Tuesday, July 21, 2015

Career in शिक्षण

परिचय

एक शिक्षक का बच्चे के प्रति उत्तरदायित्व शायद उसके माता-पिता से भी कहीं ज्यादा होता हैं. चूंकि बच्चा विद्यालय में केवल शिक्षा ही ग्रहण नहीं करता बल्कि अपने शिक्षकों से जीवन के नैतिक मूल्यों को भी ग्रहण करता है.
चाहे वह स्कूल के स्तर पर शिक्षण कार्य हो या कॉलेज के स्तर पर, शिक्षण को करियर के रूप में अपनाने के लिए सबसे आवश्यक है आपमें विचारों के आदान-प्रदान की क्षमता होनी चाहिए . एकतरफ जहाँ स्कूल टीचर के रूप में आप बच्चों के कोमल मन को शिक्षित करते हैं वहीं दूसरी तरफ कॉलेज के वातावरण में आप छात्रों से मित्रवत व्यवहार कर बौद्धिक स्तर पर उनके साथ विचारों का आदान-प्रदान करते हैं.
भारत में शिक्षकों के लिए अंग्रेज़ी, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान इत्यादि विषयों में बहुत अवसर उपलब्ध हैं. इंटरनेट के इस युग में जहां बच्चों के पास सूचना आवश्यकता से अधिक मात्रा में उपलब्ध हैं, अच्छे अध्यापकों की मांग निश्चित तौर पर ज्यादा बढ़ गयी है. कुछ स्कूलों द्वारा वर्चुअल क्लासरूम टीचिंग की शुरूआत कर देने से शिक्षकों के लिए अवसर और ज्यादा बढ़ गए हैं.
स्नातक के  उपरान्त अथवा इसके साथ-साथ ही शिक्षा में स्नातक की डिग्री हासिल की जा सकती है जिसके बाद आप आसानी से किसी स्कूल में अध्यापक का पद पा सकते हैं. साधारणतः सरकारी स्कूलों में अध्यापक का पद प्रतिष्ठित माना जाता है. परन्तु यदि आप शिक्षण की आधुनिक विधाओं का ज्ञान लेना चाहते हैं तो आपको प्राइवेट स्कूल में नौकरी तलाश करनी चाहिए.
कॉलेज में अध्यापन से करियर की शुरूआत करने के लिए आपको परास्नातक तथा उसके बाद डोक्टरेट की उपाधि प्राप्त करना आवश्यक है. इसके बाद आपको प्रवेश परीक्षा भी पास करनी पड़ेगी.

चरणबद्ध प्रक्रिया

बीएड पाठ्यक्रम भावी शिक्षकों में सैद्धांतिक, प्रायोगिक एवं वैश्लेषिक क्षमता विकसित करने हेतु डिजाईन किया गया है. एक पारंपरिक बीएड पाठ्यक्रम में निम्न विषय समाहित होते हैं:

शिक्षा सिद्धांतशिक्षा एवं विकास मनोविज्ञानसूचना संचार तकनीक एवं निर्देश तंत्रशिक्षा का मूल्यांकन एवं चुनावविषयपरक शिक्षाप्रायोगिक परीक्षासामूहिक चर्चालाईव प्रजेंटेशनछात्रों के साथ संवाद

उपरोक्त वर्णित विषयों में शिक्षकों को ट्रेनिंग देकर कॉलेज उनमें छात्रों को समझने व उनको सँभालने के गुण विकसित करते हैं.  कई कॉलेज छात्रों को प्लेसमेंट भी प्रदान करते हैं.
भारत में कुछ सबसे अच्छे बीएड कॉलेज हैं:  जेएसएस इंस्टीटयूट ऑफ़ एजूकेशन, बैंगलौर; कॉलेज ऑफ़ टीचर एजूकेशन, अगरतला; इंदिरा गांधी बीएड कॉलेज, कर्नाटक; एजी टीचर्स कॉलेज, अहमदाबाद तथा नेशनल काउन्सिल ऑफ़ टीचर एजूकेशन, नयी दिल्ली. इनके अलावा इग्नू (इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय) जैसे संस्थान हैं जिनका एक नियत पाठ्यक्रम है:

इन कॉलेजों  में दाखिला लेने के लिए आपको प्रवेश परीक्षा व साक्षात्कार से गुज़रना होगा.

पदार्पण

यदि आप छात्र हैं और टीचिंग को अपना करियर बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको उन कॉलेजों के बारे में पता करना चाहिये जो बीएड कोर्स संचालित कर रहे  हैं. इसके अलावा आपमें छात्रों को पढ़ाने के दौरान भी अपने ज्ञान को बढ़ाने की इच्छा होनी चाहिए. यदि आपको शिक्षण में अपना करियर बनाना है तो आपको अपनी स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद अथवा कॉलेज के दौरान ही निम्लिखित चरण-बद्ध तरीके से शुरूआत कर सकते हैं:

बीएड कोर्स संचालित करने वाले कॉलेजों के बारे में सूचना एकत्र करिये. उदाहरण के तौर पर, अपने शहर में स्थित विश्वविद्यालय से ही शुरूआत कर सकते हैं.  यदि आप दिल्ली में रहते हैं तो दिल्ली यूनिवर्सिटी की वेबसाईट पर इसके बारे में देख सकते हैं. इसी तरह आप दूसरे विश्वविध्यालयों के बारे में भी सूचना एकत्र कर सकते हैं . कम से कम 4-5 विकल्प ज़रूर तलाशें .कौन-कौन से कॉलेज प्रवेश परीक्षा के द्वारा प्रवेश देते हैं, उनकी सूची बनाइये.  उन सम्भावित विषयों  को लिखिए जो कि परीक्षा में पूछे जा सकते हैं तथा उनकी तैयारी शुरू कर दीजिये. यदि ऐसा नहीं कर सकते तो अपने 12वीं के अंकों पर नज़र डालिए चूंकि ये आपको दाखिला दिला सकते हैं.उन स्कूलों व कॉलेजों की सूची बनाइये जहां आप कोर्स करने के पश्चात आवेदन कर सकते हैं. ऐसा इसलिए ताकि कॉलेज से निकलते ही आपको नौकरी मिल जाए.

क्या यह मेरे लिए सही करियर है?

शिक्षण को करियर के रूप में उन्हें चुनना चाहिए जो दूसरों के साथ सूचना व ज्ञान बांटने के लिए सदैव तत्पर हों. इस करियर का सबसे बड़ा फायदा है इसमें ज्यादा लम्बे वर्किंग आवर्स का नहीं होना. एक अध्यापक 8 या 9 टीचिंग सेशन के बाद घर वापस लौटकर आसानी से घरेलु एवं अन्य वैक्तिगत कम निपटाया जा सकता है. शायद यही वजह है कि महिलाएं इस करियर को सबसे ज्यादा पसंद करती हैं. हालाँकि आजकल तो पुरुष भी पूर्णकालिक शिक्षक के रूप में सामने आ रहे हैं. पारंपरिक विषयों के अलावा, शारीरिक शिक्षा एवं खेल, योग तथा कला एवं शिल्प भी शिक्षण में पसंदीदा विषय बनकर उभरे हैं.

खर्चा कितना होगा?

बीएड कोर्स का खर्चा करीब 10,000 से 30,000 के बीच आयेगा हालाँकि कुछ विश्वविद्यालय इससे कम फीस पर भी यह कोर्स संचालित कर रहे हैं.

छात्रवृत्ति

साधारणतः बीएड के लिए लोन लेने की ज़रुरत नहीं पड़ती है परन्तु फिर भी आप स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया जैसे बैंकों से 7.5 लाख रूपये तक का लोन ले सकते हैं.

रोज़गार के अवसर

शिक्षकों के लिए रोज़गार के अवसर अच्छे हैं. वर्क टाइमिंग्स भी ठीक हैं. एक अध्यापक साधारणतः 8 बजे से 3 बजे तक क्लास लेता है हालाँकि महाविद्यालयों में शिक्षकों को अपने टाइमिंग्स निर्धारित करने की छूट रहती है परन्तु  वहां भी प्रसिद्ध कॉलेजों में 4-5 बजे तक ही क्लास संचालित होती हैं .

प्रतिष्ठित कॉलेज व यूनिवर्सिटीज़ में अवसरों की भले ही कमी हों परन्तु प्राइवेट कॉलेज एवं स्कूलों में एजूकेशन में डिग्री लेने के पश्चात आसानी से नौकरी प्राप्त की जा सकती है.

वेतनमान

सरकारी स्कूलों व कॉलेजों में वेतनमान अच्छा है. केन्द्रीय विध्यालय में एक प्राथमिक अध्यापक कक्षा के स्तर के अनुसार 20,000 से 25,000 तक आसानी से कमा लेता है. यहाँ इन्हें रहने, आने-जाने  व स्वास्थ्य के लिए भत्ते भी मिलते हैं.  वहीं दूसरी ओर, प्राइवेट स्कूल 15,000 से अधिक वेतन देते हैं जो कि कक्षा के स्तर तथा शिक्षक की योग्यता एवं अनुभव पर निर्भर करता है.

कॉलेजों में पढ़ाने पर आप कम से कम 40,000 रूपये मासिक व उससे ज्यादा  कमा सकते हैं परन्तु लेक्चरर व प्रोफ़ेसर के पद के लिए चयन प्रक्रिया काफी जटिल है तथा आपको इसके लिए कई प्रवेश परीक्षाओं को उत्तीर्ण करना होगा.

मांग एवं आपूर्ति

समाज में शिक्षक का योगदान बहुत महत्वपूर्ण  होता है चूंकि वह देश के भविष्य की नींव रखता है. हाल ही में बना  "शिक्षा का अधिकार"  क़ानून गाँव के बच्चों के लिए शिक्षा के कई अवसर लेकर आया है. भारत में पहले से ही सभी विषयों के शिक्षकों की बहुत कमी है. अब तो मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ेगी ही. कम वेतन की वजह से अब तक शिक्षकों की आपूर्ति कम रहती थी परन्तु हाल ही में सरकार ने स्थिति सुधारने के लिए कुछ कदम उठाये हैं.

मार्केट वॉच

बाज़ार में योग्य शिक्षकों की सदैव कमी रहती है. हर जगह पब्लिक व प्राइवेट स्कूल एवं प्राइवेट कॉलेज तथा यूनिवर्सिटीज़ के खुल जाने से लेक्चरर एवं प्रोफ़ेसर की मांग उच्चतम स्तर पर है.
चाहे वह एमिटी यूनिवर्सिटी, बिरला ग्रुप ऑफ़ इंस्टीट्यूशन  या एमआईटी गाजियाबाद हो या फिर देश भर में फैले हुए कोई और निजी एमबीए कॉलेज, सभी को शिक्षण के लिए योग्य प्रोफेशनल्स की जरूरत है.
आजकल स्कूल वर्चुअल लर्निंग क्लासरूम की शुरूआत कर रहे हैं वहीं अधिकाँश स्कूलों में कक्षा 5 के बाद से ही कंप्यूटर एक अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाने लगा है.  ऐसी स्थिति में आईटी प्रोफेशनल्स भी शिक्षण को एक करियर विकल्प के रूप में देख रहे हैं.
इसके अलावा, एनआईआईटी, एप्टेक, सीएससी, सीएमसी जैसे संस्थानों ने प्रोग्रामिंग के क्षेत्र में ट्रेनर्स के लिए संभावनाएं पैदा कर दी हैं.  कई परास्नातक छात्र अतिरिक्त धन कमाने के उद्देश्य से इन संस्थानों में पार्ट-टाईम जॉब करते हैं.

अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शन

आज शिक्षण आमने-सामने मौखिक रूप में पढ़ाने तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि ऑनलाईन वेब टीचिंग एवं ई-लर्निंग तक इसका विस्तार हो चुका है. अतः इस क्षेत्र में अवसर कई गुना बढ़  गए  हैं . 20-25  साल के अनुभव वाले सेवानिवृत्त अध्यापक आज ऑनलाईन ट्यूशन दे सकते हैं. ग्रामीण छात्रों के लिए इस माध्यम द्वारा पढ़ाई करना बहुत संभव हो सकता है.
यूके व यूएस जैसे देशों में हालाँकि शिक्षा तंत्र बहुत अलग है परन्तु सभी जगह इस क्षेत्र में अवसर अनेक हैं तथा साथ ही यह सबसे ज़्यादा आदरणीय प्रोफेशन में से एक है.



सकारात्मक/नकारात्मक पहलू

सकारात्मक

शिक्षण का क्षेत्र आपको विचारों के आदान-प्रदान व अपने ज्ञान को बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है. यदि कक्षा में उपस्थित छात्र उत्साही व सीखने के प्रति लगनशील हों तो शिक्षण भी एक मज़ेदार अनुभव होता है.  इस प्रोफेशन में बोर होने के बहुत ही कम अवसर हैं.सभी देशों में शिक्षण एक सम्माननीय प्रोफेशन है. इसकी टाइमिंग्स भी व्यक्ति की सुविधानुसार हैं.

नकारात्मक

दूसरी कॉर्पोरेट नौकरियों की तुलना में  ये जॉब आपको कम पैसे देगा.जहां कुछ स्कूलों व कॉलेजों में वेतन बहुत कम है वहीं कुछ स्कूल व कॉलेज ऐसे भी हैं जहां वेतन बहुत ज्यादा है. वेतन में इस विसंगति की वजह से शिक्षा का स्तर बुरी तरह प्रभावित होता है.भारत में छात्र की विशेष विषय में रूचि को देखते हुए पढ़ाने से ज्यादा अध्यापक का ध्यान पाठ्यक्रम पर रहता है. परिणामस्वरूप, गणित जैसे कठिन विषयों को प्रायोगिक विधियों से पढ़ाने को नज़रंदाज़ कर दिया जाता है. जब ये विषय सैद्धांतिक रूप में पढ़ाए जाते हैं  तो छात्रों को इनको समझने में कठिनाई होती है.

भूमिका एवं पदनाम

किसी संगठन में शिक्षक को लर्निंग एवं डेवलपमेंट प्रोफेशनल, कोच व विश्वसनीय सलाहकार के तौर पर जाना जाता है. जिन्होंने अपना मनोविज्ञान का कोर्स पूरा कर लिया है वो परामर्शदाता के रूप में जीवन की महत्त्वपूर्ण बातों तथा व्यक्ति प्रबंधन की शिक्षा दे सकते हैं.  इस प्रकार एक ही व्यक्ति हालाँकि विभिन्न पदनामों से जाना जाता है परन्तु उसकी सभी जगह भूमिका कमोवेश एक ही होती है. मूलतः शिक्षक का कार्य होता है- दूसरों को शिक्षा प्रदान करना तथा उनका तकनीकी एवं व्यक्तिगत विकास करना.

भारत में शिक्षकों की भर्ती करने वाले कुछ अग्रणी स्कूल व कॉलेज

केन्द्रीय विद्यालय संगठन (सीबीएसई पाठ्यक्रम)
राज्य सरकार अथवा नगर निगम/ पालिका द्वारा संचालित स्कूल
आईसीएसई जैसे अन्य बोर्डों से सम्बद्ध स्कूलविश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा अनुमोदित विश्वविद्यालयअखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् (एआईसीटीई) द्वारा अनुमोदित तकनीकी विश्वविद्यालय

रोज़गार प्राप्त करने के लिए कुछ सुझाव

यदि आपने शिक्षण कार्य के लिए कहीं आवेदन किया है तो निम्न बातों का ध्यान रखें:

आप ये पेशा क्यों चुनना चाहते हैं  या आज के भारत में इस प्रोफेशन की क्या अहमियत है, ऐसे सवालों के जवाब तैयार रखें. अपने जवाबों को आपकी शिक्षण के पेशे तथा आपके द्वारा चयनित विषय में रूचि एवं शिक्षक और छात्र जीवन को ध्यान में रखकर तैयार करें.चूंकि शिक्षण के कार्य को एक सम्माननीय पेशे के तौर पर देखा जाता है अतः ज़्यादा वेतन की मांग पर जोर ना डालें विशेषकर तब जब आप किसी सरकारी संस्थान में आवेदन कर रहे हों.जिस संस्थान में आवेदन कर रहे हैं, साक्षात्कार से पहले उसके बारे में पूरा अनुसंधान कर लें. यदि स्कूल या विश्वविद्यालय निजी है, तो आप अपनी व्यक्ति-प्रबंधन क्षमता का परिचय दे सकते हैं तथा साथ ही यह भी कह सकते हैं कि आप समय के साथ अपने कौशल को इंटरनेट एवं अन्य पत्रिकाओं जैसे माध्यमों की सहायता से विकसित करने के लिए आप सदैव तैयार रहते हैं. ऐसा इसलिए चूंकि सरकारी संस्थानों की अपेक्षा निजी संस्थान अधिक वैश्विक ज्ञान  की अपेक्षा रखते हैं. अपनी रूचि के अनुसार शिक्षण के कुछ सिद्धांतों को सूचीबद्ध करें तथा साक्षात्कार के दौरान इन्हें उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करें.छात्र जीवन के दौरान अथवा पिछली जॉब में प्राप्त किये गए पुरस्कारों के प्रमाण-पत्र अवश्य साथ ले जाएँ


Monday, July 20, 2015

HOW TO CHOOSE कोर्स AND कॉलेज?

बोर्ड एग्जाम्स के रिजल्ट का जिस बेसब्री से स्टूडेंट्स इंतजार कर रहे हैं, उनमें उतनी ही कुलबुलाहट या बेचैनी इस बात को लेकर भी है कि रिजल्ट के बाद आगे क्या? हर स्ट्रीम के स्टूडेंट अपने तरीके से सोच रहे होंगे। इनमें कुछ का विजन क्लियर होगा और टारगेट फिक्स, जबकि कई इस उधेड़बुन में होंगे कि कौन-सा कोर्स सलेक्ट करूं, जिसमें पढ़ाई के बाद जॉब की गारंटी हो। दोस्त कुछ कह रहे होंगे तो पैरेंट्स कुछ और राय दे रहे होंगे। लेकिन पढ़ाई आपको करनी है, इसलिए फैसला भी आप ही करें। गेंद आपके पाले में है। खुद को तलाशें, परखें और मजबूती से बढ़ाएं कदम...

आगरा के विपुल और अमल दोनों ने साथ-साथ 12वीं किया। अमल ने स्कूल में ही तय कर लिया था कि वह फैशन डिजाइनिंग में करियर बनाएंगे। इसलिए उन्होंने रिजल्ट आने से पहले ही निफ्ट और दूसरे प्रतिष्ठित फैशन इंस्टीट्यूट्स में एडमिशन के लिए तैयारी शुरू कर दी। उन्होंने फील्ड के कुछेक एक्सपट्र्स, फैशन डिजाइनर्स और सीनियर्स से इस बाबत जानकारी भी हासिल की। इससे काफी फायदा हुआ। अमल ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन डिजाइनिंग का एंट्रेंस एग्जाम क्वालिफाई किया। आज वह मुंबई में एक मशहूर डिजाइनर के अंडर में काम कर रहे हैं। वहीं, विपुल ने दोस्तों की देखा-देखी इंजीनियरिंग के एंट्रेंस एग्जाम्स दिए। इंजीनियर पिता भी चाहते थे कि बेटा उनके पेशे से जुड़े। लेकिन विपुल को सक्सेस नहीं मिली, वह निराश हो गए। किसी तरह इंजीनियरिंग के डिप्लोमा कोर्स में दाखिला लिया, लेकिन वहां भी उनका मन नहीं रमा। उन्होंने डिस्टेंस एजुकेशन से बीए किया। जॉब फिर भी नहीं लगी, तो एक प्राइवेट इंस्टीट्यूट से एमबीए की डिग्री हासिल की। काफी मशक्कत के बाद एक निजी कंपनी में जॉब लगी। इन दोनों उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि जब आपका टारगेट क्लियर होता है, तो आप सही दिशा में आगे बढ़कर प्रयास करते हैं। वहीं, कंफ्यूजन आपको दिशाहीन कर देता है। इस बारे में बीएचयू के वाइस चांसलर गिरीश त्रिपाठी का कहना है कि इस समय देश में जिस तरह से नए-नए इंस्टीटऌ्यूट्स खुल रहे हैं, वहां पढऩे वालों की तादाद बढ़ रही है, उसके मुताबिक शिक्षा का स्तर नहींबढ़ा है। इसलिए हर साल कॉलेजों से हजारों की तादाद में टेक्निकल या नॉन-टेक्निकल ग्रेजुएट्स के निकलने के बाद भी नौकरियां नहींमिलती हैं। जहां तक सही कोर्स चुनने का सवाल है, तो स्टूडेंट्स को सबसे ज्यादा एम्प्लॉयबिलिटी फैक्टर का ध्यान रखना होगा।

सिलीगुड़ी की सोनम महापात्रा को आर्किटेक्चर पढऩा था, इसलिए कोलकाता के एक कॉलेज में बिना जांचे-परखे दाखिला ले लिया। आज उन्हें पछतावा हो रहा है, क्योंकि न तो कॉलेज मान्यताप्राप्त है और न ही वहां रेगुलर फैकल्टी है। सोनम को नहीं मालूम कि कोर्स होने में कितने साल लग जाएंगे। इसके बाद भी आगे जॉब मिलने की कोई गारंटी नहीं है। दरअसल, आज संस्थान तो बहुत खुल गए हैं, लेकिन ज्यादातर कॉलेजों द्वारा न तो क्वालिटी फैकल्टी उपलब्ध कराई जाती है और न ही इंडस्ट्री के साथ इंटरैक्शन होता है। प्लेसमेंट की तो खैर पूछिए ही मत। लिहाजा, कोर्स कंप्लीट करने के बाद स्टूडेंट्स नौकरी के लिए भटकते रहते हैं।?आपके साथ ऐसा न हो, इसलिए समय रहते फैसला कर लें कि करियर की लिहाज से कौन-सा कोर्स और कॉलेज सलेक्ट करना बेहतर होगा...

ऐसे करें कोर्स का सलेक्शन

आज तमाम छोटे-बड़े, गवर्नमेंट और प्राइवेट इंस्टीट्यूशंस में विभिन्न तरह के कोर्सेज अवेलेबल हैं। लेकिन 12वीं के बाद कोई खास कोर्स चुनना एक स्टूडेंट के इंट्रेस्ट और ऑप्शन पर डिपेंड करता है। अगर आप आर्टिस्टिक या क्रिएटिव हैं, तो एडवर्टाइजिंग, डिजाइन, फैशन जैसे कोर्सेज चुन सकते हैं। वहीं, जो एनालिटिकली सोचते हैं, उनके लिए इंजीनियरिंग या टेक्नोलॉजी के क्षेत्र हैं। यहां बहुत सारे स्पेशलाइज्ड कोर्सेज भी हैं, जिन्हें करने के बाद करियर में ऊंची उड़ान भर सकते हैं। ऐसे में स्टूडेंट्स जब भी किसी खास कोर्स या प्रोग्राम में एनरोल कराने जाएं, तो एक बात क्लियर

रखें कि उस प्रोग्राम को सलेक्ट करने का उनका मकसद या पर्पज क्या है? फिर भी अगर कंफ्यूजन बना रहे, तो अपना प्रोफाइलिंग टेस्ट कराएं। इससे आपको अपनी स्ट्रेंथ का पता लग सकेगा और आप उसके मुताबिक कोर्स सलेक्ट कर सकेंगे। कोर्स का सलेक्शन करते समय इन खास बातों का ध्यान रखना जरूरी है...

पसंदीदा कोर्स चुनें

दिल्ली के अंबेडकर कॉलेज के प्रोफेसर प्रदीप सिंह के अनुसार, स्टूडेंट्स को हमेशा कॉलेज से पहले कोर्स को प्रिफरेंस देना चाहिए। अगर कोई स्टूडेंट बिना इंट्रेस्ट के सब्जेक्ट सलेक्ट कर लेता है, तो उसका परफॉर्मेंस प्रभावित होता है। जब अच्छे ग्रेड्स ही नहीं आएंगे, तो करियर के विकल्प भी सीमित हो जाएंगे। इसलिए अपने पसंदीदा सब्जेक्ट को देखते हुए ही कोर्स चुनें। दूसरों की नकल से बचें, क्योंकि हर स्टूडेंट का लक्ष्य, टैलेंट, वैल्यू और इंट्रेस्ट अलग होता है। जरूरी नहीं कि कंप्यूटर साइंस, इकोनॉमिक्स जैसे सब्जेक्ट्स ही ऑप्ट किए जाएं। आट्र्स, फाइन आट्र्स, डिजाइनिंग, वेब डेवलपमेंट जैसे कोर्सेज भी बेहतर हैं।

सेल्फ असेसमेंट करें

स्टूडेंट्स को कोई भी कोर्स सलेक्ट करने से पहले यह असेस करना चाहिए कि वे किस काम को एंजॉय करते हैं। आप उन करियर ऑप्शंस की लिस्ट बनाएं, जिनमें खुद को प्रूव कर सकते हैं। अगर कोई प्रॉब्लम आ रही हो, तो किसी टीचर, काउंसलर की सलाह लें।

ऑन- लाइन करियर असेसमेंट टेस्ट या पर्सनैलिटी टेस्ट भी दे सकते हैं।

ऑप्शंस एक्सप्लोर करें

जानी-मानी करियर काउंसलर परवीन मल्होत्रा का कहना है कि अब वह दौर नहीं रहा, जब साइंस स्ट्रीम के स्टूडेंट्स के पास सिर्फ मेडिकल या इंजीनियरिंग के ऑप्शन हों। अगर आप किसी कॉम्पिटिटिव एग्जाम की तैयारी की बजाय डायरेक्ट प्रोफेशनल कोर्स करना चाहते हैं, तो अपने पैशन को देखते हुए बायोटेक्नोलॉजी, बायोइंजीनियरिंग, फिजियोथेरेपी, ऑक्युपेशनल थेरेपी, मेडिकल ट्रांसक्रिप्शन जैसे कोर्सेज कर सकते हैं। इसी तरह आट्र्स से ऌ12वीं करने वाले बिजनेस या होटल मैनेजमेंट कोर्स कर रिटेलिंग, हॉस्पिटैलिटी, टूरिज्म इंडस्ट्री का हिस्सा बन सकते हैं। जो लोग क्रिएटिव हैं, वे फैशन डिजाइनिंग, मर्चेंडाइजिंग, स्टाइलिंग का कोर्स कर सकते हैं। इसके लिए आप फील्ड के एक्सपट्र्स या प्रोफेशनल्स से बात करें। उनसे जॉब, एम्प्लॉयमेंट आउटलुक, प्रमोशन अपॉच्र्युनिटीज की जानकारी लें।

कॉलेज का सलेक्शन

स्टूडेंट्स जब भी किसी कॉलेज या इंस्टीट्यूट में दाखिला लेने की सोचें, उन्हें पहले यह पता कर लेना चाहिए कि उस संस्थान को समुचित रेगुलेटरी अथॉरिटी से मान्यता हासिल है या नहीं। जैसे टेक्निकल इंस्टीट्यूट्स को ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन से मान्यता लेनी होती है। इसी तरह यूजीसी, एमसीआई आदि भी रेगुलेटरी बॉडीज हैं। अगर प्राइवेट कॉलेज में दाखिला लेने जा रहे हैं, तो इन बातों का विशेष ध्यान रखें :?

1. क्वालिटी ऑफ फैकल्टी

2. फैकल्टी रिसर्च 3. प्रोफेसर, लेक्चरर और असिस्टेंट प्रोफेसर का रेशियो

4. करिकुलम डाइवर्सिटी ऐंड अपडेशन

5. प्लेसमेंट

फैकल्टी की क्वालिटी

कॉलेज में पढ़ाई की क्वालिटी का अंदाजा वहां की फैकल्टी से लगाया जा सकता है। अगर कंप्यूटर साइंस कोर्स करना चाहते हैं, तो यह देखना जरूरी है कि उक्त संस्थान में कितनी क्वालिफाइड फैकल्टी यानी एमसीए या एमटेक होल्डर्स हैं? यह जानकारी वेबसाइट की बजाय कॉलेज जाकर या वहां के स्टूडेंट्स से बात कर हासिल की जा सकती है। जैसे- क्या फैकल्टी वहां रेगुलर एम्प्लॉई हैं या गेस्ट फैकल्टी के तौर पर काम कर रहे हैं।

इंफ्रास्ट्रक्चर देखेें

स्टूडेंट्स और पैरेंट्स को अपनी ओर खींचने के लिए कॉलेजेज के ब्रोशर काफी अट्रैक्टिव बनाए जाते हैं। उनमें लाइब्रेरी, लैब, स्पोट्र्स फैसिलिटीज, क्लासरूम के बारे में बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन कई बार दाखिले के बाद वहां की सच्चाई पता चलती है और तब तक काफी देर हो चुकी होती है। इसलिए एडमिशन से पहले इन सबके बारे में पूरी जांच-पड़ताल कर लें। कभी सिर्फ ब्रांड पर न जाएं।

इंडस्ट्री कनेक्ट

इन दिनों अक्सर यह शिकायत सुनने को मिलती है कि कॉलेज की पढ़ाई से इंटरव्यू में सक्सेस नहीं मिलती। इंडस्ट्री की जो डिमांड है, उस पर स्टूडेंट्स खरे नहीं उतरते। इसलिए किसी भी कॉलेज को चुनने से पहले यह मालूम करें कि उनका इंडस्ट्री के साथ टाई-अप है या नहीं? आज अधिकांश इंस्टीट्यूट्स या कॉलेजेज में इंस्टीट्यूशन-इंडस्ट्री में कनेक्शन को लेकर कोई मैकेनिज्म नहीं है, जबकि मार्केट और इंडस्ट्री की जरूरतों को देखते हुए कॉरपोरेट मेंटरशिप जैसे प्रोग्राम्स होने चाहिए। वैसे, कंपनीज इंटर्नशिप प्रोग्राम्स के जरिए स्टूडेंट्स को प्रैक्टिकल ट्रेनिंग देती हैं। लेकिन यह काम कॉलेज से शुरू हो जाना चाहिए, जैसे आइआइएम, आइआइटी या दूसरे बड़े संस्थानों में होता है।

प्लेसमेंट चेक करें

अमूमन कोई भी प्रोफेशनल कोर्स करने के पीछे स्टूडेंट्स का मकसद सही जगह पर प्लेसमेंट हासिल करना होता है। कॉलेज प्लेसमेंट सेल होने का तो दावा करते हैं, लेकिन आइआइटी, आइआइएम जैसे कुछेक बड़े संस्थानों को छोड़कर अधिकांश का प्लेसमेंट रिकॉर्ड अच्छा नहीं होता। इसलिए कोर्स और कॉलेज चुनने से पहले यह मालूम करें कि किस कोर्स के स्टूडेंट्स का ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा रहा है। प्लेसमेंट के दौरान कौन-सी कंपनीज ने पार्टिसिपेट किया, इसकी जानकारी भी आपके पास होनी चाहिए।

प्लान करें करियर

अगर पसंद का कॉलेज या कोर्स न मिले, तो परेशान नहींहोना चाहिए। आज हर जगह कॉम्पि- टिशन बढ़ गया है। प्रोफेशनल कोर्सेज में सीट्स लिमिटेड होती हैं, स्टूडेंट्स की संख्या ज्यादा। बेशक आपमें सारा टैलेंट या क्षमता हो, मेरिट हो, लेकिन मुमकिन है कि पसंद के कोर्स या कॉलेज में दाखिला न मिले। इसके लिए जरूरी है कि एक ऑल्टरनेट एक्शन प्लान तैयार रहे। ऑप्शंस के लिए करियर काउंसलर, टीचर्स, पैरेंट्स, सीनियर्स किसी की भी मदद ली जा सकती है। आप जर्नलिज्म में जाना चाहते हैं, लेकिन आइआइएमसी में एडमिशन नहींमिला, तो दूसरे इंस्टीट्यूट्स और विकल्पों से इस फील्ड में प्रवेश कर सकते हैं।

नेचुरल टैलेंट को पहचानना जरूरी

स्टूडेंट्स को अपनी काबिलियत की पहचान करना जरूरी है। इस टैलेंट की पहचान स्कूल में ही होनी चाहिए। चाहें तो पाठ्यक्रम में शामिल करके या काउंसलिंग के जरिए बच्चों के नेचुरल टैलेंट को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। प्रो. गिरीश त्रिपाठी, वाइस चांसलर, बीएचयू

कैसे चुनें

इंजीनियरिंग ब्रांच?

आपको 12वीं में चाहे कितने ही अच्छे अंक क्यों न मिले हों, लेकिन अगर आइआइटी या एनआइटी में दाखिला नहीं मिल पाता, तो सही इंजीनियरिंग कॉलेज का चुनाव करना मुश्किल हो जाता है क्योंकि मार्केट में आए दिन नए प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेजेज खुल रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि आप पहले खुद को काउंसलिंग के लिए तैयार करें। रैंक के अनुसार, अपनी प्रॉयरिटीज तय कर लें। आइआइटी में स्टूडेंट्स को काउंसलिंग के दौरान ही इंजीनियरिंग के विभिन्न ब्रांचेज की जानकारी दे दी जाती है। इसके बाद स्टूडेंट्स पर निर्भर करता है कि वह अपने एप्टीट्यूड, एम्प्लॉयमेंट अपॉच्र्युनिटीज और इंडस्ट्री की डिमांड को देखते हुए कोई

स्ट्रीम चुनें।

चेक करें दावे

इंस्टीट्यूट/फैकल्टी की क्वालिटी

क्क जहां एडमिशन लेने जा रहे हैं, वहां संचालित कोर्स एआइसीटीई या संबंधित रेगुलेटरी बॉडी से मान्यताप्राप्त है या नहीं? अगर मान्यताप्राप्त है, तो उसकी अवधि कब तक है? इस बारे में रेगुलेटरी बॉडी की साइट पर जाकर चेक कर सकते हैं।

क्क संस्था और डिपार्टमेंट की वेबसाइट है कि नहीं? अगर नहीं है या उस पर पूरी इंफॉर्मेशन नहीं दी गई है, तो वहां एडमिशन लेने का रिस्क न लें।

क्क वहां फैकल्टी का लेवल क्या है? फुलटाइम फैकल्टी मेंबर्स की संख्या का पता करें। स्टूडेंट-फैकल्टी रेशियो की जानकारी भी जरूर हासिल करें। यह भी देखें कि फैकल्टी कितनी अपडेटेड है और उसका इंडस्ट्री से कितना इंटरैक्शन होता है?

क्क फैकल्टी की क्वालिफिकेशन के बारे में जानकारी रखें। कितने एमटेक या पीएचडी हैं? उन्होंने पीएचडी कहां से की है, यह जानना अच्छा रहेगा। ज्यादातर अच्छे संस्थानों में पीएचडी होल्डर ही फैकल्टी मेंबर होते हैं।

क्क अगर किसी कॉलेज में फैकल्टी मेंबर की क्वालिफिकेशन बीटेक या एमसीए से ज्यादा नहीं है, तो वहां जाना सही नहीं रहेगा। वैसे अधिकांश प्राइवेट इंस्टीट्यूट्स में वहींसे पासआउट स्टूडेंट्स को ही पढ़ाने की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है। इसके बारे में जरूर पता कर लें।

क्क कॉलेज के कितने स्टूडेंट्स हायर टेक्निकल स्टडीज के लिए जाते हैं, इसकी भी जानकारी रखें।

क्क हरेक डिपार्टमेंट के रिसर्च आउटपुट और इंडस्ट्री इंटरैक्शन पर भी ध्यान दें।

कैसे चुनें

ऌमैनेजमेंट कोर्स ?

हर स्टूडेंट पढ़ाई के बाद अच्छी सैलरी, अच्छा पे-पैकेज चाहता है। मैनेजमेंट कोर्स करने के बाद उसे अपने सपने पूरे होते दिखाई देते हैं। लेकिन जरूरी है कि आपका मैथ्स, कॉमर्स

और इकोनॉमिक्स जैसे सब्जेक्ट्स में इंट्रेस्ट हो। इसके बाद ही कॉलेज सलेक्ट करें, क्योंकि इंडिया में मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट्स की बाढ़-सी आई हुई है। इसलिए कहीं भी एडमिशन से पहले उसकी विश्वसनीयता परख लें कि वह एआइसीटीई या यूजीसी से मान्यताप्राप्त है या नहीं। फैकल्टी के बारे में फस्र्ट हैंड इंफॉर्मेशन वहां के स्टूडेंट्स से हासिल करें। उनसे इंटर्नशिप और प्लेसमेंट की जानकारी भी लें। आंख मूंद कर सिर्फ कॉलेज की वेबसाइट पर भरोसा न करें।

कमिटमेंट के साथ आएं

किसी भी ऑर्गेनाइजेशन के लिए सबसे पहले कमिटमेंट मैटर करता है। इसी को सबसे ज्यादा वैल्यू दी जाती है। इसलिए स्टूडेंट्स पूरे डेडिकेशन और पैशन के साथ एजुकेशन या हायर एजुकेशन कंप्लीट कर ही जॉब में आएं। स्मृति सैनी, एचआर मैनेजर, मुंबई

प्लेसमेंट के लिए तैयार

आइआइटी में प्लेसमेंट पर विशेष ध्यान दिया जाता है। स्टूडेंट्स को एकेडमिक्स के साथ-साथ इंडस्ट्री की रिक्वॉयरमेंट के अनुसार ट्रेन किया जाता है। उनके सॉफ्ट स्किल्स को डेवलप किया जाता है।

प्रो.सुधीर बरई, चेयरमैन, सीडीसी, आइआइटी, खडग़पुर

बिजनेस स्कूल्स

को बदलना होगा

बिजनेस स्कूल्स के सामने इंडस्ट्री के मुताबिक अपने करिकुलम को अपग्रेड और स्ट्रॉन्ग करने का बड़ा चैलेंज है। इन स्कूल्स को लाइव प्रोजेक्ट्स, केस स्टडीज, रिसर्च, इंडस्ट्री इंटरैक्शन, लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल जैसे एरियाज पर फोकस करना होगा। कॉरपोरेट टाई-अप्स और स्किल डेवलपमेंट कोर्सेज तैयार करने होंगे, जिससे कि इंडस्ट्री के साथ इंटरैक्शन बढ़े। इसके अलावा, अगर ग्लोबल और डोमेस्टिक स्टैंडड्र्स को मैच करना है, तो इंटरनेशनल यूनिवर्सिटीज और एसोसिएशंस के साथ कोलेबोरेशन एवं फैकल्टी एक्सचेंज जैसे प्रोग्राम्स चलाने होंगे।


Wednesday, July 15, 2015

थर्मल सौर ऊर्जा के कोर्स

दुनिया भर में पैट्रोल एवं गैस जैसे ऊर्जा के पारम्परिक संसाधनों की बढ़ती कीमतों के बीच ऊर्जा के गैर-पारम्परिक स्रोतों को पहले से कहीं अधिक महत्व दिया जाने लगा है। सूर्य की रोशनी से प्राप्त होने वाली ऊर्जा यानी सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भी अब तेजी से विकास हो रहा है।

भारत में भी सौर ऊर्जा के महत्व को पहचान लिया गया है तथा इसलिए हमारे यहां जवाहर लाल नेहरू सोलर मिशन की स्थापना भी की गई है जिसके लिए सरकार ने बजट में खरबों रुपए का आबंटन किया है। भारत के अधिकांश इलाकों में साल भर खूब सूर्य चमकता है जिससे यहां सौर ऊर्जा की विपुल सम्भावनाएं हैं। एक अनुमान के अनुसार हमारे यहां विभिन्न सौर ऊर्जा परियोजनाओं की मदद से 2100 गीगावॉट ऊर्जा प्राप्त की जा सकेगी।

इस वक्त देश के गुजरात राज्य में सबसे अधिक सौर ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित हैं। भविष्य में इस क्षेत्र में सम्भावनाओं को देखते हुए ही अब अनेक औद्योगिक घराने इस क्षेत्र में कदम रख रहे हैं।

सम्भावनाएं
इस क्षेत्र में विकास के लिए विभिन्न विषयों में महारत रखने वाले पेशेवरों की जरूरत तथा मांग भी पैदा हुई है। इस प्रकार सौर ऊर्जा का क्षेत्र भी अब उज्ज्वल भविष्य की नई सम्भावनाओं से भरा हुआ है। एक अनुमान के अनुसार सौर ऊर्जा संबंधी तकनीकी कामों में 60-65 प्रतिशत इलैक्ट्रिकल इंजीनियर्स, 20 से 25 प्रतिशत मैकेनिकल इंजीनियर्स, 10 प्रतिशत इलैक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर्स और बाकी सिविल इंजीनियर्स की जरूरत पड़ेगी। विशेषज्ञ सौर ऊर्जा का भविष्य बेहद उज्ज्वल मानते हैं। अनुमान के अनुसार 2040 तक विश्व की कुल ऊर्जा खपत का पांच प्रतिशत भाग अकेले सौर ऊर्जा पूरा करेगी। विश्व की वर्तमान विद्युत खपत 2040 तक दोगुनी से भी ज्यादा हो जाएगी, तब निगाह सौर ऊर्जा पर ही टिकेगी। 2020 तक सोलर थर्मल पावर उद्योग का सालाना कारोबार 7.6 अरब डॉलर का होगा।

कार्यक्षेत्र
इस क्षेत्र में इलैक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर्स के लिए सबसे आम रोजगार सोलर सैल्स एवं मॉड्यूल्स की फैब्रिकेशन, टैसिंटग एवं वायरिंग का है। हालांकि इलैक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर्स के लिए इस इंडस्ट्री में सबसे उपयुक्त काम रिसर्च एंड डिवैल्पमैंट और प्रोडक्शन में है, वे इंस्ट्रूमैंटेशन, इंस्टालेशन, ऑप्रेशन एंड मॉनिटरिंग, फाइनांसिंग तथा प्रोजैक्ट डिवैल्पमैंट संबंधी कामों में भी रोजगार प्राप्त कर सकते हैं।

युवा सोलर एनर्जी सैक्टर में सोलर पी.वी. डिजाइन इंजीनियर, प्रोसैस इंजीनियर, आर.एंड डी. प्रोफैशनल, सेल्स एंड मार्कीटिंग इंजीनियर, प्रोडक्शन मैनेजर, प्रोजैक्ट मैनेजर, पी.वी. फैब्रिकेशन एवं टैसिंटग टैक्नीशियन आदि कई पदों पर नियुक्ति हासिल कर सकते हैं।

योग्यता
आमतौर पर सौर ऊर्जा के तकनीकी क्षेत्रों में काम करने के लिए बी.टैक या एम.टैक डिग्री ही सर्वाधिक उपयुक्त शैक्षिक योग्यता मानी जाती है। इस क्षेत्र में काम करने के लिए सोलर सिस्टम्स, पी.वी. पैनल्स, इवर्टर सिस्टम्स, डी.सी. केबलिंग एवं अन्य संबंधित तकनीकों की आधारभूत जानकारी होनी चाहिए।

प्रौसैस इंजीनियर्स को सोलर फोटोवॉल्टाइक सैल/मॉड्यूल या सैमीकंडक्टर डिवाइस मैन्युफैक्चरिंग का ज्ञान होना चाहिए। जो युवा रिसर्च एंड डिवैल्पमैंट में रुचि रखते हैं उन्हें सोलिडस्टेट फिजिक्स में पीएच.डी. डिग्री हासिल करनी चाहिए या इलैक्ट्रॉनिक्स एवं कम्युनिकेशन्स में बी.ई./बी.टैक डिग्री प्राप्त करनी चाहिए।
वरिष्ठ पदों पर नियुक्ति के लिए इलैक्ट्रॉनिक्स रिसर्च एंड डिवैल्पमैंट, टैक्नोलॉजी मैनेजमैंट एवं प्रोडक्ट डिवैल्पमैंट प्रोसैसेज में कुछ अनुभव होना जरूरी है।

सौर ऊर्जा से जुड़े दिलचस्प तथ्य

1 सूर्य की किरणें धरती पर 500 सैकेंड में पहुंचती हैं।

2 वायुमंडल में शोषित होकर पृथ्वी पर लगभग 0.95 मैगावॉट ऊर्जा तत्काल आती है।

3 धरती के वायुमंडल की ऊपरी सतह पर मिलने वाली सौर ऊर्जा 1.353 किलोवॉट वर्ग मीटर होती है।

4 ईसा पूर्व 470 में दार्शनिक सुकरात ने पहली बार सौर ऊर्जा सिद्धांत का जिक्र किया था।

5 ईसा से 300 वर्ष पूर्व यूनान के महान गणितिज्ञ यूक्लिड ने सौर ऊर्जा की उपयोगिता से जुड़ा तर्क सिद्धांत प्रस्तुत किया था।

6 छठी शताब्दी में सूर्य किरणों से प्रज्वलित दर्पणों की खोज हुई थी।

प्रमुख संस्थान

देश में रिन्यूएबल एनर्जी में अधिकतर कोर्स मास्टर लैवल पर उपलब्ध हैं। ये कोर्स करवाने वाले संस्थानों में शामिल हैं-

1 सैंटर ऑफ एनर्जी स्टडीज, आई.आई.टी. दिल्ली

2 डिपार्टमैंट ऑफ एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग, आई.आई.टी. मुम्बई

3 टी.ई.आर.आई. यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली

4  यूनिवर्सिटी ऑफ लखनऊ, उत्तर प्रदेश

5 पंडित दीनदयाल पैट्रोलियम यूनिवर्सिटी, गांधीनगर, गुजरात


Tuesday, July 14, 2015

Genetic Counsellor डिकोडिंग द डिसऑर्डर

ह्यूमन बॉडी में मौजूद क्रोमोजोम्स में करीब 25 से 35 हजार के बीच जीन्स होते हैं। कई बार इन जीन्स का प्रॉपर डिस्ट्रीब्यूशन बॉडी में नहीं होता है, जिससे थैलेसेमिया, हीमोफीलिया, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, क्लेफ्ट लिप पैलेट, न्यूरोडिजेनेरैटिव जैसी एबनॉर्मलिटीज या हेरेडिटरी प्रॉब्लम्स हो सकती है। इससे निपटने के लिए हेल्थ सेक्टर में ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट और दूसरे इनेशिएटिव्स लिए जा रहे हैं, जिसे देखते हुए जेनेटिक काउंसलिंग का रोल आज काफी बढ गया है। अब जो लोग इसमें करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए स्कोप कहीं ज्यादा हो गए हैं।

जॉब आउटलुक

एक अनुमान के अनुसार, करीब 5 परसेंट आबादी में किसी न किसी तरह का इनहेरेटेड डिसऑर्डर पाया जाता है। ये ऐसे डिसऑर्डर्स होते हैं, जिनका पता शुरुआत में नहीं चल पाता है, लेकिन एक जेनेटिक काउंसलर बता सकता है कि आपमें इस तरह के प्रॉब्लम होने की कितनी गुंजाइश है। काउंसलर पेशेंट की फैमिली हिस्ट्री की स्टडी कर इनहेरेटेंस पैटर्न का पता लगाते हैं। वे फैमिली मेंबर्स को इमोशनल और साइकोलॉजिकल सपोर्ट भी देते हैं।

स्किल्स रिक्वायर्ड

जेनेटिक काउंसलिंग के लिए सबसे इंपॉर्टेट स्किल है कम्युनिकेशन। इसके अलावा, कॉम्पि्लकेटेड सिचुएशंस से डील करने का पेशेंस। एक काउंसलर का नॉन-जजमेंटल होना भी जरूरी है, ताकि सब कुछ जानने के बाद मरीज अपना डिसीजन खुद ले सके। उन्हें पेशेंट के साथ ट्रस्ट बिल्ड करना होगा।

करियर अपॉच्र्युनिटीज

अगर इस फील्ड में ऑप्शंस की बात करें, तो हॉस्पिटल में जॉब के अलावा प्राइवेट प्रैक्टिस या इंडिपेंडेंट कंसलटेंट के तौर पर काम कर सकते हैं। इसी तरह डायग्नॉस्टिक लेबोरेटरीज में ये फिजीशियन और लैब के बीच मीडिएटर का रोल निभा सकते हैं। कंपनीज को एडवाइज देने के साथ टीचिंग में भी हाथ आजमा सकते हैं। वहीं, जेनेटिक रिसर्च प्रोजेक्ट्स में स्टडी को-ओर्डिनेटर के तौर पर काम कर सकते हैं। बायोटेक और फार्मा इंडस्ट्री में भी काफी मौके हैं।

क्वॉलिफिकेशन

जेनेटिक काउंसलर बनने के लिए बायोलॉजी, जेनेटिक्स और साइकोलॉजी में अंडरग्रेजुएट की डिग्री के साथ-साथ लाइफ साइंस या जेनेटिक काउंसलिंग में एमएससी या एमटेक की डिग्री होना जरूरी है।

सैलरी

जेनेटिक काउंसलिंग के फील्ड में फाइनेंशियल स्टेबिलिटी भी पूरी है। हालांकि जॉब प्रोफाइल और सेक्टर के मुताबिक सैलरी वैरी करती है। प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाला प्रोफेशनल महीने में 50 हजार रुपये तक अर्न कर सकता है, जबकि गवर्नमेंट डिपार्टमेंट में काम करने वाले महीने में 25 से 40 हजार के बीच अर्न कर सकते हैं।

ट्रेनिंग

-गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर

-कामिनेनी इंस्टीट्यूट, हैदराबाद

-संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट, लखनऊ

-सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज, बेंगलुरु

-महात्मा गांधी मिशन, औरंगाबाद

-जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, दिल्ली

-सर गंगाराम हॉस्पिटल, नई दिल्ली

एक्सपर्ट बाइट

जेनेटिक काउंसलिंग इंडिया में काफी तेजी से पॉपुलर हो रहा है। एप्लीकेशन के नजरिए से इसमें बहुत स्कोप है। नई लेबोरेटरीज खुल रही हैं, जिनके लिए जेनेटिक काउंसलर्स की काफी डिमांड है। वैसे, ट्रेडिशनल हॉस्पिटल्स के अलावा फार्मा कंपनीज में, कॉरपोरेट एनवॉयरनमेंट के बीच काम करने के पूरे मौके मिलते हैं। अब तक मेडिकल प्रोफेशन से जुडे स्टूडेंट्स ही इसमें आते थे, लेकिन अब नॉन-मेडिकल स्टूडेंट्स भी आ रहे हैं।

Monday, July 13, 2015

Career in जन-संपर्क

जन-संपर्क का करियर उनके लिए है जिनमें उत्कृष्ट संवाद कौशल हो तथा जो नित नए-नए लोगों से मिलने व उनसे संवाद स्थापित करने में माहिर हों. यह एक ऐसा कार्यक्षेत्र है जहाँ आपको अपने श्रोता की मनःस्थिति जानकर उसे अपने पक्ष में मोड़ना होता है. 
अगस्त 1978 में मेक्सिको शहर में हुई दुनिया भर के जनसंपर्क संगठनों की प्रथम सभा ने जन-संपर्क को इस प्रकार परिभाषित किया-  " जन-संपर्क रुझानों का विश्लेषण करने, उनके संभावित परिणामों को प्रक्षेपित करने, सांगठनिक नेतृत्व को परामर्श देने तथा योजनाओं को क्रियान्वित करने की एक ऐसी कला व सामजिक विज्ञान है जो संस्थान व लोगों दोनों के हितों का ध्यान रखती है." लोगों को जानना, समझना व उनके मत को प्रभावित करना एक महत्त्वपूर्ण कार्य है जिसके द्वारा विभिन्न मीडिया माध्यमों का उपयोग कर आप किसी व्यक्ति अथवा संस्थान की आम जनता में सही व गलत छवि बनाते हैं.

चरणबद्ध प्रक्रिया

जनसंपर्क के पाठ्यक्रम में समाहित होता है- आपमें जन-संवाद तथा लोगों के मनोविज्ञान को समझने के कौशल विकसित करना जो कि सूचनाओं के आदान-प्रदान में सहायक सिद्ध हों. मूलतः इसका उद्देश्य लोगों व उनकी संवाद आवश्यकताओं को समझना होता है. अधिकांश पाठ्यक्रम जन-संचार पाठ्यक्रम से समानता रखते हैं या उनमें समाहित होते हैं तथा उनमें तमाम तकनीकी ज्ञान के साथ संवाद क्षमता विकसित करने पर जोर दिया जाता है. यहाँ तकनीकी ज्ञान को सरल बनाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है.
अधिकाँश जन-संपर्क पाठ्यक्रमों में निम्न विषय समाहित होते हैं:
  1. जन-संवाद से परिचय
  2. भारत में प्रिंट मीडिया का इतिहास
  3. इलेक्ट्रोनिक मीडिया व फोटोग्राफी
  4. अंतर्राष्ट्रीय संवाद व मानवाधिकार
  5. सूचना तकनीक का जन-संपर्क के क्षेत्र में महत्व
  6. मानव आवश्यकताओं व मनोविज्ञान का अध्ययन
कॉलेज अथवा विश्वविद्यालय के आधार पर पाठ्यक्रम में थोड़ी भिन्नता अवश्य हो सकती है परन्तु सभी विषय ऊपर बताये गए विषयों के लगभग समान ही होते हैं.

पदार्पण

यदि आप इस क्षेत्र में करियर बनाना चाहते हैं तो सर्वप्रथम आपको इस कोर्स को संचालित करने वाले कॉलेजों की सूची बनानी पड़ेगी तथा यह भी ध्यान रखना होगा कि कॉलेज का कोर्स कॉन्टेंट कैसा है. जन-संचार पाठ्यक्रमों को संचालित करने वाले कॉलेजों में दाखिला लेना श्रेयस्कर रहेगा चूंकि ये मीडिया प्रोफेशनल्स से संवाद स्थापित करने में सहायक सिद्ध होते हैं. स्कूलिंग के उपरान्त आप जन-संचार में स्नातक तथा इसके बाद जन-संवाद में स्नातकोत्तर की डिग्री ले सकते हैं. इसके अलावा किसी भी विषय में स्नातक करने के बाद भी आप जन-संपर्क में स्नातकोत्तर कर सकते हैं. कुछ संस्थान डिप्लोमा कोर्स भी संचालित करते हैं. इस क्षेत्र के प्रमुख संस्थान हैं- जेविअर इंस्टिट्यूट ऑफ़ मॉस कम्युनिकेशन, मुंबई; सिम्बोयसिस स्कूल, पुणे; तथा इन्डियन इंस्टीटयूट ऑफ़ मॉस कम्युनिकेशन, नयी दिल्ली.

क्या यह मेरे लिए सही करियर है?

ये जानने के लिए कि जन-संपर्क का करियर आपके लिए सही है अथवा नहीं, आपको ये जानना होगा कि आप लोगों से बात करने में कितने निपुण हैं और आपमें मीडिया के साथ काम करने का कितना जुनून है. यदि आप पढ़ने के शौक़ीन हैं और दैनिक समाचारों व घटनाओं पर नज़र रखते हैं तो जन-संपर्क व जन-संचार का पाठ्यक्रम आपके लिए सही विकल्प साबित हो सकता है और यदि आपकी तकनीकी विषयों में रूचि है तो आप कम्प्यूटर साइंस, साइंस, फिनांस और एकाउंटिंग जैसे क्षेत्र में करियर बना सकते हैं. परन्तु फिर भी पीआर कोर्स सभी की संवाद क्षमता बढ़ाने में सहायक होता है. पीआर प्रोफेशनल्स का वेतनमान उतना ही अच्छा होता जितना कि किसी मार्केटिंग या आईटी प्रोफेशनल का.

खर्चा कितना होगा?

कॉलेज के स्तर के अनुसार, एक अच्छे पीआर कोर्स की वार्षिक फीस 10000 से 40000 तक हो सकती है. यदि आपका चुनाव सेंट जेविअर, मुंबई के लिए होता है तो वहां आपको 12000 रूपये वार्षिक फीस के रूप में देने होंगे. निजी संस्थानों में हालाँकि फीस बहुत ज्यादा है.

छात्रवृत्ति

आप कोर्स के लिए विभिन्न बैंकों से एजुकेशन लोन भी प्राप्त कर सकते हैं. आप या तो पढ़ाई के दौरान ही जॉब करके या पढ़ाई पूरी करने के बाद ये लोन चुका सकते हैं. स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया जैसे राष्ट्रीयकृत बैंक 7.5 लाख तक का लोन देते हैं.

रोज़गार के अवसर

पीआर प्रोफेशनल्स जिनके पास उत्कृष्ट स्तर की सम्वाद व लोगों को समझाने की क्षमता है, के लिए विभिन्न उद्योगों में अपार संभावनाएं हैं. विज्ञापन एजेंसियां व मार्केटिंग कम्पनियाँ अच्छे पीआर प्रोफेशनल्स की तलाश में हमेशा रहती हैं. कई पीआर प्रोफेशनल्स पीआर कोर्स करते हुए फोटोग्राफी अथवा विजुअल कम्युनिकेशन में भी कोर्स कर लेते हैं जिससे उन्हें फिल्म-मेकिंग कम्पनियों में आसानी से जॉब मिल जाती है.
भारत में इस क्षेत्र में रोज़गार के अवसर लगातार बढ़ रहे हैं. बालाजी टेलीफिल्म्स, मुक्ता आर्ट्स जैसी कई बड़ी कम्पनियां विभिन्न जॉब साइट्स पर क्रिएटिव हेड और दूसरे क्रिएटिव पदों के लिए विज्ञापन देती रहती हैं.

वेतनमान

शैक्षिक स्तर व आपकी योग्यता के अनुसार आप शुरू में 15,000 व इससे अधिक भी प्राप्त कर सकते हैं. यदि आप किसी कंपनी में सीईओ के सचिव के रूप में अपने करियर की शुरूआत करते हैं तो आपको 2 से 3 लाख वार्षिक वेतन मिल सकता है. यदि आप मार्केटिंग अथवा एड एजेंसी में कम्युनिकेशन प्रोफेशनल के रूप में करियर की शरूआत करते हैं तो आपको 2.5 लाख रूपये वार्षिक वेतनमान मिल सकता है. दूसरी तरफ यदि आप किसी न्यूज़ चैनल में एंकर के रूप में शुरूआत करते हैं तो आपको 30000 या उससे अधिक भी मासिक वेतन प्राप्त हो सकता है. परन्तु यहाँ काम करने के लिए आपको शिफ्ट में काम करने और विभिन्न स्थानों की यात्रा करने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए. किसी आईटी कंपनी में टेक्नीकल या कोर्पोरेट कम्युनिकेशन से करियर शुरू करने पर आप 15000 रूपये मासिक वेतन आसानी से प्राप्त कर सकते हैं. आप सेल्स अथवा बिजनेस डेवलपमेंट पदों के लिए भी आवेदन कर सकते हैं बस ज़रुरत है आपके अन्दर उत्कृष्ट सेलिंग व संवाद स्किल का होना. वास्तव में इस क्षेत्र में अवसरों की कमी नहीं है.

मांग एवं आपूर्ति

अच्छी संवाद वाले प्रोफेशनल्स की मांग लगभग हर उद्योग में है. उदाहरण के तौर पर आजकल कम्पनियों के एचआर प्रोफेशनल्स, सोफ्टवेयर प्रोफेशनल जैसे पदों के लिए व्यक्तियों का चुनाव करते समय कम्युनिकेशन स्किल को भी एक फैक्टर मानते हैं. भारत में मांग की तुलना में अच्छें इंग्लिश-स्पीकिंग प्रोफेशनल्स की हमेशा कमी रहती है. हालाँकि पिछल कुछ वर्षों में इंग्लिश का स्तर सुधरा है यहाँ तक कि गवर्नमेंट स्कूल के छात्र भी अच्छी इंग्लिश बोल सकते हैं. अतः प्रतिस्पर्धा बढ़ गयी है.

मार्केट वॉच

पीआर प्रोफेशन का विकास पिछले कुछ वर्षों में अद्वितीय रहा है. नित नए टीवी चैनलों, न्यूज़ चैनलों, आईटी कम्पनियों, बीपीओ/केपीओ के खुलने के कारण पीआर प्रोफेशनल्स की मांग अपने उद्योग उच्चतम स्तर पर है. होटल, शिपिंग एवं लोजिस्टिक्स जैसे दूसरे क्षेत्रों में भी पीआर प्रोफेशनल्स की बहुत मांग है. उन्हें रिसेप्शनिस्ट से लेकर लॉबी मैनेजर तथा सेल्स मैनेजर तक जैसे पद मिल सकते हैं. पिछले कुछ दशकों में एड एजेंसियों का भी अतुल्यनीय विकास हुआ है. विभिन्न सरकारी विभागों व कंपनियों में जन-संपर्क अधिकारी बनना भी एक अच्छा विकल्प हो सकता है. आप कुछ बड़े व धनवान लोगों के पब्लिक प्रोफाइल को मैनेज करने का काम भी कर सकते हैं. इसलिए इस समय पीआर प्रोफेशनल्स के लिए मार्केट उनकी चॉईस का है.

अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शन

भारतीय प्रोफेशनल्स कई देशों में कई बड़े-बड़े मार्केटिंग पदों पर कार्यरत हैं. विशेषकर अमेरिका में कम्युनिकेशन प्रोफेशनल्स के लिए अपार संभावनाएं है. कई भारतीय वहां वेबसाईट व एड एजेंसी स्थापित कर अच्छी कमाई कर रहे हैं.

सकारात्मक/ नकारात्मक पहलू

सकारात्मक
  1. अच्छी संवाद क्षमता वाले छात्रों की हर जगह मांग है. अतः पीआर प्रोफेशनल्स के लिए रोज़गार के अवसर बहुत अच्छे हैं. 
  2. वेतनमान दूसरे क्षेत्र के प्रोफेशनल्स की तरह ही काफी अच्छा है.
नकारात्मक
  1. कुछ पीआर प्रोफेशनल्स ज़्यादा पैसा कमाने के चक्कर में लगातार कम्पनियाँ बदलते रहते हैं जो कि उनके करियर को स्थायित्व नहीं प्रदान कर पाता.

भूमिका और पदनाम

विषय के आधार पर जन-संपर्क, जन-संचार का ही एक भाग है. कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन, टेक्नीकल कम्युनिकेशन इत्यादि भी इससे मिलते-जुलते विषय ही हैं. वास्तव में ये सभी विषय एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. अतः पीआर प्रोफेशनल के लिए हर क्षेत्र में करियर की अपार संभावनाएं मौजूद हैं बस ज़रुरत है तो सिर्फ समय के साथ ज्यादा से ज्यादा सीखने की.

अग्रणी कंपनिया

भारत की कुछ अग्रणी विज्ञापन कम्पनियां निम्न हैं:
  1. ओगिल्वी एंड मादर
  2. जे वॉल्टर थॉमसन इण्डिया
  3. मुद्रा कम्युनिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड
  4. एफसीबी-उल्का  एडवरटाइजिंग लिमिटेड
  5. रीडिफ्यूज़न- डीवाई एंड आर
 इन कंपनियों के अलावा आप एचसीएल, विप्रो, इनफ़ोसिस इत्यादि आईटी कम्पनियों के लिए भी आवेदन कर सकते हैं चूंकि आजकल ये कम्पनियां भी पीआर क्षेत्र में अनुभव रखने वाले कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स को नियुक्त कर रही हैं. आप न्यूज़ एवं अन्य बड़े चैनलों में भी आवेदन कर सकते हैं.

रोज़गार प्राप्त करने के लिए सुझाव

जन-संपर्क में करियर बनाने के लिए आप निम्न सुझावों पर अमल कर सकते हैं:
  1. कम से कम 7 से 20 कम्पनियों के लिए आवेदन करें. 
  2. साक्षात्कार व परीक्षा की तिथियाँ सुविधानुसार चुनें.
  3. ज्यादा से ज्यादा बात करने के लिए तैयार रहे चूंकि ये कम्पनियां अद्वितीय संवाद क्षमता वाले प्रोफेशनल्स चाहती हैं.
  4. करियर की शुरूआत में वेतन के मुद्दे पर लचीला रुख अपनाएं.
  5. जिस कंपनी में आपने आवेदन किया है वहां पीपुल स्किल सीखने व उसमें ईमानदारी से सुधार करने के साथ-साथ उस कंपनी में काम करने की इच्छा जताएं.
  6. साक्षात्कार में जाने से पहले कम्पनी तथा उसके व्यापार के बारे में पूरे तरह रिसर्च कर लें.

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Sunday, July 12, 2015

रोबोटिक्स का रोचक करियर

शब्द की उत्पत्ति चेक शब्द 'रोबिट' तथा स्लैव मूल के शब्द रोबोटा से हुई, जिसका अर्थ कार्य तथा गुलामी का काम है। आजकल रोबोट हार्ट सर्जरी करते हैं, बारूदी सुरंगों को हटाते हैं तथा कारों की असेम्बलिंग का कार्य करते हैं। फिर भी भारतीय कंपनियाँ अभी भी बार-बार किए जाने वाले बोरिंग तथा असुखदकर कार्यों में रोबोटों के उपयोग करने से बच रही है। वेल्डिंग, असेम्बलिंग, स्प्रे-पेटिंग, कटिंग तथा पूर्जों को लगाना कुछ ऐसे काम हैं, जिन्हें रोबोट द्वारा कुशलतापूर्वक किया जाता है।

तीन शाखाओं का संगम है रोबोटिक्स
रोबोटिक्स के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल या कम्प्यूटर इंजीनियरिंग का अध्ययन करने की आवश्यकता होती है। वास्तव में रोबोटिक्स इन तीनों के तालमेल का ही रूप है। इसलिए रोबोटिक्स में सुविज्ञता हासिल करने के लिए इन तीनों क्षेत्र का गहन ज्ञान अपेक्षित है। इस क्षेत्र में कुछ इंजीनियरिंग संस्थानों द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, एडवांस्ड रोबोटिक्स सिस्टम्स, इंटेलिजेंस कंट्रोल, इमेजिंग प्रोसेस, न्यूरल नेटवर्क्स तथा फुजी लाजिक्स पर विशेष कोर्स संचालित किए जाते हैं। इसके अलावा पोस्टग्रेजुएट स्तर पर भी स्पेशलाइजेशन किया जा सकता है।

रोबोटिक्स के अध्ययन में बेसिक इंजीनियरिंग प्रिसिपल तथा रोबोट्स का विकास तथा उपयोग करने वाले प्रोफेशनल की सहायता करने के लिए टेक्निकल स्किल्स सिखाई जाती है। इसमें डिजाइन में इंस्ट्रक्शन, ऑपरेशन टेस्टिंग, सिस्टम मैटेनेंस तथा रिपेयर शामिल है।

रोबोटिक्स को जानिए
फिर भी रोबोटिक्स एक या दो दिनों में सीख कर चलाया जाने वाला अल्पकालीन क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह एक दीर्घकालीन अनुसंधानपरक करियर है। हो सकता है कि इस क्षेत्र में आज प्रवेश करने वालों को अपनी मंजिल तक पहुँचने में कुछ साल इंतजार करना पड़े। बीएचईएल, बार्क तथा सीएआईआर जैसे संगठनों द्वारा फ्रेश ग्रेजुएटस को साइंटिस्ट के रूप में लेकर रोबोटिक्स के क्षेत्र में प्रशिक्षित किया जाता है।

रोबोटिक्स विषय से परिचित होने के लिए सबसे पहले रोबोट की अवधारणा को समझना आवश्यक है। इंटरनेशनल स्टैंडर्ड ऑर्गनाइजेशन ने रोबोट को परिभाषित करते हुए बताया है कि यह ऐसी स्व-नियंत्रित रि-प्रोगामेबल मल्टीपरपज मशीन है, जिसे लोकोमोशन सहित या उसके बिना इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन एप्लिकेशन के लिए उपयोग में लाया जाता है। आज सारी दुनिया में विभिन्न कार्यकलापों में रोबोटों का उपयोग निरंतर लोकप्रिय होकर बढ़ता जा रहा है। चूँकि रोबोट को किसी भी काम के लिए खतरनाक पर्यावरण तक के लिए बार-बार सही रूप से प्रोग्राम किया जा सकता है।

ये विभिन्न रणनीतियुक्त मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। रोबोटिक्स के अंतर्गत रोबोट की डिजाइनिंग, उनका अनुरक्षण, नए एप्लिकेशंस का विकास और अनुसंधान जैसे काम आते हैं। इस क्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक्स, मैकेनिक्स तथा कम्प्यूटर साइंस जैसे सहयोगी क्षेत्रों का ज्ञान शामिल होता है। इसलिए इस क्षेत्र में करियर बनाने वालों को इन क्षेत्रों से संबंधित तकनीकों से अवगत होना चाहिए।

रोबोटिक्स के कोर्स
रोबोटिक्स इंजीनियरिंग का वह क्षेत्र है, जो रोबोट की डिजाइन तथा एप्लिकेशन से संबंधित है तथा इसमें मेनिपुलेशन तथा प्रोसेसिंग के लिए कम्प्यूटर का उपयोग किया जाता है। उद्योगों में रोबोट्स का उपयोग निर्माण प्रक्रिया को तेज करने के लिए किया जाता है।

इन्हें न्युक्लियर साइंस, सी-एक्सप्लोरेशन, इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स की ट्रांसमिशन सर्विस, बायोमेडिकल इक्विपमेंट की डिजाइनिंग आदि के लिए उपयोग में लाया जाता है। रोबोटिक्स के लिए कम्प्यूटर इंटीग्रेटेड मैन्यूफैक्चरिंग, मैकेनिकल, मैकेनिकल इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, बायोलॉजिकल मैकेनिक्स, सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग का एप्लिकेशंस आवश्यक होता है।

योग्यता
चूँकि रोबोटिक्स एक इंटर-डिसिप्लिनरी कोर्स है। इसलिए इसमें उन छात्रों के लिए आमंत्रण है, जिन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, इंस्ट्रूमेंटेशनल इंजीनियरिंग या कम्प्यूटर इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन किया हो तथा जिनकी रोबोटिक्स तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में अभिरुचि हो।

सामान्यतः रोबोटिक्स के लिए बी टेक या बीई कम्प्यूटर, आईटी, मैकेनिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिकल को आदर्श योग्यता माना जाता है। आईआईटी दिल्ली, कानपुर, मुंबई, चेन्नई, खड़गपुर, गुवाहाटी तथा रूड़की सहित कई इंजीनियरिंग संस्थानों द्वारा रोबोटिक्स तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं।

रोजगार के अवसर
रोबोटिक्स एक उभरता हुआ क्षेत्र है। इसलिए यहाँ रोजगार के नए-नए और बेहतरीन अवसर उपलब्ध हैं। रोबोटिक्स में करियर बनाने वाले या तो इंडस्ट्रीयल रोबोट्स के निर्माण या एप्लिकेशन स्पेसिफिक रोबोट के क्षेत्र जैसे कि बम निष्क्रिय करने के काम तथा अन्य सुरक्षा कार्यों में रोबोट के उपयोग से संबंधित कार्य कर सकता है। रोबोट से वैक्यू क्लीनिंग जैसे घरेलू काम भी लिए जा सकते हैं। रोबोटिक्स के क्षेत्र में सतत अनुसंधान जारी है। इस क्षेत्र में भी करियर निर्माण की अपार संभावना है।

भारत में स्कोप
रोबोटिक्स में एमई करने वाले छात्र इसरो जैसे अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में रोजगार के विशिष्ट अवसर प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही माइक्रोचिप बनाने वाले उद्योगों में भी उनकी खासी माँग है। उनके आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में अनुसंधान में कार्य करने के लिए आईआईटी के दरवाजे भी खुले हुए हैं। इतना ही नहीं, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑव बायोलॉजी भी रोबोटिक्स तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में अनुसंधान के लिए फैलोशिप प्रदान की है।

विदेशों में स्कोप
रोबोटिक्स इंजीनियर को अमेरिका की प्लास्टेक जैसी कंपनियों में रोबोटों को प्रोग्राम करने, ट्रबलशूट तथा अनुरक्षण के लिए रोजगार के शानदार अवसर उपलब्ध हैं। मानवीय रोबोटिक्स तथा कम्प्यूटेशनल न्यूरोसाइंस के क्षेत्र में रिसर्च करने वाली प्रीमियर रिसर्च संस्थान एटीआर में भी रिसर्च फैलोशिप के अवसर भी उपलब्ध हैं। इनटेल जैसी कंपनियों द्वारा माइक्रोचिप निर्माण के लिए रोबोटिक्स तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्पेशलिस्ट को नियुक्त करते हैं।

उत्तरी अमेरिका स्थित रोबोटिक्स इंडस्ट्रियल एसोसिएशन रोबोट मैन्यूफैक्चरिंग एंड मेंटेनेंस सिस्टम्स इंटिग्रेशन में रोजगार के अवसर प्रदान करता है। साथ ही जो लोग रोबोटिक्स को अंतरिक्ष विज्ञान में उपयोग में लाने की अभिरुचि रखते हैं, उनके लिए नासा सबसे अच्छा करियर निर्माण स्थल है।

रोबोटिक्स के क्षेत्र
रोबोटिक्स का कोर्स छात्रों को निम्नलिखित क्षेत्र में प्रशिक्षित कर शिक्षा प्रदान करता है-
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
हकम्प्यूटर एडेड मैन्यूफैक्चरिंग
- इंस्टीट्यूट कम्प्यूटर इंटीग्रेटेड मैन्यूफैक्चरिंग सिस्टम
- कम्प्यूटेशन ज्यामेट्री
- रोबोट मोशन प्लानिंग
- डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स
- माइक्रो प्रोसेसर्स
- रोबोट मेनिपुलेटर्स
कुशल रोबोटिक्स इंजीनियर अपनी सुविज्ञता को मॉडर्न वेलफेयर, सर्जरी, नेनो टेक्नॉलॉजी, स्पेस एक्सप्लोरेशन तथा अन्य कई क्षेत्रों में उपयोग में ला सकता है।

पारिश्रमिक
रोबोटिक्स के क्षेत्र में योग्य और गुणी प्रोफेशनल्स के सामने करियर निर्माण का एक सुनहरा संसार बाहें पसारे खड़ा है। भारत में भी रोबोटिक्स का धड़ाके से आगमन हो रहा है। जहाँ तक इस क्षेत्र में पारिश्रमिक का प्रश्न है, इस क्षेत्र में बेहतरीन पे-पैकेज की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। सामान्यतः आरंभिक वेतन 25 हजार से लेकर 60 हजार के बीच हो सकता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा योग्य रोबोटिक्स प्रोफेशनल्स को ज्यादा सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं।

रोबोटिक्स से जुड़े संस्थान
निम्नलिखित प्रमुख संस्थानों के अतिरिक्त देश की कई नेशनल यूनिवर्सिटियों द्वारा अपने इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम
में रोबोटिक्स को एक विशेष विषय के रूप में पढ़ाया
जाता है :-
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, दिल्ली
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, मुंबई
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, कानपुर
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, मद्रास
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, गुवाहाटी
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, खड़गपुर
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, रूड़की
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, हैदराबाद यूनिवर्सिटी
- जादवपुर यूनिवर्सिटी-एमई रोबोटिक्स
- कोचिन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी, कोचि
- वीरमाता जीजाबाई टेक्नॉलॉजी, इंस्टीट्यूट, मुंबई
- थापर इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नॉलॉजी, पटियाला
- यूनिवर्सिटी ऑफ हैदराबाद
- उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद
- एमएम यूनिवर्सिटी, बड़ौदा

Friday, July 10, 2015

केमोइंफॉर्मेटिक्स: रासायनिक सूचनाओं का प्रबंधन में करियर

केमोइंफॉर्मेटिक्स केमिस्ट्री की सबसे तेजी से विकसित होने वाली शाखा बन चुकी है। आने वाले समय में केमोइंफॉर्मेटिक्स का कोर्स करने वाले छात्रों को देश और विदेश में पर्याप्त अवसर मिलेंगे। इस बारे में बता रही हैं नमिता सिंह

इस समय हम ग्लोबल विलेज में जी रहे हैं। आईटी ने कई विधाओं को खुद से जोड़ कर उनका कायाकल्प करने का बीड़ा उठाया है। इसी प्रक्रिया के तहत आईटी का रसायन विज्ञान के साथ सम्मिलन दिन-ब-दिन परवान चढ़ता जा रहा है। इसके अंतर्गत रासायनिक सूचनाओं का संग्रहण, प्रबंधन, विश्लेषण एवं उनका समाधान संबंधी कार्य आते हैं। इस प्रचलित एवं कारगर विधा को नाम दिया गया ‘केमोइंफॉर्मेटिक्स’ अर्थात रसायन सूचना विज्ञान। केमोइंफॉर्मेटिक्स का सबसे ज्यादा उपयोग दवा बनाने वाली कंपनियां दवाओं की खोज में करती हैं। बाजार का विश्लेषण यही बता रहा है कि संभावनाओं एवं विस्तार को देखते हुए आने वाले कुछ वर्षों में यह क्षेत्र और अधिक चमकदार एवं रोजगारपरक हो सकता है, क्योंकि इसका ताल्लुक काफी हद तक आईटी से जुड़ा हुआ है।

बायोइंफॉर्मेटिक्स के दो दशक बाद केमोइंफॉर्मेटिक्स शाखा चलन में आई। आमतौर पर लोग बायोइंफॉर्मेटिक्स व केमोइंफॉर्मेटिक्स को एक ही मानते हैं, जबकि दोनों में काफी विविधता है। बायोइंफॉर्मेटिक्स में जहां कई तरह की विधाओं को शामिल किया जाता है, वहीं केमोइंफॉर्मेटिक्स उसी से निकली एक शाखा है, जिसमें ड्रग डिजाइन के प्रयोग व थ्योरी को भली-भांति समझा जाता है।

उच्च शिक्षा की दरकार
रसायन विज्ञान एवं आईटी से संबंधित होने के कारण इसके पाठय़क्रम में दाखिला लेने के लिए छात्रों को रसायन विज्ञान में कम से कम बीएससी होना चाहिए, तभी एमएससी में प्रवेश मिल पाता है। एमएससी दो वर्षीय पाठय़क्रम है। इसके उपरांत रिसर्च एवं एकेडमिक फील्ड में जाने का मार्ग प्रशस्त होता है। अधिकांश संस्थान स्नातक के पश्चात एक वर्षीय पीजी डिप्लोमा एवं डिप्लोमा जैसे कोर्स भी करवाते हैं। इसकी अवधि एक से लेकर डेढ़ वर्ष तक होती है। विदेशों में सबसे ज्यादा प्रचलित एमएससी इन केमोइंफॉर्मेटिक्स है, जबकि भारत में एक वर्षीय पीजी डिप्लोमा की अधिक डिमांड है। कई संस्थान डिस्टेंस लर्निंग के जरिए भी पीजी डिप्लोमा कोर्स कराते हैं। योग्यता व कोर्स अवधि रेगुलर की तरह ही होती है।

पाठ्य़क्रम
एमएससी इन केमोइंफॉर्मेटिक्स के अंतर्गत छात्रों को विशेष रूप से डाटा बेस, प्रोग्रामिंग, वेब टेक्नोलॉजी, डाटा माइनिंग एवं कम्प्यूटर द्वारा ड्रग डिजाइनिंग आदि कार्य शामिल हैं। पाठय़क्रम के दौरान छात्रों से कई तरह के प्रायोगिक प्रशिक्षण एवं प्रबंधन संबंधी कार्य कराए जाते हैं, जबकि पीएचडी आदि पाठय़क्रमों के अंतर्गत रिसर्च वर्क में ड्रग की खोज, डिजाइन एवं उसकी कंपोजिशन का अध्ययन किया जाता है। वैसे भी केमिस्ट्री की निर्भरता दिन-प्रतिदिन कम्प्यूटर पर बढ़ती ही जा रही है। नए आने वाले छात्रों की केमिस्ट्री के प्रति रुचि को देख कर पाठ्य़क्रम की रूपरेखा काफी हद तक उचित भी है। जहां तक पीजी डिप्लोमा के पाठय़क्रम का सवाल है तो वह विभिन्न मॉडय़ूल में बांटा गया है। इसमें केमोइंफॉर्मेटिक्स की बेसिक जानकारी से लेकर मॉडर्न कॉम्बिनेशन ऑफ केमिस्ट्री, ड्रग डिजाइन, केमिकल इंफॉर्मेशन सोर्स, मेडिसिनल केमिस्ट्री आदि को विस्तार से बताया जाता है।

स्वयं से सरोकार
पाठ्य़क्रम अथवा रोजगार के लिए छात्रों को अपने अंदर कई तरह के विशिष्ट गुण लाने पड़ते हैं। सर्वप्रथम उन्हें केमिस्ट्री के प्रति रुचि बढ़ाने, कम्प्यूटर स्किल्स मजबूत करने व रिसर्च वर्क के प्रति उत्साह जागृत करना आवश्यक हो जाता है। इसके अलावा इसमें प्रोफेशनल्स को धैर्यवान व परिश्रमी होना जरूरी है, क्योंकि कई बार किसी रिसर्च अथवा प्रोजेक्ट पर काम के दौरान लंबा समय व्यतीत होता है। साथ ही टीम वर्क, अनुशासन व बाजार में बदलाव को स्वीकार करने का गुण होना भी जरूरी है।

कार्यक्षेत्र का संसार
पिछले तीन वर्षों में इस क्षेत्र में संभावनाएं काफी प्रबल हुई हैं। खासतौर पर फार्मास्यूटिकल, एग्रोकेमिकल एवं बॉयोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्रीज में प्रशिक्षित लोगों की भारी कमी महसूस की गई है। केमोइंफॉर्मेटिक्स में एमएससी करने वाले छात्र प्रारंभ में केमोइंफॉर्मेटिक्स साइंटिस्ट, प्रोजेक्ट मैनेजर, केमोइंफॉर्मेटिक्स डेवलपर, ड्रग डिस्कवरी साइंटिस्ट, एसोसिएट रिसर्च साइंटिस्ट, कम्प्यूशनल केमिस्ट, केमिकल डाटा साइंटिस्ट, रेगुलेटरी अफेयर्स, सीनियर इंफार्मेशनल एनालिस्ट, इंफार्मेशनल ऑफिसर, डाटा ऑफिसर, सॉफ्टवेयर टैस्टर, सपोर्ट एनालिस्ट, बिजनेस एनालिस्ट कार्यक्षेत्र के अवसरों को देखते हुए निम्न क्षेत्रों में सामने आ सकते हैं-

फार्मास्यूटिकल/केमिकल इंडस्ट्री सेक्टर,
आईटी/कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर सेक्टर,
हॉस्पिटल/हेल्थ ऑथारिटी,
शोध के क्षेत्र में

आमदनी
इस क्षेत्र में आमदनी भी भरपूर होती है। शुरुआती दिनों में भले ही कुछ संघर्ष की स्थिति आ जाए, पर एक समय के बाद सब कुछ पटरी पर आ जाता है। प्रारंभ में प्रोफेशनल्स को 15-20 हजार रुपए प्रतिमाह मिलते हैं। अनुभव बढ़ जाने पर यही रकम 35-40 हजार रुपए प्रतिमाह तक पहुंच जाती है। इसके अलावा फ्रीलांसिंग में प्रतिदिन या पैकेज के हिसाब से पेमेंट दिया जाता है। विदेशों में काफी आकर्षक पैकेज मिलता है।

संभावनाएं
छात्रों को रोजगार मिलने की आस एवं संभावनाओं को देखते हुए प्रमुख सरकारी एवं गैर सरकारी कंपनियों में अवसर सामने आते रहते हैं। देश के साथ-साथ विदेश में भी रोजगार के पर्याप्त अवसर मौजूद हैं। पार्ट टाइम व स्वतंत्र रूप से भी इस क्षेत्र में काम किया जा सकता है।

एक्सपर्ट्स व्यू/

देश में भी हैं बेशुमार मौके
एक समय ऐसा था, जब कोर्स करने के पश्चात छात्रों को विदेश की ओर रुख करना पड़ता था। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। वर्तमान समय केमोइंफॉर्मेटिक्स के लिए काफी अच्छा है। सफलतापूर्वक कोर्स करने के पश्चात कई भारतीय कंपनियां छात्रों को आकर्षक पैकेज पर काम दे रही हैं। सबसे ज्यादा मौके फार्माकेमिकल में सामने आ रहे हैं, जबकि पढ़ाई के लिहाज से डिस्टेंस लर्निंग का भी चलन बढ़ा है। जिन छात्रों को डिस्टेंस लर्निंग की प्रक्रिया के तहत कोर्स समझ में नहीं आता, उन्हें फैकल्टी उपलब्ध करा कर इसके प्रमुख टॉपिक से अवगत कराया जाता है। इसमें मेल व फीमेल दोनों के लिए समान रूप से अवसर मिलते हैं। छात्रों को सलाह दी जाती है कि वे जो भी पढ़ें, पूरे मन से पढ़ें।
अंशुल कुमार, प्रोग्राम डायरेक्टर,
इंस्टीटय़ूट ऑफ केमोइंफॉर्मेटिक्स,
नोएडा

फैक्ट फाइल

प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान
भारतीय संस्थान

मालाबार क्रिश्चियन कॉलेज, कोझिकोड
वेबसाइट - www.mcccalicut.org

इंस्टीटय़ूट ऑफ केमोइंफॉर्मेटिक्स स्टडीज, नोएडा
वेबसाइट - www.cheminformaticscentre.org

जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली
वेबसाइट - www.jamiahamdard.ac.in

विदेशी संस्थान

जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी,
वेबसाइट -  www.jhu.edu

मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी,
वेबसाइट - www.manchester.ac.uk

शेफिल्ड यूनिवर्सिटी,
वेबसाइट - www.shef.ac.uk/courses

इंडियाना यूनिवर्सिटी,
वेबसाइट - www.informatics.indiana.edu