Monday, April 24, 2017

सॉइल साइंस में कॅरिअर

शिक्षण से लेकर रिसर्च और मिट्टी के संरक्षण से लेकर कंसल्टिंग जैसे कई अवसर कॅरिअर विकल्प के रूप में सॉइल साइंटिस्ट के लिए उपलब्ध हैं। एग्रीकल्चरल रिसर्च काउंसिल अपने सभी रिसर्च संस्थानों के साथ मृदा वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी नियोक्ता है। इसके अलावा सॉइल साइंटिस्ट डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर, विश्वविद्यालयों, कृषि सहकारी समितियों, खाद निर्माताओं और रिसर्च संस्थानों के द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। 

एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन के रूप में मृदा एक अहम तत्व है। मृदा विज्ञान में मिट्टी का अध्ययन एक प्राकृतिक संसाधन के रूप में किया जाता है। इसके अंतर्गत मृदा निर्माण, मृदा का वर्गीकरण, मृदा के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक गुणों और उर्वरकता का अध्ययन किया जाता है। बीते सालों में फसल उत्पादन, वन उत्पाद और कटाव नियंत्रण में मिट्टी के महत्व को देखते हुए मृदा विज्ञान के क्षेत्र में रोजगार के ढेरों अवसरों का सृजन हुआ है। अब देश भर में बड़ी संख्या में सॉइल टेस्टिंग व रिसर्च लैबोरेट्रीज स्थापित हो रही हैं। इनमें से हरेक को प्रशिक्षित पेशेवरों की जरूरत होती है, जो मिट्टी के मापदंडों का मूल्यांकन कर सकें ताकि उसकी गुणवत्ता को सुधारा जा सके। ऐसे में यह क्षेत्र रोजगार के अवसरों से भरपूर है।
क्या करते हैं सॉइल साइंटिस्ट

सॉइल साइंटिस्ट या मृदा वैज्ञानिक का प्राथमिक काम फसल की बेहतरीन उपज के लिए मृदा का विश्लेषण करना है। मृदा वैज्ञानिक मृदा प्रदूषण का विश्लेषण भी करते हैं, जो उर्वरकों और औद्योगिक अपशिष्ट से उत्पन्न होता है। इन अपशिष्टों को उत्पादक मृदा में परिवर्तित करने के लिए उपयुक्त तरीके और तकनीकियां भी वे विकसित करते हैं। इन पेशेवरों के वर्क प्रोफाइल में बायोमास प्रॉडक्शन के लिए तकनीकियों का इस्तेमाल शामिल है। वनस्पति पोषण, वृद्धि व पर्यावरण गुणवत्ता के लिए भी वे काम करते हैं। उर्वरकों का उपयोग सुझाने में भी मृदा वैज्ञानिक की भूमिका अहम होती है। सॉइल साइंस प्रोफेशनल मृदा प्रबंधन पर मार्गदर्शन करते हैं। चूंकि मृदा वैज्ञानिक रिसर्चर, डवलपर और एडवाइजर होते हैं, इसलिए वे अपने ज्ञान का इस्तेमाल बेहतरीन मृदा प्रबंधन के लिए करते हैं। मिट्टी की उर्वरकता और पानी के सही इस्तेमाल के लिए वे सलाह देते हैं। मिट्टी के अधिकतम सही उपयोग के लिए भी मृदा वैज्ञानिक जिम्मेदार होते हैं। मृदा क्षरण को वे रोकते हैं और यह भी सुनिश्चित करते हैं कि मिट्टी की उर्वरकता बरकरार और बेहतर रहे। मृदा वैज्ञानिक फील्ड के साथ-साथ लैबोरेट्री में काम करते हैं। वे डेटा बैंक, सिम्युलेशन मॉडल्स और कम्प्यूटर का उपयोग करते हैं।
क्या पढ़ना होगा

अध्ययन के मुख्य क्षेत्रों में सॉइल केमिस्ट्री, माइक्रोबायोलॉजी, फिजिक्स, पेडोलॉजी, मिनरोलॉजी, बायोलॉजी, फर्टिलिटी, प्रदूषण, पोषण, बायोफर्टिलाइजर, अपशिष्ट उपयोगिता, सॉइल हेल्थ एनालिसिस शामिल हैं। छात्र सॉइल साइंस में बैचलर या मास्टर डिग्री ले सकते हैं। साथ ही वे सॉइल फॉर्मेशन (वह प्रक्रिया जिससे मिट्टी बनती है।), सॉइल क्लासिफिकेशन (गुणों के अनुसार मिट्टी का वर्गीकरण), सॉइल सर्वे (मिट्टी के प्रकारों का प्रतिचित्रण), सॉइल मिनरोलॉजी (मिट्टी की बनावट), सॉइल बायोलॉजी, केमिस्ट्री व फिजिक्स (मिट्टी के जैविक, रसायनिक व भौतिक गुण), मृदा उर्वरकता (मृदा में कितने पोषक तत्व है), मृदा क्षय जैसे क्षेत्रों में स्पेशलाइजेशन कर सकते हैं।
कॅरिअर के विकल्प

शिक्षण से लेकर रिसर्च और संरक्षण से लेकर कंसल्टिंग जैसे कई अवसर कॅरिअर विकल्प के रूप में मृदा वैज्ञानिकों के लिए उपलब्ध हैं। कृषि, वॉटर रिहैबिलिटेशन प्रोजेक्ट्स, सॉइल एंड फर्टिलाइजर टेस्टिंग लैबोरेट्रीज, ट्रांसपोर्टेशन प्लानिंग, आर्कियोलॉजी, मृदा उत्पादकता, लैंडस्केप डवलपमेंट जैसे क्षेत्रों में मृदा वैज्ञानिकों की खासी मांग है। क्रॉप एडवाइजर से लेकर संरक्षणकर्ता बनने तक सॉइल साइंस यानी मृदा विज्ञान में अनगिनत अवसर हैं। पर्यावरण और एग्रो-कंसल्टिंग फर्म्स में इस क्षेत्र के पेशेवरों की प्रबंधकीय और एग्जीक्यूटिव पदों पर खासी जरूरत है। ऐसा चलन न केवल भारत, बल्कि विदेशों में है। इस फील्ड में रिसर्च आपको आईसीएआर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुंचता सकती है। इतना ही नहीं फसल उत्पादकता और मृदा स्वास्थ्य को बरकरार रखने के लिए आने वाले सालों में अधिक रोजगार उत्पन्न होगा।
अवसर

एग्रीकल्चरल रिसर्च काउंसिल अपने सभी रिसर्च संस्थानों के साथ मृदा वैज्ञानिक की सबसे बड़ी नियोक्ता है। इसके अलावा मृदा वैज्ञानिक डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर, विश्वविद्यालयों, कृषि सहकारी समितियों, खाद निर्माताओं और रिसर्च संस्थानों के द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। मृदा वैज्ञानिक अपना व्यवसाय भी शुरू कर सकते हैं। वे एनालिस्ट या मृदा सर्वेक्षक और डवलपमेंट कंसल्टेंट के रूप में काम कर सकते हैं। वे अपने सेवाएं एग्रीकल्चरल इंडस्ट्री, डवलपमेंट, कॉपरेटिव, कॉमर्शिलय बैंक के कृषि विभागों को दे सकते हैं।
यहां से करें कोर्स

इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट, पूसा
http://www.iari.res.in/

तमिलनाडु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, कोयंबटूर
http://www.tnau.ac.in/

पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, लुधियाना
http://www.pau.edu/

यूनिवर्सिटी ऑफ कलकत्ता, कोलकाता
http://www.caluniv.ac.in/

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, वाराणसी
http://www.bhu.ac.in/

Sunday, April 23, 2017

न्यूट्रिशनिस्ट में करियर

संतुलित डाइट के महत्व से तो हर कोई वाकिफ है लेकिन अपनी उम्र, शारीरिक क्षमता, कार्य की प्रकृति और दैनिक रुटीन के हिसाब से डाइट कैसी होनी चाहिए, इसको लेकर अध‍िकांश लोग भ्रमित रहते हैं। सही डाइट से जुड़ी हमारी शंकाएं दूर करते हैं डायटीशियन और न्यूट्रिशनिस्ट। अगर आप हेल्दी लाइफस्टाइल के साथ रोमांचक करियर चाहते हैं, तो यह फील्ड आपके लिए बढ़िया है। 
लोगों की बदली जीवनशैली और खानपान की खराब आदतों का सबसे ज्यादा असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसीलिए हाल के दिनों में लोगों के बीच बैलेंस्ड डाइट को लेकर जागरूकता बढ़ी है। हालांकि बैलेंस्ड डाइट व्यक्ति विशेष की अपनी जरूरतों पर आधारित होती है, इसीलिए इसे लेकर लोगों में अक्सर भ्रम भी रहता है। इसी भ्रम को दूर करके फूड न्यूट्रिएंट्स के हिसाब से हमें सुझाव देते हैं डायटीशियन और न्यूट्रिशनिस्ट। अगर आपको भी फूड साइंस और न्यूट्रिशन में रुचि है, तो आप इसमें करियर प्लान कर सकते हैं।
क्या है न्यूट्रिशन एंड डायटेटिक्स?
यह फूड साइंस से जुड़ा एक ऐसा कोर्स है, जिसमें फूड न्यूट्रिएंट्स के बारे में अध्ययन किया जाता है। इसी के आधार पर बड़े स्तर पर लोगों में न्यूट्रिशन से जुड़ी समस्याओं को पहचानकर उन्हें दूर करने के लिए सामाजिक और तकनीक के स्तर पर समाधान तलाशे जाते हैं। यही नहीं, सरकारी इकाइयों और स्वास्थ्य से जुड़े संस्थानों को भी इन्हीं के अनुसार स्वास्थ्य नीति में बदलाव के सुझाव दिए जाते हैं।
कौन-से कोर्स?
इस फील्ड में करियर प्लान करने के लिए 12वीं में फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी जैसे विषय लेकर पढ़ने वाले विद्यार्थी होम साइंस व फूड साइंस एंड प्रॉसेसिंग में बीएससी, फूड साइंस एंड माइक्रोबायोलॉजी, न्यूट्रिशन, न्यूट्रिशन एंड फूड साइंस और न्यूट्रिशन एंड डायटेटिक्स में बीएससी ऑनर्स कर सकते हैं। इसके अलावा डायटेटिक्स एंड न्यूट्रिशन में डिप्लोमा और फूड साइंस एंड पब्लिक हेल्थ न्यूट्रिशन में डिप्लोमा भी किया जा सकता है। ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद आप इन्हीं विषयों में एमएससी कर सकते हैं। इस फील्ड में रिसर्च का भी काफी स्कोप है। हायर स्टडीज करने वाले विद्यार्थियों को इस फील्ड में मौके भी बहुत मिलते हैं। 
जरूरी स्किल्स 
अगर आपको फूड इंग्रीडिएंट्स में रुचि है और अलग-अलग पकवानों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री में मौजूद न्यूट्रिएंट्स के बारे में पढ़ना व उनके हिसाब से डाइट में परिवर्तन करना पसंद है, तो आप इस फील्ड में जरूर आएं क्योंकि इसमें आपको नियंत्रित डाइट का सही प्लान बनाने का तरीका सिखाया जाता है। बॉडी मास इंडेक्स के हिसाब से आप अपना खुद का फूड चार्ट भी डिजाइन कर सकते हैं।
भविष्य की संभावनाएं 
आप सरकारी क्षेत्र और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे संस्थानों में अपना करियर बना सकते हैं। अमूमन इस फील्ड में चार तरह के न्यूट्रिशनिस्ट काम करते हैं:
क्लिनिकल न्यूट्रिशनिस्ट 
ये हॉस्पिटल्स, आउटपेशेंट क्लिनिक्स और नर्सिंग होम्स में काम करते हैं। इसमें आपको रोगियों की बीमारियों
के हिसाब से उनका डाइट चार्ट प्लान करना होगा।
मैनेजमेंट न्यूट्रिशनिस्ट 
ये न्यूट्रिशनिस्ट क्लिनिकल और फूड साइंस एक्सपर्ट्स होते हैं। ये बड़े संस्थानों में काम करने वाले एक्सपर्ट्स का
मैनेजमेंट करते हैं। इसके अलावा इन्हें न्यूट्रिशनिस्ट्स की प्रोफेशनल ट्रेनिंग की जिम्मेदारी भी दी जाती है।
कम्युनिटी न्यूट्रिशनिस्ट 
ये सरकारी स्वास्थ्य एजेंसियों, हेल्थ एंड फिटनेस क्लब्स और डे-केयर सेंटर्स में काम करते हैं। इस क्षेत्र में किसी व्यक्ति विशेष के लिए काम न करके पूरे समुदाय पर फोकस किया जाता है।
मैनेजमेंट न्यूट्रिशनिस्ट 
ये न्यूट्रिशनिस्ट क्लिनिकल और फूड साइंस एक्सपर्ट्स होते हैं। ये बड़े संस्थानों में काम करने वाले एक्सपर्ट्स का
मैनेजमेंट करते हैं। इसके अलावा इन्हें न्यूट्रिशनिस्ट्स की प्रोफेशनल ट्रेनिंग की जिम्मेदारी भी दी जाती है।
न्यूट्रिशन एडवाइजर 
ये एक्सपर्ट्स बिना किसी संस्थान से जुडे, किसी डॉक्टर की तरह अपनी स्वतंत्र प्रैक्टिस करते हैं और लोगों को न्यूट्रिशन से जुड़ी सलाह व मार्गदर्शन देते हैं। इस तरह की फ्रीलांसिंग में भी अच्छी संभावनाएं हैं। 
प्रमुख संस्थान 
- नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन, हैदराबाद
- जेडी बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ होम साइंस, कोलकाता
- लेडी अर्विन कॉलेज, दिल्ली 
- एसएनडीटी विमेंस यूनिवर्सिटी, मुंबई
- ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हाइजीन एंड पब्लिक हेल्थ, कोलकाता
- मुंबई यूनिवर्सिटी

Thursday, April 20, 2017

साइबर लॉ एक्सपर्ट इंटरनेट के डिटेक्टिव

आज शायद ही कोई स्टूडेंट या प्रोफेशनल हो, जिसका ई-मेल एकाउंट या सोशल वेबसाइटï्स पर कोई प्रोफाइल न हो। इंटरनेट पर समय बिताने या काम करने वाले लोगों की संख्या भी दिनों-दिन बढ़ रही है। अब तो मोबाइल और स्मार्टफोन यूजर्स भी इसमें शामिल हो गए हैं। हालांकि इसके साथ साइबर क्राइम का खतरा भी बढ़ रहा है। पर्सनल एकाउंट की हैकिंग से लेकर वायरस के प्रसार, स्टॉकिंग, साइबर वॉर, साइबर टेररिज्म, साइबर फ्रॉड जैसी घटनाएं आम होती जा रही हैं। साइबर रिलेटेड केसेज बढ़ रहे हैं। अगर आप आइटी के साथ-साथ लॉ में भी इंट्रेस्ट रखते हैं, तो साइबर लॉ फील्ड में लुक्रेटिव करियर बना सकते हैं।
क्या है साइबर लॉ?
डिजिटल इंफॉर्मेशन एवं कम्युनिकेशंस टेक्नोलॉजी ने एक नए कानूनी कार्यक्षेत्र को जन्म दिया है, जिसे साइबर लॉ कहते हैं। साइबर लॉ के तहत इंटरनेट और साइबर स्पेस से जुड़े मामले सुलझाए जाते हैं। इसके एक्सपर्ट छोटे-बड़े साइबर क्राइम की रोकथाम के अलावा उसकी जांच में सहायक भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा, सॉफ्टवेयर
पेटेंट, नेट बैंकिंग से जुड़े कानूनी मामले भी यही देखते हैं।
एजुकेशनल क्वालिफिकेशन
साइबर लॉ एक्सपर्ट बनने के लिए आपके पास लॉ की डिग्री या मास्टर्स होना आवश्यक है। वैसे, कोई भी लॉयर, आइटी प्रोफेशनल, आइटी सिक्योरिटी पर्सनल, मैनेजमेंट प्रोफेशनल साइबर लॉ में पोस्ट ग्रेजुएशन डिग्री या डिप्लोमा करके साइबर लॉ एक्सपर्ट बन सकता है। देश में आज ऐसे कई कॉलेज या इंस्टीट्यूट्स हैं, जहां से आप साइबर लॉ में शॉर्ट टर्म या लॉन्ग टर्म कोर्स कर सकते हैं। आप चाहें तो ऑनलाइन कोर्स भी कर सकते हैं।
टेक्निकल स्किल्स
साइबर लॉ एक नया और तेजी से उभरता हुआ फील्ड है, इसलिए जो लोग इसमें करियर बनाने का इरादा रखते हैं, उन्हें हर संभव मेहनत के लिए तैयार रहना होगा। एक सफल साइबर लॉ एक्सपर्ट होने के लिए आइटी की गहरी जानकारी और दिलचस्पी होने के साथ-साथ साइबर स्पेस की बेहतर समझ होना जरूरी है। साथ ही, साइबर लॉ से जुड़े प्रॉब्लम्स की एनालिसिस और उन्हें सॉल्व करने की क्षमता हो। इसलिए आपको वर्चुअल वल्र्ड की तमाम तकनीकी जटिलताओं का अहसास होना जरूरी है। इसके अलावा, जिनके पास इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी, कॉमर्शियल और सिविल लॉ की स्पेशलाइजेशन होगी और जो समय-समय पर खुद को एडवांस टेक्नोलॉजी से अपडेट करते रहेंगे, उन्हें करियर ग्रोथ में मदद मिलेगी।
करियर स्कोप
इंडिया के अलावा पूरी दुनिया में साइबर लॉ एक्सपट्र्स के लिए काफी स्कोप है। आज कंपनीज अपने डाटा को डिजिटली स्टोर कर रही हैं। दूसरी ओर ई-बैंकिंग, ई-कॉमर्स, ई-टिकटिंग और ई-गवर्नेंस आदि की लोकप्रियता बढ़ रही है। ऐसे में साइबर अपराध और विवाद भी बढ़ रहे हैं, जिन्हें सुलझाने के लिए निजी आइटी, कंप्यूटर या इंटरनेट बेस्ड कंपनीज से लेकर सरकारी एजेंसीज साइबर लॉ एक्सपट्र्स को हायर कर रही हैं। एक साइबर लॉयर किसी लॉ फर्म, पुलिस डिपार्टमेंट, बैंक, टेक्नोलॉजी फर्म या कॉरपोरेट ऑर्गेनाइजेशन में साइबर कंसल्टेंट, रिसर्च असिस्टेंट या एडवाइजर के रूप में काम कर सकता है।
सैलरी पैकेज
साइबर लॉ एक्सपर्ट का सैलेरी पैकेज उसके एक्सपीरियंस और एक्सपर्टीज पर निर्भर करता है। फ्रेशर को शुरुआत में 10 से 25 हजार रुपये मिलते हैं, जबकि अनुभवी साइबर लॉ एक्सपर्ट महीने में 50 हजार रुपये आसानी से कमा सकता है। किसी रिप्यूटेड फर्म को ज्वाइन करते हैं, तो उससे सही करियर ग्रोथ मिलती है।
प्रमुख इंस्टीट्यूट्स
-एशियन स्कूल ऑफ साइबर लॉ, मुंबई
-इंडियन लॉ इंस्टीट्यूट, दिल्ली
-एनएएलएसएआर, हैदराबाद
-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, इलाहाबाद,
-एमिटी लॉ स्कूल, दिल्ली
एक्सपर्टीज के साथ बढ़ाएं कदम
साइबर स्पेस को संचालित करने वाले कानून को साइबर लॉ कहते हैं। सभी इंटरनेट यूजर्स इस कानून के दायरे में आते हैं। इस तरह साइबर लॉ एक टेक्नो-लीगल फील्ड है, जिसमें टेक्नोलॉजी के साथ-साथ कानून की जानकारी होना बेहद जरूरी है। इस तरह पूरी एक्सपर्टीज के साथ आप साइबर लिटिगेशन में सुनहरा करियर बना सकते हैं। मार्केट में डिमांड को देखते हुए एक्सपट्र्स की कमी भी है, जिससे यह और ज्यादा लुक्रेटिव करियर च्वाइस बन सकता है।

Tuesday, April 18, 2017

फूड टेक्नोलॉजी में करिअर

खाद्यविज्ञान में खाद्य- सामग्रियों के चुनाव, संरक्षण, प्रसंस्करण, डिब्बाबंद (पैकेजिंग), वितरण और उपभोग की तकनीकों के बारे में जानकारी दी जाती है। ऐसे में जाहिर सी बात है करियर की संभावनाएं अपार है क्योंकि खाना और खिलाना तो चलता ही रहता है

बदलती जीवनशैली और व्यस्तता के कारण आज लोगों की खानपान की आदतें और शौक भी बदल गए हैं। ऐसे में खाने-पीने की चीजों में जो भी उन्हें आसान जरिया या विकल्प मौजूद मिलता है, उसी को आदत बना लेते हैं। इसी में है डिब्बा बंद भोजन और पेय पदार्थ जिस पर लोग आज निर्भर होने लगे हैं। ऐसी स्थिति में इन खाद्य पदार्थों का चलन बढ़ने के कारण युवाओं के लिए फूड टेक्नोलॉजी बेहतरीन करियर ऑप्शन के रूप में सामने आया है। खाद्यविज्ञान के सिद्धांतों का उपयोग करते हुए खाद्य-सामग्रियों के चुनाव, संरक्षण, प्रसंस्करण, डिब्बाबंद (पैकेजिंग), वितरण और उपभोग की तकनीकों को ही खाद्य प्रौद्योगिकी (फूड टेक्नोलॉजी) कहते हैं। खाद्य विज्ञान खाद्य के सभी तकनीकी पहलुओं से जुड़ा एक ऐसा विषय क्षेत्र है, जो फसल की कटाई से शुरू होता है तथा इसके पकाने और खपत के साथ समाप्त होता है। योग्यता- फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री बहुत ही व्यापक और फलता- फूलता इंडस्ट्री है, जिसमें जॉब की संभावनाएं भी अपार हैं। भारत में भी कुछ यूनिर्वसटिी फूड टेक्नोलॉजी और फूड साइंस में डिग्री कोर्सेज ऑफर कराते हैं। कुछ ऐसे भी संस्थान हैं, जहां फूड प्रॉसेसिंग में पोस्टग्रेजुएट कोर्सेज उपलब्ध हैं। फूड टेक्नोलॉजी, फूड साइंस और होम साइंस के अंडरग्रेजुएट कोर्स में दाखिला के लिए 10 अ 2 लेवल में पीसीएम या पीसीबी होना चाहिए। एमएससी/मैनेजमेंट में दाखिला के लिए फूड टेक्नोलॉजी में बीएससी होना जरूरी है, जिसके लिए ग्रेजुएट/पोस्टग्रेजुएट डिग्री अनिवार्य है। होम साइंस ग्रेजुएट्स या न्यूट्रिशन और होटल मैनेजमेंट ग्रेजुएट्स (फूड्स एंड बेवरेज) भी फूड प्रोडक्शन इंडस्ट्रीज, मार्केटिंग, प्रिजर्वेशन आदि में टीम की तरह काम कर सकते हैं। ऐसे में होम साइंस या न्यूट्रिशन में सभी स्नातक छात्रों के सामने कई ऑप्शन मौजूद हैं। फूड टेक्नोलॉजी क्षेत्र में स्नातक डिग्री में प्रवेश पाने के लिए फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी अथवा मैथमेटिक्स विषयों के साथ 10 अ 2 में कम से कम 50 प्रतिशत अंक होने चाहिए। एमएससी कोर्स करने के लिए फूड टेक्नोलॉजी से संबंधित विषयों में स्नातक की डिग्री आवश्यक है।

पढ़ाई में शामिल विषय- फूड टेक्नोलॉजी तथा इससे संबंधित कोर्सेज के अंतर्गत खाद्य पदार्थो के उचित रख-रखाव से लेकर पैकेजिंग, फ्रीजिंग आदि की तकनीकी जानकारियां शामिल होती हैं। इसके अंतर्गत पोषक तत्वों का अध्ययन, फल, मांस, वनस्पति व मछली प्रसंस्करण आदि से संबंधित जानकारियां भी दी जाती हैं।

संभावनाएं- चूंकि भारत में भी अब भारी तादाद में लोग संशोधित व डिब्बाबंद खाद्य-पदार्थ इस्तेमाल करने लगे हैं, यही कारण है कि यह क्षेत्र मल्टीनेशनल कंपनियों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। इसी आकर्षण के कारण कई मल्टीनेशनल कंपनियां जैसे मैक्डोनाल्ड, पेप्सी, कोका कोला के साथ ही कई विदेशी कंपनियां भी अपना कारोबार भारत में बढ़ाती जा रही हैं, जिससे इस फील्ड में शिक्षा हासिल कर रहे छात्रों के लिए ढेरों ऑप्शन व ऑपरच्युनिटी मौजूद है।

प्लेसमेंट और प्रॉस्पेक्ट्स- फूड टेक्नोलॉजिस्ट का कार्य मुख्य रूप से होटल, फूड इंडस्ट्रीज, क्वालिटी कंट्रोल, हॉस्पिटल, पैकेजिंग, इंडस्ट्रीज, डिस्टिलरीज, सॉफ्ट ड्रिंक फैक्टरी, राइस मिल्स आदि में होता है। साथ ही मै नुफैक्चरिंग इंडस्ट्री में भी काम करने का मौका मिलता है। चाहें तो, अपनी विशेषताओं और ज्ञान के जरिए स्टोरेज मॉनिटरिंग, प्रोसेसिंग, हाइजिन टेम्प्रेचर मॉनिटरिंग (जांच व निगरानी करना) और एक्सपेरिमेंटिंग आदि में भी जॉब हासिल कर सकते हैं । फूड टेक्नोलॉजी को र्स करने के बाद खुद का बिजनेस या स्वरोजगार भी शुरू कर सकते हैं। इसके अलावा तकनीकी संस्थाओं में शैक्षिक या प्रशिक्षक के पद पर भी कार्य कर सकते हैं। साथ ही इस फील्ड में शिक्षा हासिल करने के बाद फूड प्रॉसेसिंग इंडस्ट्री अलग-अलग फील्ड के प्रोफेशनल्स को मैनेजेरियल लेवल पर भी नियुक्ति प्रदान करता है। जैसे कि इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन मैनेजर्स मैनुफैक्चरिंग प्लांट्स के ऑपरेशन को कंट्रोल करने, मार्केटिंग औ र सेल्स कर्मचारी सेल्स प्रमोशन और मार्केटिंग में कार्यरत हो ने के अलावा फूड टेक्नोलॉजिस्ट रिसर्च लैबोरेट्रीज या ऑन प्रोडक्शन लाइंस में भी काम करने का मौका हासिल कर सकते हैं। जिसके तहत नया प्रोडक्ट डेवलप करने के साथ तैयार माल को टेस्ट करना और फूड क्वालिटी को कंट्रोल करने की जिम्मेदारी निभाते हैं। फूड टेक्नोलॉजिस्ट भविष्य पब्लिक सेक्टर के साथ प्राइवेट सेक्टर में भी उज्ज्वल है क्योंकि यहां सैलरी भी अच्छी मिलती है। उद्यम में भी लाभप्रद संभावना है, खासकर फूड प्रोसेसिंग बिजनेस में। जुलाई, 1988 में मिनिस्ट्री ऑफ फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री की स्थापना हुई थी, जो फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री के विकास को प्रोत्साहित, नई दिशा देने के लिए स्थापित किया गया था। भारत में भी इन दिनों फॉरेन-टाइ-अप्स के साथ प्रोसेस्ड फूड चेन्स का विकास, फूड टेक्नोलॉजी फील्ड में जॉब प्रॉसपेक्टस को और भी बेहतर कर रहा है।

कार्य विवरण- फूड प्रोसेसिंग सेक्टर के तहत वे सभी कार्य शामिल हैं, जिनसे खाने वाली चीजों की गुणवत्ता, स्वाद और रंग-रूप बरकरार रह सके। जैसे- मक्खन, सॉफ्ट ड्रिंक, जैम व जेली, फ्रूट जूस, बिस्कुट, आइसक्रीम आदि। इसके अलावा कच्चे और बने हुए माल की गुणवत्ता, स्टोरेज तथा हाइजिन आदि की निगरानी भी फूड टेक्नोलॉजिस्ट करते हैं। इसके अलावा फूड टेक्नोलॉजिस्ट मुख्य रूप से मैनुफैक्चरिंग प्रोसेस, फूड और ड्रिंक प्रोडक्ट्स के रेसेपी डेवलप करते हैं। नई रेसेपी और कॉन्सेप्ट को इन्वेंट करने के लिए डिस्कवर किये गये इंग्रीडिएंट्स और टेक्नोलॉ जी पर काम करते हैं। साथ ही फूड को सुधारने व परिवर्तित करने का भी काम करता है जैसे फैट-फ्री प्रोडक्ट्स और रेडी मील्स तैयार करना। इसके अलावा करंट कंज्यूमर मार्केट और लेटेस्ट टेक्नोलॉजी रिसर्च करना ताकि न्यू प्रोडक्ट कॉन्सेप्ट डेवलप किया जा सके। सप्लायर्स से रॉ मटीरियल और अन्य सामग्री सलेक्ट करना भी इन्हीं का कार्य होता है।

गुण- फूड टेक्नोलॉजिस्ट को साइंटिफिक सोच वाला होना जरूरी है। बेहतरीन ऑब्जर्वेशन, साइंटिफिक और टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट में रु चि, हेल्थ व न्यूट्रिशन में रु चि, रिसर्च और डे वलपमेंट में खासकर ध्यान देने की क्षमता हो। इसके साथ ही जिम्मेदारी व टीम के साथ काम करने के अलावा कम्युनिकेशन स्किल भी बेहतर होनी चाहिए।

वेतन-शुरुआती स्तर पर फ्रेशर 10 से 15 हजार रुपये प्रतिमाह आसानी से कमा सकते हैं। अनुभवी होने पर 30 से 35 हजार रु पये भी प्रतिमाह वेतन प्राप्त कर सकते हैं।

उपलब्ध कोर्स
बीएससी इन फूड साइंस बीएससी और एमएससी विद फूड एंड न्यूट्रिशन बीएससी इन फूड टेक्नोलॉजी (3 वर्ष) बीएससी विद फूड प्रिजर्वेशन (3वर्ष) बीटेक इन फूड इंजीनियरिंग (4 वर्ष) एमएससी इन फूड टेक्नोलॉजी (2वर्ष) एमएससी इन फूड साइंस फूड एनालिसिस और क्वालिटी एश्योरेंस/फूड साइंस टेक्नोलॉजी में डिप्लोमा कोर्स

संस्थान

इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी, मैदानगढ़ी, दिल्ली, यूनिवर्सिटी ऑफ दिल्ली, दिल्ली जी. बी. पंत यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रिकल्चर ऐंड टेक्नोलॉजी, पंतनगर, उत्तराखंड बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी, झांसी, उत्तर प्रदेश कानपुर यूनिवर्सिटी, कानपुर, उत्तर प्रदेश आचार्य एनजी रंगा एग्रिकल्चर यूनिवर्सिटी, राजेन्द्र नगर, हैदराबाद कोलकाता विश्वविद्यालय, कोलकाता महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी, प्रियदशर्नी हिल्स, कोट्टयम, केरल, गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर, पंजाब तमिलनाडु एग्रिकल्चर यूनिवर्सिटी कोयम्बटू र मुंबई यूनिवर्सिटी, मुंबई नागपुर यूनिवर्सिटी, नागपुर सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजी रिसर्च इंस्टीट्यूट, मैसूर
(अंशुमाला,राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली,1.3.11)

Monday, April 17, 2017

बाॅयोफिजिक्स उभरता में कैरियर

बाॅयोफिजिक्स उभरता हुआ क्षेत्र है और इसमें जॉब की संभावनाएं भी काफी अच्छी हैं। कैसी मिल सकती है इस फील्ड में एंट्री और क्या है फ्यूचर प्रॉस्पेक्ट, आइए नजर डालते हैं। बाॅयोफिजिक्स, फिजिक्स और बाॅयोलॉजी के बीच का ब्रिज है, जिसमें जैविक प्रक्रिया में भौतिकी के उपयोग का अध्ययन किया जाता है।
इसके अंतर्गत मोल्यूक्यूलर बाॅयोफिजिक्स, फिजियोलॉजिकल बाॅयोफिजिक्स, मेडिकल फिजिक्स, न्यूक्लियर मेडिसिन, जीन- प्रोटीन इंजीनियरिंग, बायो इंफॉर्मेटिक्स आदि का अध्ययन किया जाता है, जिनके विकास से मेडिसिन और मेडिकल तकनीक के विकास को दिशा मिलती है। इसमें करियर के विषय के बारे में लखनऊ के आईटी कॉलेज के बायोफिजिक्स के प्रोफेसर डॉ रवि कुमार बता रहे हैं...

बीमारियों के इलाज में मिलती है मदद

बाॅयोफिजिक्स से जैविक स्तर पर कैंसर सहित विभिन्न बीमारियों के बढ़ने के संबंध में होने वाले अध्ययन में मदद मिलती है। मोल्यूक्यूलर बाॅयोफिजिक्स का दूसरा क्षेत्र है, जिसमें सैद्धांतिक और कम्प्यूटेशनल तकनीक के प्रयोग से अणु के व्यवहार का प्रतिरूप तैयार किया जाता है।
इसका इस्तेमाल बीमारियों के अध्ययन और उनके इलाज के काम आते हैं। बाॅयोफिजिक्स की मदद से संक्रामक बीमारियों की पावरफुल वैक्सीन तैयार की जाती है। इस फील्ड में जो प्रोफेशनल काम करते हैं, उसे ‘बायोफिजिसिस्ट’ कहते हैं।

बॉयोफिजिक्स के खास क्षेत्र

मोल्यूक्यूलर बायोफिजिक्स
इस फील्ड में मोल्यूक्यूल्स और पार्टिक्लस के संबंध मे स्टडी किया जाता है।
रेडिएशन बाॅयोफिजिक्स
इस फील्ड में ऑर्गनिज्म पर रेडिएशन जैसे- अल्फा, बीटा, गामा, एक्सरे और अल्ट्रा वायलेट लाइट का क्या असर होता है, इस पर अध्ययन किया जाता है।
साइकोलॉजिकल बाॅयोफिजिक्स
इसमें फिजिकल मेकेनिज्म द्वारा लिविंग ऑर्गनिज्म के व्यवहार और क्रिया के बारे में स्टडी किया जाता है।
मेडिकल बाॅयोफिजिक्स
इसके अंतर्गत मेडिकल ऐप्लिकेशन के क्षेत्र में बाॅयोलॉजिकल प्रोसेस के प्रभाव को जानने के लिए फिजिक्स का इस्तेमाल किया जाता है।
मैथमैटिकल और थ्योरोटिकल बाॅयोफिजिक्स
इसमें मैथमैटिकल और फिजिक्स के थ्योरी के आधार पर लिविंग ऑर्गनिज्म के व्यवहार के बारे में अध्ययन किया जाता है।

योग्यता

बायोफिजिक्स की स्डटी के लिए जरूरी है कि अंडरग्रेजुएट लेवल पर फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी सब्जेक्ट हो। भारत में ऐसे कुछ ही यूनिवर्सिटीज हैं, जो बायोफिजिक्स के अंडर ग्रेजुएट लेवल कोर्स आॅफर करती हैं। वैसे, अधिकतर बायोफिजिसिस्ट अपने करियर की शुरुआत बायोफिजिक्स की डिग्री के बाद ही की है। इसके बाद मास्टर और पीएचडी कर सकते हैं। बायोफिजिक्स कोर्स के अंतर्गत मोल्यूक्यूलर बायोफिजिक्स, मेंमब्रेंस बायोफिजिक्स, न्यूरोबायोफिजिक्स, बायोफिजिक्ट तकनीक, बायोएनर्जेटिक्स, मेडिकल बायोफिजिक्स आदि आते हैं।

इंस्टीट्यूट वॉच

  • आल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंस, नई दिल्ली
  • महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी, फैकल्टी आफ अप्लाइड साइंस, कोट्यम, केरला
  • यूनिवर्सिटी आफ कल्यानी, नाडिया, पश्चिम बंगाल
  • मणिपुर यूनिवर्सिटी, मणिपुर
  • पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़
  • यूनिवर्सिटी आफ मद्रास, चेन्नई
  • यूनिवर्सिटी आफ मुंबई, मुंबई

कार्यक्षमता

बाॅयोफिजिसिस्ट के लिए क्रिएटिव सोच होना बहुत जरूरी है। फिजिकल वर्ल्ड के प्रति जिज्ञासा होने के साथ-साथ अच्छी राइटिंग और कम्प्यूटर स्किल जरूरी है। फिजिक्स, बाॅयोलॉजी और मैथमैटिक्स विषय पर अच्छी पकड़ होने के साथ-साथ विज्ञान की दुनिया में हो रहे अद्भुत घटनाओं के प्रति दिलचस्पी रखना आवश्यक है। साथ धैर्य, दृढ़ता और काम के प्रति लगन करियर में बुलंदियों पर ले जा सकती है।

जॉब के अवसर

जो छात्र फिजिक्स और बाॅयोलॉजी में रूचि रखते हैं। वह बाॅयोफिजिक्स के क्षेत्र में करियर बना सकते हैं। इस फील्ड में ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट की तुलना में पीएचडी करने वाले छात्रों के लिए काफी संभावनाएं हैं। बाॅयोफिजिसिस्ट बाॅयोफिजिक्स रिसर्चर और साइंटिस्ट के रूप में गवर्नमेंट ऑर्गनाइजेशन में जॉब की तलाश कर सकते हैं। साथ ही, बाॅयोफिजिक्स से संबंधित कंपनियों में भी जॉब के खूब अवसर हैं। फॉर्मास्यूटिकल और हाईटेक बाॅयोलॉजिकल कंपनियां भी इनको हायर करती हैं। मेडिकल और डेंटल कॉलेज में भी लेक्चरर के रूप में जॉब की तलाश की जा सकती है। इसके अलावा, फॉरेंसिक लैब, केमिकल कंपनिज, फूड प्रोसेसिंग प्लांट्स, ड्रग मैन्यूफैक्चर्स, कॉस्मेटिक इंडस्ट्री, फर्टिलाइजर-पेस्टिसाइड कंपनियों में भी इनके लिए जॉब ऑप्शंस होते हैं। 
सैलरी पैकेज
इस फील्ड में सैलरी अनुभव और ऑर्गनाइजेशन पर भी निर्भर करती है। हालांकि एंट्री लेवल पर भी अच्छी सैलरी की उम्मीद की जा सकती है। शुरुआती दौर में प्रतिमाह 15-20 हजार रुपए प्रतिमाह सैलरी मिल जाती है। अगर आपका परफॉर्मेंस अच्छा रहता है, तो सैलरी और भी अच्छी हो सकती है, लेकिन जो रिसर्च सेक्टर में काम करते हैं, उनकी सैलरी अच्छी होने से साथ-साथ कई तरह का अलाउंस भी मिलता है।