Tuesday, June 6, 2017

ऑक्यूपेशनल थैरेपी में करियर

अगर आपकी रूचि मेडिकल क्षेत्रों में है और अगर आप इसमें कुछ हटकर करना चाहते हैं तो ऑक्यूपेशनल थैरेपी कोर्स कर सकते हैं। ऑक्यूपेशनल थैरेपिस्टों की मांग भारत में तेजी से बढ़ रही है, लेकिन प्रोफेशनल्स की बेहद कमी है। यही वजह है कि इस पेशे में रोजगार की काफी संभावनाएं हैं।

जानिए, ऑक्यूपेशनल थैरेपी के बारे में ::::::::
ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट का काम मुख्य तौर पर अपंग लोगों को दिनचर्या के कामों को करने के लिए प्रशिक्षण देना होता है। वे मरीजों को भावनात्मक रूप के साथ-साथ शारीरिक तौर पर भी इस बात के लिए संकल्पित कराते हैं कि कैसे वे लोग एक स्वतंत्र और संतुष्ट जीवन जी सकते हैं। एक ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट का काम मरीज के कार्यकलापों और उसकी प्रोन्नति का पूरा ट्रैक रिकॉर्ड मेंटेन करने का होता है।
ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट के लिए जरूरी है कि वो बहुत ही धैर्यवान हो और अपने मरीज के साथ एक विश्वसनीय और मजबूत भावनात्मक रिश्ता बना सके। इनोवेटिव होना उसके लिए सोने पर सुहागे जैसा है। ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट्स की भूमिका में अब वैश्विक स्तर पर बड़ा परिवर्तन आया है। वे अब लोगों के जीवन में एक अहम भूमिका निभा रहे हैं, सेल्फ-केयर व्यवहार से लेकर कर्मचारी परिस्थिति विज्ञान तक।
मेडिकल और पैरामेडिकल प्रोफेशन की ही तरह ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट्स के लिए भी हॉस्पिटल्स, ऑर्थोपेडिक्स विभाग, रिहेबिलिटेशन सेंटर्स, स्पेशल स्कूल्स, हेल्थकेयर सेंटर्स आदि में रोजगार की संभावानाएं हैं।
एक क्वालिफाइड ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट बनने के लिए आपको बीपीटी या बीओटी की बैचलर डिग्री या अनिवार्य विषय में डिप्लोमा करना होता है। इन कोर्सों के लिए आवश्यक शैक्षणिक योग्यता फिजिक्स-कैमिस्ट्री-मैथ्स के साथ बारहवीं उत्तीर्ण करना है।
भारत से लेकर अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया समेत तमाम देशों में ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट की खूब डिमांड है। हालांकि विदेशों में उनसे दो साल के अनुभव की मांग की जाती है। वैसे ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट को सेलरी भी अच्छी मिलती है, पर ये अपनी प्रैक्टिस भी शुरू कर सकते हैं।


ऑक्यूपेशनल थैरेपी शारीरिक या मानसिक रूप से अक्षम लोगों को उनकी रोजाना की जिंदगी को सुगम बनाने में मदद करती है। इसकी जरूरत ऑटिज्म या इमोशनल डिसऑर्डर के शिकार हुए बच्चों और न्यूरोलॉजिकल या साइकेट्रिक डिसऑर्डर से प्रभावित युवाओं को होती है।

संबंधित कोर्सेज :::::::

इस कोर्स में पढाई करने के लिए स्टूडेंट्स का साइंस स्ट्रीम से 12वीं पास होना जरूरी है। इस कोर्स में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया जा सकता है। इस कोर्स में एंट्रेस एग्जाम के द्वारा ही स्टूडेंट्स को एडमिशन मिलता है।

नौकरी की असीम संभावनाएं :::::::::

ऑक्यूपेशनल थैरेपिस्ट को सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों, मेंटल हेल्थ केयर सेंटर, रिहेबिलेशन सेंटर, एडल्ट डे केयर में नौकरी मिल सकती है। थैरेपिस्ट या कंसल्टेंट के रूप में अगर आप चाहें तो अपना क्लीनिक भी खोल सकते हैं।

यहां से करे कोर्स ::::::::::


- राष्ट्रीय पुनर्वास प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान, कटक
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एंड एजुकेशन रिसर्च, पटना
- इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी, दिल्ली
- क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर
- दिल्ली इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल डेवलपमेंट, दिल्ली

Sunday, June 4, 2017

वुड साइंस-टेक्नोलॉजी में कॅरियर

नई दिल्ली. वुड साइंस और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में करियर के चमकीले अवसर हैं। वर्तमान में इस क्षेत्र में भारी मांग है तथा यह मांग भविष्य में भी बने रहने की संभावना है। कई संस्थानों में इससे संबंधित संचालित स्पेशलाइज्ड कोर्स कर वुड साइंस के क्षेत्र में करियर बनाया जा सकता है। इस बारे में और विस्तार से जानिए।
 
काष्ठ उत्पाद यानी वुड प्रोडक्ट्स हमारी विविध आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। अगर हम अपने आस-पास की वस्तुओं पर नजर डालें तो पाएंगे कि कार्य के औजार, खिलौने, मकान, फर्नीचर, पुस्तकें और समाचारपत्र आदि अनेक वस्तुएं काष्ठ द्वारा बनाई जाती हैं। ऐसी सूची में प्लाइवुड पार्टिकल बोर्ड, फाइबर बोर्ड, पैलेट्स और अनेक अन्य औद्योगिक एवं उपभोक्ता सामग्री भी शामिल हैं और इस सूची में अन्य ढेरों नाम और सम्मिलित किए जा सकते हैं।
 
हमारे देश में लकड़ी के  कुल योगदान में से लगभग 40 प्रतिशत भाग कागज बनाने में प्रयुक्त होता है। टिंबर प्रोसेसिंग उद्योग की प्राइमरी वुड प्रोसेसिंग (सॉ मिलिंग पैनल्स तथा लुगदी एवं कागज) और वानिकी व्यवसायों में रोजगार देने में अहम भूमिका है। इनमें से अधिकांश व्यवसाय लघु तथा मझोले उद्यम हैं। काष्ठ एवं इससे बने विविध उत्पादों का उपयोग बढ़ने से काष्ठ उद्योग तेजी से विकसित हो रहे हैं। 

मेन कोर्सेस-एंट्री
भारत में  आईसीएफआरई के अधीन वन अनुसंधान संस्थान विश्वविद्यालय, देहरादून काष्ठ प्रौद्योगिकी में मास्टर डिग्री पाठ्यक्रम चलाता है। काष्ठ प्रौद्योगिकी में स्नातकोत्तर डिग्री पाठ्यक्रम में चयन के लिए कोई भी स्टूडेंट, विज्ञान/वानिकी/कृषि/बुनियादी विज्ञान आदि में स्नातक योग्यता पूरी करने के बाद आवेदन कर सकता है। स्नातकोत्तर डिग्री पाठ्यक्रम में चयन अखिल भारतीय स्तर की प्रवेश परीक्षा के माध्यम से किया जाता है। इसी तरह काष्ठ विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी संस्थान (आईडब्ल्यूएसटी), बैंगलुरु, भारतीय प्लाइवुड उद्योग अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (आईपीआईआरटीआई), बैंगलुरु, केंद्रीय लुगदी एवं कागज अनुसंधान संस्थान, (सीपीपीआरआई) सहारनपुर में पीएचडी तथा अनुसंधान पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं। कृषि वैज्ञानिक भर्ती बोर्ड (एएसआरबी) जो भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पूसा, नई दिल्ली से संबद्ध है, के द्वारा संचालित वानिकी कोर्स भी बहुत उपयोगी है। इसके अतिरिक्त काष्ठ प्रौद्योगिकी तथा समवर्गी विज्ञान में अध्येतावृत्तियां भी विभिन्न राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों/संगठनों द्वारा चलाई जाती हैं। 
 
कोर्स कंटेंट
बीएससी वानिकी में काष्ठ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पढ़ाया जाने वाला एक अनिवार्य विषय है। इंजीनियरी, सामग्री विज्ञान तथा प्रसंस्करण, रसायन विज्ञान या विपणन में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों के लिए काष्ठ विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी एक बहुत ही आकर्षक करियर है। यह एक ऐसा मल्टी डिसिप्लीनरी क्षेत्र है, जिसका प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग से सीधा संबंध होने के साथ भौतिकी विज्ञान से भी गहरा जुड़ाव है। काष्ठ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के स्नातक पाठ्यक्रम में एनाटॉमिकल, भौतिकी, रासायनिक तथा यांत्रिक संपत्तियों का ज्ञान शामिल होता है।
 
इसके अतिरिक्त छात्र व्यापक काष्ठ  प्रसंस्करण कार्यों, काष्ठ सीजनिंग, काष्ठ परिरक्षण, पुनर्निर्मित काष्ठ आधारित पैनलों, वन उत्पादों, गोंद, टिंबर इंजीनियरी तथा निर्माण, उत्पाद-डिजाइन तथा अवसंरचना, काष्ठ कार्य तथा परिष्करण और रासायनिक परिशोधन में भी प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं। अपनी रुचि के  करियर के आधार पर छात्र किसी निर्दिष्ट क्षेत्र में अतिरिक्त पाठ्यक्रमों का चयन करके काष्ठ का अपना ज्ञान और विस्तृत कर सकते हैं। कुछ विश्वविद्यालय काष्ठ इंजीनियरी में डिग्री को अपने इंजीनियरी पाठ्यक्रम के एक भाग के रूप में चलाते हैं। काष्ठ प्रौद्योगिकी से संबंधित सभी पहलू पाठ्यक्रमों में सम्मिलित किए जाते हैं। 
 
जॉब आॅप्शंस-इनकम
विनिर्माण, तकनीकी सेवा, अनुसंधान तथा विपणन ऐसे विभिन्न क्षेत्र हैं, जहां काष्ठ प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों की जरूरत होती है। काष्ठ प्रौद्योगिकी में पीजी कैंडिडेट्स केंद्र सरकार, राज्य सरकारों तथा वन विभागों में वैज्ञानिक, हस्तशिल्प संवर्धन अधिकारी, गुणवत्ता निरीक्षक तथा लॉगिंग अधिकारी के पदों पर भर्ती किए जाते हैं। ग्रामीण विकास से जुड़ी परियोजनाओं में काष्ठ प्रौद्योगिकी एक्सपर्ट लघु और कुटीर उद्योगों से संबंधित कार्यों के लिए परियोजना अधिकारी के रूप में नियुक्त किए जाते हैं। निजी क्षेत्र में ये व्यवसायी अपनी विशेषज्ञता के आधार पर काष्ठ आधारित उद्योगों, अनुसंधान एवं विकास कंपनियों में तकनीकी कार्मिक के रूप में नियुक्त होते हैं।
 
आजकल काष्ठ प्रौद्योगिक विशेषज्ञों को चारकोल उद्योग, काष्ठ निर्माण उद्योग, इंजीनियर्ड वुड या संयुक्त काष्ठ उद्योगों, सॉ मिलिंग तथा सॉ डाक्टरिंग, रेजिन तथा टर्पेंटाइन उद्योग एवं औधषीय पादप यूनिट, काष्ठ नमूना निर्धारण, लुगदी एवं कागज उद्योगों एवं अन्य काष्ठ उत्पाद आधारित उद्योगों में क्वालिटी कंट्रोलर तथा प्रोडक्शन मैनेजर के रूप में भर्ती किया जाता है। इनके अतिरिक्त, नेट एग्जाम क्लीयर कर प्रोफेसर पद के लिए भी अप्लाई कर सकते हैं। काष्ठ विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में मिलने वाले वेतन की तुलना देश में इंजीनियरों को दिए जाने वाले वेतन से की जा सकती है। 
 
प्रमुख संस्थान 
-इंदिरा गांधी कृषि विवि, रायपुर 
वेबसाइट: www.igau.edu.in
-भारतीय वन प्रबंधन संस्थान
वेबसाइट: : www.iifm.ac.in
-जेएलएन एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, जबलपुर
वेबसाइट: www.jnkvv.org

Thursday, June 1, 2017

एडवेंचर स्पोर्टस में बनाएं करियर

क्या आपको साहसिक खेल पसंद है? अगर आप कुदरत के करीब रहना पसंद करते हैं तो एडवेंचर स्पोर्टस के क्षेत्र में आप करियर बना सकते हैं। घरेलू पर्यटन का विकास होने की वजह से एडवेंचर स्पोर्टस के पेशेवर खिलाड़ियों की मांग में भी कई गुना का इजाफा हुआ है। इसके अलावा नेशनल जियोग्राफिक और डिस्कवरी जैसे चैनल सामान्य यात्राओं की बजाय रोमांचक यात्राओं पर जाने वाले पर्यटकों को विशेष लाभ भी मुहैया कराते हैं।
क्या है एडवेंचर स्पोर्टस
एडवेंचर स्पोर्टस को एक्शन स्पोर्ट्स, एग्रो स्पोर्ट्स और एक्सट्रीम स्पोर्ट के नाम से भी जाना जाता है। इस तरह के खेलों में वो गतिविधियां (खेल संबंधी) आती हैं, जिनमें बड़े खतरे अंतर्निहित होते हैं। इन गतिविधियों में गति, उच्च स्तर के शारीरिक दमखम और विशेष कौशल की जरूरत होती है।
कई तरह के एडवेंचर स्पोर्ट्स
इन खेलों को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है- एअर स्पोर्ट्स, लैंड स्पोर्ट्स और वॉटर स्पोर्ट्स। खेलों की इन श्रेणियों में ढेर सारे खेल शामिल हैं, इनमें से कुछ प्रमुख हैं-
एअर स्पोर्ट्स-  बंजी जंपिंग, पैराग्लाइडिंग, स्काई डाइविंग और स्काई सर्फिग आदि।
लैंड स्पोर्ट्स-  रॉक क्लाइम्बिंग, स्केट बोर्डिग, माउंटेन बाइकिंग, स्कीइंग, स्नो बोर्डिंग और ट्रैकिंग आदि।
वाटर स्पोर्ट्स-  स्कूबा डाइविंग, व्हाइट वाटर राफ्टिंग, कायकिंग, केनोइंग, क्िलफ डाइविंग,स्नॉर्केलिंग और याट रेसिंग आदि।
पेशेवरों का काम
एडवेंचर स्पोर्टस के क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवरों का काम भौगोलिक दृष्टि से उन क्षेत्रों की तलाश करना होता है जहां एडवेंचर स्पोर्ट्स की संभावना हो। इसके साथ ही वह उस क्षेत्र में खेल से जुड़े जोखिमों का आकलन भी करते हैं। इन कार्यों को करने के बाद वह खेल गतिविधियों को संचालित करने का प्रारूप तैयार करते हैं और संभावित खतरों से निपटने के लिए आपदा प्रबंधन की कार्ययोजना भी बनाते हैं। यह पेशा देखने में भले ही बेहद रोमांचक हो, लेकिन असल जिंदगी में यह काफी चुनौतीपूर्ण है। इसके पेशेवरों को हमेशा जोखिम उठाते हुए जिंदगी की महीन डोर के सहारे चलना पड़ता है। उन्हें कई बार घबराए हुए और कई बार उत्साही क्लाइंटों को संभालने की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती है।
रोजगार के मौके
साहसिक खेल के क्षेत्र में सबसे ज्यादा रोजगार एडवेंचर स्पोर्ट्स कंपनियां देती हैं। हालांकि इस क्षेत्र में कार्यरत लोगों के पास काम में बदलाव करके भी रोजगार और अपनी पेशेवर रुचि को बरकरार रखने का विकल्प होता है। वह स्कूलों के साथ मिलकर छात्रों के लिए आउटडोर एजुकेशन प्रोग्राम संचालित कर सकते हैं, तो पर्सनल ट्रेनर और कैजुअल टूर गाइड के रूप में भी कार्य कर सकते हैं। इसके अलावा वह अपनी निजी एडवेंचर स्पोर्ट्स कंपनी भी शुरू कर सकते हैं। कुछ लोग तो इस क्षेत्र में काम करने के लिए दुनिया की सैर करने का विकल्प भी चुनते हैं।
योग्यता
-एडवेंचर स्पोर्ट्स के क्षेत्र में बतौर पेशेवर काम करने के लिए किसी विषय के साथ बारहवीं या बैचलर डिग्री प्राप्त होना पर्याप्त है। इस योग्यता के आधार पर एडवेंचर स्पोर्ट्स में डिप्लोमा या डिग्री पाठयक्रम संचालित करने वाले संस्थानों में प्रवेश लिया जा सकता है। इन संस्थानों में प्रशिक्षण पाठयक्रम पूरा करने के बाद आसानी से रोजगार प्राप्त किया जा सकता है।
-इसके अलावा शारीरिक रूप से मजबूत और स्वस्थ होना भी आवश्यक होता है।
-इस पेशे में जल आधारित खेलों के लिए तैराकी में निपुण होना जरूरी होता है।
-अंग्रेजी और किसी एक विदेशी भाषा में दक्ष होना भी इस पेशे में मददगार होता है।
ऐसे में अगर आपको भी साहसिक खेल का रोमांच पसंद है तो इस क्षेत्र में अपना करियर बना सकते हैं

Monday, May 29, 2017

एथिकल हैकिंग में करियर

वचरुअल दुनिया का दायरा जिस तरह दिन-दुनी रात-चौगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है, आईटी (इफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी) आधारित सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं भी परेशानी का सबब बन रही हैं। हर रोज दुनिया के किसी न किसी कोने में नेटवर्क, वेबसाइट और ई-मेल अकाउंट्स की सुरक्षा दांव पर लगी होती है। इंटरनेट पर साइबर अपराध के मामलों में चिंताजनक रफ्तार से वृद्धि देखी जा रही है
इन मामलों में किसी व्यक्ति या संस्था के कंप्यूटर सिस्टम में सेंध लगाकर संवेदनशील डाटा चुराने से लेकर पासवर्ड चोरी करने, भद्दे ई-मेल भेजने और ई-मेल अकाउंट को हैक करने जैसी घटनाएं शामिल होती हैं। इंटरनेट से जुड़े कंप्यूटरों से सूचनाओं को अवैध ढंग से प्राप्त करने वालों को हैकर कहा जाता है। मगर जब यही काम कंप्यूटर सिस्टम के सुरक्षा उपायों को जांचने और उसे पुख्ता बनाने के उद्ेदश्य से किया जाता है, तो उसे एथिकल हैकिंग कहते हैं। इस कार्य को करने वाले पेशेवर एथिकल हैकर के नाम से जाने जाते हैं। साइबर अपराधों की बढ़ती तादाद के बीच मूल्यवान इंफॉर्मेशन सिस्टम की सुरक्षा के लिए एथिकल हैकरों की मांग जोर पकड़ रही है। इस कारण यह पेशा नौकरी की आकर्षक संभावनाओं के द्वार खोल रहा है।

एथिकल हैकर का काम

इन पेशेवरों को व्हाइट हैट्स या पेनिशन टेस्टर के नाम से भी जाना जाता है। कंप्यूटर और नेटवर्क से संबंधित तकनीकों में इन्हें विशेषज्ञता प्राप्त होती है।

इनका काम अपने नियोक्ता (कंप्यूटर सिक्योरिटी उत्पाद बनाने वाली कंपनी) के लिए किसी निर्धारित कंप्यूटर सिस्टम पर हमला करना होता है, ताकि सिस्टम की उन कमियों का पता लगाया जा सके, जिन्हें तलाशकर हैकर साइबर अपराधों को अंजाम देते हैं।

एक प्रकार से एथिकल हैकर भी हैकरों (साइबर अपराधी) जैसा ही काम करते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य किसी कंप्यूटर सिस्टम को नुकसान पहुंचाने की बजाए उसे पहले से ज्यादा सुरक्षित बनाना होता है। इंटरनेट पर बढ़ती निर्भरता के कारण एथिकल हैकर आईटी सिक्योरिटी इंडस्ट्री की अहम जरूरत बन गए हैं। यह एक चुनौतीपूर्ण पेशा है, जो जरूरत पड़ने पर 24 घंटे काम में जुट रहने की भी अपेक्षा रखता है। एथिकल हैकर को हमेशा खुद को कंप्यूटर सिस्टम से संबंधित नई तकनीकों से अपडेट रखना होता है, ताकि वह नई चुनौतियों का तेजी से हल तलाश सकें।

पर्याप्त हैं रोजगार के अवसर
•फिलहाल देश में एथिकल हैकरों की काफी कमी है। इसलिए कई-कई कंपनियां अपने नेटवर्क में मौजूद खामियों को खोजने के लिए एक ही पेशेवर की मदद लेती हैं। इन पेशेवरों की सरकारी क्षेत्र के संस्थानों में भी काफी पूछ है। सेना, पुलिस बलों (सीबीआई और एनआईए शामिल), फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं और रक्षा अनुसंधान संगठनों में विशेष रूप से एथिकल हैकरों की मदद ली जाती है। जासूसी एजेंसियों में भी इनके लिए काफी अवसर हैं।

 योग्यता
•    इस पेशे में आने के लिए कंप्यूटर प्रोग्रामिंग का अच्छा ज्ञान जरूरी होता है। इसलिए कंप्यूटर साइंस, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी या कंप्यूटर इंजीनियरिंग में बैचलर डिग्री का होना आवश्यक है। शैक्षणिक योग्यता के साथ उ, उ++ और ढ83ँल्लआदि प्रोग्रामिंग लैंग्वेज और कंप्यूटर में इस्तेमाल होने वाले ऑपरेटिंग सिस्टम मसलन विंडोज या लिनक्स की जानकारी का होना भी जरूरी है।

•    उपलब्ध पाठय़क्रम
•    सर्टिफिकेट कोर्स इन साइबर लॉ
•    सीसीएनए सर्टिफिकेशन
•    सर्टिफाइड एथिकल हैकर
•    सर्टिफाइड इंफॉर्मेशन सिस्टम सिक्योरिटी प्रोफेशनल
•    एमएससी साइबर फॉरेंसिक्स एंड इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी
•    पीजी डिप्लोमा इन डिजिटल एंड साइबर फॉरेंसिक्स
•    पीजी डिप्लोमा इन साइबर लॉ
•    पीजी डिप्लोमा इन आईटी सिक्योरिटी
•    एडवांस डिप्लोमा इन एथिकल हैकिंग
•    संबंधित संस्थान
•    एनआईईएलआईटी
•    सीईआरटी
•    इंडियन स्कूल ऑफ एथिकल हैकिंग
•    तिलक महाराष्ट्र यूनिवर्सिटी
•    इन्नोबज नॉलेज सॉल्यूशन्स प्रा. लि.
•    आईएमटी गाजियाबाद
•    इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी

Thursday, May 25, 2017

ड्रामा मे करियर

अभिनय, निर्देशन, डिजाइन या थियेटर से जुड़े अन्य क्षेत्रों मे करियर बनाने का शौक यदि आप भी अपने मन में पाले बैठे हैं और अपने इस शौक को पेशेवर ट्रेनिंग के जरिए निखारना चाहते हैं तो इस क्षेत्र के प्रतिष्ठित संस्थान नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के डिप्लोमा इन ड्रमैटिक आर्ट्स में आवेदन कर सकते हैं। इस संस्थान में आवेदन वेबसाइट से फॉर्म डाउनलोड करके भी किया जा सकता है और पोस्ट से मंगवाकर भी। इस कोर्स में आवेदन की अंतिम तिथि 8 मई 2015 रखी गई है। चयन प्रक्रिया में ऑडिशन, वर्क शॉप और फिटनेस टैस्ट होगा।
एनएसडी दिल्ली
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के तहत आने वाला एक स्वायत्त संस्थान है। इसकी स्थापना संगीत नाटक अकादमी ने वर्ष 1959 मे की थी। थियेटर की विभिन्न विधाओं में कलाकारों के हुनर को प्रशिक्षण के जरिए निखारने वाले इस संस्थान से फिल्म और थियेटर जगत की कई दिग्गज हस्तियां प्रशिक्षण ले चुकी हैं। यह संस्थान नई दिल्ली में स्थित है। थिएटर ट्रेनिंग में इस संस्थान का विश्वभर में एक अहम स्थान है। आप भी यहां थिएटर ट्रेनिंग लेकर अपना कौशल निखार सकते हैं और अच्छा करियर बना सकते हैं।
क्या है योग्यता
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के तीन वर्षीय कोर्स में वे लोग आवेदन कर सकते हैं, जिन्होंने भारत से या विदेश से ग्रेजुएशन की हो और कम से कम छह माह तक थिएटर प्रोडक्शंस में भागीदारी की हो और हिंदी-अंग्रेजी की जानकारी हो। 1 जुलाई 2015 को आवेदक की उम्र कम से कम 20 साल और अधिक से अधिक 30 साल हो। एससी/ एसटी को इसमें पांच साल की छूट प्राप्त है।
कैसे होगा चयन
एनएसडी के इस कोर्स में प्रवेश के इच्छुक आवेदकों के एप्टीट्यूड और टैलेंट की परख विशेषज्ञों की एक कमेटी करेगी। प्रवेश के इच्छुक कैंडिडेट्स को सबसे पहले एक प्रीलिमिनरी टेस्ट या ऑडिशन देना होगा। यह ऑडिशन/टेस्ट देशभर मे कुल छह केंद्रों पर अलग-अलग दिन करवाया जाएगा। गुवाहाटी में यह टेस्ट 23 मई को होना है। कोलकाता में इसकी तारीख 25 व 26 मई है। बेंगलुरू में यह टैस्ट 28 मई को, मुंबई में 2 और 3 जून को होगा। लखनऊ में यह टेस्ट 5 और 6 जून को और दिल्ली में 8,9,10 व 11 जून को होगा। इस टेस्ट को पास करने वाले आवेदकों को फिर 16 जून से 20 जून तक चलने वाली पांच दिवसीय वर्कशॉप में हिस्सा लेना होगा। इसके बाद इनके अंतिम चयन पर फैसला लिया जाएगा। एडमिशन के लिए चयनित लोगों का फिजिकल फिटनेस की जांच के लिए मेडिकल टेस्ट भी करवाया जाएगा। इसमें उत्तीर्ण होने पर ही एडमिशन दिया जाएगा।
संस्था के संसाधन
एनएसडी से कोर्स करने वाले लोगों को इस संस्थान के उत्कृष्ट संसाधनों के प्रयोग के साथ-साथ यहां के रचनात्मक माहौल में खुद को ज्यादा से ज्यादा निखारने का अवसर मिलता है। यह काफी उपयोगी साबित होता है। यहां के स्टूडेंट्स को थिएटर और फिल्म क्षेत्र की विभिन्न हस्तियों के संपर्क में आने का अवसर तो मिलता ही है, साथ ही यहां की वीडियो-ऑडियो लाइब्रेरी, परफॉर्मिग स्पेस आदि की मदद से वे अपने खास कौशल को ज्यादा रचनात्मक रूप दे पाते हैं। संस्थान में आयोजित होने वाले विभिन्न महोत्सवों में उन्हें अपने कौशल को मंच पर पेश करने का अवसर भी मिलता है। एनएसडी के इस तीन वर्षीय डिप्लोमा कोर्स में प्रवेश पाने वाले लोगों को प्रतिमाह 6000 रूपए का स्टाइपेंड भी दिया जाता है, ताकि वे अपने अकादमिक और अन्य खर्चे आसानी से चला सकें।
कैसे लें फॉर्म
आवेदन के लिए फॉर्म http://nsd.gov.in/ से डाउनलोड करें। संस्थान के पते पर 225 रूपए का डीडी या पे ऑर्डर भेजकर फॉर्म मंगवा भी सकते हैं। फॉर्म भरकर भेज रहे हैं तो The Director, National School of Drama, New Delhi के पक्ष में 150 रूपए का डीडी भेजें।
फॉर्म भेजने का पता
डाउनलोड किए हुए फॉर्म को पूरा भरकर संस्थान के पते पर आठ मई तक पहुंचाना है। फॉर्म के लिफाफे में 150 रूपए का डिमांड ड्राफ्ट या पे ऑर्डर होना जरूरी है, नहीं तो फॉर्म स्वीकार नहीं किया जाएगा। फॉर्म इस पते पर भेजना है-
Dean Academics, National School of Drama, Bahawalpur House, Bhagwandas Road, New Delhi - 110001
- See more at: http://www.patrika.com/news/career-courses/diploma-in-dramatic-arts-from-nsd-1031444/#sthash.mktB58eO.dpuf

Sunday, May 21, 2017

टॉय डिजाइनिंग में कैरियर

खिलौने सभी बच्चों को बेहद पसंद होते हैं। ये सिर्फ खेलने के नजरिए से नहीं बल्कि उनके मानसिक विकास में भी मदद करते हैं। वैसे भी आजकल बाजार में इतने नए-नए खिलौने आ गए हैं कि कई बार लेने से पहले सोचना पड़ता है। कहते हैं अपने अंदर का बच्चा कभी न मरने दें और खिलौनों की दुनिया का यह नया स्वरूप खिलौने के निर्माण में कैरियर की भी ढेरों संभावनाएं पैदा करता है।
टॉय डिजाइनर का काम खिलौनों से बच्चों का मनोरंजन तो हो ही, साथ ही, ऐसे खिलौने बनाना भी है जिनसे बच्चों को मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा भी मिले। टॉय डिजाइनिंग
खिलौने भी दो प्रकार के होते हैं - एक जिनसे बच्चे कुछ सीखते हैं और जिसे परिवार के साथ भी खेला जा सकता है, दूसरा सिर्फ मौज-मस्ती के लिए। पुराने समय में खिलौने प्राकृतिक चीजों से बनते थे जैसे लकड़ी, पत्थर या मिट्टी लेकिन आजकल यह प्लास्टिक, फर और अन्य कृत्रिम पदार्थ।
टॉय डिजाइनर खिलौनों को डिजाइन करते हैं और फिर बनाते हैं। उनका काम शुरू होता है ड्रॉइंग, स्केचिंग या कंप्यूटर से मॉडल तैयार करने से, फिर यह तय करना कि खिलौने का हर हिस्सा कैसे बनना है और फिर उसका एक नमूना तैयार करना।
खिलौनों को बाजार में दो प्रकार के उपभोक्ताओं के लिए रखा जाता है - एक तो बच्चे जो उनसे खेलते हैं और दूसरे उन ग्राहकों के लिए जो खिलौने एकत्रित करते हैं। गुड़िया से लेकर मैकेनिकल सेट, टॉय डिजाइनर बोर्ड गेम्स, पजल्स, कंप्यूटर गेम्स, स्टफ्ड एनिमल्स, रिमोट कंट्रोल कार, नवजात शिशु के लिए खिलौने आदि बनाते हैं।
आजकल के दौर के हिसाब से खिलौने बनाने के लिए डिजाइनर को न केवल बाजार के ट्रेंड से अवगत रहना चाहिए बल्कि अलग-अलग आयु वर्ग के बच्चों की जरूरतों को भी पता होना चाहिए। इस कैरियर में ग्राफिक डिजाइन, मैकेनिकल ड्रॉइंग और कलर के चुनाव की जानकारी हो तो अच्छी सफलता प्राप्त हो सकती है। टॉय डिजाइनर बच्चों के विशेषज्ञ के साथ काम करते हैं जिससे उन्हें हर आयु के बच्चों की जरूरत का पता चलता है। उनकी सफलता अच्छे, मनोरंजक, कल्पनाशील और सुरक्षित खिलौने बनाने पर निर्भर करती है। इस कैरियर के लिए व्यापार और प्रबंधन क्षमता होना जरूरी है।

इस कैरियर में विशिष्ट कोर्स कम हैं लेकिन ग्राफिक डिजाइन, इंडस्ट्रियल डिजाइन या कार्टूनिंग की जानकारी के साथ काम किया जा सकता है। इसमें कंप्यूटर की जानकारी होना जरूरी है। इसके अलावा, इंजीनियरिंग और मार्केटिंग में अनुभव भी प्राप्त कर सकते हैं। शिक्षक, विशेषज्ञ, साइकोलॉजिस्ट, इंजीनियर, आर्किटेक्ट और कंप्यूटर साइंस ग्रेजुएट भी टॉय डिजाइनिंग का कोर्स कर सकते हैं।
इंजीनियरिंग का ज्ञान तकनीक द्वारा निर्मित खिलौने के लिए होना जरूरी है। शिक्षक, विशेषज्ञ और मनोवैज्ञानिक हर आयु के बच्चों की जरूरतें आसानी से समझ सकते हैं इसलिए परामर्शदाता के तौर पर वह इस क्षेत्र में पैर जमाने में सक्षम हैं। कंप्यूटर साइंस ग्रेजुएट खिलौनों की सॉफ्टवेयर संबंधित कार्यात्मकता प्रदान कर सकते हैं।
कुछ टॉय डिजाइनर एजुकेशनल खिलौनों में भी विशेषज्ञता प्राप्त कर सकते हैं, कुछ सामान्य खिलौनों में या फिर कोई विशिष्ट क्षेत्र में कोर्स कर सकते हैं जैसे मॉडल मेकिंग, बोर्ड गेम्स, सॉफ्ट टॉय या पुराने खिलौनों की प्रतिकृति आदि। आजकल पालतू जानवरों के लिए खिलौने बनाना भी बढ़ती हुई इंडस्ट्री है।
टॉय डिजाइनर अगर चाहें तो किसी कंपनी में भी काम कर सकते हैं या स्वतंत्र रूप से खिलौने भी बना सकते हैं। अगर चाहें तो अपनी मैनुफैक्चरिंग यूनिट भी खोल सकते हैं। टॉय डिजाइन पर किताब लिख सकते हैं या किसी इंस्टिट्यूट में बतौर शिक्षक भी नौकरी की जा सकती है। इसके अलावा, बतौर इंटीरियर डिजाइनर बच्चों के कमरे या प्ले स्कूल थीम बेस्ड टॉय का इस्तेमाल करके डिजाइन कर सकते हैं। टॉय डिजाइन कंस्लटेंट या इसमें फ्रीलांसिंग भी की जा सकती है। एक बार डिजाइनर के तौर पर अपने आपको स्थापित करने के बाद अवसरों और आय की कमी नहीं होगी। लेकिन इस कैरियर में सफलता आपकी रचनात्मकता पर निर्भर करती है।
यहां से करें कोर्स -
1 नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ डिजाइन, अहमदाबाद

2 इंस्टिट्यूट ऑफ टॉय मेकिंग, कोलकाता

Tuesday, May 16, 2017

एग्रो-फॉरेस्ट्री में करियर

फॉरेस्ट्री के क्षेत्र में अभी बहुत कुछ एक्सप्लोर किया जाना बाकी है। इसमें नए इनोवेटिव रिसर्च की जरूरत है। फॉरेस्ट्री से ही जुड़ा फील्ड है एग्रो-फॉरेस्ट्री, जिसमें कृषि उत्पाद, वन पैदावार और आजीविका के क्रिएशन, कंजर्वेशन और साइंटिफिक मैनेजमेंट की जानकारी दी जाती है। फॉरेस्ट्री या एग्रीकल्चर या प्लांट साइंसेज में ग्रेजुएट एग्रो-फॉरेस्ट्री में मास्टर्स कर सकते हैं। इसके लिए यूनिवर्सिटी का एंट्रेंस एग्जाम देना होगा या फिर मेरिट के आधार पर भी दाखिला मिल सकता है। एग्रो फॉरेस्ट्री प्रोफेशनल्स बैंकिंग सेक्टर के अलावा कृषि विज्ञान केंद्र, आइटीसी जैसी प्लांटेशन कंपनी या बायो-फ्यूअल इंडस्ट्री में काम कर सकते हैं।
डॉ. अरविंद बिजलवान, असि. प्रोफेसर (टेक्निकल फॉरेस्ट्री), आइआइएफएम, भोपाल
लाइफ का सेकंड चांस
भिलाई इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से इलेक्ट्रॉनिक्स ऐंड टेलीकम्युनिकेशन में इंजीनियरिंग करने के बाद मैं टीसीएस मुंबई में जॉब कर रही थी। हर दिन कंप्यूटर के सामने एक-सा काम करते हुए मन नहींलग रहा था। बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट-सी गई थी। तब खुद से सवाल पूछा कि आखिर ये मैं क्या कर रही हूं? मैंने जॉब से इस्तीफा दिया और भोपाल स्थित आइआइएफएम में अप्लाई कर दिया। पहली बार इंटरव्यू में मुझे रिजेक्ट कर दिया गया, लेकिन दूसरी बार मैं सक्सेसफुल रही। इंस्टीट्यूट में पहले हफ्ते के ओरिएंटेशन प्रोग्राम में हमें फील्ड में जाने का मौका मिला। जंगलों के बीच रहने वाले लोगों, महिलाओं से मिली। वह मेरी लाइफ का सबसे बेहतरीन एक्सपोजर रहा। पूरे कोर्स के दौरान और भी बहुत कुछ अलग जानने और सीखने को मिला। जिंदगी ने मुझे सेकंड चांस दिया था। मैंने डेवलपमेंट मैनेजमेंट में स्पेशलाइजेशन पूरा करने के बाद प्रदान नामक एनजीओ को ज्वाइन किया। फिलहाल मैं बस्तर के दो ब्लॉक में 4000 परिवारों के बीच काम कर रही हूं। वन संपदा को कैसे बचाकर रखना है, किस तरह उनके संरक्षण से मानव का विकास जुड़ा है, इसे लेकर लोगों को जागरूक करना, उन्हें आजीविका के रास्ते बताना हमारे काम का हिस्सा है। यहां लाइफ टफ है और पैसे भी ज्यादा नहींमिलते, लेकिन जमीनी स्तर पर काम करने का जो अनुभव और सुकून मिल रहा है, वह ऑफिस के कमरे में बैठकर कभी हासिल नहींकर सकती थी।
स्नेहा कौशल
प्रोजेक्ट एग्जीक्यूटिव, प्रदान, बस्तर
फॉरेस्ट्री में ऑप्शंस अनलिमिटेड
फॉरेस्ट्री ग्रेजुएट्स और फॉरेस्ट मैनेजमेंट प्रोफेशनल्स के लिए गवर्नमेंट के अलावा प्राइवेट सेक्टर में अनेक अपॉच्र्युनिटीज हैं। गवर्नमेंट सेक्टर में स्टेट फॉरेस्ट सर्विस, एकेडेमिक्स और बैंकों में फॉरेस्ट्री ग्रेजुएट्स की नियुक्ति होती है। एसबीआइ, नाबार्ड, पंजाब नेशनल बैंक, यूनियन बैंक आदि के साथ ही आइसीआइसीआइ और एक्सिस जैसे प्राइवेट बैंकों में एग्रीकल्चर ऑफिसर, रूरल डेवलपमेंट ऑफिसर की जरूरत होती है, जो ग्रामीण विकास से जुड़ी गतिविधियों को देखते हैं। वहीं, विभिन्न फॉरेस्ट डेवलपमेंट कॉरपोरेशन, टाइगर फाउंडेशन, बैंबू मिशन, स्टेट लाइवलीहुड मिशन, वल्र्ड वाइल्डलाइफ फंड, इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च, वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, एनवॉयर्नमेंटल कंसल्टेंसीज, एनजीओ में भी फॉरेस्ट्री ग्रेजुएट के लिए अवसरों की कमी नहीं है। इन दिनों माइक्रोफाइनेंस सेक्टर, नॉन-टिंबर प्रोसेसिंग और पेपर इंडस्ट्री में भी फॉरेस्ट्री ग्रेजुएट्स या फॉरेस्ट मैनेजमेंट के स्पेशलाइज्ड प्रोफेशनल्स की अच्छी डिमांड देखी जा रही है। आइआइएफएम में 100 परसेंट प्लेसमेंट इस तथ्य की पुष्टि करता है। फॉरेस्ट्री ग्रेजुएट्स को शुरू में 25 से 30 हजार रुपये महीने मिल जाते हैं। एसबीआइ जैसे बैंकों में 7 से नौ लाख रुपये का सालाना पैकेज मिल जाता है। स्पेशलाइजेशन के कारण प्रमोशन भी जल्दी मिलता है। वहीं, प्राइवेट सेक्टर की कंपनीज में 10 लाख रुपये तक पैकेज स्टूडेंट्स को मिलता रहा है।
प्रो. अद्वैत एदगांवकर, प्लेसमेंट चेयरपर्सन
आइआइएफएम, भोपाल
कमा लो बूंद-बूंद पानी
प्रकृति को बचाने की मुहिम के परिणामस्वरूप ग्रीन जॉब्स का एक बड़ा मार्केट खड़ा हो रहा है, जहां पे-पैकेज भी अच्छा है। इसमें भी वॉटर कंजर्वेशन का फील्ड इंटेलिजेंट यूथ में काफी पसंद किया जा रहा है....
बिजली की बचत, सोलर व विंड एनर्जी?का मैक्सिमम यूटिलाइजेशन करने वाली इमारतें बनाने वाले आर्किटेक्ट, वॉटर रीसाइकल सिस्टम लगाने वाला प्लंबर, कंपनियों में जल संरक्षण से संबंधित रिसर्च वर्क और सलाह देने वाले, ऊर्जा की खपत कम करने की दिशा में काम करने वाले एक्सपर्ट, पारिस्थितिकी तंत्र व जैव विविधता को कायम रखने के गुर सिखाने वाले एक्सपर्ट, प्रदूषण की मात्रा और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के तरीके बताने वाले एक्सपर्ट...अपने आस-पास नजर दौड़ाइए तो ऐसे अनगिनत प्रोफेशनल्स दिख जाएंगे, जो किसी न किसी रूप में ग्रीन कैम्पेन से जुड़े हुए हैं।?
वॉटर कंर्जवेशन पर जोर
नदियों की सफाई, वर्षाजल का भंडारण, मकानों के निर्माण के साथ ही वाटर हार्वेस्टिंग की प्रणाली की स्थापना, नदियों की बाढ़ से आने वाले पानी को सूखाग्रस्त इलाकों के लिए संग्रहित करना, सीवेज जल का प्रबंधन कर खेती आदि के कार्यकलापों में इस्तेमाल आदि पर आधारित योजनाओं का क्रियान्वयन सभी देशों में किया जा रहा है। जल प्रबंधन एवं संरक्षण पर आधारित कोर्सेज अब औपचारिक तौर पर तमाम देशों में अस्तित्व में आ गए हैं। पहले परंपरागत विधियों एवं प्रणालियों से जल बर्बादी को रोकने तक ही समस्त उपाय सीमित थे। आज देश में स्कूल स्तर से लेकर यूनिवर्सिटीज में एमई और एमटेक तक के कोर्सेज चलाए जा रहे हैं। वॉटर साइंस, वॉटर कंजर्वेशन वॉटर मैनेजमेंट, वॉटर हार्वेस्टिंग, वॉटर ट्रीटमेंट, वॉटर रिसोर्स मैनेजमेंट कई स्ट्रीम्स हैं जिन्हें चुनकर आप इस फील्ड में करियर बना सकते हैं।
वॉॅटर साइंस
हवा और जमीन पर उपलब्ध पानी और उससे जुड़े प्रॉसेस का साइंस वाटर साइंस कहलाता है। इससे जुड़े प्रोफेशनल वॉटर साइंटिस्ट कहलाते हैं।
वॉटर साइंस का स्कोप
केमिकल वॉटर साइंस : वॉटर की केमिकल क्वालिटीज की स्टडी।
इकोलॉजी : लिविंग क्रिएचर्स और वॉॅटर-साइंस साइकल के बीच इंटरकनेक्टेड प्रॉसेस की स्टडी।
हाइड्रो-जियोलॉजी : ग्राउंड वॉटर के डिस्ट्रिब्यूशन तथा मूवमेंट की स्टडी।
हाइड्रो-इन्फॉरमेटिक्स : वॉटर साइंस और वॉटर रिसोर्सेज के एप्लीकेशंस में आइटी के यूज की स्टडी।
हाइड्रो-मीटियोरोलॉजी : वॉटर एड एनर्जी के ट्रांसफर की स्टडी। पानी के आइसोटोपिक सिग्नेचर्स की स्टडी।
सरफेस वॉटर साइंस : जमीन की ऊपरी सतह के पास होने वाली हलचलों की स्टडी।
वॉटर साइंटिस्ट का काम
-हाइड्रोमीट्रिक और वाटर क्वालिटी का मेजरमेंट
-नदियों, झीलों और भूमिगत जल के जल स्तरों, नदियों के प्रवाह, वर्षा और जलवायु परिवर्तन को दर्ज करने वाले नेटवर्क का रख-रखाव।
-पानी के नमूने लेना और उनकी केमिकल एनालिसिस करना।
-आइस तथा ग्लेशियरों का अध्ययन।
-वॉॅटर क्वालिटी सहित नदी में जल प्रवाह की मॉडलिंग।
-मिट्टी और पानी के प्रभाव के साथ-साथ सभी स्तरों पर पानी की जांच करना।
-जोखिम की स्टडी सहित सूखे और बाढ़ की स्टडी।
किससे जुड़कर काम करते हैं
सरकार : पर्यावरण से संबंधित नीतियों को तैयार करना, एग्जीक्यूट करना और मैनेज करना।
अंतरराष्ट्रीय संगठन : टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और आपदा राहत।
एडवाइजरी : सिविल इंजीनियरिंग, पर्यावरणीय प्रबंधन और मूल्यांकन में सेवाएं उपलब्ध कराना।
एकेडमिक ऐंड रिसर्च : नई एनालिटिक टेक्निक्स के जरिए टीचिंग ऐंड रिसर्च वर्क करना।
यूटिलिटी कम्पनियां और पब्लिक अथॉरिटीज : वॉटर सप्लाई और सीवरेज की सर्विसेज देना।
एलिजिबिलिटी
-वॉटर साइंस से रिलेटेड सब्जेक्ट में बैचलर डिग्री, मास्टर डिग्री को वरीयता।
-जियोलॉजी, जियो-फिजिक्स, सिविल इंजीनियरिंग, फॉरेस्ट्री ऐंड एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग सब्जेक्ट्स इनमें शामिल हैं।
स्किल्स
-सहनशीलता, डिटरमिनेशन, ब्रॉडर ऑस्पेक्ट और गुड एनालिटिकल स्किल की जरूरत होती है।
-टीम में काम करने की स्किल
-इन्वेस्टिगेशन की प्रवृत्ति
वॉटर मैनेजमेंट
बढ़ते शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण आज पूरी दुनिया पानी की किल्लत से जूझ रही है। इसे देखते हुए वाटर मैनेजमेंट और कंजर्वेशन से जुड़े प्रोफेशनल्स की डिमांड बढ़ रही है। आजकल हाउसिंग कॉम्प्लेक्सेज से लेकर उद्योगों आदि में ऐसे प्रोफेशनल्स की जरूरत होती है, जो वॉटर हार्वेेस्टिंग से लेकर जल संचयन आदि की तकनीकों को जानते हों।
कोर्स
वॉटर हार्वेस्टिंग ऐंड मैनेजमेंट नाम से यह कोर्स करीब 6 महीने का है। इसके तहत सिखाया जाता है कि बारिश के पानी को किस तरह से मापा जाए, वॉटर टेबल की क्या इंपॉर्र्टेंस है और उसे किस तरह से रिचार्ज किया जाए।
एलिजिबिलिटी
इसमें एडमिशन की मिनिमम एलिजिबिलिटी 10वीं पास है। अगर आपने इग्नू से बैचलर प्रिपरेट्री प्रोग्राम (बीपीपी) किया हुआ है, तो आप सीधे इस कोर्स में एडमिशन ले सकते हैं।
एक्वाकल्चर
एक्वाकल्चर में समुद्र, नदियों और ताजे पानी के कंजर्वेशन, उनके मौलिक रूप और इकोलॉजी की सेफ्टी के बारे में स्टडी की जाती है। इन दिनों घटते जल स्रोतों, कम होते पेयजल संसाधनों के चलते इस फील्ड में विशेषज्ञों की मांग बढ़ी है।
कोर्स ऐंड एलिजिबिलिटी
इस फील्ड में बीएससी और एमएससी इन एक्वा साइंस जैसे कोर्स प्रमुख हैं। इनमें एडमिशन के लिए बायोलॉजी सब्जेक्ट के साथ 10+2 पास होना अनिवार्य है। इसके अलावा, वाटर कंजर्वेशन और उसकीइकोलॉजी के बारे में गहरा रुझान जरूरी है।
एनवॉयर्नमेंट इंजीनियरिंग
एनवॉयर्नमेंट कंजर्वेशन के फील्ड में बढ़ती टेक्नोलॉजी के एक्सपेरिमेंट्स से आज एनवॉयर्नमेंट इंजीनियर्स की मांग बढ़ी है। अलग-अलग सेक्टर्स के कई इंजीनियर्स आज एनवॉयर्नमेंट इंजीनियरिंग में अपना योगदान दे रहे हैं। इनमें एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग, बायोलॉजिस्ट केमिकल इंजीनियरिंग, जियोलॉजिस्ट, हाइड्रो-जियोलॉजिस्ट, वॉटर ट्रीटमेंट मैनेजर आदि कारगर भूमिका निभाते हैं।
इंस्टीट्यूट वॉच
-आइआइटी, रुड़की
(भूजल जल-विज्ञान और वाटरशेड मैनेजमेंट)
-इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, दिल्ली
-अन्ना विश्वविद्यालय (वाटर मैनेजमेंट)
-एम.एस. बड़ौदा विश्वविद्यालय
(वाटर रिसोर्सेज इंजीनियरिंग)
-आंध्र विश्वविद्यालय, विशाखापत्तनम
-अन्नामलाई विश्वविद्यालय (हाइड्रो-जियोलॉजी)
-दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी, दिल्ली
-गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज, रायपुर (वाटर रिसोर्सेज डेवलपमेंट ऐंड इरिगेशन इंजीनियरिंग)
-आइआइटी, मद्रास (फ्लड साइंस ऐंड वाटर रिसोर्सेज इंजीनियरिंग)
-जवाहरलाल नेहरू टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी, हैदराबाद
-राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की