Monday, February 18, 2019

फोटोग्राफी में बनाए कॅरि‍यर

फोटोग्राफी एक कला है जिसमें विजुअल कमांड के साथ-साथ टेक्निकल नॉलेज भी जरूरी है। फोटोग्राफी एक बेहतर कॅरि‍यर ऑप्शन साबित हो सकता है उन सभी छात्रों के लिए जिन्हें नेचर से प्यार है। वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी एक ऐसी फील्ड है जहां एक तरफ घने जंगलों के बीच खूंखार जानवरों को अपने कैमरे में कैद करने व उनके अलग-अलग मूवमेंट्स को दुनिया के सामने लाने का रोमांच है तो वहीं दूसरी तरफ इस क्षेत्र में खतरे भी कम नहीं हैं।
 
फोटोग्राफी एक क्रिएटिव क्षेत्र है जिसमें वर्तमान में बेहतर कॅरि‍यर की संभावनाएं मौजूद हैं। एक अच्छा वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर बनने के लिए बेसिक फोटोग्राफी की जानकारी होना बेहद जरूरी है। हालांकि एक साधारण डिजिटल कैमरा लेकर शौकिया तौर पर शुरुआत की जा सकती है। एक-दो साल का अनुभव हो जाने के बाद डिजिटल एसएलआर ख़रीद कर प्रोफेशनली इस क्षेत्र में एंट्री की जा सकती है।
सैलरी पैकेज
अभी तक यह क्षेत्र हमारे देश में ज्यादा फेमस नहीं था तो कमाई के साधन भी सीमित थे, लेकिन ग्लोबलाइजेशन के बाद अब इस क्षेत्र में अच्छा पैसा कमाया जा सकता है। किसी संस्थान से जुड़ने पर आसानी से 10 से 20 हजार रुपए प्रतिमाह की कमाई हो सकती है। एक अनुभवी वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर प्रतिमाह आसानी से एक लाख रुपए कमा सकता है। इसके अलावा कुछ सीनियर फोटोग्राफर्स भी अपने असिस्टेंट रखते हैं, जो न केवल सिखाते हैं बल्कि 10 से 12 हजार रुपए का स्टाइपेंड भी देते हैं।
योग्यता
फोटोग्राफी एक क्रिएटिव क्षेत्र है जिसमें वर्तमान में बेहतर करियर की संभावनाएं मौजूद हैं। बारहवीं या ग्रेजूएशन करने के बाद इस क्षेत्र में प्रवेश लिया जा सकता है। फोटोग्राफी का कोर्स सरकारी और निजी स्तर पर कई संस्थान कराते हैं। एक अच्छा वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर बनने के लिए बेसिक फोटोग्राफी की जानकारी होना बेहद जरूरी है। 
कोर्स और संस्थान
किसी भी सरकारी या निजी संस्थान से फोटोग्राफी का कोर्स करने के बाद इस क्षेत्र में प्रवेश किया जा सकता है। हालांकि भारत में अभी इस क्षेत्र के लिए कोई स्पेशलाइज्ड कोर्स उपलब्ध नहीं है। फोटोग्राफी में डिप्लोमा और सर्टिफिकेट दो तरह के कोर्स कराए जाते हैं।

1. इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट इन एजुकेशन एंड एडवांस्ड स्टडीज, अहमदाबाद । 
2. कॉलेज ऑफ आर्ट्स, तिलक मार्ग, दिल्ली एजेके मास कम्युनिकेशन सेंटर, जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली ।
3. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन, अहमदाबाद । 
4. सेंटर फॉर रिसर्च आर्ट ऑफ फिल्म्स ऐंड टेलीविजन नई दिल्ली । 
5. दिल्ली स्कूल ऑफ फोटोग्राफी । 6. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फोटोग्राफी, मुंबई

Tuesday, February 12, 2019

चिप डिजाइनर के रूप में करियर

टेक्‍नोलॉजी ने जहां लोगों के जीवन को सरल और आधुनिक बना दिया है, वहीं टेक्‍नोलॉजी के कई क्षेत्रों में करियर के शानदार विकल्‍प भी उभ्‍ार कर सामने आए हैं। टेक्‍नोलॉजी के क्षेत्र में जो प्रगति हुई है उसमें चिप डिजाइनिंग इंडस्‍ट्री ने महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है। अगर आप भी इंजीनियरिंग में रूचि रखते हैं और साथ ही चैलेंजिंग काम करना चाहते हैं तो चिप डिजाइनिंग में करियर बना सकते हैं। चिप सिलिकॉन का एक छोटा और पतला टुकड़ा होता है जो मशीनों के लिए इंटीग्रेटेड सर्किट बेस का काम करता है। चिप डिजाइनिंग की मदद से बड़े आकार के उपकरणों को भी छोटे आकार में बदला जा सकता है।
बढ़ रही है डिमांड 
चिप डिजाइन के रूप में आप एक सुनहरा करियर बना सकते हैं। इसकी हर सेक्‍टर में मांग है। एक चिप डिजाइनर का मुख्‍य काम छोटी-बड़ी इलेक्‍ट्रॉनिक डिवाइसेस की कार्यक्षमता को बढ़ाना और उसे आसान बनाना है। मोबाइल, टीवी रिमोट से लेकर कंज्‍यूमर इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स, ऑटोमोबाइल सेक्‍टर तक में चिप का इस्‍तेमाल हो रहा है। आप इस इंडस्ट्री से डिजाइन इंजीनियर, प्रोडक्ट इंजीनियर, टेस्ट इंजीनियर, सिस्टम्स इंजीनियर, प्रॉसेस इंजीनियर, पैकेजिंग इंजीनियर, सीएडी इंजीनियर आदि के रूप में जुड सकते हैं।
योग्‍यता 
चिप डिजानिंग में करियर बनाने के लिए आपके पास इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स, टेली कम्‍यूनिकेशन या कम्‍प्‍यूटर साइंस में बीई या बीटेक डिग्री होना चाहिए। चिप डिजाइनिंग इंडस्‍ट्री में विशेष रूप से डिजाइन, प्रोडक्‍शन, टेस्टिंग, एप्‍लीकेशंस और प्रॉसेस इं‍जीनियरिंग शामिल होता है। वैसे इस क्षेत्र में कुछ संस्थानों द्वारा शॉर्ट टर्मकोर्सेस भी कराए जाते हैं, जिनका संबंध आईसी, सर्किट डिजाइन और माइक्रो प्रोसेसर से होता है।
जरूरी स्किल्‍स 
इस क्षेत्र में करियर बनाने के इच्‍छुक युवाओं को हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का नॉलेज होना जरूरी है। इसके अलावा अच्‍छी कम्‍यूनिकेशन स्किल्‍स, टीम वर्क, प्रॉब्‍लम सॉल्विंग एटिट्यूड बहुत जरूरी है। प्रोग्रामिंग और मैथमेटिकल स्किल्‍स बहुत जरूरी है। इस क्षेत्र में करियर बनाने के इच्‍छुक युवाओं को टेक्‍नोलॉजी डेवलपमेंट्स और लेटेस्‍ट इनोवेशन का ज्ञान होना जरूरी है।
प्रमुख संस्‍थान: 
- बिटमैपर इंट्रीगेशन टेक्नोलजी, पुणे, महाराष्ट्र
- सेंट्रल फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांसड कंप्यूटिंग, बेंगलूर 
- जामिया मिलीया इस्लामिया, नई दिल्ली

Sunday, February 10, 2019

मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग में कॅरियर

मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग में कॅरियर हमारी जरूरतों में वक्त के साथ कई ऐसी चीजें भी जुड़ी हैं, जो प्राकृतिक होकर भी अपने मूल रूप में हम तक नहीं पहुंचतीं। उनमें एक महत्वपूर्ण चीज है मेटल यानी धातु। प्रकृति में कई प्रकार की धातु हैं, जो कई तत्वों (एलीमेंट्स) के रासायनिक संयोग से बनी हैं। इस कारण उनके गुणों (कैरेक्टरीस्टिक) में भी भौतिक और रासायनिक स्तर पर कई तरह की विशेषताएं देखने को मिलती हैं। ये विशेषताएं ही उनकी उपयोगिता (इंसानी जरूरत) का निर्धारण करती हैं। एल्यूमीनियम, तांबा, लोहा और टिन आदि धातुओं का इस्तेमाल वाहन निर्माण, विद्युत उपकरण और मशीनों के निर्माण में बड़े पैमाने पर किया जाता है। प्राकृतिक रूप में ये धातु अयस्क (ओर) के रूप में मिलते हैं। इनमें अशुद्धियों (मिट्टी और अन्य तत्व) की भारी मात्रा होती है। इस कारण इनका तत्काल उपयोग संभव नहीं होता। अयस्क से धातुओं को निकालने और उन्हें उपयोग लायक बनाने का कार्य मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग के जरिए होता है। इस विधा के जरिए ही खनन में मिले खनिजों से धातु अयस्क और फिर उससे धातु प्राप्त करने की सुगम प्रक्रियाओं का विकास किया जाता है।
इंजीनियरिंग की इस शाखा के विकास का प्रमाण हैं विभिन्न प्रकार के एलॉय (मिश्रधातु)। औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न धातुओं के मेल से तैयार एलॉय का काफी क्षेत्रों में इस्तेमाल हो रहा है। उदाहरण के लिए स्टेनलेस स्टील को लिया जा सकता है, लोहे में निकिल और क्रोमियम के मेल से तैयार यह मिश्रधातु जंगरहित और चमकदार होती है। इसी तरह ड्यूरेलुमिन है, जो एल्युमीनियम के साथ कॉपर, मैंगनीज और मैग्नीशियम के मेल से बना है। इस मिश्रधातु का उपयोग हवाई जहाजों के निर्माण में होता है। इसकी खासियत है हल्का वजन और भारी वहन क्षमता। ऐसे कई मिश्रधातु हैं, जिनका विकास मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग के कारण संभव हो पाया है। आने वाले वक्त में भी निर्माण और उत्पादन का क्षेत्र लोगों की बढ़ती भौतिक जरूरतों के कारण बढ़ता रहेगा। स्वाभाविक रूप से इस कारण  सहयोगी के रूप में मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग का क्षेत्र भी विस्तृत होगा। ऐसे में उसके पेशेवरों के लिए यह क्षेत्र आगे भी अवसरों की दृष्टि से आकर्षक बना रहेगा।
क्या है मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग
मेटलिक एलीमेंट (धातु तत्व) और उनसे बनने वाले यौगिकों (कंपाउंड्स) व मिश्रणों (मिक्सचर्स) के रासायनिक और भौतिक गुणों का अध्ययन मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग के तहत किया जाता है। मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग में धातु अयस्क के प्राकृतिक भंडारों से धातु को प्राप्त करने, उनमें मौजूद अशुद्धियों को दूर करने और औद्योगिक आवश्यकताओं के लिए धातुओं के मेल से मिश्रधातुओं (एलॉय) का निर्माण करने संबंधी प्रकियाओं और सिद्धांतों के बार में बताया जाता है। विभिन्न प्रक्रियाओं की प्रायोगिक जानकारी प्राप्त करने के लिए इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप, स्पेक्ट्रोग्राफ्स और एक्स-रे मशीन आदि तकनीकों का भी इस्तेमाल किया जाता है।  इंजीनियरिंग की यह शाखा मुख्य रूप से तीन भागों में बंटी है। इनके नाम हैं-फिजिकल मेटलर्जी, एक्सट्रेक्टिव मेटलर्जी और मिनरल प्रोसेसिंग। बैचलर डिग्री में इन भागों के आधारभूत सिद्धांतों के बारे में बताया जाता है, जबकि मास्टर्स में इनमें से किसी एक को स्पेशलाइजेशन का विषय बनाया जा सकता है।
इंजीनियर के कार्य 
- धातुओं को उपयोग के लायक बनाने की कम खर्चीली और तकनीकी दृष्टि से सुविधाजनक प्रक्रियाओं को विकसित करना। अयस्क में से धातु को अलग करने के लिए अयस्क की काफी बड़ी मात्रा को साफ (रिफाइन) करना पड़ता है।
- उपलब्ध धातुओं से विभिन्न उद्योगों (परिवहन, रक्षा, आटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, निर्माण और मशीनरी आदि) की जरूरत के अनुरूप नए उत्पाद विकसित करना।
-  मेटलर्जी के क्षेत्र में हुए नवीनतम शोध और तकनीकी विकास की जानकारी हासिल करते रहना। इसका इस्तेमाल कार्य को बेहतर बनाने में के लिए जरूरी होता है। 
- धातु निर्माण कंपनियों में प्रोडक्शन सुपरवाइजर के तौर पर काम करते हुए प्रयोग में लाई जा रही प्रक्रियाओं के पर्यावरणीय प्रभाव और ऊर्जा की खपत आदि पहलुओं पर गौर करते हुए उपयोगी उपाय तलाशना।
योग्यता
डिप्लोमा कोर्स

किसी मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी या स्कूल शिक्षा बोर्ड से 10वीं पास करने के बाद इंजीनियरिंग के डिप्लोमा कोर्स में दाखिला लिया जा सकता है। मेटलर्जी में डिप्लोमा कोर्स देश के कई विश्वविद्यालयों और पॉलिटेक्नीक संस्थानों में चल रहा है। इनमें दाखिले आमतौर पर प्रवेश परीक्षा के जरिए होते हैं। कुछ संस्थान दसवीं में प्राप्त अंकों के आधार पर भी दाखिला करते हैं। तीन वर्षीय डिप्लोमा कोर्स करने के बाद लेटरल एंट्री स्कीम के तहत सीधे बीई/ बीटेक कोर्स के दूसरे वर्ष (तीसरा सेमेस्टर) में प्रवेश लिया जा सकता है।
बैचलर कोर्स
विज्ञान विषयों (फिजिक्स और मैथ्स के अलावा केमिस्ट्री जरूरी) के साथ बारहवीं पास करके मेटलर्जी के बीई या बीटेक कोर्स में प्रवेश लिया जा सकता है। शैक्षणिक सत्र 2013-14 से इंजीनियरिंग के सभी कोर्स में प्रवेश के लिए सिंगल एंट्रेंस टेस्ट को माध्यम बनाया गया है। एनआईटी और राज्य स्तरीय इंजीनियरिंग संस्थानों की सीटें भरने के लिए आईआईटी (मेंस) परीक्षा का आयोजन होगा। इसमें प्राप्त अंक और 12वीं के अंक को मेरिट सूची बनाने में क्रमश: 60 और 40 फीसदी की वेटेज (राज्यों में वेटेज का अनुपात बदल भी सकता है) दी जाएगी। आईआईटी सीटों पर दाखिले के लिए आईआईटी (मेंस) के शीर्ष डेढ़ लाख छात्रों में चुने जाने के अलावा आईआईटी (एडवांस्ड) परीक्षा में पास होना होगा। इस परीक्षा में बैठने के लिए संबंधित स्कूल शिक्षा बोर्ड के शीर्ष 20 पर्सेंटाइल में भी आना होगा। 
मास्टर्स कोर्स
मेटलर्जी में इंजीनियरिंग की बैचलर डिग्री हासिल करने या केमिस्ट्री में एमएससी करने के बाद मेटलर्जी या उससे संबंधित विषयों में एमटेक किया जा सकता है। इसके लिए आईआईटी द्वारा आयोजित गेट (ग्रेजुएट एप्टीट्यूड टेस्ट इन इंजीनियरिंग) को पास करना पड़ता है।
स्पेशलाइजेशन के विषय
- फिजिकल मेटलर्जी
- मिनरल प्रोसेसिंग
- एक्सट्रेक्टिव मेटलर्जी
कार्य का दायरा
इंजीनियरिंग के इस क्षेत्र में रोजगार की काफी संभावनाएं हैं। धातु निर्मित उत्पादों के विकास और निर्माण से जुड़ी कंपनियों में मेटलर्जिकल इंजीनियर की काफी मांग होती है। इसके लिए धातुओं का निर्माण करने वाली कंपनियों (टाटा स्टील, सेल, जिंदल स्टील, हिंडाल्को इंडस्ट्रीज) में मेटलर्जिकल कंसल्टेंट के पद पर इंजीनियरों की नियुक्ति की जाती है। निजी और सरकारी कंपनियों की शोध व विकास शाखाओं में रिसर्चर के तौर पर मेटलर्जी के विशेषज्ञों की नियुक्ति की जाती है। इसके लिए मास्टर्स डिग्री का होना जरूरी होता है। मास्टर्स डिग्री और सीएसआईआर-यूजीसी नेट परीक्षा पास करने के बाद इंजीनियरिंग संस्थानों में लेक्चरर के रूप में भी अपनी योग्यता और अनुभव का उपयोग किया जा सकता है। 
इन पदों पर मिलेगा काम
- मेटलर्जिस्ट 
-  रिसर्चर
-  वेल्डिंग इंजीनियर 
-  प्रोसेस इंजीनियर
-  प्लांट इक्विपमेंट इंजीनियर 
- बैलिस्टिक इंजीनियर
-  क्वालिटी प्लानिंग इंजीनियर
वेतन
कोर्स करने के बाद पहली नौकरी में वेतन का स्तर कंपनी की बाजार स्थिति और कारोबार पर निर्भर करता है। डिप्लोमा कोर्स के बाद शुरुआती वेतन 15 से 18 हजार रुपये के बीच होता है, जबकि बैचलर डिग्री के बाद औसत वेतन 30 हजार रुपये मासिक होता है।
प्रमुख कोर्स
- डिप्लोमा इन मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग
- बीई/ बीटेक इन मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग
- एमटेक इन मेटलर्जिकल एंड मेटेरियल्स इंजीनियरिंग ऋ एमटेक इन स्टील टेक्नोलॉजी
प्रमुख संस्थान
-  इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (कानपुर, रुड़की, मद्रास)
-  नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (राउरकेला, जमशेदपुर, दुर्गापुर, वारंगल, तिरुचिरापल्ली)
-  इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी, वाराणसी
-  इंडियन स्कूल ऑफ माइंस
-  बंगाल इंजीनियरिंग एंड साइंस यूनिवर्सिटी, हावड़ा
-  बिरसा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, धनबाद
-  जादवपुर यूनिवर्सिटी, कोलकाता
-  जवाहरलाल नेहरू टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी, हैदराबाद

Sunday, January 20, 2019

फार्माकोविजिलेंस में करियर

बचपन से मेडिसीन की पढ़ाई का सपना था पर सफलता नहीं मिलने की वजह से मेडिकल कॉलेज में एडमिशन नहीं ले पाए तो निराश होने की कोई बात नहीं. अब आपके पास एक ऐसा ऑप्‍शन है जो आपके अधूरे सपने को पूरा कर सकता है. हालांकि इस कोर्स को करने के बाद आप एमबीबीएस की डिग्री तो नहीं पा सकेंगे लेकिन एक डॉक्टर का फर्ज जरूर निभा सकेंगे.
हम यहां जिस कोर्स की बात कर रहे हैं उसका नाम है- फार्माकोविजिलेंस. दरअसल, दवाइयों से होने वाले किसी भी प्रकार के साइड इफेक्ट की पहचान, आकलन और बचाव के लिए फार्माकोलॉजिकल साइंस की मदद ली जाती है ताकि दवाइयों को ज्यादा सुरक्षित और उपयोगी बनाया जा सके. 

अगर आपकी रुचि मेडिकल के क्षेत्र में है तो यह कोर्स आपके लिए ठीक रहेगा. इसके अलावा लोगों को स्वास्थ्य के प्रति सजग और सुरक्षित रखने की भावना रखने वाले लोगों के लिए यह एक बेहतर करियर ऑप्शन है.
फार्माकोविजिलेंस का संबंध दवाइयों की उपलब्धता, डिस्ट्रीब्यूशन, पहुंच, इस्तेमाल और इससे जुड़ी दूसरी समस्‍याओं से भी है. इस फील्‍ड में विदेशों में भी नौकरियों की संभावनाएं हैं.
कोर्सेज:
सर्टिफिकेट इन फार्माकोविजिलेंस 
डिप्लोमा इन फार्माकोविजिलेंस
विषय:
बेसिक प्रिंसिपल ऑफ फार्माकोविजिलेंस
रेगुलेशन इन फार्माकोविजिलेंस
फार्माकोविजिलेंस इन क्लिनिकल रिसर्च
ड्रग रिएक्शन
मैनेजमेंट ऑफ फार्माकोविजिलेंस डाटा
रिस्क मैनेजमेंट इन फार्माकोविजिलेंस
फार्माकोइपिडेमियोलॉजी
योग्यता: 
कम से कम 50 फीसदी अंकों के साथ केमिस्ट्री, बॉटनी, जूलॉजी, बायोकेमिस्ट्री, माइक्रोबायोलॉजी, जेनेटिक्स और बायोटेक से ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट या फार्मेसी और मेडिसिन में ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट.
चयन प्रक्रिया:
छात्रों का चयन एंट्रेंस टेस्ट, पर्सनल इंटरव्यू और स्क्रीनिंग टेस्ट पर आधारित होता है.
कहां मिलेगी नौकरी:
फार्माकोविजिलेंस से संबंधित कोर्स करने के बाद ग्लैक्सो, सन फार्मा, फाइजर, सिप्ला, निकोलस पिरामल जैसी फार्मास्युटिकल कंपनियों में नौकरी मिल सकती है. विदेशी फार्मा कंपनियां भी इस कोर्स को करने वाले भारतीय छात्रों को अच्छा पैकेज ऑफर करते हैं.
वेतन:
इस फील्ड में शुरुआत में 15 से 20 हजार रुपये मिलते हैं. वहीं, कुछ साल का अनुभव हासिल करने के बाद 30 से 40 हजार रुपये प्रतिमाह तक मिल सकते हैं
कहां से करें कोर्स:
इंस्टीट्यूट ऑफ क्लीनिकल रिसर्च, नई दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू, अहमदाबाद, हैदराबाद
वेबसाइट: www.icriindia.com
आईसीबीआईओ क्लीनिकल रिसर्च, बेंगलुरू
वेबसाइट: www.icbio.org
एम्पावर स्कूल ऑफ हेल्थ, दिल्ली
वेबसाइट: www.empower.net.in
आईडीडीसीआर, हैदराबाद
वेबसाइट: www.iddcr.com
जीआईटीएस एकेडमी, बेंगलुरू
वेबसाइट: www.gitsacademy.com
एकेडमी ऑफ क्लीनिकल रिसर्च एंड फार्मास्युटिकल मैनेजमेंट, कोलकाता
महाराजा इंस्टीट्यूट मेडिकल साइंसेज, आंध्रप्रदेश
वेबसाइट: www.mimsvzm.org

सिमोजेन इंडिया
वेबसाइट: www.symogen.net

Wednesday, January 9, 2019

केमिस्ट्री में करियर

साइंस के हरेक विषय की खासियत है कि वह अपनी अलग-अलग शाखाओं में कॅरिअर और रिसर्च के ढेरों बेहतरीन अवसर देता है। केमिस्ट्री भी ऐसा ही एक विषय है। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने वाला यह विज्ञान नौकरी के मौकों से भरपूर है। साथ ही परम्परागत सोच रखने वालों को भी अब यह समझ आ गया है कि केमिस्ट्री प्रयोगशाला के बाहर भी ढेरों अवसर पैदा कर रही है और इंडस्ट्री आधारित बेहतरीन जॉब प्रोफाइल्स उपलब्ध करवा रही है। ऐसे में भविष्य के लिहाज से यह एक सुरक्षित विकल्प है।
क्या पढ़ना होगा
केमिस्ट्री में रुचि रखने वाले स्टूडेंट्स 12वीं कक्षा(साइंस) अच्छे अंकों से पास करने के बाद केमिकल साइंस में पांच वर्षीय इंटीग्रेटेड मास्टर्स प्रोग्राम का विकल्प चुन सकते हैं या फिर केमिस्ट्री में बीएससी/बीएससी(ऑनर्स)डिग्री कोर्स चुन सकते हैं। आगे चलकर एनालिटिकल केमिस्ट्री, इनऑर्गनिक केमिस्ट्री, हाइड्रोकेमिस्ट्री, फार्मास्यूटिकल केमिस्ट्री, पॉलिमर केमिस्ट्री, बायोकेमिस्ट्री, मेडिकल बायोकेमिस्ट्री और टेक्सटाइल केमिस्ट्री में स्पेशलाइजेशन के जरिए आप एक मजबूत करियर की शुरुआत कर सकते हैं।
काम और रोजगार के अवसर : लैब के बाहर और भीतर केमिस्ट्री अपने आपमें काम के अनेक अवसर समेटे हुए है-
ऊर्जा एवं पर्यावरण
रसायनों के मिश्रण या रासायनिक प्रतिक्रियाओं से ऊर्जा पैदा करने के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। इन बदलावों ने बड़ी संख्या में रसायन तकनीशियनों की बाजार मांग पैदा कर दी है। ढेरों कंपनियां ऐसी प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए कैम्पस प्लेसमेंट आयोजित रही हैं। साथ ही अंतरराष्ट्रीय कंपनियों पर लगातार पर्यावरण को नुकसान न करने वाले उत्पाद बनाने का दबाव बना हुआ है। ऐसे में संबंधित रसायनों पर लगातार रिसर्च हो रहा है अाैर इस तरह के उत्पाद बनाने वाले प्रतिभाशाली प्रोफेशनल्स की जरूरत बढ़ती जा रही है। खासकर रेजीन उत्पाद संबंधी क्षेत्रों में उत्कृष्ट रसायनविद् को बढ़िया पैकेज मिल रहा है।
लाइफ स्टाइल एंड रिक्रिएशन
नए उत्पादों की खोज और पुराने उत्पादों को बेहतर बनाने की दौड़ ने नए रसायनों के मिश्रण और आइडियाज के लिए बाजार में जगह बनाई है। लाइफ स्टाइल प्रॉडक्ट्स जिनमें काॅस्मेटिक्स से लेकर एनर्जी ड्रिंक्स तक शामिल हैं, ने केमिस्ट्री स्टूडेंट्स के लिए अच्छे मौके उत्पन्न किए हैं। इस क्षेत्र में रुचि रखने वालों को हाउस होल्ड गुड्स साइंटिस्ट, क्वालिटी एश्योरेंस केमिस्ट, एप्लीकेशन्स केमिस्ट और रिसर्चर जैसे पदों पर काम करने का अवसर प्राप्त हो रहा है। 
ह्यूमन हेल्थ
रक्षा उत्पादों के बाद ड्रग एंड फार्मा इंडस्ट्री दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा पैसा कमाने वाला उद्योग है। इसी के चलते फार्मेसी और ड्रग इंडस्ट्री में फार्मासिस्ट और ड्रगिस्ट की भारी मांग मार्केट में लगातार बनी रहने वाली है। इसके अलावा मेडिसिनल केमिस्ट, एसोसिएट रिसर्चर, एनालिटिकल साइंटिस्ट और पाॅलिसी रिसर्चर जैसे पदों पर भी रसायनविदों की जरूरत रहती है।
जॉब प्रोफाइल
रसायन विज्ञान की विभिन्न शाखाओं में पारंगत विशेषज्ञ एनालिटिकल केमिस्ट, शिक्षक, लैब केमिस्ट, प्रॉडक्शन केमिस्ट, रिसर्च एंड डेवलपमेंट मैनेजर, आर एंड डी डायरेक्टर, केमिकल इंजीनियरिंग एसोसिएट, बायोमेडिकल केमिस्ट, इंडस्ट्रियल रिसर्च साइंटिस्ट, मैटेरियल टेक्नोलाॅजिस्ट, क्वालिटी कंट्रोलर, प्रॉडक्शन आॅफिसर और सेफ्टी हेल्थ एंड इन्वाइरॅनमेंट स्पेशलिस्ट जैसे पदों पर काम कर सकते हैं। फार्मास्यूटिकल, एग्रोकेमिकल, पेट्रोकेमिकल, प्लास्टिक मैन्यूफैक्चरिंग, केमिकल मैन्यूफैक्चरिंग, फूड प्रोसेसिंग, पेंट मैन्यूफैक्चरिंग, टैक्सटाइल्स, फोरेंसिक और सिरेमिक्स जैसी इंडस्ट्रीज में पेशेवरों की मांग बनी हुई है।

यहां से कर सकते हैं कोर्स
>>यूनिवर्सिटी ऑफ मुंबई, मुंबई
>>दिल्ली यूनिवर्सिटी, दिल्ली
>>सेंट जेवियर्स काॅलेज, मुम्बई
>>कोचीन यूनिवर्सिटी आॅफ साइंस एंड टेक्नोलाॅजी, केरल
>>इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नोलाॅजी, खड़गपुर
>>लोयोला काॅलेज, चेन्नई

Friday, January 4, 2019

आनुवंशिक इंजीनियरी में कॅरिअ

हम अपने अभिभावकों जैसे क्यों दिखते हैं? किसी तरह एक कोशाणु एक सजीव जीव-जंतु में विकसित हो जाता है? क्या आप सजीव प्राणियों में वंशानुगतता विज्ञान के बारे में जानना चाहते हैं? जेनेटिक्स शब्द प्राचीन ग्रीक शब्द ‘‘जेनीटिकोस’’ से आया है जिसका अर्थ ‘जेनरेटिव’’ ‘‘(जनन)’’ है, जो जेनेसिस से निकला है और इसका अर्थ वंश या कुल है.
अत्यधिक साधारण से लेकर अत्यधिक विकसित के जीव-जंतु का एक आनुवंशिक कोड अथवा ‘‘ रूप रेखा’’ होती है, जो स्पष्ट रूप से यह निर्धारित करती है कि इसकी क्या विशेषताएं हैं. आनुवंशिकी एक स्पष्ट विज्ञान है जो हमें अत्यधिक लाभकारी विशेषताओं का पता लगाने और उन्हें विभिन्न जीवों में स्थापित करने में हमें सक्षम बनाता है. आनुवंशिक इंजीनियरी एक अत्यधिक परिष्कृत एवं जटिल क्षेत्र है जो जीव-जंतुओं में जैविकीय परिवर्तन के अध्ययन से संबद्ध है.
यह जैवप्रौद्योगिकी की शाखा है जो जीव-जंतुओं के कोशाणु (सबसे छोटा जीव एकक), संरचनात्मक एवं कार्यात्मक इकाई के अध्ययन से संबंध रखता है. यह जीन के निर्माण और एक जीव से दूसरे जीव में प्रतिरोपित करने के लिए जैविकीय विज्ञान द्वारा विकसित एक प्रौद्योगिकी है. यह मानव कौशल के माध्यम से आनुवंशिक कोड का परिष्करण है. यह ‘‘आनुवंशिकता विज्ञान’’ के रूप में भी जाना जाता है और इसमें रिकॉम्बिनेंट डी.एन.ए. तकनीकों द्वारा आनुवंशिक सामग्रियों की क्लोनिंग, इन विट्रो फर्टिलाइजेशन, स्पीसीज़ हाइब्रिडाइजेशन या डायरेक्ट मैनिपुलेशन निहित है.
आनुवंशिकी इंजीनियरी, इंजीनियरों को कृत्रिम पद्धतियों द्वारा शरीर में डी.एन.ए. तथा जीन के आचरण के आध्यम में सहायता करती है. इंजीनियर जीवों से डी.एन.ए के निष्कर्षण, संरचना में परिवर्तन के अध्ययन तथा उन्हें पुन: उसी जीव या अन्य जीवों में प्रतिस्थापित करने जैसे विभिन्न कार्य करते हैं. आनुवंशिकी एवं आनुवंशिक इंजीनियरी अनिवार्यत: अनुसंधान उन्मुखी क्षेत्र हैं, जिसमें औषधि, भेषजीय, कृषि एवं पर्यावरण जैसे विभिन्न क्षेत्रों में इसका अनुप्रयोग निहित है.
आनुवंशिक इंजीनियर के कुछ कार्य-क्षेत्र इस प्रकार हैं:-
औषधि: जैवप्रौद्योगिकीविदों द्वारा इस क्षेत्र में किए गए विशिष्ट विकास कार्य से, जानलेवा रोगों जैसे हेपिटाइटिस बी, एड्स, स्माल-पोक्स तथा अन्य रोगों के लिए निदान, औषधि एवं वैक्सीन में सुधार आया है. आनुवंशिक इंजीनियरी का उपयोग करके विभिन्न किस्मों के भेषजीय उत्पादों का निर्माण किया जा रहा है. जो वंशागत व्यतिक्रम अब तक असाध्य माने जाते थे अब उनका आनुवंशिक इंजीनियरी के उत्पादों से उपचार किया जा रहा है.
कृषि एवं पशुपालन:  पौधों एवं पशुओं में आनुवंशिक इंजीनियरी का उपयोग अनेक प्राकृतिक महत्व की विशेषताओं में सुधार लाने, रोगों अथवा क्षति से प्रतिरक्षा बढ़ाने तथा अन्य विशेषताएं बढ़ाने के लिए किया जाता है. अधिक पैदावार वाले बीजों की किस्मों, या कम अवधि वाली फसल किस्मों अथवा जो आद्रता बनाए रखने या रोग एवं पेस्ट रेसिस्टेंट अथवा शुष्क अथवा अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के लिए उपयुक्त होती हंै, जो अन्यथा जी.एम. (जेनेटिकली मोडिफाइड) खाद्य के रूप में जाने जाते हैं आनुवंशिक  इंजीनियरी का ही परिणाम है. आनुवंशिक रूप से इंजीनियर्ड पशु विकास हार्मोन से उच्च पैदावार के उत्पादन एवं पशु उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार आया है. अनेक किस्मों के आनुवंशिक रूप से इंजीनियर्ड, उच्च पैदावार वाले पशु ब्रीड का विकास हुआ है, जिससे डेयरी उत्पादों तथा मीट उत्पादों के उत्पादन में वृद्धि हुई है. इसके परिणामस्वरूप भारत विश्व का सबसे बड़ा दूध उत्पादक बन गया है.
पर्यावरण: औद्योगिक वायु प्रदूषण का नियंत्रण, कूड़ा एवं निस्सारी शोधन भी आनुवंशिक इंजीनियरों के बड़े कार्य क्षेत्र हैं.  वे वायु में आपके पेय जलों तथा पृथ्वी-जहां आप रहते हैं पर संभावित जैविकीय, भौतिकीय या रासायनिक प्रदूषकों का पता लगाते हैं. वे जोखिम, ऐसे जोखिमों के उपचार तथा पद्धतियों का विश्लेषण करने तथा ऑयल स्पिल्स एवं जहरीले कूड़े आदि के लिए सूक्ष्म-जैवीय उपचार निर्धारित करने के लिए खतरनाक पदार्थों के कूड़ा प्रबंधन का अध्ययन करते हैं.
शैक्षिक अनुसंधान एक तकनीक होती है, जो विशिष्ट कार्य क्षेत्रों में अनुप्रयोग करने की अपेक्षा ज्ञान के क्षेत्र में विस्तावित करने के लिए अधिक संचालित किया जाता है. शैक्षिक अनुसंधान न केवल चिकित्सा एवं शैक्षिक संस्थाओं में, बल्कि कुछ बड़े भेषज एवं रासायनिक उद्योगों में भी संचालित किया जाता है.
पात्रता:कोई स्नातक डिग्री (बी.ई./बी.टेक) के लिए 10+2 या समकक्ष परीक्षा मूल पात्रता मानदंड है जिसमें भौतिकीरासायन विज्ञानगणित एवं जीव विज्ञान होना अभीष्ट होती है.
आनुवंशिक इंजीनियरी जैवप्रौद्योगिकी में एक विशेषज्ञता है और इसलिए छात्र आनुवंशिकी या आनुवंशिक इंजीनियरी में विशेषज्ञता,  जैवप्रौद्योगिकी में अपनी अधिस्नातक डिग्री करते समय प्राप्त कर सकते हैं.
अर्हताप्राप्त आनुवंशिक इंजीनियर आनुवंशिकी या संबंधित क्षेत्रों जैसे-जैवप्रौद्योगिकी, मोलेक्यूलर जीव विज्ञान, सूक्ष्म जीव विज्ञान या जैव रसायन विज्ञान में स्नातक/अधिस्नातक आनुवंशिकी डिग्रीधारी होना चाहिए अथवा किसी मान्यताप्राप्त विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट (पीएच.डी.) धारी होना चाहिए. मुख्य रूप से जीवन विज्ञान पर बल देते हुए आनुवंशिक या प्रौद्योगिकी क्षेत्र को शामिल करते हुए आनुवंशिक इंजीनियरी का अध्ययन एम.एस.सी., या एम.टेक. के माध्यम से मास्टर स्तर पर और तत्पश्चात डॅाक्टोरल स्तर के अनुसंधान के समय किया जाता है. कृषि, पशु चिकित्सा विज्ञान एवं पशुपालन, आयुर्विज्ञान, जीवन विज्ञान, आनुवंशिकी, फार्मेसी, सूक्ष्मजीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, प्राणि विज्ञान, रसायन विज्ञान, जैवप्रौद्योगिकी, रसायनिक इंजीनियरी, या प्रौद्योगिकी, कृषि इंजीनियरी, खाद्य प्रौद्योगिकी, मानव जीव विज्ञान एवं समवर्गी किसी एक या अधिक विषयों में डिग्रीधारी स्नातक आनुवंशिकी या आनुवंशिक इंजीनियरी में एम.एस.सी.या एम.टेक. में प्रवेश ले सकते हैं. अधिकांश संस्थान आनुवंशिक इंजीनियरी में विशेष विषय के रूप में पाठ्यक्रम नहीं चलाते हैं, बल्कि जैवप्रौद्योगिकी, सूक्ष्मजीव विज्ञान, जैवरसायन विज्ञान विधाओं में एक गौण या सहायक विषय के रूप में रखते हैं. जैवप्रौद्योगिकी में अधिस्नातक एवं स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में आनुवंशिक इंजीनियरी में विशेषज्ञता कराई जाती है.
स्नातक पाठ्यक्रमों (बी.ई./बी.टेक.) के लिए चयन मैरिट अर्थात 10+2 की अंतिम परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर और प्रवेश परीक्षा के माध्यम से किया जाता है. आई.आई.टी. में प्रवेश जे.ई.ई. (संयुक्त प्रवेश परीक्षा) के माध्यम से दिया जाता है तथा अन्य संस्थाओं के लिए उनकी निजी पृथक प्रवेश परीक्षा एवं अन्य राज्य स्तरीय और राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं के माध्यम से प्रवेश दिया जाता है. विभिन्न विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों (एम.एस.सी/एम.टेक.) के लिए चयन जे.एन.यू., नई दिल्ली द्वारा संचालित की जाने वाली अखिल भारतीय सम्मिलित प्रवेश परीक्षा के माध्यम से तथा आई.आई.टी. में गेट के माध्यम से दो वर्षीय/चार सैमेस्टर के एम.टेक. पाठ्यक्रमों के लिए और जैव रासायनिक इंजीनियरी एवं जैवप्रौद्योगिकी में पांच वर्षीय एकीकृत एम.टेक पाठ्यक्रमों के लिए जे.ई.ई. द्वारा किया जाता है-
अपेक्षित कौशल: सफल आनुवंशिक इंजीनियर बनने के लिए किसी भी व्यक्ति में निम्नलिखित गुण/विशेषताएं होनी चाहिएं.*प्रखर विश्लेषिक मस्तिष्क*अनुसंधान के प्रति अभिरुचि*उच्च स्तर की एकाग्रता*विहंगम दृष्टि*उच्च कल्पनाशीलता*लंबे समय तक कार्य करने की प्रचुर शारीरिक क्षमता*मिलकर कार्य करने की क्षमता
संभावनाजैवप्रौद्योगिकी एवं आनुवंशिकी के अंतर-संबंधित कई क्षेत्रों में आवश्यक क्षमताएं तथा रुचि रखने वालों के लिए भारत तथा विदेश में उभर रहे अनेक अवसर हैं. आनुवंशिक इंजीनियर वैज्ञानिक एवं अनुसंधानकर्ता सामान्यत: विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थाओं की प्रयोगशालाओं में कार्य प्राप्त करते हैं. कुछ ऐसे व्यक्ति जैवप्रौद्योगिकी उद्योगों के अनुसंधान तथा विकास अनुभाग में भी कार्य-भार ग्रहण करते हैं.
आनुवंशिक इंजीनियर निम्नलिखित उद्योगों/क्षेत्रों में रोजग़ार तलाश सकते हैं.*भेषज एवं चिकित्सा उद्योग*कृषि उद्योग*एमएफएमसीजी कंपनियां*खाद्य प्रसंस्करण कंपनियां तथा जैवप्रोसेस प्रौद्योगिकी के क्षेत्र*जैव-कृषि (ट्रांसजेनिक किस्में, जैव-उर्वरक, बायो-पेस्टिसाइड्स)*सरकारी एवं निजी क्षेत्रों के अनुसंधान एवं विकास विभाग*अध्यापन एवं शिक्षाशास्त्र*अनुसंधान
सरकारी एवं निजी क्षेत्रों के अनुसंधान संगठन रोग निवारण, प्रदूषण नियंत्रण, कूड़ा प्रबंधन के लिए और बड़ी हुई उत्पादकता के लिए विभिन्न रासायनिक प्रक्रियाओं के क्षेत्र में अनुप्रयोग हेतु उपायुक्त अनुसंधान एवं विकास अध्ययन करने के लिए भी आनुवंशिकविदों को सेवा में रखते हैं. वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, सेलुलर एवं मोलेक्यूलर जीव विज्ञान केंद्र, सूक्ष्म जैविकीय प्रौद्योगिकी संस्थान, पादप जैवप्रौद्योगिकी केंद्र, केंद्रीय औषध अनुसंधान संस्थान, राष्ट्रीय आहार संस्थान, टाटा आधारभूत अनुसंधान संस्थान, राष्ट्रीय जीव विज्ञान केंद्र, आलू अनुसंधान संस्थान, तम्बाकू अनुसंधान संस्थान आदि न्यूनतम मास्टर योग्यताधारी व्यक्तियों  को भर्ती करते हैं.
चूंकि आनुवंशिक इंजीनियरी एक अत्यधिक अनुसंधान-उन्मुखी क्षेत्र है, इसलिए यदि आप कार्य की ऊंचाई पर चढऩा चाहते हैं तो कोई पीएच.डी. डिग्री होना आपके लिए आवश्यक है. पीएच.डी. स्नातक सामान्यत: अपना डॉक्टरोत्तर प्रशिक्षण पूरा करते हैं और विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में या उद्योग में अनुसंधान वैज्ञानिकों के रूप में कार्य ग्रहण करते हैं.
इसलिए, यदि आप ऐसा अनुसंधान करना चाहते हैं जो कि एक दिन एक ऐसे फल का उत्पादन करें जो हेपिटाइटिस-बी के लिए सुरक्षित, प्रभावपूर्ण तथा सस्ता वैक्सीन हो, या ऐसे अतिरिक्त विटामिनों वाले धान का उत्पादन करें जो भारत में रोगों से संघर्ष करने वाले शिशुओं की सहायता कर सके तो आनुवंशिकी या आनुवंशिक इंजीनियरी आपके लिए एक सही कॅरिअर  है.  आज यह कोई विज्ञान फिक्शन नहीं बल्कि एक अत्यधिक क्रांतिपूर्ण एवं लाभपूर्ण विज्ञान है.
संस्थानभारत में आनुवंशिक इंजीनियरी पाठ्यक्रम चलाने वाले बहुत विश्वविद्यालय निम्नानुसार हैं :-*एस.आर.एम. विश्वविद्यालय (आनुवंशिक इंजीनियरी में बी.टेक./एम.टेक.पीएच.डी)*भारत विश्वविद्यालय, चेन्नै (आनुवंशिक इंजीनियरी में एम.टेक.)*आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय, पटना (आनुवंशिक इंजीनियरी में बी.टेक. एवं एम.टेक.)*आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय, बिहार*मदुरै कामराज विश्वविद्यालय ,मदुरै, तमिलनाडु*आर.एम. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान, चेन्नै*वी.पटेल इंजीनियरी कॉलेज, खेरवा, गुजरात*भारतीय विज्ञान संस्थान (आई.आई.एस.सी.), बंगलौर*आनुवंशिक इंजीनियरों की भर्ती करने वाले कुछ सरकारी संगठन निम्नलिखित हैं:-*राष्ट्रीय रोगप्रतिरक्षाविज्ञान, नई दिल्ली*डी.एन.ए. फिंगरप्रिंट्स एवं डायग्नोस्टिक्स  केंद्र, हैदराबाद*जैव रासायनिक इंजीनियरी अनुसंधान तथा प्रोसेस विकास केंद्र, चंडीगढ़*जीनोमिक एवं इंटीगे्रटिव जीवविज्ञान संस्थान, दिल्ली*वैज्ञानिक एवं औद्योगिकी अनुसंधान परिषद (सी.एस.आई.आर.)

Monday, December 31, 2018

एस्ट्रोनॉमी में बनाएं अपना कॅरियर

आसमान में लाखों जगमगाते एवं टिमटिमाते तारों को निहारना दिमाग को सुकून से भर देता है। इन्हें देखने पर मन में यही आता है कि अगली रात में पुन: आने का वायदा कर जगमगाते हुए ये सितारे आखिर कहां से आते हैं और कहां गायब हो जाते हैं?  हालांकि,  इसी तरह के कई अन्य सवालों जैसे उल्कावृष्टि, ग्रहों की गति एवं इन पर जीवन जैसे रहस्यों से ओत-प्रोत बातें सोचकर व्यक्ति खामोश रह जाता है। एस्ट्रोनॉमी (Astronomy) या खगोल विज्ञान वह करियर है, जो इन सभी रहस्यों, सवालों एवं गुत्थियों को सुलझाता है। अगर आप ब्रह्मांड (Universe) के रहस्यों से दो-चार होकर अंतरिक्ष को छूना चाहते हैं तो यह करियर आपके लिए बेहतर है। वैसे भी कल्पना चावला (Kalpana Chawla), राकेश शर्मा (Rakesh Sharma) तथा सुनीता विलियम्स (Sunita Williams) जैसे प्रतिभावान एस्ट्रोनॉट (Astronaut) के कारण आज यह करियर युवाओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय है।

एस्ट्रोनॉमी (Astronomy) क्या है
एस्ट्रोनॉमी (Astronomy) वह विज्ञान है, जो पृथ्वी के वातावरण से परे अंतरिक्ष (Space) से संबंधित है। यह ब्रह्मांड में उपस्थित खगोलीय पिंडों (Celestial Bodies) की गति, प्रकृति और संघटन का शास्त्र है। साथ ही इनके इतिहास और संभावित विकास हेतु प्रतिपादित नियमों का अध्ययन भी है। यह एस्ट्रोलॉजी (Astrology) या ज्योतिष विज्ञान जिसमें सूर्य, चंद्र और विभिन्न ग्रहों द्वारा व्यक्ति के चरित्र, व्यक्तित्व एवं भविष्य पर पडने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जाता है, से पूरी तरह से अलग शास्त्र है। अत्याधुनिक तकनीक एवं गैजेट्स के प्रयोग ने हालांकि एस्ट्रोनॉमी को एक विशिष्ट विधा बना दिया है, परंतु वास्तव में यह बहुत ही पुरानी विधा है। प्राचीन काल से ही मानव ग्रहों (Human Planet) एवं अंतरिक्ष पिंडों (Space Bodies) का अध्ययन करता रहा है, जिनमें आर्यभट्ट (Aryabhatta), भास्कराचार्य (Bhaskaracharya), गैलीलियो (Galileo) और आइजक न्यूटन (Isaac Newton) जैसे महान गणितज्ञों एवं खगोलशास्त्रियों (Astronomers) का महत्वपूर्ण योगदान है। एस्ट्रोनॉमी में अंतरिक्ष पिंडों के बारे में जानकारी संग्रह करने के बाद उपलब्ध आंकडों से तुलना कर निष्कर्ष निकाला जाता है तथा पुराने सिद्घांतों को संशोधित कर नए नियम प्रतिपादित किए जाते हैं।

शैक्षिक योग्यता  (Educational Qualification)
यदि आप भी अंतरिक्ष की रहस्यमय और रोमांचक दुनिया में कदम रखना चाहते हैं, तो एस्ट्रोनॉमी (Astronomy) का कोर्स कर सकते हैं। फिजिक्स या मैथमेटिक्स से स्नातक पास स्टूडेंट्स थ्योरेटिकल एस्ट्रोनॉमी (Theoretical Astronomy) के कोर्स में एंट्री ले सकते हैं। इंस्ट्रूमेंटेशन/ एक्सपेरिमेंटल एस्ट्रोनॉमी में प्रवेश के लिए बीई (बैचलर ऑफ इलेक्ट्रॉनिक/ इलेक्ट्रिकल/ इलेक्ट्रिकल कम्युनिकेशन) की डिग्री जरूरी है। यदि आप पीएचडी कोर्स (फिजिक्स, थ्योरेटिकल व ऑब्जर्वेशनल एस्ट्रोनॉमी, एटमॉस्फेरिक ऐंड स्पेस साइंस आदि) में प्रवेश लेना चाहते हैं, तो ज्वाइंट एंट्रेंस स्क्रीनिंग टेस्ट-जेईएसटी (Joint Entrance Screening Test) से गुजरना होगा। इस एग्जाम में बैठने के लिए फिजिक्स में मास्टर डिग्री या फिर इंजीनियरिंग में बैचलर डिग्री जरूरी है। यूनिवर्सिटी ऑफ पुणे (University of Pune) में स्पेस साइंस में एमएससी कोर्स उपलब्ध है। बेंगलुरु यूनिवर्सिटी (Bangalore University) और कालीकट यूनिवर्सिटी (University of Calicut) से एस्ट्रोनॉमी में एमएससी कोर्स कर सकते हैं।

एस्ट्रोनॉमी के प्रकार (Type of Astronomy)
एस्ट्रोनॉमी में वैज्ञानिक तरीकों से तारे (Stars), ग्रह (Planets), धूमकेतु (Comets) आदि के बारे में अध्ययन किया जाता है। साथ ही पृथ्वी (Earth) के वायुमंडल के बाहर किस तरह की गतिविधियां हो रही हैं, यह भी जानने की कोशिश की जाती है। इसकी कई ब्रांचेज हैं..

एस्ट्रोकेमिस्ट्री (Astrochemistry): इसमें केमिकल कॉम्पोजिशन (Chemical Composition) के बारे में अध्ययन किया जाता है। साथ ही विशेषज्ञ स्पेस में पाए जाने वाले रासायनिक तत्व के बारे में गहन अध्ययन कर जानकारियां एकत्र करते हैं।

एस्ट्रोमैटेरोलॉजी (Astro Meteorology): एस्ट्रोनॉमी के इस हिस्से में खगोलीय चीजों की स्थिति और गति के बारे में जानकारी जुटाई जाती है। साथ ही, यह भी जानने की कोशिश की जाती है कि खगोलीय चीजों का पृथ्वी के वायुमंडल पर किस तरह का प्रभाव पडता है। यदि आप वायुमंडल पर पडने वाले खगोलीय प्रभाव को ठीक से समझ गये और इस विद्या का डीप अध्ययन कर लिया तो आपकी डिमांड का ग्राफ बढ जाएगा।

एस्ट्रोफिजिक्स  (Astrophysics): इसके अंतर्गत खगोलीय चीजों की फिजिकल प्रॉपर्टी के बारे में अध्ययन किया जाता है। खगोलीय फिजिकल प्रॉपर्टी को समझना इतना आसान नहीं होता, जितना लोग समझते हैं। इसे समझने में अध्ययन कर रहे स्टूडेंटस को सालों गुजर जाते हैं।

एस्ट्रोजिओलॉजी  (Astrogeology): इसके तहत ग्रहों की संरचना और कॉम्पोजिशन के बारे स्टडी की जाती है। इस क्षेत्र के विशेषज्ञ आप तभी बन सकेंगे जब ग्रहों की तह में जाकर गहन अध्ययन करेंगे। एकाग्रचित होकर की गयी सिस्टमेटिक पढाई ही ग्रहों के फार्मूलों के करीब ले जाएगी। इसे समझने के लिए सोलर सिस्टम, प्लेनेट, स्टार, सेटेलाइट आदि का डीप अध्ययन जरूरी है।
एस्ट्रोबायोलॉजी  (Astrobiology): पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर भी जीवन है? इस बात की पडताल एस्ट्रोबायोलॉजी के अंतर्गत किया जाता है। एस्ट्रोबायोलॉजी के जानकार ही वायुमंडल के बाहर जीवन होने के रहस्य से पर्दा उठा सकते हैं, इसके पीछे छुपी होती है उनकी वर्षो की तपस्या।

Career in Astronomyसंभावनाएं (Opportunities)
एस्ट्रोनॉमी का कोर्स पूरा करने के बाद विकल्पों की कमी नहीं रहती है। यदि सरकारी संस्थाओं की बात करें, तो इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (Indian Space Research Organisation), नेशनल सेंटर फॉर रेडियो एस्ट्रोफिजिक्स पुणे (National Centre for Radio Astrophysics), फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी अहमदाबाद (Physical Research Laboratory), विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (Vikram Sarabhai Space Center), स्पेस फिजिक्स लेबोरेटरीज, स्पेस ऐप्लिकेशंस सेंटर, इंडियन रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन बेंगलुरु, एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी ऑफ इंडिया आदि में नौकरी की तलाश कर सकते हैं। यदि रिसर्च के क्षेत्र में कुछ वर्षो का अनुभव हासिल कर लें, तो अमेरिका की नासा (नेशनल एरोनॉटिक्स स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) जैसी संस्थाओं में नौकरी हासिल कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त समय-समय पर विभिन्न देशों में आयोजित सेमिनार एवं गोष्ठियों में हिस्सा लेने का भी अवसर प्राप्त होता है।

सैलरी (Salary)
शोध के दौरान जूनियर रिसर्चर (Junior Researcher) को 8 हजार एवं सीनियर रिसर्चर (Senior Researcher) को 9 हजार रूपये मिलते हैं। हॉस्टल में रहने-खाने, चिकित्सा तथा ट्रैवल की सुविधा संस्थान द्वारा दी जाती है। साथ ही विभिन्न राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय सेमिनार एवं कांफे्रंस में भाग लेने का भी मौका मिलता है। शोध पूरा करने के पश्चात् विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों में वैज्ञानिक एवं एस्ट्रोनामर या एस्ट्रोनाट के पद पर उच्च वेतनमान के साथ अन्य उत्कृष्ट सुविधाएं भी मिलती हैं।

कहां से करें कोर्स (Course)
रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट, सीवी रमन एवेन्यू, बेंगलुरू
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स,
फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी, अहमदाबाद
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, मुम्बई
रेडियो एस्ट्रोनॉमी सेंटर, तमिलनाडु
उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद
मदुरै कामराज विश्वविद्यालय, मदुरै, तमिलनाडु
पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला, पंजाब
महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, कोट्टयम, केरला