Wednesday, July 15, 2015

थर्मल सौर ऊर्जा के कोर्स

दुनिया भर में पैट्रोल एवं गैस जैसे ऊर्जा के पारम्परिक संसाधनों की बढ़ती कीमतों के बीच ऊर्जा के गैर-पारम्परिक स्रोतों को पहले से कहीं अधिक महत्व दिया जाने लगा है। सूर्य की रोशनी से प्राप्त होने वाली ऊर्जा यानी सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भी अब तेजी से विकास हो रहा है।

भारत में भी सौर ऊर्जा के महत्व को पहचान लिया गया है तथा इसलिए हमारे यहां जवाहर लाल नेहरू सोलर मिशन की स्थापना भी की गई है जिसके लिए सरकार ने बजट में खरबों रुपए का आबंटन किया है। भारत के अधिकांश इलाकों में साल भर खूब सूर्य चमकता है जिससे यहां सौर ऊर्जा की विपुल सम्भावनाएं हैं। एक अनुमान के अनुसार हमारे यहां विभिन्न सौर ऊर्जा परियोजनाओं की मदद से 2100 गीगावॉट ऊर्जा प्राप्त की जा सकेगी।

इस वक्त देश के गुजरात राज्य में सबसे अधिक सौर ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित हैं। भविष्य में इस क्षेत्र में सम्भावनाओं को देखते हुए ही अब अनेक औद्योगिक घराने इस क्षेत्र में कदम रख रहे हैं।

सम्भावनाएं
इस क्षेत्र में विकास के लिए विभिन्न विषयों में महारत रखने वाले पेशेवरों की जरूरत तथा मांग भी पैदा हुई है। इस प्रकार सौर ऊर्जा का क्षेत्र भी अब उज्ज्वल भविष्य की नई सम्भावनाओं से भरा हुआ है। एक अनुमान के अनुसार सौर ऊर्जा संबंधी तकनीकी कामों में 60-65 प्रतिशत इलैक्ट्रिकल इंजीनियर्स, 20 से 25 प्रतिशत मैकेनिकल इंजीनियर्स, 10 प्रतिशत इलैक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर्स और बाकी सिविल इंजीनियर्स की जरूरत पड़ेगी। विशेषज्ञ सौर ऊर्जा का भविष्य बेहद उज्ज्वल मानते हैं। अनुमान के अनुसार 2040 तक विश्व की कुल ऊर्जा खपत का पांच प्रतिशत भाग अकेले सौर ऊर्जा पूरा करेगी। विश्व की वर्तमान विद्युत खपत 2040 तक दोगुनी से भी ज्यादा हो जाएगी, तब निगाह सौर ऊर्जा पर ही टिकेगी। 2020 तक सोलर थर्मल पावर उद्योग का सालाना कारोबार 7.6 अरब डॉलर का होगा।

कार्यक्षेत्र
इस क्षेत्र में इलैक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर्स के लिए सबसे आम रोजगार सोलर सैल्स एवं मॉड्यूल्स की फैब्रिकेशन, टैसिंटग एवं वायरिंग का है। हालांकि इलैक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर्स के लिए इस इंडस्ट्री में सबसे उपयुक्त काम रिसर्च एंड डिवैल्पमैंट और प्रोडक्शन में है, वे इंस्ट्रूमैंटेशन, इंस्टालेशन, ऑप्रेशन एंड मॉनिटरिंग, फाइनांसिंग तथा प्रोजैक्ट डिवैल्पमैंट संबंधी कामों में भी रोजगार प्राप्त कर सकते हैं।

युवा सोलर एनर्जी सैक्टर में सोलर पी.वी. डिजाइन इंजीनियर, प्रोसैस इंजीनियर, आर.एंड डी. प्रोफैशनल, सेल्स एंड मार्कीटिंग इंजीनियर, प्रोडक्शन मैनेजर, प्रोजैक्ट मैनेजर, पी.वी. फैब्रिकेशन एवं टैसिंटग टैक्नीशियन आदि कई पदों पर नियुक्ति हासिल कर सकते हैं।

योग्यता
आमतौर पर सौर ऊर्जा के तकनीकी क्षेत्रों में काम करने के लिए बी.टैक या एम.टैक डिग्री ही सर्वाधिक उपयुक्त शैक्षिक योग्यता मानी जाती है। इस क्षेत्र में काम करने के लिए सोलर सिस्टम्स, पी.वी. पैनल्स, इवर्टर सिस्टम्स, डी.सी. केबलिंग एवं अन्य संबंधित तकनीकों की आधारभूत जानकारी होनी चाहिए।

प्रौसैस इंजीनियर्स को सोलर फोटोवॉल्टाइक सैल/मॉड्यूल या सैमीकंडक्टर डिवाइस मैन्युफैक्चरिंग का ज्ञान होना चाहिए। जो युवा रिसर्च एंड डिवैल्पमैंट में रुचि रखते हैं उन्हें सोलिडस्टेट फिजिक्स में पीएच.डी. डिग्री हासिल करनी चाहिए या इलैक्ट्रॉनिक्स एवं कम्युनिकेशन्स में बी.ई./बी.टैक डिग्री प्राप्त करनी चाहिए।
वरिष्ठ पदों पर नियुक्ति के लिए इलैक्ट्रॉनिक्स रिसर्च एंड डिवैल्पमैंट, टैक्नोलॉजी मैनेजमैंट एवं प्रोडक्ट डिवैल्पमैंट प्रोसैसेज में कुछ अनुभव होना जरूरी है।

सौर ऊर्जा से जुड़े दिलचस्प तथ्य

1 सूर्य की किरणें धरती पर 500 सैकेंड में पहुंचती हैं।

2 वायुमंडल में शोषित होकर पृथ्वी पर लगभग 0.95 मैगावॉट ऊर्जा तत्काल आती है।

3 धरती के वायुमंडल की ऊपरी सतह पर मिलने वाली सौर ऊर्जा 1.353 किलोवॉट वर्ग मीटर होती है।

4 ईसा पूर्व 470 में दार्शनिक सुकरात ने पहली बार सौर ऊर्जा सिद्धांत का जिक्र किया था।

5 ईसा से 300 वर्ष पूर्व यूनान के महान गणितिज्ञ यूक्लिड ने सौर ऊर्जा की उपयोगिता से जुड़ा तर्क सिद्धांत प्रस्तुत किया था।

6 छठी शताब्दी में सूर्य किरणों से प्रज्वलित दर्पणों की खोज हुई थी।

प्रमुख संस्थान

देश में रिन्यूएबल एनर्जी में अधिकतर कोर्स मास्टर लैवल पर उपलब्ध हैं। ये कोर्स करवाने वाले संस्थानों में शामिल हैं-

1 सैंटर ऑफ एनर्जी स्टडीज, आई.आई.टी. दिल्ली

2 डिपार्टमैंट ऑफ एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग, आई.आई.टी. मुम्बई

3 टी.ई.आर.आई. यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली

4  यूनिवर्सिटी ऑफ लखनऊ, उत्तर प्रदेश

5 पंडित दीनदयाल पैट्रोलियम यूनिवर्सिटी, गांधीनगर, गुजरात


Tuesday, July 14, 2015

Genetic Counsellor डिकोडिंग द डिसऑर्डर

ह्यूमन बॉडी में मौजूद क्रोमोजोम्स में करीब 25 से 35 हजार के बीच जीन्स होते हैं। कई बार इन जीन्स का प्रॉपर डिस्ट्रीब्यूशन बॉडी में नहीं होता है, जिससे थैलेसेमिया, हीमोफीलिया, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, क्लेफ्ट लिप पैलेट, न्यूरोडिजेनेरैटिव जैसी एबनॉर्मलिटीज या हेरेडिटरी प्रॉब्लम्स हो सकती है। इससे निपटने के लिए हेल्थ सेक्टर में ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट और दूसरे इनेशिएटिव्स लिए जा रहे हैं, जिसे देखते हुए जेनेटिक काउंसलिंग का रोल आज काफी बढ गया है। अब जो लोग इसमें करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए स्कोप कहीं ज्यादा हो गए हैं।

जॉब आउटलुक

एक अनुमान के अनुसार, करीब 5 परसेंट आबादी में किसी न किसी तरह का इनहेरेटेड डिसऑर्डर पाया जाता है। ये ऐसे डिसऑर्डर्स होते हैं, जिनका पता शुरुआत में नहीं चल पाता है, लेकिन एक जेनेटिक काउंसलर बता सकता है कि आपमें इस तरह के प्रॉब्लम होने की कितनी गुंजाइश है। काउंसलर पेशेंट की फैमिली हिस्ट्री की स्टडी कर इनहेरेटेंस पैटर्न का पता लगाते हैं। वे फैमिली मेंबर्स को इमोशनल और साइकोलॉजिकल सपोर्ट भी देते हैं।

स्किल्स रिक्वायर्ड

जेनेटिक काउंसलिंग के लिए सबसे इंपॉर्टेट स्किल है कम्युनिकेशन। इसके अलावा, कॉम्पि्लकेटेड सिचुएशंस से डील करने का पेशेंस। एक काउंसलर का नॉन-जजमेंटल होना भी जरूरी है, ताकि सब कुछ जानने के बाद मरीज अपना डिसीजन खुद ले सके। उन्हें पेशेंट के साथ ट्रस्ट बिल्ड करना होगा।

करियर अपॉच्र्युनिटीज

अगर इस फील्ड में ऑप्शंस की बात करें, तो हॉस्पिटल में जॉब के अलावा प्राइवेट प्रैक्टिस या इंडिपेंडेंट कंसलटेंट के तौर पर काम कर सकते हैं। इसी तरह डायग्नॉस्टिक लेबोरेटरीज में ये फिजीशियन और लैब के बीच मीडिएटर का रोल निभा सकते हैं। कंपनीज को एडवाइज देने के साथ टीचिंग में भी हाथ आजमा सकते हैं। वहीं, जेनेटिक रिसर्च प्रोजेक्ट्स में स्टडी को-ओर्डिनेटर के तौर पर काम कर सकते हैं। बायोटेक और फार्मा इंडस्ट्री में भी काफी मौके हैं।

क्वॉलिफिकेशन

जेनेटिक काउंसलर बनने के लिए बायोलॉजी, जेनेटिक्स और साइकोलॉजी में अंडरग्रेजुएट की डिग्री के साथ-साथ लाइफ साइंस या जेनेटिक काउंसलिंग में एमएससी या एमटेक की डिग्री होना जरूरी है।

सैलरी

जेनेटिक काउंसलिंग के फील्ड में फाइनेंशियल स्टेबिलिटी भी पूरी है। हालांकि जॉब प्रोफाइल और सेक्टर के मुताबिक सैलरी वैरी करती है। प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाला प्रोफेशनल महीने में 50 हजार रुपये तक अर्न कर सकता है, जबकि गवर्नमेंट डिपार्टमेंट में काम करने वाले महीने में 25 से 40 हजार के बीच अर्न कर सकते हैं।

ट्रेनिंग

-गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर

-कामिनेनी इंस्टीट्यूट, हैदराबाद

-संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट, लखनऊ

-सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज, बेंगलुरु

-महात्मा गांधी मिशन, औरंगाबाद

-जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, दिल्ली

-सर गंगाराम हॉस्पिटल, नई दिल्ली

एक्सपर्ट बाइट

जेनेटिक काउंसलिंग इंडिया में काफी तेजी से पॉपुलर हो रहा है। एप्लीकेशन के नजरिए से इसमें बहुत स्कोप है। नई लेबोरेटरीज खुल रही हैं, जिनके लिए जेनेटिक काउंसलर्स की काफी डिमांड है। वैसे, ट्रेडिशनल हॉस्पिटल्स के अलावा फार्मा कंपनीज में, कॉरपोरेट एनवॉयरनमेंट के बीच काम करने के पूरे मौके मिलते हैं। अब तक मेडिकल प्रोफेशन से जुडे स्टूडेंट्स ही इसमें आते थे, लेकिन अब नॉन-मेडिकल स्टूडेंट्स भी आ रहे हैं।

Monday, July 13, 2015

Career in जन-संपर्क

जन-संपर्क का करियर उनके लिए है जिनमें उत्कृष्ट संवाद कौशल हो तथा जो नित नए-नए लोगों से मिलने व उनसे संवाद स्थापित करने में माहिर हों. यह एक ऐसा कार्यक्षेत्र है जहाँ आपको अपने श्रोता की मनःस्थिति जानकर उसे अपने पक्ष में मोड़ना होता है. 
अगस्त 1978 में मेक्सिको शहर में हुई दुनिया भर के जनसंपर्क संगठनों की प्रथम सभा ने जन-संपर्क को इस प्रकार परिभाषित किया-  " जन-संपर्क रुझानों का विश्लेषण करने, उनके संभावित परिणामों को प्रक्षेपित करने, सांगठनिक नेतृत्व को परामर्श देने तथा योजनाओं को क्रियान्वित करने की एक ऐसी कला व सामजिक विज्ञान है जो संस्थान व लोगों दोनों के हितों का ध्यान रखती है." लोगों को जानना, समझना व उनके मत को प्रभावित करना एक महत्त्वपूर्ण कार्य है जिसके द्वारा विभिन्न मीडिया माध्यमों का उपयोग कर आप किसी व्यक्ति अथवा संस्थान की आम जनता में सही व गलत छवि बनाते हैं.

चरणबद्ध प्रक्रिया

जनसंपर्क के पाठ्यक्रम में समाहित होता है- आपमें जन-संवाद तथा लोगों के मनोविज्ञान को समझने के कौशल विकसित करना जो कि सूचनाओं के आदान-प्रदान में सहायक सिद्ध हों. मूलतः इसका उद्देश्य लोगों व उनकी संवाद आवश्यकताओं को समझना होता है. अधिकांश पाठ्यक्रम जन-संचार पाठ्यक्रम से समानता रखते हैं या उनमें समाहित होते हैं तथा उनमें तमाम तकनीकी ज्ञान के साथ संवाद क्षमता विकसित करने पर जोर दिया जाता है. यहाँ तकनीकी ज्ञान को सरल बनाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है.
अधिकाँश जन-संपर्क पाठ्यक्रमों में निम्न विषय समाहित होते हैं:
  1. जन-संवाद से परिचय
  2. भारत में प्रिंट मीडिया का इतिहास
  3. इलेक्ट्रोनिक मीडिया व फोटोग्राफी
  4. अंतर्राष्ट्रीय संवाद व मानवाधिकार
  5. सूचना तकनीक का जन-संपर्क के क्षेत्र में महत्व
  6. मानव आवश्यकताओं व मनोविज्ञान का अध्ययन
कॉलेज अथवा विश्वविद्यालय के आधार पर पाठ्यक्रम में थोड़ी भिन्नता अवश्य हो सकती है परन्तु सभी विषय ऊपर बताये गए विषयों के लगभग समान ही होते हैं.

पदार्पण

यदि आप इस क्षेत्र में करियर बनाना चाहते हैं तो सर्वप्रथम आपको इस कोर्स को संचालित करने वाले कॉलेजों की सूची बनानी पड़ेगी तथा यह भी ध्यान रखना होगा कि कॉलेज का कोर्स कॉन्टेंट कैसा है. जन-संचार पाठ्यक्रमों को संचालित करने वाले कॉलेजों में दाखिला लेना श्रेयस्कर रहेगा चूंकि ये मीडिया प्रोफेशनल्स से संवाद स्थापित करने में सहायक सिद्ध होते हैं. स्कूलिंग के उपरान्त आप जन-संचार में स्नातक तथा इसके बाद जन-संवाद में स्नातकोत्तर की डिग्री ले सकते हैं. इसके अलावा किसी भी विषय में स्नातक करने के बाद भी आप जन-संपर्क में स्नातकोत्तर कर सकते हैं. कुछ संस्थान डिप्लोमा कोर्स भी संचालित करते हैं. इस क्षेत्र के प्रमुख संस्थान हैं- जेविअर इंस्टिट्यूट ऑफ़ मॉस कम्युनिकेशन, मुंबई; सिम्बोयसिस स्कूल, पुणे; तथा इन्डियन इंस्टीटयूट ऑफ़ मॉस कम्युनिकेशन, नयी दिल्ली.

क्या यह मेरे लिए सही करियर है?

ये जानने के लिए कि जन-संपर्क का करियर आपके लिए सही है अथवा नहीं, आपको ये जानना होगा कि आप लोगों से बात करने में कितने निपुण हैं और आपमें मीडिया के साथ काम करने का कितना जुनून है. यदि आप पढ़ने के शौक़ीन हैं और दैनिक समाचारों व घटनाओं पर नज़र रखते हैं तो जन-संपर्क व जन-संचार का पाठ्यक्रम आपके लिए सही विकल्प साबित हो सकता है और यदि आपकी तकनीकी विषयों में रूचि है तो आप कम्प्यूटर साइंस, साइंस, फिनांस और एकाउंटिंग जैसे क्षेत्र में करियर बना सकते हैं. परन्तु फिर भी पीआर कोर्स सभी की संवाद क्षमता बढ़ाने में सहायक होता है. पीआर प्रोफेशनल्स का वेतनमान उतना ही अच्छा होता जितना कि किसी मार्केटिंग या आईटी प्रोफेशनल का.

खर्चा कितना होगा?

कॉलेज के स्तर के अनुसार, एक अच्छे पीआर कोर्स की वार्षिक फीस 10000 से 40000 तक हो सकती है. यदि आपका चुनाव सेंट जेविअर, मुंबई के लिए होता है तो वहां आपको 12000 रूपये वार्षिक फीस के रूप में देने होंगे. निजी संस्थानों में हालाँकि फीस बहुत ज्यादा है.

छात्रवृत्ति

आप कोर्स के लिए विभिन्न बैंकों से एजुकेशन लोन भी प्राप्त कर सकते हैं. आप या तो पढ़ाई के दौरान ही जॉब करके या पढ़ाई पूरी करने के बाद ये लोन चुका सकते हैं. स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया जैसे राष्ट्रीयकृत बैंक 7.5 लाख तक का लोन देते हैं.

रोज़गार के अवसर

पीआर प्रोफेशनल्स जिनके पास उत्कृष्ट स्तर की सम्वाद व लोगों को समझाने की क्षमता है, के लिए विभिन्न उद्योगों में अपार संभावनाएं हैं. विज्ञापन एजेंसियां व मार्केटिंग कम्पनियाँ अच्छे पीआर प्रोफेशनल्स की तलाश में हमेशा रहती हैं. कई पीआर प्रोफेशनल्स पीआर कोर्स करते हुए फोटोग्राफी अथवा विजुअल कम्युनिकेशन में भी कोर्स कर लेते हैं जिससे उन्हें फिल्म-मेकिंग कम्पनियों में आसानी से जॉब मिल जाती है.
भारत में इस क्षेत्र में रोज़गार के अवसर लगातार बढ़ रहे हैं. बालाजी टेलीफिल्म्स, मुक्ता आर्ट्स जैसी कई बड़ी कम्पनियां विभिन्न जॉब साइट्स पर क्रिएटिव हेड और दूसरे क्रिएटिव पदों के लिए विज्ञापन देती रहती हैं.

वेतनमान

शैक्षिक स्तर व आपकी योग्यता के अनुसार आप शुरू में 15,000 व इससे अधिक भी प्राप्त कर सकते हैं. यदि आप किसी कंपनी में सीईओ के सचिव के रूप में अपने करियर की शुरूआत करते हैं तो आपको 2 से 3 लाख वार्षिक वेतन मिल सकता है. यदि आप मार्केटिंग अथवा एड एजेंसी में कम्युनिकेशन प्रोफेशनल के रूप में करियर की शरूआत करते हैं तो आपको 2.5 लाख रूपये वार्षिक वेतनमान मिल सकता है. दूसरी तरफ यदि आप किसी न्यूज़ चैनल में एंकर के रूप में शुरूआत करते हैं तो आपको 30000 या उससे अधिक भी मासिक वेतन प्राप्त हो सकता है. परन्तु यहाँ काम करने के लिए आपको शिफ्ट में काम करने और विभिन्न स्थानों की यात्रा करने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए. किसी आईटी कंपनी में टेक्नीकल या कोर्पोरेट कम्युनिकेशन से करियर शुरू करने पर आप 15000 रूपये मासिक वेतन आसानी से प्राप्त कर सकते हैं. आप सेल्स अथवा बिजनेस डेवलपमेंट पदों के लिए भी आवेदन कर सकते हैं बस ज़रुरत है आपके अन्दर उत्कृष्ट सेलिंग व संवाद स्किल का होना. वास्तव में इस क्षेत्र में अवसरों की कमी नहीं है.

मांग एवं आपूर्ति

अच्छी संवाद वाले प्रोफेशनल्स की मांग लगभग हर उद्योग में है. उदाहरण के तौर पर आजकल कम्पनियों के एचआर प्रोफेशनल्स, सोफ्टवेयर प्रोफेशनल जैसे पदों के लिए व्यक्तियों का चुनाव करते समय कम्युनिकेशन स्किल को भी एक फैक्टर मानते हैं. भारत में मांग की तुलना में अच्छें इंग्लिश-स्पीकिंग प्रोफेशनल्स की हमेशा कमी रहती है. हालाँकि पिछल कुछ वर्षों में इंग्लिश का स्तर सुधरा है यहाँ तक कि गवर्नमेंट स्कूल के छात्र भी अच्छी इंग्लिश बोल सकते हैं. अतः प्रतिस्पर्धा बढ़ गयी है.

मार्केट वॉच

पीआर प्रोफेशन का विकास पिछले कुछ वर्षों में अद्वितीय रहा है. नित नए टीवी चैनलों, न्यूज़ चैनलों, आईटी कम्पनियों, बीपीओ/केपीओ के खुलने के कारण पीआर प्रोफेशनल्स की मांग अपने उद्योग उच्चतम स्तर पर है. होटल, शिपिंग एवं लोजिस्टिक्स जैसे दूसरे क्षेत्रों में भी पीआर प्रोफेशनल्स की बहुत मांग है. उन्हें रिसेप्शनिस्ट से लेकर लॉबी मैनेजर तथा सेल्स मैनेजर तक जैसे पद मिल सकते हैं. पिछले कुछ दशकों में एड एजेंसियों का भी अतुल्यनीय विकास हुआ है. विभिन्न सरकारी विभागों व कंपनियों में जन-संपर्क अधिकारी बनना भी एक अच्छा विकल्प हो सकता है. आप कुछ बड़े व धनवान लोगों के पब्लिक प्रोफाइल को मैनेज करने का काम भी कर सकते हैं. इसलिए इस समय पीआर प्रोफेशनल्स के लिए मार्केट उनकी चॉईस का है.

अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शन

भारतीय प्रोफेशनल्स कई देशों में कई बड़े-बड़े मार्केटिंग पदों पर कार्यरत हैं. विशेषकर अमेरिका में कम्युनिकेशन प्रोफेशनल्स के लिए अपार संभावनाएं है. कई भारतीय वहां वेबसाईट व एड एजेंसी स्थापित कर अच्छी कमाई कर रहे हैं.

सकारात्मक/ नकारात्मक पहलू

सकारात्मक
  1. अच्छी संवाद क्षमता वाले छात्रों की हर जगह मांग है. अतः पीआर प्रोफेशनल्स के लिए रोज़गार के अवसर बहुत अच्छे हैं. 
  2. वेतनमान दूसरे क्षेत्र के प्रोफेशनल्स की तरह ही काफी अच्छा है.
नकारात्मक
  1. कुछ पीआर प्रोफेशनल्स ज़्यादा पैसा कमाने के चक्कर में लगातार कम्पनियाँ बदलते रहते हैं जो कि उनके करियर को स्थायित्व नहीं प्रदान कर पाता.

भूमिका और पदनाम

विषय के आधार पर जन-संपर्क, जन-संचार का ही एक भाग है. कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन, टेक्नीकल कम्युनिकेशन इत्यादि भी इससे मिलते-जुलते विषय ही हैं. वास्तव में ये सभी विषय एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. अतः पीआर प्रोफेशनल के लिए हर क्षेत्र में करियर की अपार संभावनाएं मौजूद हैं बस ज़रुरत है तो सिर्फ समय के साथ ज्यादा से ज्यादा सीखने की.

अग्रणी कंपनिया

भारत की कुछ अग्रणी विज्ञापन कम्पनियां निम्न हैं:
  1. ओगिल्वी एंड मादर
  2. जे वॉल्टर थॉमसन इण्डिया
  3. मुद्रा कम्युनिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड
  4. एफसीबी-उल्का  एडवरटाइजिंग लिमिटेड
  5. रीडिफ्यूज़न- डीवाई एंड आर
 इन कंपनियों के अलावा आप एचसीएल, विप्रो, इनफ़ोसिस इत्यादि आईटी कम्पनियों के लिए भी आवेदन कर सकते हैं चूंकि आजकल ये कम्पनियां भी पीआर क्षेत्र में अनुभव रखने वाले कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स को नियुक्त कर रही हैं. आप न्यूज़ एवं अन्य बड़े चैनलों में भी आवेदन कर सकते हैं.

रोज़गार प्राप्त करने के लिए सुझाव

जन-संपर्क में करियर बनाने के लिए आप निम्न सुझावों पर अमल कर सकते हैं:
  1. कम से कम 7 से 20 कम्पनियों के लिए आवेदन करें. 
  2. साक्षात्कार व परीक्षा की तिथियाँ सुविधानुसार चुनें.
  3. ज्यादा से ज्यादा बात करने के लिए तैयार रहे चूंकि ये कम्पनियां अद्वितीय संवाद क्षमता वाले प्रोफेशनल्स चाहती हैं.
  4. करियर की शुरूआत में वेतन के मुद्दे पर लचीला रुख अपनाएं.
  5. जिस कंपनी में आपने आवेदन किया है वहां पीपुल स्किल सीखने व उसमें ईमानदारी से सुधार करने के साथ-साथ उस कंपनी में काम करने की इच्छा जताएं.
  6. साक्षात्कार में जाने से पहले कम्पनी तथा उसके व्यापार के बारे में पूरे तरह रिसर्च कर लें.

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Sunday, July 12, 2015

रोबोटिक्स का रोचक करियर

शब्द की उत्पत्ति चेक शब्द 'रोबिट' तथा स्लैव मूल के शब्द रोबोटा से हुई, जिसका अर्थ कार्य तथा गुलामी का काम है। आजकल रोबोट हार्ट सर्जरी करते हैं, बारूदी सुरंगों को हटाते हैं तथा कारों की असेम्बलिंग का कार्य करते हैं। फिर भी भारतीय कंपनियाँ अभी भी बार-बार किए जाने वाले बोरिंग तथा असुखदकर कार्यों में रोबोटों के उपयोग करने से बच रही है। वेल्डिंग, असेम्बलिंग, स्प्रे-पेटिंग, कटिंग तथा पूर्जों को लगाना कुछ ऐसे काम हैं, जिन्हें रोबोट द्वारा कुशलतापूर्वक किया जाता है।

तीन शाखाओं का संगम है रोबोटिक्स
रोबोटिक्स के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल या कम्प्यूटर इंजीनियरिंग का अध्ययन करने की आवश्यकता होती है। वास्तव में रोबोटिक्स इन तीनों के तालमेल का ही रूप है। इसलिए रोबोटिक्स में सुविज्ञता हासिल करने के लिए इन तीनों क्षेत्र का गहन ज्ञान अपेक्षित है। इस क्षेत्र में कुछ इंजीनियरिंग संस्थानों द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, एडवांस्ड रोबोटिक्स सिस्टम्स, इंटेलिजेंस कंट्रोल, इमेजिंग प्रोसेस, न्यूरल नेटवर्क्स तथा फुजी लाजिक्स पर विशेष कोर्स संचालित किए जाते हैं। इसके अलावा पोस्टग्रेजुएट स्तर पर भी स्पेशलाइजेशन किया जा सकता है।

रोबोटिक्स के अध्ययन में बेसिक इंजीनियरिंग प्रिसिपल तथा रोबोट्स का विकास तथा उपयोग करने वाले प्रोफेशनल की सहायता करने के लिए टेक्निकल स्किल्स सिखाई जाती है। इसमें डिजाइन में इंस्ट्रक्शन, ऑपरेशन टेस्टिंग, सिस्टम मैटेनेंस तथा रिपेयर शामिल है।

रोबोटिक्स को जानिए
फिर भी रोबोटिक्स एक या दो दिनों में सीख कर चलाया जाने वाला अल्पकालीन क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह एक दीर्घकालीन अनुसंधानपरक करियर है। हो सकता है कि इस क्षेत्र में आज प्रवेश करने वालों को अपनी मंजिल तक पहुँचने में कुछ साल इंतजार करना पड़े। बीएचईएल, बार्क तथा सीएआईआर जैसे संगठनों द्वारा फ्रेश ग्रेजुएटस को साइंटिस्ट के रूप में लेकर रोबोटिक्स के क्षेत्र में प्रशिक्षित किया जाता है।

रोबोटिक्स विषय से परिचित होने के लिए सबसे पहले रोबोट की अवधारणा को समझना आवश्यक है। इंटरनेशनल स्टैंडर्ड ऑर्गनाइजेशन ने रोबोट को परिभाषित करते हुए बताया है कि यह ऐसी स्व-नियंत्रित रि-प्रोगामेबल मल्टीपरपज मशीन है, जिसे लोकोमोशन सहित या उसके बिना इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन एप्लिकेशन के लिए उपयोग में लाया जाता है। आज सारी दुनिया में विभिन्न कार्यकलापों में रोबोटों का उपयोग निरंतर लोकप्रिय होकर बढ़ता जा रहा है। चूँकि रोबोट को किसी भी काम के लिए खतरनाक पर्यावरण तक के लिए बार-बार सही रूप से प्रोग्राम किया जा सकता है।

ये विभिन्न रणनीतियुक्त मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। रोबोटिक्स के अंतर्गत रोबोट की डिजाइनिंग, उनका अनुरक्षण, नए एप्लिकेशंस का विकास और अनुसंधान जैसे काम आते हैं। इस क्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक्स, मैकेनिक्स तथा कम्प्यूटर साइंस जैसे सहयोगी क्षेत्रों का ज्ञान शामिल होता है। इसलिए इस क्षेत्र में करियर बनाने वालों को इन क्षेत्रों से संबंधित तकनीकों से अवगत होना चाहिए।

रोबोटिक्स के कोर्स
रोबोटिक्स इंजीनियरिंग का वह क्षेत्र है, जो रोबोट की डिजाइन तथा एप्लिकेशन से संबंधित है तथा इसमें मेनिपुलेशन तथा प्रोसेसिंग के लिए कम्प्यूटर का उपयोग किया जाता है। उद्योगों में रोबोट्स का उपयोग निर्माण प्रक्रिया को तेज करने के लिए किया जाता है।

इन्हें न्युक्लियर साइंस, सी-एक्सप्लोरेशन, इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स की ट्रांसमिशन सर्विस, बायोमेडिकल इक्विपमेंट की डिजाइनिंग आदि के लिए उपयोग में लाया जाता है। रोबोटिक्स के लिए कम्प्यूटर इंटीग्रेटेड मैन्यूफैक्चरिंग, मैकेनिकल, मैकेनिकल इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, बायोलॉजिकल मैकेनिक्स, सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग का एप्लिकेशंस आवश्यक होता है।

योग्यता
चूँकि रोबोटिक्स एक इंटर-डिसिप्लिनरी कोर्स है। इसलिए इसमें उन छात्रों के लिए आमंत्रण है, जिन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, इंस्ट्रूमेंटेशनल इंजीनियरिंग या कम्प्यूटर इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन किया हो तथा जिनकी रोबोटिक्स तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में अभिरुचि हो।

सामान्यतः रोबोटिक्स के लिए बी टेक या बीई कम्प्यूटर, आईटी, मैकेनिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिकल को आदर्श योग्यता माना जाता है। आईआईटी दिल्ली, कानपुर, मुंबई, चेन्नई, खड़गपुर, गुवाहाटी तथा रूड़की सहित कई इंजीनियरिंग संस्थानों द्वारा रोबोटिक्स तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं।

रोजगार के अवसर
रोबोटिक्स एक उभरता हुआ क्षेत्र है। इसलिए यहाँ रोजगार के नए-नए और बेहतरीन अवसर उपलब्ध हैं। रोबोटिक्स में करियर बनाने वाले या तो इंडस्ट्रीयल रोबोट्स के निर्माण या एप्लिकेशन स्पेसिफिक रोबोट के क्षेत्र जैसे कि बम निष्क्रिय करने के काम तथा अन्य सुरक्षा कार्यों में रोबोट के उपयोग से संबंधित कार्य कर सकता है। रोबोट से वैक्यू क्लीनिंग जैसे घरेलू काम भी लिए जा सकते हैं। रोबोटिक्स के क्षेत्र में सतत अनुसंधान जारी है। इस क्षेत्र में भी करियर निर्माण की अपार संभावना है।

भारत में स्कोप
रोबोटिक्स में एमई करने वाले छात्र इसरो जैसे अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में रोजगार के विशिष्ट अवसर प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही माइक्रोचिप बनाने वाले उद्योगों में भी उनकी खासी माँग है। उनके आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में अनुसंधान में कार्य करने के लिए आईआईटी के दरवाजे भी खुले हुए हैं। इतना ही नहीं, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑव बायोलॉजी भी रोबोटिक्स तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में अनुसंधान के लिए फैलोशिप प्रदान की है।

विदेशों में स्कोप
रोबोटिक्स इंजीनियर को अमेरिका की प्लास्टेक जैसी कंपनियों में रोबोटों को प्रोग्राम करने, ट्रबलशूट तथा अनुरक्षण के लिए रोजगार के शानदार अवसर उपलब्ध हैं। मानवीय रोबोटिक्स तथा कम्प्यूटेशनल न्यूरोसाइंस के क्षेत्र में रिसर्च करने वाली प्रीमियर रिसर्च संस्थान एटीआर में भी रिसर्च फैलोशिप के अवसर भी उपलब्ध हैं। इनटेल जैसी कंपनियों द्वारा माइक्रोचिप निर्माण के लिए रोबोटिक्स तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्पेशलिस्ट को नियुक्त करते हैं।

उत्तरी अमेरिका स्थित रोबोटिक्स इंडस्ट्रियल एसोसिएशन रोबोट मैन्यूफैक्चरिंग एंड मेंटेनेंस सिस्टम्स इंटिग्रेशन में रोजगार के अवसर प्रदान करता है। साथ ही जो लोग रोबोटिक्स को अंतरिक्ष विज्ञान में उपयोग में लाने की अभिरुचि रखते हैं, उनके लिए नासा सबसे अच्छा करियर निर्माण स्थल है।

रोबोटिक्स के क्षेत्र
रोबोटिक्स का कोर्स छात्रों को निम्नलिखित क्षेत्र में प्रशिक्षित कर शिक्षा प्रदान करता है-
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
हकम्प्यूटर एडेड मैन्यूफैक्चरिंग
- इंस्टीट्यूट कम्प्यूटर इंटीग्रेटेड मैन्यूफैक्चरिंग सिस्टम
- कम्प्यूटेशन ज्यामेट्री
- रोबोट मोशन प्लानिंग
- डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स
- माइक्रो प्रोसेसर्स
- रोबोट मेनिपुलेटर्स
कुशल रोबोटिक्स इंजीनियर अपनी सुविज्ञता को मॉडर्न वेलफेयर, सर्जरी, नेनो टेक्नॉलॉजी, स्पेस एक्सप्लोरेशन तथा अन्य कई क्षेत्रों में उपयोग में ला सकता है।

पारिश्रमिक
रोबोटिक्स के क्षेत्र में योग्य और गुणी प्रोफेशनल्स के सामने करियर निर्माण का एक सुनहरा संसार बाहें पसारे खड़ा है। भारत में भी रोबोटिक्स का धड़ाके से आगमन हो रहा है। जहाँ तक इस क्षेत्र में पारिश्रमिक का प्रश्न है, इस क्षेत्र में बेहतरीन पे-पैकेज की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। सामान्यतः आरंभिक वेतन 25 हजार से लेकर 60 हजार के बीच हो सकता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा योग्य रोबोटिक्स प्रोफेशनल्स को ज्यादा सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं।

रोबोटिक्स से जुड़े संस्थान
निम्नलिखित प्रमुख संस्थानों के अतिरिक्त देश की कई नेशनल यूनिवर्सिटियों द्वारा अपने इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम
में रोबोटिक्स को एक विशेष विषय के रूप में पढ़ाया
जाता है :-
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, दिल्ली
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, मुंबई
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, कानपुर
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, मद्रास
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, गुवाहाटी
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, खड़गपुर
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, रूड़की
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, हैदराबाद यूनिवर्सिटी
- जादवपुर यूनिवर्सिटी-एमई रोबोटिक्स
- कोचिन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी, कोचि
- वीरमाता जीजाबाई टेक्नॉलॉजी, इंस्टीट्यूट, मुंबई
- थापर इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नॉलॉजी, पटियाला
- यूनिवर्सिटी ऑफ हैदराबाद
- उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद
- एमएम यूनिवर्सिटी, बड़ौदा

Friday, July 10, 2015

केमोइंफॉर्मेटिक्स: रासायनिक सूचनाओं का प्रबंधन में करियर

केमोइंफॉर्मेटिक्स केमिस्ट्री की सबसे तेजी से विकसित होने वाली शाखा बन चुकी है। आने वाले समय में केमोइंफॉर्मेटिक्स का कोर्स करने वाले छात्रों को देश और विदेश में पर्याप्त अवसर मिलेंगे। इस बारे में बता रही हैं नमिता सिंह

इस समय हम ग्लोबल विलेज में जी रहे हैं। आईटी ने कई विधाओं को खुद से जोड़ कर उनका कायाकल्प करने का बीड़ा उठाया है। इसी प्रक्रिया के तहत आईटी का रसायन विज्ञान के साथ सम्मिलन दिन-ब-दिन परवान चढ़ता जा रहा है। इसके अंतर्गत रासायनिक सूचनाओं का संग्रहण, प्रबंधन, विश्लेषण एवं उनका समाधान संबंधी कार्य आते हैं। इस प्रचलित एवं कारगर विधा को नाम दिया गया ‘केमोइंफॉर्मेटिक्स’ अर्थात रसायन सूचना विज्ञान। केमोइंफॉर्मेटिक्स का सबसे ज्यादा उपयोग दवा बनाने वाली कंपनियां दवाओं की खोज में करती हैं। बाजार का विश्लेषण यही बता रहा है कि संभावनाओं एवं विस्तार को देखते हुए आने वाले कुछ वर्षों में यह क्षेत्र और अधिक चमकदार एवं रोजगारपरक हो सकता है, क्योंकि इसका ताल्लुक काफी हद तक आईटी से जुड़ा हुआ है।

बायोइंफॉर्मेटिक्स के दो दशक बाद केमोइंफॉर्मेटिक्स शाखा चलन में आई। आमतौर पर लोग बायोइंफॉर्मेटिक्स व केमोइंफॉर्मेटिक्स को एक ही मानते हैं, जबकि दोनों में काफी विविधता है। बायोइंफॉर्मेटिक्स में जहां कई तरह की विधाओं को शामिल किया जाता है, वहीं केमोइंफॉर्मेटिक्स उसी से निकली एक शाखा है, जिसमें ड्रग डिजाइन के प्रयोग व थ्योरी को भली-भांति समझा जाता है।

उच्च शिक्षा की दरकार
रसायन विज्ञान एवं आईटी से संबंधित होने के कारण इसके पाठय़क्रम में दाखिला लेने के लिए छात्रों को रसायन विज्ञान में कम से कम बीएससी होना चाहिए, तभी एमएससी में प्रवेश मिल पाता है। एमएससी दो वर्षीय पाठय़क्रम है। इसके उपरांत रिसर्च एवं एकेडमिक फील्ड में जाने का मार्ग प्रशस्त होता है। अधिकांश संस्थान स्नातक के पश्चात एक वर्षीय पीजी डिप्लोमा एवं डिप्लोमा जैसे कोर्स भी करवाते हैं। इसकी अवधि एक से लेकर डेढ़ वर्ष तक होती है। विदेशों में सबसे ज्यादा प्रचलित एमएससी इन केमोइंफॉर्मेटिक्स है, जबकि भारत में एक वर्षीय पीजी डिप्लोमा की अधिक डिमांड है। कई संस्थान डिस्टेंस लर्निंग के जरिए भी पीजी डिप्लोमा कोर्स कराते हैं। योग्यता व कोर्स अवधि रेगुलर की तरह ही होती है।

पाठ्य़क्रम
एमएससी इन केमोइंफॉर्मेटिक्स के अंतर्गत छात्रों को विशेष रूप से डाटा बेस, प्रोग्रामिंग, वेब टेक्नोलॉजी, डाटा माइनिंग एवं कम्प्यूटर द्वारा ड्रग डिजाइनिंग आदि कार्य शामिल हैं। पाठय़क्रम के दौरान छात्रों से कई तरह के प्रायोगिक प्रशिक्षण एवं प्रबंधन संबंधी कार्य कराए जाते हैं, जबकि पीएचडी आदि पाठय़क्रमों के अंतर्गत रिसर्च वर्क में ड्रग की खोज, डिजाइन एवं उसकी कंपोजिशन का अध्ययन किया जाता है। वैसे भी केमिस्ट्री की निर्भरता दिन-प्रतिदिन कम्प्यूटर पर बढ़ती ही जा रही है। नए आने वाले छात्रों की केमिस्ट्री के प्रति रुचि को देख कर पाठ्य़क्रम की रूपरेखा काफी हद तक उचित भी है। जहां तक पीजी डिप्लोमा के पाठय़क्रम का सवाल है तो वह विभिन्न मॉडय़ूल में बांटा गया है। इसमें केमोइंफॉर्मेटिक्स की बेसिक जानकारी से लेकर मॉडर्न कॉम्बिनेशन ऑफ केमिस्ट्री, ड्रग डिजाइन, केमिकल इंफॉर्मेशन सोर्स, मेडिसिनल केमिस्ट्री आदि को विस्तार से बताया जाता है।

स्वयं से सरोकार
पाठ्य़क्रम अथवा रोजगार के लिए छात्रों को अपने अंदर कई तरह के विशिष्ट गुण लाने पड़ते हैं। सर्वप्रथम उन्हें केमिस्ट्री के प्रति रुचि बढ़ाने, कम्प्यूटर स्किल्स मजबूत करने व रिसर्च वर्क के प्रति उत्साह जागृत करना आवश्यक हो जाता है। इसके अलावा इसमें प्रोफेशनल्स को धैर्यवान व परिश्रमी होना जरूरी है, क्योंकि कई बार किसी रिसर्च अथवा प्रोजेक्ट पर काम के दौरान लंबा समय व्यतीत होता है। साथ ही टीम वर्क, अनुशासन व बाजार में बदलाव को स्वीकार करने का गुण होना भी जरूरी है।

कार्यक्षेत्र का संसार
पिछले तीन वर्षों में इस क्षेत्र में संभावनाएं काफी प्रबल हुई हैं। खासतौर पर फार्मास्यूटिकल, एग्रोकेमिकल एवं बॉयोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्रीज में प्रशिक्षित लोगों की भारी कमी महसूस की गई है। केमोइंफॉर्मेटिक्स में एमएससी करने वाले छात्र प्रारंभ में केमोइंफॉर्मेटिक्स साइंटिस्ट, प्रोजेक्ट मैनेजर, केमोइंफॉर्मेटिक्स डेवलपर, ड्रग डिस्कवरी साइंटिस्ट, एसोसिएट रिसर्च साइंटिस्ट, कम्प्यूशनल केमिस्ट, केमिकल डाटा साइंटिस्ट, रेगुलेटरी अफेयर्स, सीनियर इंफार्मेशनल एनालिस्ट, इंफार्मेशनल ऑफिसर, डाटा ऑफिसर, सॉफ्टवेयर टैस्टर, सपोर्ट एनालिस्ट, बिजनेस एनालिस्ट कार्यक्षेत्र के अवसरों को देखते हुए निम्न क्षेत्रों में सामने आ सकते हैं-

फार्मास्यूटिकल/केमिकल इंडस्ट्री सेक्टर,
आईटी/कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर सेक्टर,
हॉस्पिटल/हेल्थ ऑथारिटी,
शोध के क्षेत्र में

आमदनी
इस क्षेत्र में आमदनी भी भरपूर होती है। शुरुआती दिनों में भले ही कुछ संघर्ष की स्थिति आ जाए, पर एक समय के बाद सब कुछ पटरी पर आ जाता है। प्रारंभ में प्रोफेशनल्स को 15-20 हजार रुपए प्रतिमाह मिलते हैं। अनुभव बढ़ जाने पर यही रकम 35-40 हजार रुपए प्रतिमाह तक पहुंच जाती है। इसके अलावा फ्रीलांसिंग में प्रतिदिन या पैकेज के हिसाब से पेमेंट दिया जाता है। विदेशों में काफी आकर्षक पैकेज मिलता है।

संभावनाएं
छात्रों को रोजगार मिलने की आस एवं संभावनाओं को देखते हुए प्रमुख सरकारी एवं गैर सरकारी कंपनियों में अवसर सामने आते रहते हैं। देश के साथ-साथ विदेश में भी रोजगार के पर्याप्त अवसर मौजूद हैं। पार्ट टाइम व स्वतंत्र रूप से भी इस क्षेत्र में काम किया जा सकता है।

एक्सपर्ट्स व्यू/

देश में भी हैं बेशुमार मौके
एक समय ऐसा था, जब कोर्स करने के पश्चात छात्रों को विदेश की ओर रुख करना पड़ता था। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। वर्तमान समय केमोइंफॉर्मेटिक्स के लिए काफी अच्छा है। सफलतापूर्वक कोर्स करने के पश्चात कई भारतीय कंपनियां छात्रों को आकर्षक पैकेज पर काम दे रही हैं। सबसे ज्यादा मौके फार्माकेमिकल में सामने आ रहे हैं, जबकि पढ़ाई के लिहाज से डिस्टेंस लर्निंग का भी चलन बढ़ा है। जिन छात्रों को डिस्टेंस लर्निंग की प्रक्रिया के तहत कोर्स समझ में नहीं आता, उन्हें फैकल्टी उपलब्ध करा कर इसके प्रमुख टॉपिक से अवगत कराया जाता है। इसमें मेल व फीमेल दोनों के लिए समान रूप से अवसर मिलते हैं। छात्रों को सलाह दी जाती है कि वे जो भी पढ़ें, पूरे मन से पढ़ें।
अंशुल कुमार, प्रोग्राम डायरेक्टर,
इंस्टीटय़ूट ऑफ केमोइंफॉर्मेटिक्स,
नोएडा

फैक्ट फाइल

प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान
भारतीय संस्थान

मालाबार क्रिश्चियन कॉलेज, कोझिकोड
वेबसाइट - www.mcccalicut.org

इंस्टीटय़ूट ऑफ केमोइंफॉर्मेटिक्स स्टडीज, नोएडा
वेबसाइट - www.cheminformaticscentre.org

जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली
वेबसाइट - www.jamiahamdard.ac.in

विदेशी संस्थान

जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी,
वेबसाइट -  www.jhu.edu

मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी,
वेबसाइट - www.manchester.ac.uk

शेफिल्ड यूनिवर्सिटी,
वेबसाइट - www.shef.ac.uk/courses

इंडियाना यूनिवर्सिटी,
वेबसाइट - www.informatics.indiana.edu

Thursday, July 9, 2015

करियर का बड़ा कैनवास फैशन कोरियोग्राफी



चमचमाती लाइट्स और सुरीले संगीत के बीच जब खूबसूरत मॉडल्स रैंप पर डिजाइनर कपड़ों के कलेक्शन एक खास अंदाज में पेश करती हैं तो ऑडियंस की तालियां रुकने का नाम नहीं लेतीं। भारत में फैशन शो का चलन इंटरनेशनल मार्केट से आया है, जिसमें कपड़ों का कलेक्शन पश्चिमी विचारों के साथ पेश किया जाता था। पर आज फैशन कोरियोग्राफी में भारतीयों की पसंद और नापसंद का पूरा खयाल रखा जाता है। म्यूजिक भी उन्हीें की पसंद की रखी जाती है। कोरियोग्राफी में ड्रामा क्रिएट किया जाता है ताकि कलेक्शन को प्रभावशाली तरीके से प्रेजेंट किया जा सके। फैशन कोरियोग्राफर को कपड़ों की नॉलेज के साथ-साथ उनकी बनावट, रंगों, डिजाइनों, सामग्रियों की पूरी जानकरी होती है। वे सीजन के साथ नए आइडियाज और ट्रेंड्स का भी ध्यान रखते हैं, तभी फैशन कोरियोग्राफी का बड़ा कैनवास तैयार हो पाता है।

फैशन कोरियोग्राफर को कपड़ों के ज्ञान के साथ-साथ कपड़ों की बुनावट, रंगों, डिजाइनों, सामग्री की पूरी जानकरी होती है। वह हर सीजन में अपने खास डिजाइनों और मार्केट का खयाल रखता है। यही नहीं, नए-नए विचारों और नए प्रचलनों को भी ध्यान में रखता है, तभी फैशन कोरियोग्राफी का बड़ा कैनवस तैयार कर पाता है।

फैशन कोरियोग्राफर में संगीत के चयन की समझ, कलेक्शन की समझ, शो के लिए एक लुक तैयार करने की समझ होनी चाहिए। एक आम दिन में कोरियोग्राफर बहुत-सी चीजें करता है जैसे मॉडल और डिजाइनर से कपड़े की फिटिंग चेक करना, म्यूजिक सेलेक्शन, शो को डायरेक्ट करना, रिहर्सल करना, शो के वक्त डीजे म्यूजिक और लाइट इंजीनियर के साथ कोऑर्डिनेट करना वगैरह।

फैशन कोरियोग्राफी चुनौतीभरा, रचनात्मकता और उत्सुकता भरा क्षेत्र है। इसमें किताबी कीड़ा बनने की बजाय प्रेक्टिल होना महत्वपूर्ण है। अवसर की बात करें तो यह क्षेत्र काफी चकाचौंध भरा है।

क्या है फैशन कोरियोग्राफी
फैशन कोरियोग्राफी कपड़ों के एक कलेक्शन को रनवे पर बहुत ही रचनात्मक ढंग से रोशनी और संगीत का उपयोग करके पेश करती है और दर्शकों को उनकी ओर आकर्षित करती है। भारत में फैशन शो का चलन अंतरराष्ट्रीय बाजार से आया है, जिसमें कपडमें का एक कलेक्शन पश्चिमी विचारों के साथ पेश किया जाता था। परन्तु आज फैशन कोरियोग्राफी में भारतीयों की पसंद और नापसंद पर बहुत ज्यादा और अच्छे से ख्याल रखा जाता है। म्यूजिक भी उन्हीं की पसंद का रखा जाता है। कोरियोग्राफी में ड्रामा क्रिएट किया जाता है ताकि कलेक्शन को जीवंत किया जा सके।

नेचर ऑफ वर्क
अक्सर लोगों को यह लगता है कि डिजाइनर सपनों की दुनिया में विचरण करते रहते हैं, लेकिन असलियत यह है कि उनका काम काफी चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि बाजार की मांग के अनुरूप किसी खास प्रोडक्ट, सीजन और कीमत को ध्यान में रख कर उन्हें काम करना पड़ता है।

योग्यता
इस क्षेत्र में कदम रखने के लिए फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करना जरूरी है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के अलावा और भी कई संस्थान हैं, जहां से फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया जा सकता है। फैशन डिजाइनिंग के अंडर ग्रेजुएट कोर्स में एडमिशन के लिए 50 प्रतिशत अंकों के साथ 12वीं पास होना जरूरी है। साथ ही एडमिशन के लिए लिखित परीक्षा, ग्रुप डिस्कशन और इंटरव्यू से गुजरना पडम्ता है। वहीं पीजी में एडमिशन के लिए स्नातक होना जरूरी है।

निफ्ट जैसे इंस्टीट्यूट में एडमिशन के लिए लिखित परीक्षा, ग्रुप डिस्कशन और पर्सनल इंटरव्यू के दौर से गुजरना पड़ता है। पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स में प्रवेश के लिए किसी भी विषय में स्नातक होना जरूरी है।

कोर्स
यह एक प्रोफेशनल कोर्स है, जो 12वीं के बाद किया जा सकता है। इसके तहत अपेरल डिजाइनिंग, फैशन डिजाइनिंग, प्रोडक्शन मैनेजमेंट, क्लोदिंग टेक्नोलॉजी, टेक्सटाइल साइंस, अपेरल कंस्ट्रक्शन मैथड, फैब्रिक डाइंग एवं प्रिंटिंग, कलर मिक्सिंग और कंप्यूटर एडेड डिजाइन आदि क्षेत्रों में से किसी एक का चुनाव कर सकते हैं। इसमें सर्टिफिकेट, डिप्लोमा, एडवांस डिप्लोमा, फाउंडेशन डिग्री, डिग्री और पीजी डिग्री तक कोर्स उपलब्ध हैं।

कहां-कहां हैं अवसर
एपीजी शिमला यूनिवर्सिटी की एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर प्रियंका गोयल के मुताबिक कोर्स करने के बाद फैशन प्रोडक्शन मैनेजमेंट, फैशन मीडिया, क्वालिटी कंट्रोल, फैशन एक्सेसरीज डिजाइन और ब्रांड प्रमोशन में काम कर सकते हैं। इसके अलावा कॉस्ट्यूम डिजाइनर, फैशन कंसल्टेंट, टेक्निकल डिजाइनर, ग्राफिक डिजाइनर, प्रोडक्शन पैटर्न मेकर, फैशन को-ऑर्डिनेटर आदि के रूप में भी शानदार करियर बना सकते हैं।

आमदनी
अगर शुरुआती आमदनी की बात करें तो आपका वेतन इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस शहर में और किस क्लाइंट के लिए काम कर रहे हैं। शुरुआती वेतन 5,000 से 20,000 रुपये तक कुछ भी हो सकता है। समय के साथ वेतन में इजाफा होता है।

प्रमुख संस्थान
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी (निफ्ट), हौज खास, नई दिल्ली, www.nift.ac.in
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन, पालदी, अहमदाबाद, www.nid.edu
एपीजी शिमला यूनिवर्सिटी, शिमला, हि.प्र. www.apg.edu.in  
इग्नू, मैदानगढ़ी, नई दिल्ली, www.ignou.ac.in
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन, पालदी, अहमदाबाद, www.nid.edu

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Wednesday, July 8, 2015

वीडियो गेमिंग के क्षेत्र में करियर के अवसर

मनोरंजन और खेल के नाम से अब मैदानी भागदौड ही मस्तिष्क में नहीं आती कंप्यूटर ने उसे घर बैठे दिमागी भागदौड का खेल बना दिया है। शहरी परिवेश में पले-बढ़े बच्चे आज गुल्ली-डंडा, कबड्डी या खो-खो जैसे खेलों से वाफिक हों या न हों लेकिन मारियो, सुपर कांट्रा, बॉबरमैन जैसे वीडियो गेमों से वे भली-भांति वाकिफ होते हैं। जैसे-जैसे वीडियो गेम की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है, उसी तेजी से यह उद्योग भी फल-फूल रहा है। नए-नए वीडियो गेमों के लिए नई-नई तकनीकें भी ईजाद की जा रही हैं।

गौरतलब है कि वीडियो गेम के निर्माण की प्रक्रिया काफी जटिल होती है। वीडियो गेमों का निर्माण मल्टीमीडिया, ग्राफिक्स सॉफ्टवेयर और कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के प्रयोग द्वारा किया जाता है। एक बड़े कंप्यूटर गेम का निर्माण करने में कई अनुभवी लोगों की टीम को कुछ महीनों का समय लग सकता है। आजकल वीडियो गेस को अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जाता है।

सबसे पहले वीडियो गेम की स्क्रिप्ट में लिखित रूप में यह तय कर लिया जाता है कि गेम में कौन से पात्र डाले जाएँ तथा कैसे दृश्य निर्मित किए जाएँ। इसके बाद स्टोरी बोर्ड तैयार किया जाता है जिसमें सभी संभावित दृश्यों के फ्रेम तैयार किए जाते हैं। इसके बाद एडोब फोटोशॉप सॉफ्टवेयर में 3-डी तथा फोटोमैस सॉफ्टवेयर में 2-डी एनिमेटेड चित्र बनाए जाते हैं।

इन चित्रों में एसएसआई जैसे सॉफ्टवेयर की मदद से गति उत्पन्न की जाती है। इसके बाद गेमिंग इंजन की मदद से एनिमेटेड इमेज को की-बोर्ड तथा माउस की सहायता से नियंत्रित किया जाता है। गेम इंजन में लिखे कमांड से ही कंप्यूटर के किसी बटन को दबाने से गोली चलती है या एनीमेटेड इमेज आगे-पीछे, ऊपर-नीचे बढ़ती है।

वीडियो गेम को मुख्य तौर पर चार भागों में बांटा जाता है। एस बॉस गेम, कंप्यूटर गेम, मोबाइल गम तथा थिएटर गेम। एस बॉस गेम में एक मशीन को तार द्वारा टीवी स्क्रीन से जोड़ा जाता है। कंप्यूटर गेम को कंप्यूटर पर सीडी या इंटरनेट की मदद से लोड किया जाता है। मोबाइल गेम का फार्मेट कंप्यूटर गेम से मिलता-जुलता ही होता है लेकिन सेटछोटा हो जाता है। थिएटर गेम बड़े-बड़े एम्यूजमेंट पार्क, मल्टीप्लेस तथा मॉल्स में लगाए जाते हैं।

वीडियो गेम बनाने की प्रक्रिया वैज्ञानिक ज्ञान और कलात्मक एवं रचनात्मक क्षमता का अनोखा मिश्रण है। यह काफी वक्त लेने वाला काम है इसलिए वीडियो गेम के निर्माण में कलात्मक प्रतिभा, दिमागी कौशल ही नहीं बल्कि धैर्य का होना भी बहुत आवश्यक है।

वीडियो गेम डिजाइनिंग में करियर बनाने हेतु रचनात्मक अभिरुचि के अलावा कंप्यूटर गेम खेलने का शौक भी होना चाहिए चूंकि गेमिंग कंप्यूटर एनिमेशन क्षेत्र की ही एक नई शाखा है इसलिए पहले एनिमेशन के एक्स्पर्ट ही गेम डेवलप का कार्य किया करते थे लेकिन गेमिंग बाजारकी बढ़ती मांग औरनए गेमिंग सॉफ्टवेयर के विकास ने गेमिंग को एक नए अध्ययन क्षेत्र के रूप में विकसित कर दिया है।

वीडियो गेमिंग के क्षेत्र में सबसे ज्यादा काम कनाड़ा में होता है। अब भारत में भी इसका दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। भारत में गेमिंग में डिप्लोमा या एडवांस डिप्लोमा पाठ्यक्रम कराया जाता है। वीडियो गेम डिजाइनिंग सिखाने वाले संस्थानों में प्रवेश लेने के लिए स्नातक होना आवश्यक है। कुछ संस्थान एनीमेशन तथा मल्टीमीडिया के कोर्स के दौरान ही गेमिंग की जानकारी देते हैं। इन सभी कोर्सों की अवधि एक से दो वर्ष होती है।

कोर्स के दौरान ड्राइंग, डिजाइनिंग, प्रोडशन, प्रोग्रामिंग, लाइटिंग के साथ-साथ एनीमेशन व डिजीटल आर्ट्स सिखाया जाता है। गेम डेवलपमेंट में लाइफ ड्राइंग तथा स्कल्पचर जैसी कलाओं को समझना जरूरी होता है। वीडियो गेमिंग के पाठ्यक्रम के दौरान सभी संस्थान छात्रों को प्रोजेक्ट वर्क देते हैं जिसके तहत उन्हें एक छोटा गेम तैयारकरना होता है। कोर्स में छात्रों को यूँ तो गेम डेवलपमेंट की पूरी जानकारी दी जाती हैलेकिन कोर्स के दौरान ही छात्र अपनी रुचि का क्षेत्र चुन लेते हैं और बाद में इसी क्षेत्र के विशेषज्ञ बनते हैं। वैसे भी आज मार्केट में विशेषज्ञ की ही माँग है।

कंप्यूटर जीवन के जिस-जिस क्षेत्र से जुड़ता जा रहा है, उस-उस क्षेत्र में रोजगारके नए अवसर पैदा करता जा रहा है। कंप्यूटर के प्रयोग के कारण भारत में गेमिंग उद्योग तेजी से विकसित हो रहा है। एक अनुमान के अनुसार भारत में आज करीब पचास हजार गेमिंग प्रोफेशनल्स की जरूरत है लेकिन मात्र दस से पंद्रह फीसदी प्रोफेशनल्स ही बाजार में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं।

गेमिंग मार्केट में गेम डेवलपर, गेम प्रोग्रामर, गेम ऑथर, एनिमेटर, ग्राफिक डिजाइनर, स्कल्पचर, गेम लाइटिंग व साउंड एक्सपर्ट की जबर्दस्त मांग है। देश में अभी गेम डेवलपमेंट के क्षेत्र में इंडिया गेम, ध्रुव इंटरेटिव, पाराडौस, वी-बीइंग जैसी कुछ प्रमुख कंपनियाँ काम कर रही हैं। इसके अलावा सोनी, ईए जैसी मल्टीनेशनल कंपनियाँ भी भारत में अपनी दस्तक दे चुकी हैं। भविष्य में इन्हीं कंपनियों में करियर की अपार संभावनाएँ प्रोफेशनल्स तलाश सकते हैं। भारत में गेमिंग उद्योग के तेजी से पनपने की प्रमुख वजह गेम डेवलपमेंट पर अन्य देशों के मुकाबले कम पैसा खर्च होता है।

वीडियो गेमिंग का कोर्स कराने वाले देश के प्रमुख संस्थान इस प्रकार हैं:
नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ डिजाइन पाल्दी, अहमदाबाद।
सेंटर फॉर इलेट्रॉनिस डिजाइन एंड टेक्नोलॉजी ऑफ इंडिया, चंडीगढ़।
फॉरच्यून इंस्टिट्यूट ऑफ कम्युनिकेशन, नई दिल्ली।
महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, केरल।
माया एके डमी ऑफ एडवांस सिनेमेटिस, मुंबई।