवश्यक बातों का उल्लंघन न हो। इसके बाद आर्किटेक्ट को विशेषताओं, फ्लोरिंग, फिनिशिंग और निर्माण सामग्री की अनुमानित मात्रा तथा परियोजना की अनुमानित लागत का विवरण तैयार करना पड़ता है। 

इसके लिए अभियांत्रिकीय सिद्धांतों की समझ, निर्माण विधियों, सामग्री तथा पर्यावरण की तकनीकों के नवीनतम विकास संबंधी नियमों की जानकारी का होना भी नितांत आवश्यक है। किसी आर्किटेक्ट की काबिलियत इस बात पर निर्भर करती है कि वह जगह और साधनों के बेहतर इस्तेमाल में कितना कुशल है। 

अगर आप किसी संरचना में स्तंभों को पूर्णता प्रदान कर सकने में सक्षम हैं, अगर संरचना को जीवंत बनाने में आपको महारत हासिल है और अगर आप संरचना की खिड़कियों और दरवाजों के माध्यम से अपनी कहानी बयां कर सकते हैं तो आर्किटेक्ट के रूप में करिअर की असीम ऊंचाइयां हाथ फैलाए आपका इंतजार कर रही हैं। 

निर्माण उद्योग में उछाल आने वाले दशकों तक बरकरार रहने की संभावनाओं के मद्देनजर करियर का यह क्षेत्र काफी दिलचस्प भी है। बारहवीं में गणित, भौतिकी और रसायन विषयों की पढ़ाई के बाद आप आर्किटेक्चर में स्नातक की पढ़ाई कर सकते हैं। अगर स्कूली स्तर पर आपने इंजीनियरिंग ड्राइंग की पढ़ाई की हो तो आगे यह कोर्स काफी आसान हो जाता है। बी. आर्क कोर्स में प्रवेश हेतु प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती है। आर्किटेक्चर में परा स्नातक कोर्स हेतु बी.आर्क डिग्री आवश्यक है।

बी. आर्क के अलावा विभिन्न पोलिटेक्निकों में तीन वर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। आर्किटेक्चर के डिप्लोमा पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु गणित विषय के साथ दसवीं कक्षा उत्तीर्ण होना आवश्यक है। देश के 135 आर्किटेक्चर कॉलेजों में बैचलर ऑफ आर्किटेक्चर करने के लिए नाटा परीक्षा देना होती है।

नाटा परीक्षा में सम्मिलित होने के लिए बारहवीं गणित विषय के साथ उत्तीर्ण होना आवश्यक है। नाटा में सफल होने के लिए कम से कम नाटा परीक्षा में 40 प्रतिशत अंक प्राप्त होने चाहिए इसके बाद नाटा परीक्षा और बारहवीं की परीक्षा (दोनों का समान वेटेज) में मिले अंकों के आधार पर मेरिट बनाई जाती है।आर्किटेक्ट का कार्यक्षेत्र बहुत व्यापक है।


आर्किटेक्चरल फर्म, कंस्ट्रक्शन कंपनी, सरकारी विभागों और पुल निर्माण व रखरखाव, विभाग, शहरी व ग्रामीण विकास विभाग और नगर पालिकाओं एवं नगर निगमों में आर्किटेक्ट बहुत ही आकर्षक वेतन व सुविधाओं पर रखे जाते हैं। इसके अलावा आज देश में तीन सौ से ज्यादा इंफ्रास्ट्रक्शन डेवलपमेंट कंपनियां हैं, जो कई सारे प्रोजेक्ट पर एक साथ काम करती हैं और जिनके यहां हजारों आर्किटेक्ट काम करते हैं। महानगरों में बन रहे फ्लाईओवर, आधुनिक यातायात व्यवस्था मेट्रो, नदी पर बनने वाले पुल और सब-वे के बढ़ते चलन ने आर्किटेक्ट के काम को नया विस्तार दिया है। 

इसके अलावा, भवनों के रखरखाव और सरकारी गृह निर्माण योजनाओं में आर्किटेक्ट की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, ताकि जगह के सदुपयोग के साथ आम जनता को उनके पैसे की पूरी कीमत भी मिल सके। इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र के माहिरों की केंद्र व राज्य सरकार के विभागों में भी हमेशा मांग बनी रहती है। आप चाहें तो विभिन्न निर्माण कार्यों से जुड़ी संस्थाओं और प्राधिकरणों से जुड़कर विशेषज्ञ आर्किटेक्ट का काम भी संभाल सकते हैं। 

काउसिंल ऑफ आर्किटेक्चर इंडिया ने इस क्षेत्र से संबंधित विभिन्न सेवाओं के लिए वेतन और पारिश्रमिक का एक मानक निर्धारत कर रखा है। यह पारिश्रमिक अमूमन परियोजना पर आने वाले खर्च का एक निर्धारित प्रतिशत होता है। सीधे शब्दों में कहें तो इस क्षेत्र में आप प्रारंभिक दौर में भी 15 से 20 हजार रुपए मासिक कमा सकते हैं जो प्रसिद्धि मिलने के बाद बढ़ता चला जाता है।

कहां से करें कोर्

जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, जामिया नगर, दिल्ली।
बिरला इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, मेसरा, रांची 
रूड़की इंजीनियरिंग कॉलेज, रूड़की 
गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर, लखनऊ विवि, लखनऊ 
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, खड़गपुर 
स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर एंड प्लानिंग, चेन्नई 
दयानंद सागर कॉलेज ऑफ इंजीनियंरिंग, बेंगलुरु 
कॉलेज ऑफ इंजीनियंरिंग, केरल विश्वविद्यालय, तिरुअनंतपुरम